Saturday, November 30, 2019

कब तक जलेगी नारी...

कब तक जलेगी नारी...

 एक कोलाहल थमता नहीं 
दूसरा आकर तन-मन को 
 शिथिल कर देता है ..

 संज्ञाशून्य हो जाती है 
चेतना बार-बार 
मन को यही आक्रोश 
 मथने लगता है, 
 आखिर कब तक जलेगी 
 संसार की निर्मात्री नारी , 
कब थमेगी नृशंषता, 
कब तक हमें बेबस चीखें
द्रवित करेगी।

 कब इंसान जानवर से 
इंसान बनेगा , 
कब तक केंडल मार्च 
निकालकर मन को
 सांत्वना देते रहेंगे ? 

 उत्तर है किसी के पास ...!! 
चुप रहकर, 
आँख मूंद कर 
 क्या हम स्वयं 
नृशंषता के 
 भागीदार नहीं बन रहे हैं ?

 एक आवाज नहीं, 
 हजारों आवाज चाहिए 
 अपराधी को कटघरे तक 
 पहुंचाने के लिये... 
मौत के बदले सिर्फ मौत 
 इससे कम कुछ नहीं !! 

 @सुधा आदेश

Friday, November 22, 2019

ऐसा मजाक उचित नहीं

ऐसा मजाक उचित नहीं विवाह का स्वागत समारोह था...अनिमेष और अपराजिता मेहमानों का गर्मजोशी से स्वागत करने में लगे हुए थे । बेमेल जोड़े को देखकर लोगों में कानाफूसी प्रारंभ हो गई थी...। अनिमेष की पारखी नजरों से लोगो के चेहरे पर छाया व्यंग्य छिपा न रह पाया । उसे डर था तो सिर्फ इतना कि ये बातें अपराजिता के कानों में न पड़ जायें किन्तु अपराजिता को उसी निश्चल मुस्कान के साथ मेहमानों का स्वागत करते देख वह निश्चिंत हो गया । लगभग तीन हफ्ते पूर्व ही उनका विवाह हुआ था । एक हफ्ता अपने रिश्तेदारों के साथ व्यतीत करने के पश्चात् वे मधुयामिनी हेतु ऊटी चले गये थे । दिन रात पंख लगाकर उड़े जा रहे थे पर कभी तो समय को रूकना पड़ता ही है , यही उनके साथ भी हुआ । खुशियों के पलों को अपनी स्मृतियों में सहेजे जब अनिमेष काम पर लौटा तो उसके मित्रों ने भी पार्टी की माँग कर डाली । वस्तुतः उनका विवाह पैतृक निवास पर हुआ था । विवाह में उसके एक दो मित्रों के अतिरिक्त अन्य कोई सम्मिलित नहीं हो पाया था अतः उनकी भावनाओं का सम्मान करने के लिये उसे इस स्वागत समारोह का भी आयोजन करना पड़ा । अनिमेष एक आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी था...गोरा रंग, लंबा एवं छरदरा बदन, मधुर एवं सौम्य स्वभाव के कारण वह किसी को एक ही नजर में आकर्षित कर लेने में सक्षम था किंतु अपराजिता दोहरे बदन की, सांवले रूप रंग की सामान्य कदकाठी की नवयौवना थी । इसके बावजूद उसके मुख पर आत्मसंतोष, संपन्नता, शालीनता की वैभवपूर्ण मुस्कान सुशोभित थी जो सभी को आकर्षित कर रही थी किंतु फिर भी वह कहीं से अनिमेष के अनुरूप नहीं लग रही थी । अनिमेष के कई मित्रों का मत था कि श्री रामचंद्रजी तो अपने माता-पिता की आज्ञा को शिरोधार्य कर सिर्फ चौदह वर्षो के लिये वन को गये थे पर कलियुग के इस श्रीराम ने दहेज लोलुप अपने माता-पिता के सामने अपनी सारी कामनायें गिरवी रख दी हैं । बलि का बकरा बन गया है बेचारा...। अनिमेष इन सब आक्षेपों को नजरअंदाज कर अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ प्रत्येक आने जाने वाले मित्रों से अपराजिता का परिचय करवा रहा था और अपराजिता भी उसके हर इशारे पर मर मिटने को तैयार प्रतीत हो रही थी । पार्टी समाप्त होते-होते रात्रि के ग्यारह बज गये थे । लगभग सभी मेहमान चले गये थे । अनिमेष के चार पाँच अभिन्न मित्र ही बचे थे । उन्होंने साथ बैठकर खाना प्रारंभ किया । हँसी मजाक का जो दौर प्रारंभ हुआ, वह समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा था कि वेटर ने आकर होटल बंद करने की सूचना दी तब आभास हुआ कि बहुत देर हो गई है, अब घर चलना चाहिये । अपराजिता नई नवेली होते हुए भी सबसे ऐसे घुल मिल कर बातें कर रही थी कि लग ही नहीं रहा था कि वह सबसे पहली बार मिल रही है । यह दुनिया भी अजीब है, कोई बात हो या न हो किंतु आलोचक बाल की खाल निकालने को आतुर रहते हैं । यही कारण था कि बाहर निकलते हुये अनिमेष के मित्र पाल ने अचानक फुसफुसा कर कहा, ‘ यार,तू तो चढ़ गया सूली पर, कहाँ तू कहाँ वह, कुछ तो देखा होता ।’ ‘ हाँ यार, तू बीबी लाया है या मोटी...।’ वह कुछ कह पाता तभी वर्मा बोल उठा । आगे के शब्द उनकी हँसी में दब कर रह गये । अनिमेष ने सकपका कर अपराजिता को देखा । उसे श्रीमती सुजाता पाल और रीता वर्मा से हँस-हँस कर बातें करते देख उसने संतोष की साँस ली । वह चाहता तो पाल और वर्मा पर अपना आक्रोश प्रकट कर सकता था...आखिर क्या हक है उन्हें उसकी पत्नी के बारे में ऐसा कहने का....पर अपराजिता के सामने ऐसा वैसा कहकर तमाशा खड़ा नहीं करना चाहता था अतः चुप रह गया । एकाएक उसे अपने इन मित्रों से वितृष्णा सी हो आई जो उसकी भावनाओं के साथ उसकी नवविवाहिता पत्नी का भी सम्मान नहीं कर पा रहे हैं । अपराजिता चाहे जैसी भी हो, अब उसकी पत्नी है । वह उसके साथ जबरदस्ती नहीं वरन् समस्त सामाजिक रस्मों को निभाकर आई है...फिर जब उसे या उसके घर वालों को उसके रंगरूप पर कोई आपत्ति नहीं है तो इनको ऐसी बातें करने का क्या हक है ? यह सच है कि अपराजिता दुनिया के मापदंडो के अनुसार खूबसूरत नहीं है । माना उसका शरीर बेडौल है पर उसकी जो अदा उसे भाई थी वह थी उसकी बड़ी-बड़ी आँखें, चेहरे पर खेलती निरंतर मुस्कान, खनकती हँसी तथा उससे भी अधिक उसका सामाजिक, राजनीतिक विषयों पर पूर्ण आधिपत्य वरना लड़कियों को उसने सदा गहने, कपड़ों और खाने के संबंध में ही बातें करते पाया है । विवाह के लिये उसकी सहमति मिलने पर उसके पिताजी ने पुनः उसे अपने निर्णय पर विचार करने को कहा था...। यहाँ तक कि उसकी बहन आकांक्षा ने उसे अपने निर्णय पर अटल पाकर इस बेमेल विवाह पर अपनी नाक मुँह सिकोड़ते हुये कहा था, ‘ दिल लगा गधी से तो परी क्या चीज है ।’ ‘ दीदी, एक स्त्री होते हुए, एक स्त्री के लिये आप ऐसा कैसे कह सकती हो...? हर स्त्री का अपना एक सौन्दर्य होता है....शायद इसी सौन्दर्य ने मुझे आकर्षित किया है । अगर ऐसा ही था तो पहले आप लड़की देख लेतीं अगर आप सबको पसंद आ जाती तो फिर मुझे दिखाते...। दीदी, बिना किसी विशेष कमी के किसी को देखकर मना करना क्या उस लड़की के प्रति अन्याय नहीं है…? जहाँ तक मोटापे का प्रश्न है, वह तो कुछ कसरतों द्वारा कम भी हो सकता है....फिर जब जीवन मुझे उसके साथ बिताना है तो किसी अन्य को आपत्ति क्यों ?’ अनिमेष ने दीदी की बात सुनकर किंचित क्रोध से कहा था । ‘ यह लड़की पूरी जादूगरनी है । पता नहीं क्या जादू कर दिया है उसने आप पर जो एक ही मुलाक़ात में आपको दीवाना बना दिया है ।’ उसकी बातें सुनकर दीदी ने मुँह बनाकर कहा । अनिमेष को अपनी बहन की सोच पर हैरानी हुई थी...आखिर एक स्त्री ही, एक स्त्री की दुश्मन क्यों बन जाती है ? इसके बावजूद उसे इस बात की खुशी थी कि उसके माँ पिताजी ने उसके निर्णय एवं सोच का स्वागत किया था । अपराजिता साइकोलोजी में एम.ए. कर रही थी । इस वर्ष उसका अंतिम वर्ष था । सदा प्रथम आने वाली अपराजिता चाहती थी कि परीक्षा के पश्चात् उसका विवाह हो किन्तु उसके दादाजी जो रोगशैया पर अंतिम साँसे गिन रहे थे, उनकी इच्छा थी कि उनके जीवनकाल में ही उनकी पोती का विवाह हो जाये । यह बात और है कि विवाह के पश्चात उनकी रूकती साँसों में जान आ गई थी । परीक्षा में लगभग तीन महीने बाकी थे अतः आते वक्त वह अपनी किताबे भी साथ ले आई थी । अनिमेष के आफिस जाते ही वह पढ़ाई में जुट जाती थी जिससे कि शाम का समय वह उसके साथ बिता सके । अनिमेष के आफिस से आते ही कभी मूवी, कभी कहीं बाहर घूमने जाने का कार्यक्रम बन जाता, फिर वहाँ से किसी होटल में खाकर ही लौटते...। अपने मित्रों के बार-बार बुलाने पर भी वह उनके घर यह सोचकर जाना टालता रहता कि कहीं फिर कोई अप्रिय बात न कह दे । एक बार तो वह चुप रह गया पर शायद दुबारा कुछ बोलने पर वह अपनी जुबान पर काबू न रख पाये...उसके रूख पर कुछ मित्रों ने रोष भी जताया था पर वह यह कहकर टालता रहा अभी अपराजिता परीक्षा की तैयारी कर रही है, अतः निकलना ही नहीं चाहती । अपराजिता के अनुसार पढ़ाई के अतिरिक्त खाना और सोना ही उसके मुख्य शौक हैं अतः शरीर के रखरखाव पर उसने कभी विशेष ध्यान ही नहीं दिया । इकलौती संतान होने के कारण बिजनिसमैन पिता ने उसकी सभी जायज नाजायज मांगे पूरी की थीं । बढ़ते मोटापे तथा खाने के अपराजिता के शौक पर माँ टोकती तो उसके पिता कहते,‘ खाने के लिये कभी टोका मत करो मेरी बेटी को , तुम्हें क्या मालूम अन्न के लिये कितने लोग तरसते हैं...