Thursday, August 6, 2026

कौन है जिम्मेदार? स्वयं प्रकृति या फिर मानव?

 कौन है जिम्मेदार? स्वयं प्रकृति या फिर मानव?


आज मानव अपनी सुख -सुविधा के लिए प्रकृति से खिलवाड़ करने से नहीं चूक रहा है। अनियोजित शहरीकरण और औद्योगिक गतिविधियों के कारण जंगल कट रहे हैं, ऊँची -ऊँची अट्टालिकायें बन रही हैं। विकास के नाम पर यह न केवल शहरी क्षेत्रों में वरन गाँवों तथा पहाड़ी क्षेत्रों में भी हो रहा है। वनों की कटाई से कार्बन डाइऑक्साइड का संतुलन बिगड़ता है, क्योंकि जंगल कार्बन सिंक के रूप में कार्य करते हैं। वह कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर वायुमंडल को शुद्ध करते हैं। 

पेड़ों के कम होने के कारण पर्यावरण में ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का संतुलन बिगड़ता जा रहा है।

 बिजली, परिवहन और उद्योगों में जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल, गैस) के निरंतर बढ़ते उपयोग से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने के कारण पूरे विश्व में तापमान में वृद्धि हो रही है। क्लाइमेट चेंज का यह महत्वपूर्ण कारक हो है।

क्लाइमेट चेंज समुद्र के स्तर में वृद्धि के साथ बाढ़, सूखा, तूफान इत्यादि के लिए जिम्मेदार है जिसके कारण पर्यावरण में इकोलॉजिकल परिवर्तन हो रहा है जो जान माल के नुकसान का कारण बन रहा है।

अगर इंसान ने अपनी जीवन शैली नहीं बदली, अनियंत्रित गति से ऐसे ही बढ़ता रहा तो वह दिन दूर नहीं ज़ब हमारी खूबसूरत धरा सिसकेगी इसका जिम्मेदार सिर्फ और हम इंसान ही होंगे।


सुधा आदेश 


Thursday, July 30, 2026

 क्लाइमेट चेंज का कौन है जिम्मेदार? स्वयं प्रकृति या फिर मानव?


आज मानव अपनी सुख -सुविधा के लिए प्रकृति से खिलवाड़ करने से नहीं चूक रहा है। अनियोजित शहरीकरण और औद्योगिक गतिविधियों के कारण जंगल कट रहे हैं, ऊँची -ऊँची अट्टालिकायें बन रही हैं। विकास के नाम पर यह न केवल शहरी क्षेत्रों में वरन गाँवों तथा पहाड़ी क्षेत्रों में भी हो रहा है। वनों की कटाई से कार्बन डाइऑक्साइड का संतुलन बिगड़ता है, क्योंकि पेड़ कार्बन सिंक के रूप में कार्य करते हैं और CO2 को अवशोषित करते हैं. 

पेड़ों के कम होने के कारण पर्यावरण में ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का संतुलन बिगड़ता जा रहा है।


 बिजली, परिवहन और उद्योगों में जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल, गैस) के निरंतर बढ़ते उपयोग से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने के कारण पूरे विश्व में तापमान में वृद्धि हो रही है। क्लाइमेट चेंज का यह महत्वपूर्ण कारक हो है।


क्लाइमेट चेंज समुद्र के स्तर में वृद्धि के साथ बाढ़, सूखा, तूफान इत्यादि के लिए जिम्मेदार है जिसके कारण पर्यावरण में इकोलॉजिकल परिवर्तन हो रहा है जो जान माल के नुकसान का कारण बन रहा है।


अगर इंसान ने अपनी जीवन शैली नहीं बदली, अनियंत्रित गति से ऐसे ही बढ़ता रहा तो वह दिन दूर नहीं ज़ब हमारी खूबसूरत धरा सिसकेगी इसका जिम्मेदार सिर्फ और हम इंसान ही होंगे।


सुधा आदेश 


Monday, July 27, 2026

पेपर लीक की समस्या का समाधान हो पायेगा.

 पेपर लीक  सिर्फ भारत की नहीं वरन वैश्विक समस्या है।  कुछ दिन पहले लंदन में भी पेपर लीक हुआ था। बस अंतर इतना है कि वहां आरोपियों पर तुरंत कार्यवाही हो जाती है लेकिन हमारे देश कि लचर क़ानून व्यवस्था के कारण आरोपियों को सजा नहीं मिल पाती 

सच हमारा समाज नैतिक रूप से इतना गिर गया है कि उसे अपने स्वार्थ ए अतिरिक्त कुछ नजर नहीं आता। अपने हित के लिए वह अपने देश और समाज का ही अहित करने में पीछे नहीं रहता। यहाँ तो पेपर बनाने वाले ने ही पेपर लीक कर दिया। 

लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी के द्वारा किया आंदोलन पेपर लीक पर कम अपने स्वार्थ के लिए अधिक था, ऐसा मुझे लगता है। जब नीट की परीक्षा दुबारा हो गई, सफल अभ्यर्थी एडमिशन लेने की तैयारी कर रहे हैं तब इस आंदोलन का क्या औचित्य? हाँ अगर ये इस बात पर आंदोलन करते कि दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिले, जिससे यह गलती दुबारा न हो तो बात समझ में भी आती है या फिर उस न्याय व्यवस्था  के विरुद्ध करते जहाँ डेट पर डेट लगती जाती हैं किन्तु न्याय नहीं मिल पाता या उन वकीलों के विरुद्ध करते जो पैसों के लिए केस को दुर्बल कर देते हैं या आतंकियों के लिए रात में भी कोर्ट खुलवा लेते हैं। इसके साथ आश्चर्यजनक बात तो यह रही कि इस मंच से देश विरोधी नारे भी लगे।

माना पेपर लीक बहुत बड़ी समस्या है लेकिन क्या सिर्फ लीक करने वाला दोषी है? क्या वे दोषी नहीं हैं जो अपने नालायक बच्चों को योग्य बनाने के लिए  येन केन प्रकारेण किसी हद तक भी जा सकते हैं।

बच्चों को योग्य बनाना, उसके सुखी एवं समृद्ध जीवन की कामना हर इंसान करता है किन्तु जिसके जीवन की नींव ही झूठ और फरेब पर बनी होगी वह भविष्य में कैसा होगा उसकी कल्पना ही की जा सकती है।

मेरा मानना है कि जो लक्ष्य के प्रति समर्पित रहता है, उसे सिर्फ अपना लक्ष्य ही दिखाई देता है। इस आंदोलन का वही हिस्सा बने जिन्हें पढ़ाई से कोई मतलब नहीं है, वरना इनके मुँह से इतनी अश्लील बातें…



Wednesday, June 10, 2026

इस्तेमाल

 इस्तेमाल


न ढोलक बजी, न बजे नगाड़े,

न लड्डू बँटे, न लोरी के सुर उठे,

छाई चहुँ ओर उदासी

मानो आ गई है

कोई अनचाही ।


पलती रही, बढ़ती रही

सहेजती रही...

