ममता जी जब कहती हैं कि मैं इस्तीफा नहीं दूँगी तो न जाने क्यों मुझे रानी झाँसी की याद आ गई। उन्होंने भी कहा था कि मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी।
मुझे अपनी इस सोच पर ग्लानि भी होती है क्योंकि दोनों में जरा सा भी साम्य नहीं है। रानी झाँसी एक राज्य की रानी थीं जबकि ममता बनर्जी एक लोकतान्त्रिक देश के एक लोकतान्त्रिक राज्य की चुनी हुई प्रतिनिधि। जिस जनता ने उन्हें शासन सौंपा, उसी ने उन्हें सत्ताचयुत भी कर दिया। फिर भी जनता की इच्छा का सम्मान न करना अपनी जिद पर अड़े रहना क्या भारतीय संविधान की अवहेलना नहीं है?
इसके अतिरिक्त वह इंटरनेशनल कोर्ट में जाने की बात कर रही हैं। क्या वह यह नहीं समझ रही हैं कि पश्चिमी बंगाल भारत का हिस्सा है? शायद वह पश्चिमी बंगाल को स्वतंत्र राष्ट्र समझने लगी थीं। इस बार अगर जनता ने उनके मंसूबों पर लगाम नहीं लगाती तो शायद वह अपने मंसूबो में सफल भी हो जातीं। बांग्लादेश के मंत्रियों के बयानों से यह साबित हो भी रहा है।
किन्तु इससे भी आश्चर्य तो इंडी गठबंधन के लोगों की प्रतिक्रिया देखकर हो रहा है जो मोदी विरोध में इतने अंधे हो चुके हैं कि वे ममता के इस संविधान विरोधी रवैये का समर्थन कर उनकी सोच को हवा दे रहे हैं। ऐसे लोग भारतीय जनता को मूर्ख समझते हैं जबकि वे नहीं जानते जनता बेहद परिपक्व है वह जिसे चाहती है दिल खोलकर चाहती है जब नाराज होती है तो ऐसे बदला लेती है कि उसकी लाठी में आवाज़ नहीं होती।