पता नहीं कैसी किस्मत लेकर आई है...कम से कम जब तक हमारे पास है तब तक उसे अपने सारे शौक पूरे कर लेने दो ।’ अपराजिता के पिता को अनिमेष के बारे में अपने मित्र दयानंद से पता चला था । बेटी के विवाह के लिए चिंतित अपराजिता के पिता रामनाथ अनिमेष के घर आने का समाचार सुनकर अपनी बेटी का रिश्ता लेकर उसके घर आये । अनिमेष के आकर्षक व्यक्तित्व को देखकर उन्हें लगा कि उन्होंने यहाँ आकर भूल की है, शायद यहाँ रिश्ता न हो पाये किंतु फिर भी उन्होंने ऊपरी मन से दूसरे दिन लड़का-लड़की की मुलाकात का समय निश्चित कर लिया । अपराजिता को देखकर अनिमेष के माता-पिता सरला और दिनेश ने अपने पुत्र की इच्छानुसार इस संबंध की स्वीकृति दी तो रामनाथ जी को यह सोचकर अत्यंत आश्चर्य हुआ कि साधारण रूप रंग वाली उनकी कन्या में उन्होंने ऐसा क्या देखा कि अपने आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी पुत्र के लिये उनकी पुत्री का हाथ स्वीकार कर लिया । फिर सोचा कि उन पर लक्ष्मी की कृपा शायद इस संबंध की स्वीकृति का कारण हो या उनकी पुत्री के भाग्य में ही इतना सुदर्शन वर लिखा है । एक छोटी सी मुलाकात में ही अपराजिता भी अनिमेष इतना प्रभावित हुई कि उस जैसा पति, सहचर और सखा पाकर गर्वोन्मुख हो उठी थी । अपराजिता के पिता को सुखद आश्चर्य हुआ जब वर पक्ष की ओर से कोई डिमांड नहीं रखी गई...उनकी यह सोच कि उन्होंने उनकी लड़की को, उनके ऊपर लक्ष्मी की कृपा के कारण पसंद किया, गलत सिद्ध हो गई थी । यही कारण था कि उन्होंने विवाह में कोई कमी नहीं रखी थी । सभी बरातियों की खूब आवभगत की गई तथा सभी बारातियों को विदाई में एक-एक गिन्नी दी जिसके कारण सभी बाराती अत्यंत खुश हुए थे । सच बात तो यह थी कि बहू से भी ज्यादा लोग विवाह में हुई सजावट, स्वागत सत्कार का ही जिक्र कर रहे थे । पंद्रह दिन कैसे बीत गये पता ही नहीं चला । अपराजिता का छोटा भाई धीर उसे आकर ले गया । अनिमेष का जीवन फिर नीरव हो चला था...यद्यपि मित्रों के कटाक्षों ने उसे घायल कर दिया था पर रहना तो उसे उनके ही साथ था । वह अपने मित्रों को चाहकर भी नहीं समझा सकता था कि वास्तव में अपराजिता मानसिक रूप से अत्यंत ही सुलझी, नये से विचारोंयुक्त विदुषी महिला है, अत्यधिक मोटापे के अतिरिक्त अपराजिता किसी बात में किसी से कम नहीं है...। सच तो यह है कि उसे अपराजिता के बाह्य सौन्दर्य की अपेक्षा आंतरिक सौन्दर्य ने मोहित किया है...। उस पर अपराजिता को अपनाने के लिये न तो अपने माता-पिता की तरफ से कोई दवाब पड़ा था और न ही ससुराल वालों की तरफ से धन का लालच दिया गया था । यह बात और है कि अपनी पुत्री की खुशी के लिये उसके माता-पिता ने दिल खोलकर खर्चा किया था....पर दुनिया वालों को किसी की पसंद और नापसंद से क्या मतलब है उसे तो सिर्फ व्यंग्य करने और हँसी उड़ाने का बहाना चाहिये । देखते-देखते तीन महीने बीत गये । आज अपराजिता को आना था । वह उसे लेने स्टेशन गया । मन में हर्ष और विषाद के मिले जुले लक्षण थे । हर्ष इसलिये था कि उसकी प्रियतमा...उसकी पत्नी आ रही है और विषाद इसलिये कि कहीं किसी के कटाक्ष पर वह मासूम कली मुरझाने न लगे । मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है अतः परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालना ही श्रेयस्कर है । मनुष्य को शारीरिक सौन्दर्य की अपेक्षा गुणों से सम्मान मिलना चाहिये....वह सुनता रहा शायद इसीलिये लोग सुनाते रहे । अब यदि किसी ने कुछ भी कहने की चेष्टा की तो वह तुरंत ही टोक देगा चाहे वह उसका अभिन्न मित्र ही क्यों न हो ? पत्नी के मानसम्मान की रक्षा करना उसका दायित्व है...