निर्दोष स्वप्न,निर्दोष रिश्ते

बेगानों का लिये एहसास

आखिर थी तो पराया धन ।


वह समय भी आया

जब पराये धन को

उसके अपनों ने

दुनिया की नजरों से बचाकर

सौंप दिया बेगानों को ।


नई जगह, नया रूप

कुछ बंदिश,कुछ उन्मुक्तता

लक्ष्मी कहलाई, धात्री बनी,

बहू बनी, पत्नी बनी, 

पर नहीं मिला आशियाना ।


किलकारियों से गूंजा घर आंगन,

सार्थक हुआ मातृत्व

दूर हुआ परायेपन का एहसास

जिस ममता के लिये तरसी वह

उस ममता से उसे सिंचित किया ।


उड़ता देख नीलाम्बर में 

तन-मन से होकर तृप्त

ढेरों आशीषों के संग

नित सफलता की 

कामना करती रही ।


आया वह दिन भी

जो समय दिया था

पहले निज अंश को

अब अंश के अंश पर

न्यौछावर करने लगी ।


जीवन के अंतिम पड़ाव पर

ममता का छीजता दामन लिये

विस्मित खड़ी है

न पिता,न पति, न बच्चे

सबने उसे इस्तेमाल ही किया।

सुधा आदेश 

Tuesday, June 2, 2026

कौमें मिटती नहीं

 कौमें मिटती नहीं 


खून तुमने भी बहाया 

हमने भी बहाया

मिली आजादी 

जश्न दोनों ने मनाया 

दो टुकड़े में बंटा देश 

गम नहीं था फिर भी 

रहेंगे भाई-भाई की तरह 

था मन में सकून।


न जाने कब तुम 

मानव से बन गये दानव 

खून चूसते रहे तुम 

निर्दोषों का 

सहन करते रहे हम 

देते रहे बार -बार 

सुधरने का अवसर 

तुम न सुधरे 

बढ़ता गया 

तुम्हारा जूनून।


धर्म और राजनीति के नाम पर 

चलाओगे कितनी गोलियां 

मत भूलो 

नाम अलग हैं तो क्या 

रंग तो एक ही है खून का

मत फैलाओ 

इतना उन्माद 

साँसो को भी 

नसीब न हो चैन।


तुम हमें नहीं जानते,

न हम तुम्हें 

हम कभी मिले भी नहीं 

फिर मन में यह कटुता, 

विषाक्तता कैसी…

इंसान तुम भी हो 

इंसान हम भी हैं 

फिर ये नफरतों के 

कैसे अरण्य!!


मत भूलो कौमें मिटती नहीं 

मिट जाते हैं मिटाने वाले 

अभी भी न समझे

सदियों पुरानी बात 

न तुम रहोगे न देश तुम्हारा

कोरी धमकी नहीं, है संकल्प 

गर सहिष्णुता का 

न कर पाये सम्मान।


अभी तो झांकी ही देखी है

चाहते हो निज देश की सलामती

छोड़ दो फ़िरक़ा परस्ती

देखो कितनी हसीन है दुनिया 

चैन से तुम रहो 

चैन से हम रहें

सर्वधर्म सम्भाव का 

अपना कर मंत्र।


कोई धर्म नहीं सिखाता 

ईर्ष्या, बैर भाव 

छोड़ कर नफरतें 

चलो करें 

विश्व बंधुत्व की बात 

एकता की पेश करें 

एक ऐसी मिसाल

जिसके लिए हुए कुर्बान 

हमारे वीर जवान।

सुधा आदेश 

Tuesday, May 12, 2026

मेरे गुरु -मेरे मार्गदर्शक

 मेरे गुरु- मेरे मार्गदर्शक   


  “ज्ञान की प्रथम गुरु माता है। कर्म का प्रथम गुरु पिता है। प्रेम का प्रथम गुरु स्त्री है और कर्तव्य का प्रथम गुरु स्त्री है।” 

- आचार्य चतुर सेन


“गुरु में हम पूर्णता की कल्पना करते हैं अपूर्ण मनुष्यों को गुरु बनाकर हम अनेक भूलों का शिकार बन जाते हैं।” - महात्मा गांधी


अगर मैं कबीरदास जी का दोहा उदधृत न करूँ तो मेरी बात अधूरी ही रहेगी... 


गुरु कुम्हार शिष्य कुम्भ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ें खोट  

अंदर हाथ सहार देत, बाहर बाहै चोट।

         

अर्थात गुरु कुम्हार तथा शिष्य घड़े के समान है। जैसे कुम्हार घड़े को गढ़ते समय उसमें से मिट्टी के ढेले और अन्य अशुद्दियों को बाहर निकलता है वैसे ही गुरु भी शिष्य के दुर्गुणों को दूर करने का प्रयास करता है। जैसे वह घड़े को भीतर से हाथ सहारा देकर तथा बाहर से चोट मारकर आकार देता है ,वैसे ही गुरु भी शिष्य को भीतर से सहारा देकर तथा बाहर से डांट फटकार कर सहारा देते हैं।   


भगवान श्री कृष्ण के अनुसार गुरु वह है जो मनुष्य की स्वतन्त्रता को स्वीकार कर, उसे स्वतंत्र बनने में सक्षम बनाता है अतः गुरु वह नहीं होता जो बच्चों को किताबी ज्ञान दे वरन गुरु वह भी होता है जो हमारा उचित मार्गदर्शन करे। मेरा मानना है कि जन्म से लेकर मृत्यु तक मानव का  ज्ञान अर्जित करने का शैशव काल ही चलता रहता है। जिस दिन बच्चा आँखें खोलता है उस दिन उसका पहला परिचय माँ से होता है। माँ का स्पर्श उसके सांसरिक ज्ञानचक्षु खोलने का पहला कदम होता है। धीरे-धीरे उसका अपने आस-पास की ध्वनियों,वस्तुओं के देखकर समझने की कोशिश करता है। बोलने से पूर्व उसका हँसना, रोना उसके मन में चलते भावों का ही प्राकट्य रूप ही है। उसके मुंह से निकला पहला अक्षर उसके इस संसार को देखने समझने की प्रक्रिया के फलस्वरूप ही है।


