Wednesday, June 10, 2026

इस्तेमाल

 इस्तेमाल


न ढोलक बजी, न बजे नगाड़े,

न लड्डू बँटे, न लोरी के सुर उठे,

छाई चहुँ ओर उदासी

मानो आ गई है

कोई अनचाही ।


पलती रही, बढ़ती रही

सहेजती रही...

निर्दोष स्वप्न,निर्दोष रिश्ते

बेगानों का लिये एहसास

आखिर थी तो पराया धन ।


वह समय भी आया

जब पराये धन को

उसके अपनों ने

दुनिया की नजरों से बचाकर

सौंप दिया बेगानों को ।


नई जगह, नया रूप

कुछ बंदिश,कुछ उन्मुक्तता

लक्ष्मी कहलाई, धात्री बनी,

बहू बनी, पत्नी बनी, 

पर नहीं मिला आशियाना ।


किलकारियों से गूंजा घर आंगन,

सार्थक हुआ मातृत्व

दूर हुआ परायेपन का एहसास

जिस ममता के लिये तरसी वह

उस ममता से उसे सिंचित किया ।


उड़ता देख नीलाम्बर में 

तन-मन से होकर तृप्त

ढेरों आशीषों के संग

नित सफलता की 

कामना करती रही ।


आया वह दिन भी

जो समय दिया था

पहले निज अंश को

अब अंश के अंश पर

न्यौछावर करने लगी ।


जीवन के अंतिम पड़ाव पर

ममता का छीजता दामन लिये

विस्मित खड़ी है

न पिता,न पति, न बच्चे

सबने उसे इस्तेमाल ही किया।

सुधा आदेश 

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