इस दृढ़निश्चय के साथ मन के बवंडर को शांत करने का प्रयास कर रहा था कि ट्रेन के आने की सूचना मिली । ए.सी. कोच उसके सामने आकर ही रूकी । वह डिब्बे में चढ़ने ही वाला था कि धीर सामान लेकर उतरा । उसके साथ उतरी दुबली पतली महिला को देखकर वह आश्चर्यचकित रह गया । वह महिला और कोई नहीं, उसकी अपराजिता थी...सुगठित देह, साँवलेपन में भी मुख पर अद्वितीय सौन्दर्य छाया हुआ था । ‘ जीजाजी घर नहीं चलना क्या ?’ उसको विमुग्ध अपराजिता को निहारते देख धीर ने कहा । ‘ हाँ....क्यों नहीं...।’ अनिमेष अपराजिता पर से नजरें हटाते हुये बोला । अपराजिता उसके मनोभावों को समझकर शर्मसार हो गई । कायाकल्प के बारे में जब उसने अपराजिता से पूछा तो उसने कहा कि वास्तव में विवाहोपरान्त ही उसे सुगठित शरीर सौष्ठव का महत्व समझ में आया अतः यहाँ से जाने के पश्चात् उसने हैल्थ क्लब ज्वाइन कर लिया । पढ़ाई के साथ-साथ कुछ कसरतें तथा खाने पर मन के अंकुश ने उसके स्वप्न को साकार कर दिया । धीर के जाने के कुछ दिन पश्चात् अपराजिता के आग्रह पर उसने पाल और वर्मा को सपरिवार खाने पर आमंत्रित किया । इस पार्टी को सफल बनाने के लिये उसने पाकशास्त्र का पूरा ज्ञान बिखेर दिया । तरह-तरह के व्यंजन....पनीर बटर मसाला, मलाई कोफ्ता, खोया मटर, दही बड़ा, स्वीट डिश में फ्रूट क्रीम, तरह-तरह के सलाद इत्यादि... । अपराजिता को देखकर उसके मित्र आश्चर्यचकित रह गये । सुजाता पाल मजाक में कह उठी,‘ लगता है हमारी बहन पति वियोग में दुबली हो गई ।’ ‘ कुछ भी कहो, रूप निखर आया है । ’ कहते हुये सुजाता की बात का समर्थन रीता वर्मा ने भी कर दिया । खाना खाकर वे सब खाने की प्रशंसा किये बिना रह नही सके । पूरी पार्टी की आकर्षण का केंद्र अपराजिता ही थी और उसकी प्रशंसा सुन-सुनकर अनिमेष आत्म विभोर हो रहा था । आखिर विदा की बेला भी आ गई । विदा के समय वर्मा के अभिवादन के उत्तर में अपराजिता बोली,‘ क्यों भाई साहब, आपके मित्र बीबी ही लेकर आये हैं, मोटी काली भैंस तो नहीं...।’ प्रश्न सुनकर वर्मा के साथ-साथ अनिमेष और अन्य सभी चौंक गये...रीता वर्मा का सिर जहाँ शर्म से झुक गया वहीं निरूत्तर और असहाय स्वर में वर्मा ने कहा,‘ क्या आपने सुन लिया था भाभी ....? सारी भाभी....वह तो मैं मजाक कर रहा था ।’ ‘ भाई साहब, क्या आप भी मजाक कर रहे थे....?’ अपराजिता ने वर्मा के निकट खड़े पाल की ओर देखकर कहा । अपराजिता की बात सुनकर सुनकर पाल भी सकपका गया । वहीं उसकी पत्नी सुजाता क्रोध से उसकी ओर देखने लगीं । ‘ आपके लिये वह मजाक होगा पर आपके उस एक वाक्य ने मेरी जिंदगी बदल दी ।’ कहकर वह चिरपरिचित अंदाज में हँस दी । फिर थोड़ा रूक कर बोली,‘ भाई साहब, मैं आप दोनों को अपमानित नहीं करना चाहती थी, सिर्फ यह अहसास दिलाना चाहती थी कि इंसान का बाह्य रंग रूप, कद काठी तो ईश्वरीय देन है....मानव निज प्रयत्नों द्वारा जन्मप्रदत्त विकृतियों मे परिवर्तन अवश्य ला सकता है किंतु उसको इंगित करते हुए किसी को मानसिक पीड़ा पहुंचाने वाला कटु सत्य अनजाने में भी कभी किसी को भी नहीं कहना चाहिए । ' ‘ भाभीजी, माफ कर दीजिए....दरअसल वह मैंने मजाक में कहा था...।’ दोनों के मुँह से एक साथ निकला । ' ऐसा मजाक क्यों भाईसाहब , जो दूसरे के दिल को छलनी कर दे । शब्दों की अपनी मर्यादा होती है, एक लक्ष्मण रेखा होती है उसका उलंघन पीड़ा तो पहुंचाएगा ही । मैंने आपके शब्दों को अपनी ताकत बनाकर स्वयं में बदलाव कर लिया पर सब शायद ऐसा न कर पाएं...अवसादग्रस्त होकर अगर कोई अतिवादी कदम उठा लें तो दोषी कौन होगा ?' श्री पाल और वर्मा जहाँ अपने कहे पर पछता रहे थे वहीं सुजाता और रीता का सिर शर्म से झुका जा रहा था । वे सभी चले गये थे पर अनिमेष सोच रहा था....जो बात वह स्वयं नहीं कह पाया वही बात उसकी पत्नी ने कितने खूबसूरत तरीके से कह दी...। उसे महसूस हो रहा था कि पत्नी के रूप में अपराजिता को पाने का उसका फैसला गलत नहीं था । एकाएक उसे अपने फैसले पर गर्व हो आया और उसने अपराजिता को अपने आगोश में ले लिया । सुधा आदेश