पहला अक्षर वह माँ से ही सीखता है इसलिए कहा जाता है उसकी मातृभाषा वही होती है जो उसकी माँ बोलती है। धीरे-धीरे जैसे-जैसे वह परिवार के अन्य लोगों के संपर्क में आता है उसकी शब्द सामर्थ्य बढ़ने लगती है। वह हर चीज को छूने,उसे पहचानने तथा उसे उसके नाम से पुकारने की कोशिश करता है। माँ-पिता की गोद उसके लिए वात्सल्य से भरपूर तो होती ही है,उसे सुरक्षा का भी एहसास कराती है। दादी-नानी से कहानी सुनकर उसकी सोचने, समझने की शक्ति बढ़ती है तो दादा-नाना की अंगुली पकड़कर वह बाहर की दुनिया से परिचित होता है।

       

मुझे यह कहने में जरा भी अतिशयोक्ति नहीं है कि मेरे प्रथम शिक्षक मेरे माँ-पिताजी थे। बच्चा चाहे कितना भी छोटा हो,बचपन के कुछ दृश्य उसके हृदय की हार्ड डिस्क में सुरक्षित रह जाते हैं जो सदा याद रहते हैं। मुझे आज भी वह दृश्य याद है जब माँ की गोदी में बैठी, मैं पिताजी को ऑफिस जाते हुए हाथ हिलाकर बाय-बाय करती थी। जब मैं तीन वर्ष की थी तब सरस्वती पूजा के दिन माँ के द्वारा मुझे हाथ पकड़कर स्लेट पर ॐ लिखवाना भी याद है। 


मेरे पिताजी का स्थानांतरणीय जॉब था। हर दूसरे तीसरे वर्ष स्थानांतरण के कारण, मेरी शिक्षा एक जगह नहीं हुई वरन कई जगह हुई इसलिए मुझे शिक्षक शिक्षिकाओं के नाम तो याद नहीं हैं किन्तु उनकी स्मृतियों के खट्टे-मीठे पल अभी भी मेरे जेहन में बसे हुए हैं जो मुझे जीवन जीने की प्रेरणा तो देते ही हैं,जीवन की बुराइयों से भी दूर रखने की शिक्षा देते हैं।


कहा जाता है कि कमजोरियां इंसान का मानवीय स्वभाव है। इनसे शिक्षक भी अछूता नहीं है। ऐसे ही कुछ खट्टे-मीठे पल मेरी ज़िंदगी में भी आए। अपने स्कूल का पहला दिन या प्रथम शिक्षक या शिक्षिका तो याद नहीं है लेकिन जब मैं दूसरी कक्षा में थी तब मुझे अपनी शिक्षिका के साथ, अपना वह क्लास रुम भी याद है जब मैंने अपनी शिक्षिका से जीवन की प्रथम शिक्षा प्राप्त की थी कि छिपा कर किया गया कोई काम उचित नहीं है। 


मैं उस समय मात्र पाँच या छह वर्ष की रही होंगी किन्तु घर के शिक्षित परिवेश के कारण तब तक मैं हिन्दी थोड़ा-थोड़ा पढ़ना लिखना सीख गई थी। नया-नया पढ़ना सीखने के कारण मुझे जो भी मिलता, उसे पढ़ना चाहती थी विशेष कर कहानी की पुस्तक। उस दिन मेरी एक मित्र, नाम याद नहीं है, एक कहानी की पुस्तक स्कूल लेकर आई थी। उसने मुझे दिखाई तो मैंने उससे घर ले जाने की इजाजत मांगी किन्तु उसने मना कर दिया। उसके मना करने पर मैंने सोचा कि क्यों न इस पुस्तक को स्कूल में ही पढ़ लिया जाए। स्कूल ब्रेक में मैंने पुस्तक को पढ़ना प्रारम्भ किया किन्तु समाप्त नहीं कर पाई। कक्षा में शिक्षिका ने पढ़ना  शुरू कर दिया  किन्तु मेरा पढ़ना जारी रहा। शिक्षिका ने जब मेरा नाम पुकारा तो पढ़ने में मगन मुझे उनकी आवाज़ सुनाई नहीं दी। ज़ब मैंने कोई उत्तर नहीं दिया तब  वह मेरे पास आईं तथा मुझसे पुस्तक लेते हुए बोलीं, “कहानी पढ़ना अच्छी बात है किन्तु कक्षा के अंदर पढ़ाई पर ध्यान देना भी आवश्यक है। आगे से तुमने ऐसा किया तो पुस्तक तो ले ही लूँगी,तुम्हें सजा भी दूँगी।”


उस दिन उनकी चेतावनी से मुझे उचित-अनुचित का अंतर पता चला। 


एक अन्य शिक्षिका जब मैं 9वीं कक्षा थी, हमें बायोलोजी पढ़ाती थीं। वह इतना अच्छा पढ़ाती थीं कि अगर स्कूल में उनका पढ़ाया पाठ छात्र ध्यान से सुन लेते तो मनमस्तिष्क में ऐसा बैठ जाता था कि उसे बार-बार दोहराने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। उनका कहना था कि जब भी पढ़ो कागज पेन साथ में रखो। जो भी पढ़ रहे हो,उसे लिखो। जहां चित्र की आवश्यकता है उसे बनाओ,उसे लेबिल करो इससे पाठ के उस भाग को न केवल भलीभाँति समझ पाओगे वरन स्पेलिंग में गलती भी नहीं होगी। उनकी इस शिक्षा ने विज्ञान विषय के प्रति रुचि ही नहीं जगाई वरन पढ़ाई करने के तरीके को भी बताया। मेरी यह आदत आज भी नहीं बदली है।


याद आता है मुझे वह समय जब मैं 7वीं कक्षा में राजकीय इंटर कॉलेज बाराबंकी में पढ़ती थी। मेरे पिताश्री वहाँ एस.डी.एम.थे। मेरे स्कूल की प्रिंसिपल जो हमें गणित भी पढाती थीं,को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने मुझे अपने कक्ष में बुलाकर,अपने पिताजी से कहकर उस समय चल रहे देवा के मेले के लिए अपने लिए विशेष प्रबंध करवाने के लिए कहा। मेरे पिताजी बहुत ही ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ तथा उसूलों पर चलने वाले थे। उन्होंने मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया। उसी वर्ष फाइनल परीक्षा में मैं बीमार हो गई तथा कुछ विषय की परीक्षा नहीं दे पाई। उसी वर्ष पिताजी का स्थानांतरण कसया (कुशीनगर) हो गया। बीमारी का मेडिकल सर्टिफिकेट देने के बावजूद प्रिंसिपल महोदया ने अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए मुझे टी.सी.देने से मना कर दिया। ट्रान्सफर सर्टिफिकेट न होने के कारण कुशीनगर कॉलेज में मुझे आठवीं में दाखिले के लिए प्रवेश परीक्षा पास करनी पड़ी। जो मेरे जीवन की बुरी स्मृतियों में से एक है। जब एक शिक्षिका ने अपनी इच्छा पूरी न होने के कारण उसका बदला एक नादान बालिका से लिया।


