Tuesday, May 12, 2026

मेरे गुरु -मेरे मार्गदर्शक

 मेरे गुरु- मेरे मार्गदर्शक   


  “ज्ञान की प्रथम गुरु माता है। कर्म का प्रथम गुरु पिता है। प्रेम का प्रथम गुरु स्त्री है और कर्तव्य का प्रथम गुरु स्त्री है।” 

- आचार्य चतुर सेन


“गुरु में हम पूर्णता की कल्पना करते हैं अपूर्ण मनुष्यों को गुरु बनाकर हम अनेक भूलों का शिकार बन जाते हैं।” - महात्मा गांधी


अगर मैं कबीरदास जी का दोहा उदधृत न करूँ तो मेरी बात अधूरी ही रहेगी... 


गुरु कुम्हार शिष्य कुम्भ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ें खोट  

अंदर हाथ सहार देत, बाहर बाहै चोट।

         

अर्थात गुरु कुम्हार तथा शिष्य घड़े के समान है। जैसे कुम्हार घड़े को गढ़ते समय उसमें से मिट्टी के ढेले और अन्य अशुद्दियों को बाहर निकलता है वैसे ही गुरु भी शिष्य के दुर्गुणों को दूर करने का प्रयास करता है। जैसे वह घड़े को भीतर से हाथ सहारा देकर तथा बाहर से चोट मारकर आकार देता है ,वैसे ही गुरु भी शिष्य को भीतर से सहारा देकर तथा बाहर से डांट फटकार कर सहारा देते हैं।   


भगवान श्री कृष्ण के अनुसार गुरु वह है जो मनुष्य की स्वतन्त्रता को स्वीकार कर, उसे स्वतंत्र बनने में सक्षम बनाता है अतः गुरु वह नहीं होता जो बच्चों को किताबी ज्ञान दे वरन गुरु वह भी होता है जो हमारा उचित मार्गदर्शन करे। मेरा मानना है कि जन्म से लेकर मृत्यु तक मानव का  ज्ञान अर्जित करने का शैशव काल ही चलता रहता है। जिस दिन बच्चा आँखें खोलता है उस दिन उसका पहला परिचय माँ से होता है। माँ का स्पर्श उसके सांसरिक ज्ञानचक्षु खोलने का पहला कदम होता है। धीरे-धीरे उसका अपने आस-पास की ध्वनियों,वस्तुओं के देखकर समझने की कोशिश करता है। बोलने से पूर्व उसका हँसना, रोना उसके मन में चलते भावों का ही प्राकट्य रूप ही है। उसके मुंह से निकला पहला अक्षर उसके इस संसार को देखने समझने की प्रक्रिया के फलस्वरूप ही है।


पहला अक्षर वह माँ से ही सीखता है इसलिए कहा जाता है उसकी मातृभाषा वही होती है जो उसकी माँ बोलती है। धीरे-धीरे जैसे-जैसे वह परिवार के अन्य लोगों के संपर्क में आता है उसकी शब्द सामर्थ्य बढ़ने लगती है। वह हर चीज को छूने,उसे पहचानने तथा उसे उसके नाम से पुकारने की कोशिश करता है। माँ-पिता की गोद उसके लिए वात्सल्य से भरपूर तो होती ही है,उसे सुरक्षा का भी एहसास कराती है। दादी-नानी से कहानी सुनकर उसकी सोचने, समझने की शक्ति बढ़ती है तो दादा-नाना की अंगुली पकड़कर वह बाहर की दुनिया से परिचित होता है।

       

मुझे यह कहने में जरा भी अतिशयोक्ति नहीं है कि मेरे प्रथम शिक्षक मेरे माँ-पिताजी थे। बच्चा चाहे कितना भी छोटा हो,बचपन के कुछ दृश्य उसके हृदय की हार्ड डिस्क में सुरक्षित रह जाते हैं जो सदा याद रहते हैं। मुझे आज भी वह दृश्य याद है जब माँ की गोदी में बैठी, मैं पिताजी को ऑफिस जाते हुए हाथ हिलाकर बाय-बाय करती थी। जब मैं तीन वर्ष की थी तब सरस्वती पूजा के दिन माँ के द्वारा मुझे हाथ पकड़कर स्लेट पर ॐ लिखवाना भी याद है। 