वेनिस... फिल्मी कैनवास जैसा एक खूबसूरत शहर

वेनिस... फिल्मी कैनवास जैसा के खूबसूरत शहर ‘समंदर पर खड़ी एक शानदार नगरी जिसकी बहती और बल खाती लहरें, उसकी सड़कें और तंग गलियाँ हैं और जिसके खारे जल की जड़ी उसके महलों के संगमरमर से जा लिपटती हैं ।’ अंग्रेज कवि सैमयल रॉजर्स ने सन् 1822 में कहा था । आखिर हम अपने गंतव्य स्थल वेनिस पहुँच गये । एक शहर जो पानी में तैरता है , फिल्मी कैनवास जैसा लगता है, जिसकी फिजाओं में रोमांस गूँजता है, ऐसी है यह शानदार नगरी वेनिस । सैकड़ों वर्ष पुराना आर्किटेक्चर, पानी से भरी संकरी गलियाँ, तैरती किश्तियाँ, छोटे-छोटे दीपों को जोड़ते खूबसूरत पुल, लजीज वेनिशियन खाना, सैलानियों की भीड़, सचमुच ख्वाबों की नगरी है वेनिस...। वेनिस क्रूसी टर्मिनल से वाटर शटल से हमें सेंट मार्क स्कावयर जाना था । इसमें लगभग 45 मिनट लगने थे । इस बीच मैं वेनिस के बारे में जानने के लिये यात्री बुकलेट पढ़ने लगी... वेनिस इटली की उत्तरी पूर्वी सीमा पर स्थित वेनिटो रीजन की राजधानी है जो एडिफयाटिक सागर में स्थित है । इटेलियन और वेनीशियन भाषाओं में इसका नाम लागुना वेनेटा झील है । कहा जाता है कि वेनिस का निर्माण रोमन सभ्यता के पतन के बाद हुआ था । यह 118 छोटे-छोटे आइसलैंड को मिलाकर बना है । ये आइसलैंड कैनालों द्वारा अलग-अलग हैं तथा 400 छोटे-छोटे पुलों से जुड़ा है । इस शहर की संरचना इतनी अनूठी है कि मुख्य वेनिस छह सौ वर्षो से लगभग वैसा ही है । पानी में एक आईलैंड की तरह तैरते शहर की खूबसूरती किसी को भी आकर्षित कर सकती है । पानी में तैरते द्वीप की तरह लगने वाला यह शहर कई मायनों में अपनी प्राकृतिक छटा और खूबसूरती के कारण दुनिया के अन्य शहरों से अलग है । इस शहर में करीब 120 द्वीप हैं । उनके बीच नहरें हैं, पुल हैं । इस शहर को या तो नावों से घूमा जा सकता है या पैदल । यहाँ स्थित हर घर का दरवाजा पानी में खुलता है । घर के बाहर ही नाव रहती है जिसके द्वारा आवागमन होता है । वेनिस यूरोप का सबसे बेस्ट सिटी है । यह शहर कभी सोता नहीं है । लोगों की आवाजाही यहाँ सदैव लगी रहती है । पूरी तरह पानी पर बसा यह शहर सैलानियों में इतना लोकप्रिय है कि ढाई लाख से कम आबादी वाले शहर में हर वक्त कम से कम 50,000 पर्यटक हमेशा मौजूद रहते हैं । गलियों के अतिरिक्त यहाँ पर सड़कों की भूमिका में नहरें हैं, जिनमें नाव चलती हैं जिन्हें गोंडोला कहते हैं । इन नहरों पर चार सौ पुल बने हैं जो शहर के एक छोर को दूसरे सिरे से जोड़ते हैं । नहरों के किनारे आलीशान इमारतें बनी है जो प्राचीन वेनिस की याद दिलातीं हैं । ये इमारतें दलदली भूमि पर बनी हैं जो लकड़ियों के सहारे टिकी हुई हैं । वेनिस की सबसे बड़ी नहर ग्रांड नहर एस शेप में है जो पूरे शहर को दो भागों में बाँटती है । ढाई मील फैली यह नहर सोलह फीट गहरी है । यहाँ की एक गली को दुनिया की सबसे पतली गलियों में शुमार किया जाता है जिसकी चैड़ाई 53 सेंटीमीटर है । प्रत्येक वर्ष वेनिस में डेढ़ करोड़ टूरिस्ट आते हैं । दुनिया की पहली गे्रजुएट महिला एलेना लुक्रजिया कोरनारो पिस्कोपिया जिसका जन्म 1646 में हुआ था, वेनिस की रहने वाली थीं । वह 25 जून 1678 में ग्रेजुएट हुईं । दुनिया का पहला पब्लिक कैसीनो वेनिस में 1638 में बना । वेनिस में व्यापार और आवागमन के लिये गोडोला बोट के जरिये होता है । गोंडोला बोट 35॰5 फीट लंबी तथा 4ण्5 फीट चैड़ी होती हैं । इनका वजन 1,500 700 किलोग्राम होता है । ये आठ तरह की लकड़ी...लाइम,ओक,वालनट,चेरी, फीर, लार्च, एलम, महागोनी के 280 हाथसे बने टुकड़े से बनाई जाती है । इसको बनाने में लगभग दो महीने लगते हैं । एक गोंडोला वोट की कीमत 38,000 यूरो आती है । जैसे-जैसे हमारी शटल आगे बढ़ रही थी, समंदर के दोनों किनारों पर सालों पुरानी ऐतिहासिक इमारतें दिखाई देने लगीं जो तेरहवां से अठारवीं शताब्दी के दौरान बनाई गई थीं । खाना खाते हुये लंच समाप्त होते ही हमारा गंतव्य भी आ गया । हम शटल से सेंट मार्क स्कावयर पर उतरे तथा सबसे पहले संत मार्क बैसीलिका, मुरेनो ग्लास फैक्टरी देखने गये । मुरेनो ग्लास फैक्टरी के प्रवेश द्वार से अंदर प्रवेश करते ही एक हाॅल आये । इस हाॅल में एक बड़ा सा शीशे का घोड़ा रखा हुआ था । आगे बढ़े तो एक छोटे से कमरे में दस पंद्रह मिनट के शो के द्वारा बताया जा रहा था कि कैसे शीशे को पिघला कर मूर्तियाँ बनाई जाती हैं । इसके बाद साथ ही बने शो रूम में 24 कैरेट सोने के काम के बने बहुत मंहगे फूलदान, वाइन ग्लास, काफी सेट ज्यूलरी सेट के अलावा कुछ गिफ्ट आइटम भी देखे । वेनिस का मुरानो बीडस, या वेनेशियन ग्लास दुनिया भर में मशहूर हैं । एक और दीप बुरानो में में लेस और कढ़ाई का काम होता है । वैसे तो इटली का हर शहर मंहगा है लेकिन वेनिस यूरोप का सबसे मंहगा शहर है । किसी भी सामान की यूरो में कीमत को, रूपये में कनवर्ट करने पर खरीदने की हिम्मत नहीं होती । हम फैक्टरी से बाहर निकलकर थोड़ा आगे बढ़े तो अचानक पानी बरसने लगा । हम वहीं किनारे शेड में बैठ गये । देखा बहुत सारी कुर्सी पड़ी थीं वहाँ कोई शो होने वाला था । छाता हमारे पास नहीं था अतः हमने पाँच यूरो में एक छाता खरीदा वरना वहीं बैठे रह जाते । सामने बहुत बड़ी इमारत दिखाई दे रही थी । हमें बताया गया कि यह इस शहर का प्रसिद्ध रोमन कैथोलिक सेंट बैसीलिका कैथेड्रल चर्च है । यह इटालियन बीजान्टिन आर्कीटेक्ट का बेहतरीन उदाहरण है । यह चर्च पियाजा सेन मार्को के पूर्वी भाग में स्थित है तथा डोज पैलेस से मिला हुआ है । यह ग्यारहवीं शताब्दी से वेटिनीटियन धन और शक्ति का प्रतीक बना हुआ है । इसको सोने का चर्च भी कहा जाता है । आज की इस इमारत का निर्माण 1063 में हुआ था । समय पर इसमें बहुत परिवर्तन हुये किन्तु इसकी मूल आंतरिक संरचना वैसी ही है । कैथेड्रल के अंदर दसवीं शताब्दी में बनी संत माइकेल की सोने के पानी चढ़ी भव्य मूर्ति है । इसके अंदर बने डोम में उकेरी कलाकृतियाँ बेहतरीन आर्ट का अनुपम उदाहरण है । इस चर्च के ऊपर वेनिस के प्रतीक एवं संरक्षक संत मार्क की मूर्ति है तथा इसके नीचे शेर की पंख वाली सुनहरे रंग की मूर्ति है । यह संत और वेनिस का प्रतीक चिन्ह है । इस चर्च का पश्चिमी बाहरी भाग तीन भागों में बंटा है । सेंट मार्क बैसीलिका की बालकनी में घोड़े के जोड़े बने हुये हैं । घोड़े की मूर्तियाँ 1204 में लगीं थीं । नेपोलियन द्वारा इन्हें 1797 में पेरिस ले जाया गया किन्तु 1825 को इन्हें वेनिस को लौटा दिया । इनकी मरम्मत कर 1970 में इन्हें सेंट मार्क के म्यूजियम में रख दिया गया । कैथेड्रल में आज पीतल की बनी इनकी प्रतिकृति रखी हुई है । चर्च के बायीं ओर स्थित माक्र्स क्लाॅक टावर दर्शकों के आकर्षण का केंद्र है । यह वेनिस के पुनःजागरण काल का बेहतरीन नमूना है । इसमें लगी घड़ी पंद्रहवीं शताब्दी की है । इसकी मैकेनिज्म में समय--समय पर सुधार हुये । यह घड़ी ऐसी जगह स्थित है जो दूर से दिखाई देती है तथा वेनिस की ऐश्वर्य और प्रसिद्धि की परिचायक है । इसमें स्थित सीढ़ियों द्वारा इसकी छत तक पहुँचा जा सकता है । इस चौक में 323 फीट ऊँचा एक बेल टावर तथा और दो खूबसूरत कालम पर लायन आफ वेनिस की मूर्ति और हाथ में भाला लिये खड़े सेंट थियोडोर खड़े हैं । सेंट मार्क स्क्वायर के पास ही डाज पैलेस और कोरेर म्यूजियम है । वेनिस की खूबसूरती के बीच यह भी एक सच है कि यह सिटी हर वर्ष 0.8 से लेकर 1 मिलीमीटर तक समुद्र में समा रहा है । डोकाल पैलेस में सत्रहवीं शताब्दी तक अपार्टमेंन्ट, शहर के कोर्टरूम तथा जेल थी जो ‘ ब्रिज आफ साई ’ ( दुख का पुल ) से डोज पैलेस से जुड़े थे । अब डोकाल पैलेस वेनिस नेटवर्क के सिविक संग्रहालय का हिस्सा बन गया है । वेनिस में बहुत सारे पुल हैं जो बारोक वास्तुकला से बने हैं पर इनमें 1600 में बना रोमांटिक ब्रिज आफ साई है । इसे एन्टोनियो मारिया द्वारा डिजाइन किया गया है । सफेद पत्थर से बना यह पुल रियो दि प्लाजो से गुजरता हुआ न्यू प्रिजन से जुड़ता है । न्यू प्रिजन से इसके द्वारा डोज पैलेस में स्थित कैदियों से पूछताछ वाले कमरे तक पहँुचा जा सकता है । इसे दुख का पुल शायद इसलिये कहा जाता है कि कैदी इस पुल से गुजरते हुये आखिरी बार वेनिस के सौन्दर्य को देख पाते हैं । यह 36 फीट चैड़ा है । पास से देखेंगे तो पायेंगे कि इसकी बाहरी संरचना में कई चेहरे बने हैं जिनमें एक को छोड़कर सभी उदास हैं । यह कहा जाता है कि खुश चेहरे वाली मूर्ति इस पुल की अभिभावक है । कहा जाता है गोन्डोला राइड के समय जो युगल इस पुल के नीचे से गुजरते हुये किस करता है उसका प्यार और खुशी अनंत काल तक रहती है । हमने भी गोंडोला राइड की । पुलों के नीचे से गुजरती यह राइड बेहद रोमांचक थी । तीसरी शताब्दी में रोमन राज्य को स्थिर रखने के लिये राजा डिओसेलेटियां ने अपने अधीनस्थ चार शासक के नियम को लागू किया । उनकी स्मृति में इन चार राजाओं का प्रतीक एक चार मुख वाली मूर्ति इस बैसीलिका के दक्षिणी पश्चिमी भाग में लगाई गई है । शाम हो रही थी । हमें शटल से वापस लौटना था । अंततः खूबसूरत यादों को दिल में बसाये हम अपने होटल लौट आये । सुधा आदेश