ऐसी ही एक घटना और है जब मैंने बी.एस.सी. प्रतापगढ़ से करने के पश्चात एम.एस.सी. करने के लिए गोरखपुर विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। पिताजी के प्रतापगढ़ में रहने के कारण गोरखपुर में मुझे लड़कियों के हॉस्टल में रहना था। एक दिन जब मैं विश्वविद्यालय से घर आ रही थी तो बारिश होने लगी। शाम का समय था। धीरे-धीरे विद्यालय परिसर खाली होने लगा। नई होने के कारण ज्यादा किसी से जानपहचान भी नहीं थी।  बारिश होने के कारण उस दिन कोई सवारी भी नहीं मिली। मैं पैदल ही चल दी। भींगने के कारण बुखार तो हुआ ही,साथ ही अस्थमा का अटैक पड़  गया। यद्यपि हॉस्टल की वार्डन ने डॉक्टर को भी बुलाया,उन्होंने दवा भी दी लेकिन कमरे से बाहर निकलते हुए वार्डन के शब्द मेरे कानों में पड़  गए…


“न जाने कैसे माता-पिता हैं जिन्होंने अपनी बीमार बेटी को हॉस्टल में पढ़ने भेज दिया।”


मुझे सांत्वना देने के बजाय वार्डन को माता-पिता को दोष देते देखकर मन आहत हो गया क्योंकि प्रतापगढ में एम.सी.सी. की सुविधा न होने के कारण, वहाँ बी.एड. में दाखिला होने के बावजूद मैं स्वयं जिद करके गोरखपुर आई थी। यह सच है कि मुझे अस्थमा की समस्या थी किन्तु ऐसा अटैक उस समय तक एक दो बार ही आया था। कुछ ही दिनों पश्चात एक हफ्ते की छुट्टी हुई। मैं घर गई। मेरी हालत देखकर माँ विचलित हो उठीं। उन्होंने कहा,“तेरा यहाँ बी.एड.में दाखिला हो गया है इस वर्ष बी.एड.ही कर ले।”


मस्तिष्क की बजाय मैंने दिल की सुनी। जीवन के निर्णय कुछ ऐसे होते हैं जो जीवन की दिशा बदल देते हैं,मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ क्योंकि बी.एड. के पश्चात मैंने एम.ए. किया। माना वार्डन की बात से मैं आहत हुई थी लेकिन निर्णय तो मेरा था जिसके कारण मेरा एम.एस.सी.करने का स्वप्न,स्वप्न ही रह गया।       

शिक्षक अपने शिष्यों को ज्ञान देता है,उनके ज्ञान चक्षुओं को खोलता है लेकिन जीवन का उद्देश्य क्या है, उसे जीवन में क्या बनना है,क्या करना है,उसे स्वयं तय करना है क्योंकि शिक्षक सदा उसके साथ नहीं रह सकता। शेष जीवन उसे उनकी दी हुई शिक्षाओं से प्रेरणा लेते हुए व्यतीत करना है।


मैंने जीवन को कई बार करवट लेते देखा है। मेरी पहली कविता 11-12 वर्ष की उम्र में प्रस्फुटित हुई थी। माँ-पिताजी के कहने पर मैंने उसे एक प्रतियोगिता में भेजा, मेरी उस पहली कविता को सांत्वना पुरस्कार भी मिला था लेकिन फिर भी लेखन मेरी वरीयता सूची में नहीं था। मैं डॉक्टर बनना चाहती थी, किन्तु नहीं बन पाई। विवाह के पश्चात डॉक्टर बनने के लिए होमियोपैथी का कोर्स पत्राचार माध्यम से किया किन्तु मन नहीं लगा। कुछ करने की कशिश इतनी थी कि अंततः मैंने लेखनी फिर पकड़ी जो आज तक चल रही है। इसके लिए उत्प्रेरक रहे मेरे सहचर आदेश जी तथा मेरे पाठक जिन्होंने समय-समय पर पत्र लिखकर मुझे प्रोत्साहित किया अगर ऐसा न होता तो मेरा लेखन के क्षेत्र में बढ़ा यह कदम बीच में ही सिसक-सिसक कर दम तोड़ देता।


स्वामी विवेकानंद ने शब्द सिर्फ मेरे लिए ही नहीं प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। उनका प्रेरक वाक्य है- “तुमको (व्यक्ति) को अंदर से बाहर विकसित होना है। कोई तुमको न सिखा सकता है न आध्यात्मिक बना सकता है। तुम्हारी आत्मा के सिवा कोई गुरु नहीं है।” 


युवाओं के लिए उनके प्रेरक शब्द थे- “उठो,जागो और तब तक मत रुको जब तक मंजिल प्राप्त न हो।” 


इसमें कोई संदेह नहीं है कि गुरु की शिक्षा के साथ व्यक्ति का आत्मविश्वास,आत्मबल ही उसे सफलता के मार्ग पर ले जा सकता है। किसी भी व्यक्ति के लिए  स्वामी विवेकानंद जी के शब्द उसके जीवन की दिशा को निर्धारित करने हेतु आईना हैं। 

            

मेरा भी यही मानना है कि असली गुरु व्यक्ति की आत्मा दूसरे शब्दों में उसका मनमस्तिष्क है जो उसे अपने जीवन का उद्देश्य निर्धारित करने की क्षमता प्रदान करता है जो उसे सिखाता है कि एक रास्ता बंद हो जाए तो दूसरे भी अन्य रास्ते हैं। उन रास्तों को उसे स्वयं ढूँढना पड़ेगा। 


आज की भाषा में कहूँ तो हर व्यक्ति को स्वयं सीखना पड़ेगा जब वह संसार से डिस्कनेक्ट होने लगे तब वह मन को ऑनलाइन कैसे रखे? मन के सिग्नल को पहचानने तथा तदनुरूप कार्य करने की क्षमता अगर व्यक्ति विकसित कर ले, तो सफलता निश्चित है। अंत में यही कहना चाहूंगी...  