मेरे पिताजी का स्थानांतरणीय जॉब था। हर दूसरे तीसरे वर्ष स्थानांतरण के कारण, मेरी शिक्षा एक जगह नहीं हुई वरन कई जगह हुई इसलिए मुझे शिक्षक शिक्षिकाओं के नाम तो याद नहीं हैं किन्तु उनकी स्मृतियों के खट्टे-मीठे पल अभी भी मेरे जेहन में बसे हुए हैं जो मुझे जीवन जीने की प्रेरणा तो देते ही हैं,जीवन की बुराइयों से भी दूर रखने की शिक्षा देते हैं।


कहा जाता है कि कमजोरियां इंसान का मानवीय स्वभाव है। इनसे शिक्षक भी अछूता नहीं है। ऐसे ही कुछ खट्टे-मीठे पल मेरी ज़िंदगी में भी आए। अपने स्कूल का पहला दिन या प्रथम शिक्षक या शिक्षिका तो याद नहीं है लेकिन जब मैं दूसरी कक्षा में थी तब मुझे अपनी शिक्षिका के साथ, अपना वह क्लास रुम भी याद है जब मैंने अपनी शिक्षिका से जीवन की प्रथम शिक्षा प्राप्त की थी कि छिपा कर किया गया कोई काम उचित नहीं है। 


मैं उस समय मात्र पाँच या छह वर्ष की रही होंगी किन्तु घर के शिक्षित परिवेश के कारण तब तक मैं हिन्दी थोड़ा-थोड़ा पढ़ना लिखना सीख गई थी। नया-नया पढ़ना सीखने के कारण मुझे जो भी मिलता, उसे पढ़ना चाहती थी विशेष कर कहानी की पुस्तक। उस दिन मेरी एक मित्र, नाम याद नहीं है, एक कहानी की पुस्तक स्कूल लेकर आई थी। उसने मुझे दिखाई तो मैंने उससे घर ले जाने की इजाजत मांगी किन्तु उसने मना कर दिया। उसके मना करने पर मैंने सोचा कि क्यों न इस पुस्तक को स्कूल में ही पढ़ लिया जाए। स्कूल ब्रेक में मैंने पुस्तक को पढ़ना प्रारम्भ किया किन्तु समाप्त नहीं कर पाई। कक्षा में शिक्षिका ने पढ़ना  शुरू कर दिया  किन्तु मेरा पढ़ना जारी रहा। शिक्षिका ने जब मेरा नाम पुकारा तो पढ़ने में मगन मुझे उनकी आवाज़ सुनाई नहीं दी। ज़ब मैंने कोई उत्तर नहीं दिया तब  वह मेरे पास आईं तथा मुझसे पुस्तक लेते हुए बोलीं, “कहानी पढ़ना अच्छी बात है किन्तु कक्षा के अंदर पढ़ाई पर ध्यान देना भी आवश्यक है। आगे से तुमने ऐसा किया तो पुस्तक तो ले ही लूँगी,तुम्हें सजा भी दूँगी।”


उस दिन उनकी चेतावनी से मुझे उचित-अनुचित का अंतर पता चला। 


एक अन्य शिक्षिका जब मैं 9वीं कक्षा थी, हमें बायोलोजी पढ़ाती थीं। वह इतना अच्छा पढ़ाती थीं कि अगर स्कूल में उनका पढ़ाया पाठ छात्र ध्यान से सुन लेते तो मनमस्तिष्क में ऐसा बैठ जाता था कि उसे बार-बार दोहराने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। उनका कहना था कि जब भी पढ़ो कागज पेन साथ में रखो। जो भी पढ़ रहे हो,उसे लिखो। जहां चित्र की आवश्यकता है उसे बनाओ,उसे लेबिल करो इससे पाठ के उस भाग को न केवल भलीभाँति समझ पाओगे वरन स्पेलिंग में गलती भी नहीं होगी। उनकी इस शिक्षा ने विज्ञान विषय के प्रति रुचि ही नहीं जगाई वरन पढ़ाई करने के तरीके को भी बताया। मेरी यह आदत आज भी नहीं बदली है।