Thursday, November 14, 2019

महाराष्ट्र अप डेट

महाराष्ट्र अप डेट... मैया, मैं तो चंद्र खिलौना लेहूँ... इसी पंक्ति की तरह उद्धव ठाकरे अपनी जिद पर अड़े हैं । एक समय था जब बड़े-बड़े नेता बाला साहेब से मिलने मातोश्री जाया करते थे जबकि आज उनके बेटे अपने पुत्र की ताजपोशी के लिये घाट-घाट का पानी पी रहे हैं पर उनकी प्यास बुझ ही नहीं रही है ।

Wednesday, November 13, 2019

बोधिसत्व

बोधिसत्व 

 अपने क्लीनिक से डाक्टर विनय लौट रहे थे कि उनके देखते ही देखतेे तेज गति से जाती कार ने एक साइकिल सवार को टक्कर मारी तथा बिना रूके , बिना यह देखे कि किसी को चोट आई है या नहीं, वह कार तेजी से चली गई...। साइकिल सवार नीचे गिर कर मछली की तरह तड़पने लगा....। एक बार उन्होंने सोचा कि वह भी औरों की तरह आँख बंद कर चले जायें । वैसे भी उन्हें काफी देर हो चुकी थी, घर में सब उनका इंतजार कर रहे होंगे...आज उनके भाई का जन्मदिन है किंतु उनके संस्कारशील मन ने मस्तिश्वक को हावी होने से रोक दिया....। गाड़ी किनारे खड़ी करके वह वहाँ पहुँचे किन्तु जैसे ही उनकी नजर उस आदमी पर पड़ी वह चौंक गये....चौड़ा ललाट, बड़ा सा तिलक, बड़ी-बड़ी आँखें, गेरूए वस्त्र....हां यह वही तो है जो उनके सामने न रहते हुए भी उनके घर पर इतना हावी हो चुका था कि शनैः शनैः उनकी सारी खुशियाँ तिरोहित होती चली गई थीं । एक बार मन हुआ कि वह उसे ऐसे ही तड़पता हुआ छोड़कर चले जाएं किन्तु वह एक डाक्टर थे, उनके लिये कर्तव्य भावनाओं से ऊपर था अतः मन पर काबू रखकर उन्होंने उसे पास खड़े आदमियों की सहायता से गाड़ी में डाला तथा क्लीनिक की ओर वापस चल पड़े....। नर्सिंग होम पहुँचते ही उन्होंने नर्स को आपरेशन की तैयारी करने के लिये कहा । उसी समय फोन की घंटी बज उठी,‘ कहाँ हैं आप ? मैं कब से इंतजार कर रही हूँ । याद है आज विमल का जन्मदिन है और आपने उसे ट्रीट देने का वायदा किया था ।’ सुजाता की आवाज थी । ‘ याद है डियर, पर अभी कुछ समय लगेगा । एक इमरजेंसी आपरेशन करना है, इसीलिये रूकना पड़ रहा है । ऐसा करो कि तुम लोग चले जाओ तथा मेरे लिये खाना पैक करा कर ले आना । ’ विनय ने सहज स्वर में कहा । यह विनय के लिये कोई नई बात नहीं थी....। अक्सर ऐसा होता था किन्तु उन्हें सुजाता, अपनी पत्नी पर गर्व था...। .वह उन स्त्रियों में से नहीं थी जो उनके कामों में बाधा बने वरन् वह सदा ऐसी स्थितियों में उन्हें भला बुरा कहने के बजाय उनके पेशे की गुरूता को समझकर उन्हें सहयोग देते हुए प्रोत्साहित करती रही थी....। हाँ यह बात अलग है कि देर सबेर होने पर वह आम स्त्रियों की तरह चिंतिंत होकर जब तब फोन कर उनकी खोज खबर लेती रहती थी किन्तु उनके देर सबेर घर आने पर उसने कभी क्रोध नहीं किया था ...यह उसके उनके प्रति अतिशय प्रेम का भी परिचायक होने के साथ इस बात का भी द्योतक था कि वह उसके कार्य में बाधक नहीं वरन सहायक बनना चाहती थी । उसी के प्रयत्नों का फल है कि आज उनका अपना नर्सिग होम है....सारी अत्याधुनिक सुविधाएं है....किन्तु यह सब होते हुए भी कुछ ऐसा था उनकी जिंदगी में, जिसने उनकी सारी खुशियों को हर लिया था....। विनय को वह दिन याद आया जब वह विवाह के पश्चात पहली बार माँ के आग्रह करने पर वह औऱ सुजाता माँ के साथ हनुमानगढ़ी दर्शन के लिये गये थे । मंदिर में पूजाकर प्रसाद बांटने के पश्चात वे कार मे आकर बैठे ही थे कि एक हृष्ट-पुष्ट नौजवान आया तथा अपने भीख माँगने वाले कटोरे को आगे करते हुए बोला,‘ माँजी, तुम्हारे बच्चे दूधों नहायें, पूतों फलें, तुम्हारा सुहाग अमर रहे....भगवान तुम्हारा भला करें ।’ माँ ने उसका आशय समझकर पैसे निकालकर देने चाहे तो विनय ने उन्हें रोकते हुए कहा,‘ माँ, भीख देने की आवश्यकता नहीं है....हट्टा कट्टा तो है।’ फिर उस व्यक्ति की ओर मुखातिब होकर कहा,‘ तुम हट्टे-कट्टे नौजवान हो । तुम्हें इस तरह भगवान के नाम पर भीख माँगना शोभा नहीं देता । मुझे अपने क्लिीनिक में काम के लिये तुम्हारे जैसे आदमी की आवश्यकता है यदि चाहो तो इस पते पर आ जाना ।’ इसके साथ ही विनय ने उसे अपना विजिटिंग कार्ड देना चाहा किन्तु उसकी पेशकश को मानना तो दूर वह आगबबूला हो उठा तथा बोला,‘ नहीं देना हो तो मत दो....। हम ब्राहमण है भीख माँगकर गुजारा कर लेंगे किन्तु कहीं किसी की नौकरी नहीं करेंगे....। दान देना महादान है शायद तुम नहीं जानते जो ब्राहमणों का अपमान करता है या दान देने में आना कानी करता है, उनके कुटुम्ब में कोई पानी देने वाला भी नहीं बचता है ।’ उसका बड़बड़ाना चालू था, उसकी व्यर्थ की बातों से बचने के लिये उसने कार स्टार्ट कर दी थी किन्तु माँ तथा पत्नी की आँखों में छाया भय उससे छिप न सका था । जब विनय ने उन्हें तसल्ली देनी चाही तो माँ बिगड़ते हुए बोली,‘ अरे, ब्राहमण ही तो था....दो चार रूपये दे देते तो क्या बिगड़ जाता पर तुम आजकल के लड़कों को तो दान पुण्य की बातें समझ में ही नहीं आती ।’ ‘ माँ यहाँ दान-पुण्य की बात नहीं है, बात हैं अकर्मण्यता को बढ़ावा देने की....। बिना कोई काम किये धर्म के नाम पर पैसा लेने वालों से मुझे सख्त चिढ़ है....। वैसे भी मैंने पैसे नहीं दिये तो क्या हुआ, उसे एक अच्छी नौकरी का आफ़र तो दिया था लेकिन तुमने देखा नहीं उसने कितनी बेहरमी से मेरी पेशकश ठुकरा दी....। सम्मान की जिंदगी जीने की अपेक्षा इन्हें ऐसी जिंदगी गुजारने में पता नहीं क्या आनंद आता हैं ? ’विनय ने अपना पक्ष रखते हुए कहा । ‘ वस्तुतः नौकरी में तो वह बंध जाता है जबकि भीख माँगना तो उनकी अपनी मर्जी है....