कोई परिपूर्ण नहीं होता      

सीखने की कोई उम्र नहीं होती

जिज्ञासा जिस दिन हुई समाप्त

उस दिन जिंदा, मुर्दा बना इंसान। 



Monday, May 11, 2026

स्वयं को दूसरों की नजरों से देखना बंद करें

 स्वयं को दूसरों की नजरों से देखना बंद करें 

आज युवाओं में शरीर को जीरो साइज का बनाने के लिए दवाएं लेने का प्रचलन बढ़ा है। मूझे लगता है यह प्रवृति आत्मघाती है। दवाइयों से शरीर हो सकता है तात्कालिक रूप से पतला हो जाये किन्तु उसके जो साइड इफ़ेक्ट होंगे वह अंततः शरीर को नुकसान ही पहुंचाएंगे।

       मेरा मानना है कि हमें अपने शरीर से प्यार करना सीखना होगा। हमारे शरीर की बनावट खान-पान के साथ व्यक्ति के जीन (आनुवंशिकी) पर भी निर्भर है।  अगर इंसान अपने शारीरिक  विसंगतियों पर विचलित होने की अपेक्षा आंतरिक गुणों के विकास में ध्यान देगा तो जो जैसा है, उसी में स्वीकार्य होगा। 

         यह अवश्य है कि सांचे में ढला शरीर आत्मविश्वास को बढ़ाता है किन्तु इंसान को अपनी फिटनेस बढ़ाने के लिए प्राकृतिक साधनों को अपनाना चाहिए न कि दवाओं का। 

           जिंदगी आपकी अपनी है फिर दूसरों की नजरों से स्वयं को देखना बंद कीजिये। जीवन आपका अपना है, अपनी तरह से जिएं तभी आप जिंदगी का आनंद ले पाएंगे।


Friday, May 8, 2026

जनादेश का अनादर करती ममता दी...

 ममता जी जब कहती हैं कि मैं इस्तीफा नहीं दूँगी तो न जाने क्यों मुझे रानी झाँसी की याद आ गई। उन्होंने भी कहा था कि मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी।


मुझे अपनी इस सोच पर ग्लानि भी होती है क्योंकि  दोनों में जरा सा भी साम्य नहीं है। रानी झाँसी एक राज्य की रानी थीं जबकि ममता बनर्जी एक लोकतान्त्रिक देश के एक लोकतान्त्रिक राज्य की चुनी हुई प्रतिनिधि। जिस जनता ने उन्हें शासन सौंपा, उसी ने उन्हें सत्ताचयुत भी कर दिया। फिर भी जनता की इच्छा का सम्मान न करना अपनी जिद पर अड़े रहना क्या भारतीय संविधान की अवहेलना नहीं है?


इसके अतिरिक्त वह इंटरनेशनल कोर्ट में जाने की बात कर रही हैं। क्या वह यह नहीं समझ रही हैं कि पश्चिमी बंगाल भारत का हिस्सा है? शायद वह पश्चिमी बंगाल को स्वतंत्र राष्ट्र समझने लगी थीं। इस बार अगर जनता ने उनके मंसूबों पर लगाम नहीं लगाती तो शायद वह अपने मंसूबो में सफल भी हो जातीं। बांग्लादेश के मंत्रियों के बयानों से यह साबित हो भी रहा है।


किन्तु इससे भी आश्चर्य तो इंडी गठबंधन के लोगों की प्रतिक्रिया देखकर हो रहा है जो मोदी विरोध में इतने अंधे हो चुके हैं कि वे ममता के इस संविधान विरोधी रवैये का समर्थन कर उनकी सोच को हवा दे रहे हैं। ऐसे लोग भारतीय जनता को मूर्ख समझते हैं जबकि वे नहीं जानते जनता बेहद परिपक्व है वह जिसे चाहती है दिल खोलकर चाहती है जब नाराज होती है तो ऐसे बदला लेती है कि उसकी लाठी में आवाज़ नहीं होती।


Wednesday, December 3, 2025

धर्म ध्वजा

 धर्म ध्वजा लहराई है 

पुनर्नजागरण की सुबह आई है

उठो, खोलो आँखें, सहेजो विरासत  

संदेसा बस इतना लाई है।


गर्व करो भाषा पर 

पहचानो अपनी संस्कृति 

जिन्दा कौम हो, छोड़ो अचेतनता

संदेसा बस इतना लाई है।


अपनी स्थिति के नियंता तुम 

चैतन्य हो, आगे बढ़ो  

बदलना है, गर जीवन का गान

संदेसा बस इतना लाई है।


प्रेम और सद्भाव जीवन का मूलमंत्र 

वसुधैव कुटुंबकम उद्घोष हमारा  

घृणा, द्वेष का करो परित्याग

संदेसा बस इतना लाई है।


ईश्वर एक धर्म अनेक

सर्व धर्म सम्भाव हो जीवन दर्शन  

अनेकता में एकता हो समग्र चेतना।

संदेसा बस इतना लाई है।


धर्म ध्वजा लहराई है 

पुर्नजागरण की सुबह आई है

पुर्नजागरण की सुबह आई है।

©सुधा आदेश 


Tuesday, September 9, 2025

Gen z

 Gen Z द्वारा नेपाल में जारी आंदोलन क्या उनकी बेरोजगारी, भ्रष्टाचार दूर कर पायेगा? क्या यह पीढ़ी इतनी संवेदनहीन और उच्चश्रृंखल हो गईं है कि उसे अपने ही देश के लोगों को मारने, अपने देश के बैंको को लूटने, देश की संपत्ति जलाने में जरा भी संकोच नहीं होता?


ऐसे लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि देश के विकास में देश के हर नागरिक का योगदान होता है। ये लोग देश को अराजकता में झोंककर स्वयं का ही नुकसान करेंगे। मत भूलिए देश बनाने में सदियाँ लग जाती हैं जबकि मिटाने में पल भर भी नहीं लगता।


आश्चर्य तो भारत के उन चंद नफरती गैंग के नेताओं पर भी होता है जो भारत में भी ऐसे ही हालातों की कल्पना कर रहे हैं।

😔😔

Tuesday, August 19, 2025

एक विचार

 

अगर आप अपने विचार किसी को तर्कसम्मत तरीके से नहीं समझा सकते तो अपशब्दों के द्वारा अपने कुंठित विचारों को प्रकट कर उत्तेजना उत्पन्न कर स्वयं को सही सिद्ध करने का प्रयास करने लगते हैं।

यही राहुल गाँधी और उनकी टीम के साथ हो रहा है। वह ठोस मुद्दे उठाने या अपने संगठन में कमजोरी ढूंढने की बजाय कभी चौकीदार चोर है कहते हैं तो कभी EVM को दोषी ठहराते हैं। एक तरफ SIR का विरोध तथा दूसरी फर्जी वोटर लिस्ट का राग। अब ‘वोट चोर गद्दी छोड़ो’ का नारा। 

आखिर कांग्रेस को मतदाताओं का तिरस्कार करने तथा धमकाने का अधिकार किसने दिया? 