याद आता है मुझे वह समय जब मैं 7वीं कक्षा में राजकीय इंटर कॉलेज बाराबंकी में पढ़ती थी। मेरे पिताश्री वहाँ एस.डी.एम.थे। मेरे स्कूल की प्रिंसिपल जो हमें गणित भी पढाती थीं,को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने मुझे अपने कक्ष में बुलाकर,अपने पिताजी से कहकर उस समय चल रहे देवा के मेले के लिए अपने लिए विशेष प्रबंध करवाने के लिए कहा। मेरे पिताजी बहुत ही ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ तथा उसूलों पर चलने वाले थे। उन्होंने मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया। उसी वर्ष फाइनल परीक्षा में मैं बीमार हो गई तथा कुछ विषय की परीक्षा नहीं दे पाई। उसी वर्ष पिताजी का स्थानांतरण कसया (कुशीनगर) हो गया। बीमारी का मेडिकल सर्टिफिकेट देने के बावजूद प्रिंसिपल महोदया ने अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए मुझे टी.सी.देने से मना कर दिया। ट्रान्सफर सर्टिफिकेट न होने के कारण कुशीनगर कॉलेज में मुझे आठवीं में दाखिले के लिए प्रवेश परीक्षा पास करनी पड़ी। जो मेरे जीवन की बुरी स्मृतियों में से एक है। जब एक शिक्षिका ने अपनी इच्छा पूरी न होने के कारण उसका बदला एक नादान बालिका से लिया।


ऐसी ही एक घटना और है जब मैंने बी.एस.सी. प्रतापगढ़ से करने के पश्चात एम.एस.सी. करने के लिए गोरखपुर विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। पिताजी के प्रतापगढ़ में रहने के कारण गोरखपुर में मुझे लड़कियों के हॉस्टल में रहना था। एक दिन जब मैं विश्वविद्यालय से घर आ रही थी तो बारिश होने लगी। शाम का समय था। धीरे-धीरे विद्यालय परिसर खाली होने लगा। नई होने के कारण ज्यादा किसी से जानपहचान भी नहीं थी।  बारिश होने के कारण उस दिन कोई सवारी भी नहीं मिली। मैं पैदल ही चल दी। भींगने के कारण बुखार तो हुआ ही,साथ ही अस्थमा का अटैक पड़  गया। यद्यपि हॉस्टल की वार्डन ने डॉक्टर को भी बुलाया,उन्होंने दवा भी दी लेकिन कमरे से बाहर निकलते हुए वार्डन के शब्द मेरे कानों में पड़  गए…


“न जाने कैसे माता-पिता हैं जिन्होंने अपनी बीमार बेटी को हॉस्टल में पढ़ने भेज दिया।”


मुझे सांत्वना देने के बजाय वार्डन को माता-पिता को दोष देते देखकर मन आहत हो गया क्योंकि प्रतापगढ में एम.सी.सी. की सुविधा न होने के कारण, वहाँ बी.एड. में दाखिला होने के बावजूद मैं स्वयं जिद करके गोरखपुर आई थी। यह सच है कि मुझे अस्थमा की समस्या थी किन्तु ऐसा अटैक उस समय तक एक दो बार ही आया था। कुछ ही दिनों पश्चात एक हफ्ते की छुट्टी हुई। मैं घर गई। मेरी हालत देखकर माँ विचलित हो उठीं। उन्होंने कहा,“तेरा यहाँ बी.एड.में दाखिला हो गया है इस वर्ष बी.एड.ही कर ले।”


मस्तिष्क की बजाय मैंने दिल की सुनी। जीवन के निर्णय कुछ ऐसे होते हैं जो जीवन की दिशा बदल देते हैं,मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ क्योंकि बी.एड. के पश्चात मैंने एम.ए. किया। माना वार्डन की बात से मैं आहत हुई थी लेकिन निर्णय तो मेरा था जिसके कारण मेरा एम.एस.सी.करने का स्वप्न,स्वप्न ही रह गया।       

शिक्षक अपने शिष्यों को ज्ञान देता है,उनके ज्ञान चक्षुओं को खोलता है लेकिन जीवन का उद्देश्य क्या है, उसे जीवन में क्या बनना है,क्या करना है,उसे स्वयं तय करना है क्योंकि शिक्षक सदा उसके साथ नहीं रह सकता। शेष जीवन उसे उनकी दी हुई शिक्षाओं से प्रेरणा लेते हुए व्यतीत करना है।


मैंने जीवन को कई बार करवट लेते देखा है। मेरी पहली कविता 11-12 वर्ष की उम्र में प्रस्फुटित हुई थी। माँ-पिताजी के कहने पर मैंने उसे एक प्रतियोगिता में भेजा, मेरी उस पहली कविता को सांत्वना पुरस्कार भी मिला था लेकिन फिर भी लेखन मेरी वरीयता सूची में नहीं था। मैं डॉक्टर बनना चाहती थी, किन्तु नहीं बन पाई। विवाह के पश्चात डॉक्टर बनने के लिए होमियोपैथी का कोर्स पत्राचार माध्यम से किया किन्तु मन नहीं लगा। कुछ करने की कशिश इतनी थी कि अंततः मैंने लेखनी फिर पकड़ी जो आज तक चल रही है। इसके लिए उत्प्रेरक रहे मेरे सहचर आदेश जी तथा मेरे पाठक जिन्होंने समय-समय पर पत्र लिखकर मुझे प्रोत्साहित किया अगर ऐसा न होता तो मेरा लेखन के क्षेत्र में बढ़ा यह कदम बीच में ही सिसक-सिसक कर दम तोड़ देता।


स्वामी विवेकानंद ने शब्द सिर्फ मेरे लिए ही नहीं प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। उनका प्रेरक वाक्य है- “तुमको (व्यक्ति) को अंदर से बाहर विकसित होना है। कोई तुमको न सिखा सकता है न आध्यात्मिक बना सकता है। तुम्हारी आत्मा के सिवा कोई गुरु नहीं है।” 


युवाओं के लिए उनके प्रेरक शब्द थे- “उठो,जागो और तब तक मत रुको जब तक मंजिल प्राप्त न हो।” 


इसमें कोई संदेह नहीं है कि गुरु की शिक्षा के साथ व्यक्ति का आत्मविश्वास,आत्मबल ही उसे सफलता के मार्ग पर ले जा सकता है। किसी भी व्यक्ति के लिए  स्वामी विवेकानंद जी के शब्द उसके जीवन की दिशा को निर्धारित करने हेतु आईना हैं। 

            

मेरा भी यही मानना है कि असली गुरु व्यक्ति की आत्मा दूसरे शब्दों में उसका मनमस्तिष्क है जो उसे अपने जीवन का उद्देश्य निर्धारित करने की क्षमता प्रदान करता है जो उसे सिखाता है कि एक रास्ता बंद हो जाए तो दूसरे भी अन्य रास्ते हैं। उन रास्तों को उसे स्वयं ढूँढना पड़ेगा। 


आज की भाषा में कहूँ तो हर व्यक्ति को स्वयं सीखना पड़ेगा जब वह संसार से डिस्कनेक्ट होने लगे तब वह मन को ऑनलाइन कैसे रखे? मन के सिग्नल को पहचानने तथा तदनुरूप कार्य करने की क्षमता अगर व्यक्ति विकसित कर ले, तो सफलता निश्चित है। अंत में यही कहना चाहूंगी...  


कोई परिपूर्ण नहीं होता      

सीखने की कोई उम्र नहीं होती

जिज्ञासा जिस दिन हुई समाप्त

उस दिन जिंदा, मुर्दा बना इंसान। 



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