यह तो वही बात तुम मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं, किसी दूसरे को चाहोगी तो मुश्किल होगी।



Sunday, June 22, 2025

लंच के बहाने

प्रधानमंत्री शाहनवाज खान को दरकिनार कर असिम मुनीर को लंच पर बुलाकर उसको पुचकारना सोची समझी साजिश है बड़बोले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की... उनसे नोबल प्राइज के लिए नोमीनेट करवा कर,मुनीर के गले में पट्टा बाँधने के साथ कहीं  ट्रम्प G7 की मीटिंग छोड़कर इसीलिए तो नहीं आये थे कि वह मोदी जी को भी वहां बुलवा कर ऑपरेशन सिंदूर में मध्यस्थता की अपनी बात को सत्य सिद्ध कर सकें किन्तु मोदी जी के मना करने पर यह संभव नहीं हो पाया वरना उनका मोदीजी को फोन करना, उन्हें बुलाना बेमकसद तो नहीं हो सकता।


अमेरिका ने स्वयंभू बनने के चक्कर में उक्रेन को रूस से युद्ध के लिए तो उकसाया ही, अब इजराइल और ईरान के बीच युद्ध को हवा दे रहा है।

आज तो उसने ईरान के एटॉमिक बेस पर हमला करने का दावा भी किया है।


न जाने क्यों पिछले कुछ दिनों से कवि प्रदीप जी का लिखा गीत मेरे मन मस्तिष्क में गूंज रहा है…


एटम बमों के जोर पर ऐंठी है ये दुनिया, बारूद के ढेर पर बैठी है ये दुनिया…


काश! नीति नियंता सामान्य लोगों के बारे में भी सोचते क्योंकि मरते और सहते तो वही हैं। 



Friday, June 13, 2025

स्त्री तुम...

 मेरी डायरी का एक पृष्ठ...


स्त्री तुम…


स्त्री तुम सशक्त बनो प

र इतनी भी नहीं 

कि भूल जाओ 

अपनी संवेदनशीलता

मर्यादा, कर्तव्य

सहनशीलता, विनम्रता

रिश्तों को गूंथने की 

देवीय कला।


तुम सशक्त बनो

मन से तन से 

बनो पिता की शक्ति 

माँ जैसी त्यागिनी

जल, थल, वायु को 

मुट्ठी में बंद करने की कला

देश की प्रगति का 

आधार बनो…


स्त्री तुम सीखो 

जुडो, कराटे, बॉक्सिंग 

पुरुषों के कदम से कदम 

मिलाकर चलने की योग्यता 

प्रतिस्पर्धा करो 

स्वस्थ स्पर्धा 

पर मत सीखना 

अपना ही सिंदूर 

उड़ाने की कला…


सुधा आदेश 

बंगलुरु

Tuesday, June 10, 2025

बच्चों के प्रति माता -पिता की जिम्मेदारी


विलियम वर्ड्सवर्थ अपनी कविता ‘रेनबो’ में कहते हैं -बच्चा ही मनुष्य का पिता है अर्थात आज मनुष्य जो है उसकी आधार शिला बचपन में ही रखी जाती है, जो संस्कार, आदतें या वह बाल्यकाल में सीखता है, वही उसके जीवन पर्यंत रहते हैं।  

बच्चे के पहले शिक्षक अभिभावक होते हैं। जिस माहौल में बच्चा पलता बढ़ता है, उसका उसके व्यक्तित्व पर प्रभाव पड़ता है। दुःख की बात तो यह है कि अभिभावक बच्चों के ऊपर अपने सपने लाद देते हैं। कभी-कभी तो यह दबाव इतना होता है कि बच्चे में सामाजिकता पनप नहीं पाती। वह रिश्ते-नातों, मित्रों से दूर होता हुआ भावनाशून्य होता जाता है। 

वह पुस्तकों का कीड़ा तो बन जाता है किन्तु उसमें व्यावहारिकता नहीं आ पाती। असफलता उसे उद्देलित कर देती है, वह अवसाद का शिकार हो जाता है। 

बच्चों को सिर्फ कक्षा में रैंक लाने के लिए ही तैयार नहीं करना चाहिये वरन उसे जीवन के रणसंग्राम से जूझने के लिए भी तैयार करना आवश्यक है। इसके लिए बच्चों को पढ़ाई के साथ उनकी रुचि के अनुसार प्रशिक्षणअवश्य दिलवाना चाहिए। चाहे वह खेल हो या चेस, तैराकी या अन्य कोई।

आज के समय में बच्चों के सर्वांगीण विकास की जिम्मेदारी सिर्फ स्कूल की ही नहीं है वरन अभिभावकों की भी है क्योंकि भावनात्मक विकास से वंचित व्यक्ति व समाज दोनों के लिए घातक बन जायेगा।


सुधा आदेश 



Thursday, May 8, 2025

ऑपरेशन सिंदूर

 ऑपरेशन सिंदूर 


रणभेरी बज चुकी थी 

आगाज हुआ ऑपरेशन सिंदूर का 

तबाह किये आतंकी ठिकाने 

नेस्तनाबूद होंगे सभी आतंकी 

हिन्द सेना ने आज है ठानी।


बहुत नाज था तुम्हें 

अपने पाले, तराशे

इन दहशतगीरों पर 

भूल गये कयामत का 

आता है दिन भी।


खून बहाकर निर्दोषों का 

आखिर तुम्हें क्या मिला 

सजा मिली, मिलनी ही थी 

मत भूलो आह किसी की 

व्यर्थ नहीं जाती।


गर अब भी न संभले

अभी भी न चेते 

न तुम रहोगे न देश तुम्हारा 

छेड़ोगे तो छोडेंगे नहीं 

हिंद की सेना ने आज है ठानी।


जय हिन्द की सेना 🇮🇳🇮🇳


© सुधा आदेश

Monday, April 28, 2025

शर्मनाक घटना

 पहलगाम में हुई घटना बेहद  दर्दनाक, विचलित करने वाली है। धर्म पूछकर, कलमा न पढ़ पाने पर उनकी पत्नी और बच्चों के सामने ऐसी नृशंस घटना कल्पना से भी परे है पर हुई तो है। शायद ही कोई संवेदनशील इंसान इस घटना के पश्चात् चैन की नींद सो पाया होगा। इसका कारण सिर्फ और सिर्फ एक कौम की वह जिहादी मानसिकता है जिसके अनुसार इस धरती पर सिर्फ उन्हें ही रहने का अधिकार है।

द्वि राष्ट्र का सिद्धांत देकर इस जिहादी मानसिकता को  जिन्ना ने परोसा तथा उसके बाद की पीढ़ियों ने इसे पुष्पित एवं पल्लवित ही किया। इसका उदाहरण पाकिस्तानी जरनल आसिम मुनीर का हाल में दिया भाषण है। 


इस मानसिकता को पूरी तरह समाप्त करना इसलिए संभव नहीं हुआ क्योंकि भारत के राजनेताओं ने प्रारम्भ से ही गंगा जमुनी तहजीब की बात की तथा इसे बनाये रखने की हर संभव कोशिश की है। प्रधानमंत्री मन मोहन सिंह ने तो संसद में ही कहा था कि भारतीय संसाधनों पर पहला अधिकार अल्पसंख्यकों का है।


अल्पसंख्यक…ये अल्पसंख्यक कहाँ हैं कई प्रदेशों में ये बहु संख्यक हैं फिर भी इनका अल्पसंख्यक दर्जा समाप्त नहीं किया आखिर क्यों? 


मोदी जी के आने पर परिस्थितियां बदली हैं। शायद इसी बौखलाहट का परिणाम है पहलगाम अटैक। हमें अगर इस मानसिकता को रोकना है तो पहले भारत में जगह-जगह बने इन पाकिस्तानी पॉकेट और इन जेहादी मानसिकता वालों पर लगाम कसनी होगी लेकिन क्या ऐसा हो पायेगा? वोट के लिए कुछ राजनेता अपने देश की अस्मिता से खिलवाड़ करने से भी नहीं चूक रहे हैं। इसका उदाहरण ममता बनर्जी हैं और केंद्र सुप्रीम कोर्ट (विधायिका के हर फैसले का परिक्षण) करने के कारण इतना लाचार है कि बंगाल में राष्ट्रपति शासन भी नहीं लगा सकता…


 🙏


Sunday, December 22, 2024

अम्बेडकर सिर्फ अम्बेडकर

 संसद का पूरा सत्र ही हंगामे की भेंट चढ़ गया। जो संसद सार्थक बहस के लिए है, वह आज सिर्फ लोकतंत्र का मज़ाक बनाने के लिए राह गई है। आज न कोई सच्चाई कह सकता है न सुन सकता है। इन राजनीतिज्ञयों के लिए जनता तो मूर्ख है। वह न कुछ समझ सकती है, न गुन सकती है। इनके लिए गाँधी और अम्बेडकर एक ऐसे मोहरे हैं जिनके नाम लेने मात्र से इन्हें वोट मिल जायेंगे!

ज़ब तक कांग्रेस सत्ता में थी तब तक न संविधान खतरे में था न ही लोकतंत्र किन्तु 2014 के पश्चात् सब कुछ ख़तरे में पड़ गया क्योंकि वही भारत की एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसने भारत को आजादी दिलवाई इसीलिए उसे ही देश पर शासन करने का अधिकार है। अधिकार भी सिर्फ एक परिवार को है, किसी अन्य को नहीं। 


इस एक परिवार ने अपने सिवा किसी को खड़ा ही नहीं होने दिया।

गाँधी और अम्बेडकर तो उसके लिए लॉलीपॉप हैं जिनका नाम लेकर वह दलितों और अन्य पिछड़ी जातियों को लुभाना चाहती है। अगर वास्तव में उसे दलितों के लिए कुछ करना ही होता तो वह आपने 50 -55 साल के शासन में नहीं करती क्योंकि आरक्षण का प्रविधान तो सिर्फ 10 वर्षों का था। बाद में इसे सिर्फ वोट प्राप्त करने का हथियार बनाया गया।


मुझे याद आ रहा है वह वाकया ज़ब प्रियंका गाँधी पहली बार चुनाव प्रचार में उतरी थीं तो पेपर में खबर छपी थी कि जिस झोंपड़ी से इंदिरा गाँधी ने चुनाव प्रचार शुरू किया था वहीं से प्रियंका गाँधी ने शुरू किया है। इस खबर के साथ झोपड़ी तथा प्रियंका गांधी की फोटो भी थी।


संविधान निर्माण की तीन समितियों के अध्यक्ष पंडित जवाहर लाल नेहरू थे, तो दो-दो समितियों के अध्यक्ष सरदार वल्लभ भाई पटेल एवं डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे और केवल एक समिति के अध्यक्ष थे डॉ. भीमरॉव अम्बेडकर। फिर ऐसा क्यों है कि भारत की हर राजनीतिक पार्टी भारत के संविधान को बाबा साहेब अम्बेडकर का दिया हुआ संविधान कह कर अपना उल्लू सीधा करना चाहती है। क्या अन्य लोगों का संविधान के निर्माण में कोई योगदान नहीं था।


मेरे विचार से जितने महत्वपूर्ण संविधान सभा के अध्यक्ष एवं उससे जुड़े अन्य सदस्य थे उतने ही महत्वपूर्ण भारतीय संविधान की मूल प्रति को सजाने वाले चित्रकार नंदलाल बोस थे। नंदलाल बोस और उनके शिष्य राममनोहर सिन्हा ने मिलकर संविधान की मूल पांडुलिपि को सजाया था।नंदलाल बोस ने अपने छात्रों के साथ चार साल में संविधान को 22 चित्रों और बॉर्डर से सजाया था।



Wednesday, December 11, 2024

माता-पिता का बच्चों के प्रति दायित्व

 नींव के पत्थर हैं ये

तराशों इन्हें 

मुरझा न जायें  

सम्भालो इन्हें।


आज विज्ञान ने भी सिद्ध कर दिया है कि बच्चों में संस्कारों की जड़ें माँ की कोख में ही पड़ने लगती हैं। बच्चों के साथ समय बिताने, उनके मासूम प्रश्नों का उत्तर देने, उन्हें नैतिक ज्ञान की शिक्षा देने का काम बच्चे की पहली शिक्षक माँ का है, उससे बच्चे आज वंचित हैं। आज के आपाधापी के युग में अधिकतर माता-पिता के पास अपने बच्चों के लिए समय ही नहीं है। 


शिक्षा प्रणाली भी बच्चों को व्यावहारिक या नैतिक शिक्षा देने की बजाय किताबी शिक्षा ही देती है। एकल परिवार तथा एक ही बच्चे की अवधारणा ने पारिवारिक ढांचे को छिन्न-भिन्न कर दिया है। अकेला बच्चा अपनी बात कहे भी तो किससे कहे? बच्चों को अपने स्वप्न पूरा करने का माध्यम बनाने की बजाय उन्हें अपने स्वप्न स्वयं देखने और उन्हें पूरा करने का हौसला दीजिए। 


बच्चों की सफलता-असफलता सिर्फ उसकी ही नहीं, पालकों की भी है। व्यर्थ दोषारोपण करने की बजाय उनके मानसिक स्तर पर उतर कर उनकी समस्याओं को समझ कर उनका मार्गदर्शन करें, उन्हें आपने ध्येय में सफलता प्राप्त करने के लिए कर्मठता का महत्व समझायें तभी वे बच्चों को शानदार जीवन के लिए तैयार करने के साथ जिम्मेदार नागरिक बना पाएंगे। 






Wednesday, December 4, 2024

यह कैसी प्रवृति

 आजकल sleep divorce और grey divorce की बहुत चर्चा हो रही है। Sleep divorce अर्थात एक ही घर में रहते हुए अच्छी नींद (किसी को डिस्टर्ब न हो ) लेने के लिए युगल अलग -अलग सोने लगते हैं जबकि ग्रे डिवोर्स का मतलब है, जब कोई दंपती 50 साल या उससे ज़्यादा उम्र में तलाक लेता है। इसे सिल्वर स्प्लिटर्स या डायमंड तलाक भी कहा जाता है। ग्रे डिवोर्स शब्द का इस्तेमाल बीते कुछ सालों में ही लोकप्रिय हुआ है. हालांकि, अब 15-20 साल की शादी के बाद अचानक रिश्ता टूटने के मामलों को भी ग्रे डिवोर्स कहा जाने लगा है।

आज के भौतिकता वादी परिवेश के कारण रिश्तों में आती संवेदनहीनता, बदलती परिस्थितियों में बदलती मानसिकता के ये by product हैं। सच तो यह है कि इंसान आज इतना आत्मकेंद्रित होता जा रहा है कि उसमें हम की जगह मैं का तत्व अधिक प्रभावशाली हो गया है। वह शायद यह नहीं जानता कि मनुष्य भले आज अकेला रह ले लेकिन एक समय ऐसा आता है ज़ब सारा रुपया पैसा धरा रह जाता है, व्यक्ति की आँखें अपनों को खोजती हैं। ज़ब कोई रिश्ता ही नहीं रहेगा तो अपना कोई कहाँ रहेगा?

आज लोग बड़े गर्व से कहते हैं कि हमें किसी की आवश्यकता नहीं हैं। सीनियर सिटीजन के लिए बनाये जा रहे रिटायरमेंट होम में फ्लैट लेकर रह लेंगे या हम तो ज़ब तक चलेगा अलग ही रहेंगे क्योंकि वे समझौता नहीं करना चाहते लेकिन मैं कई ऐसे लोगों को जानती हूँ जिन्हें अंतिम समय में बच्चों के पास आना पड़ा, उनकी सहायता लेनी पड़ी।


भूत और भविष्य के दायरे से मुक्त वर्तमान में जीने वाले यही सोचते हैं कि उन्हें कभी किसी की आवश्यकता नहीं पड़ेगी लेकिन वे भूल जाते हैं कि भले ही इंसान अकेला आता है, अकेला ही जाता है किन्तु परिपूर्ण जीवन का एहसास रिश्तों के बीच रहते हुए ही मिलता है। राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त की कविता ‘मनुष्यता’ की पंक्तियाँ आज भी उतनी ही प्रेरक है जितनी कल थी…


यही पशु–प्रवृत्ति है कि आप-आप ही चरे

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।


🙏


Wednesday, October 9, 2024

नई राजनीति की शुरुआत

 

वास्तव में केजरीवाल एक अजूबा ही है। नाम आम आदमी पार्टी और रुतबा चाहते हैं खास का। ये कांग्रेस के भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ते हुए नई तरह की राजनीति की शुरुआत करने आये थे किन्तु इन्होंने प्रारम्भ से ही मोदी सरकार के खिलाफ न केवल झंडा उठाया वरन उनके खिलाफ बनारस से उम्मीदवार भी बने। यह तो देश का सौभाग्य है कि लोगों ने इन्हें नहीं वरन मोदी को चुना। 
इनकी पार्टी सिर्फ देश विरोधियों के साथ मिलकर अराजकता फैलाना चाहती है। भ्रष्टाचार के आरोप में पकड़े गये केजरीवाल ने संविधान कि आड़ लेकर पद त्याग भी नहीं किया। उससे भी बड़ी बात यह हुई कि सर्वोच्च न्यायालय से इन्हें अंतरिम जमानत भी मिल गई।
कोरोना काल में ऑक्सीजन को लेकर हाय तौबा से लेकर शराब कांड के बाद अब स्वाति मालीवाल के साथ घटना…और अब एक नया शिगुफा कि भारतीय जनता पार्टी उन पर हमला करवा सकती है। इसके तार इतने लम्बे जुड़े हैं कि अमेरिका और जर्मनी ने ने इसकी गिरफ्तारी के विरुद्ध आवाज़ उठाई। ख़ालिस्तानियों से जिसे फंड मिल रहा हो, C J I, के मित्र जिनके वकील हों, उन्हें भला अंतरिम बेल क्यों नहीं मिलती? 

वैसे भी क़ानून अंधा है। उन्हें जमानत देने से पूर्व सुप्रीम कोर्ट के जजों ने E D के वकीलों कि दलीलों पर भी ध्यान देना मुनासिब नहीं समझा। आज तो सुप्रीम कोर्ट के पास V I P लोगों के केसेस सुनने के लिए समय है जबकि अन्य लोगों के लिए नहीं…।


मन में बहुत अफ़सोस होता है किन्तु विवश हैं। यह कैसे नियम हैं कि विधायिका, कार्य पालिका का विरोध कर सकते हैं किन्तु न्याय पालिका का नहीं चाहे वह किसी को भी दोषी बना दे या किसी को भी छोड़ दे। उस पर यह आग्रह कि आप सभी के निर्णय पर विश्लेषण का स्वागत है।


अगर ऐसी ही पार्टियां सत्ता में आईं तो न जाने देश की दशा और दिशा क्या होगी।