न कोई मेहनत और न ही कोई तनाव....। माँ जैसे लोग तो हर जगह ही मिल जाते हैं....इसलिये आजकल भीख माँगना भी पेशा बनता जा रहा है । एक ऐसा पेशा जिसमें न हींग लगे और न फिटकरी पर रंग भी चोखा....।’ कहते हुए विनय के छोटे भाई विमल ने भी अपना ज्ञान बिखेरते हुए कहा । ‘वह जरूर कोई सिद्ध पुरूष या महात्मा था । तुमने देखा नहीं उसके चेहरे पर कितना तेज था ।’ माँ जो उस गेरूए वस्त्रधारी के वचनों से डरी हुई थी, ने बेचैन होकर कहा । ‘ ममा, अगर वह कोई सिद्ध पुरूष या महात्मा होता तो भीख न मिलने पर अपशब्द न कहता....भीख माँगना तो उनका पेशा है ।’ एक बार फिर विमल ने कहा । ‘ चुप रह....जैसा तेरा भाई वैसा ही तू, तुम लोगों से तो कुछ कहना ही व्यर्थ है ।' माँ ने झल्लाकर कहा । फिर मंदिर की ओर हाथ जोड़ते हुए क्षमायाचना के स्वर में बोली,‘ हे ईश्वर, मेरे इन दोनों नादान बच्चों का अपराध क्षमा करना ।' माँ का वर्षो से देखा यह रूप देखकर विनय और विमल मुस्करा दिये किन्तु आश्चर्य तो उन्हें तब हुआ जब सुजाता ने भी माँ का समर्थन करते हुए उन्हें ही दोष दिया था....। माँ तो कम पढ़ी लिखी धर्म भीरू महिला थी किन्तु सुजाता तो पढ़ी लिखी थी । सुजाता से कारण पूछा तो बोली,‘तुम लोग तो पुरूष हो इसलिये स्त्री मन को नहीं समझ पाओगे....। स्त्री एक माँ है, पत्नी है, बहन है, बेटी है....वह कभी अपने बच्चों, पति, पिता और भाई का बुरा नहीं चाहती । उनके ऊपर आई किसी विपत्ति की कल्पना ही उसका सुख चैन छीन लेती है....। विवाह होते ही जहाँ वह अनेक बंधनों में बंधती है वहीं कभी अपने सुहाग, कभी अपनेे परिवार की रक्षा तथा सुख और शांति के लिये अनेको व्रत उपवास रखती है....। स्वयं कष्ट सहकर दूसरों के भले की चाहना संस्कारशील मन या सदियों से पोषित संस्कारों का ही फल है । अब इसे तुम चाहे कुफल समझो या सुफ़ल, यह तुम्हारे ऊपर निर्भर है ।' अभी कुछ ही दिन हुए थे कि उसके नये बनते नर्सिग होम की दीवार गिर गई जिसके कारण काम करता हुआ एक मजदूर बुरी तरह घायल हो गया....। इस घटना को अभी कुछ ही दिन बीते थे कि एक दुर्घटना में विमल के हाथ में फ्रेक्चर हो गया । यही नहीं पिताजी को भी हाई ब्लडप्रेशर के कारण एक दिन बैठे-बैठे चक्कर आ गया तथा उन्हें अस्पताल में भरती करवाना पड़ा। माँ ने इन सब घटनाओं को उस ब्राहमण के श्राप से जोड़कर उसे दोष देते हुए नवग्रह शांति हेतु पूजा करवा दी । जैसे ही उसके नर्सिग होम का उद्घाटन हुआ सुजाता ने भी नवांकुर के आने की सूचना देकर उनकी खुशी को दुगणित कर दिया । एक बार फिर घर में खुशियों ने दस्तक दे दी । माँ ने सुजाता को यह न करो वह न करो के बंधन में बांध दिया… । उसका विशेष ख्याल रखा जाने लगा....। यहाँ तक कि माँ उसे कहीं अकेले आने जाने भी नहीं देती थीं । उनके व्यवहार को देखकर एक दिन विनय ने हँसते-हँसते कहा,‘ माँ, सुजाता बच्ची नहीं है, वह अपना ख्याल रख सकती है । ‘ मैं जानती हूँ लेकिन इस समय वह अकेली नहीं है वरन् हमारे वंश की पोषिता भी है....अतः इसकी उचित देखभाल मेरी जिम्मेदारी ही नही, मेरा कर्तव्य भी है वैसे भी वर्षों बाद हमारेे घर में नन्हें मुन्ने की किलकारियां गूँजेंगी....। जब यह हमें इतना सुख देगी तो क्या मैं इसका इतना सा भी ख्याल नहीं रख सकती ?’ माॅं ने प्यार से उसे निहारते हुए कहा था । किन्तु होनी को कौन टाल सकता है....माँ के अतिशय देखभाल के बावजूद एक दिन सुजाता बाथरूम मे पैर फिसल जाने के कारण गिर गई और इसके साथ ही गर्भपात हो गया....। नवग्रह शांति के पश्चात भी इस घटना का होना माँ को विचलित कर गया तथा उस श्राप को याद कर वह रोने लगी । विनय चाहकर भी माँ को सांत्वना नहीं दे पाया वस्तुतः इस बार की घटना ने उसेे भी असंतुलित कर दिया था क्या सचमुच उसकी वंशबेल नहीं फ़लेगी....? क्या दुखी मन से दिया श्राप क्या सचमुच लग जाता है ? अंर्तमन ने उसे टोका....वह दुखी कहाँ था…?.वह तो उन जैसे लोगों का पेशा है । वे लोगों की मानसिकता से भलीभांति परिचित होते हैं तभी पहले चिकनी चुपड़ी बातें करके लोगों को फँसाते हैं, यदि उससे बात न बने तो उल्टा सीधा बोलते हैं जिससे डर कर लोग उनकी झोली में कुछ न कुछ तो डाल ही दें....। वास्तव में बड़ा ही अच्छा नुस्खा है लोगों की भावनाओं से खेलने का....। वह स्वयं को भले समझा ले लेकिन माँ को समझना बेहद कठिन था । शायद यही कारण था कि पिछले लगभग एक वर्ष में हुई हर बुरी घटना को उस व्यक्ति के साथ जोड़कर देखने की माँ की आदत पड़ गई थी । चाहे अस्पताल दीवार गिरी हो या विमल का स्कूटर एक्सीडेंट में हाथ में फ्रेक्चर हुआ हो । पिताजी की बीमारी हो या बहन विनीता के विवाह में आती रूकावट हो....और अब यह घटना....। वह आदमी सामने न रहते हुए भी उनके परिवार पर बुरी आत्मा की तरह छाया हुआ था....। सुजाता निर्लिप्त थी । पिताजी अवश्य विमल का पक्ष लेते लेकिन पता नहीं क्यों बार-बार होती दुर्घटनाओं के कारण उसके आत्मविश्वास में भी कमी आती जा रही थी....। कभी-कभी उसे माँ की बात सच लगने लगती किन्तु जब उसकी तार्किक बुद्धि उसके बेसिरपैर के विचारों पर अंकुश लगाती तब वह सामान्य हो जाता किन्तु फिर कोई नई घटना जन्म ले लेती तब यत्न से दबाये नागफ़नी एक बार फिर उग कर उसे दंशित करने लगते...। अन्य अवसरों की तरह इस बार भी उसने मन के विचारों को यह सोचकर झटकने का प्रयास किया कि ऐसी सब घटनाएं आम आदमियों के जीवन का हिस्सा हैं । सुख-दुख इंसानी जीवन के दो पहलू हैं....भला इन सबका उस आदमी की उलटी सीधी बातों से क्या मतलब ? ‘ सर, आपरेशन की पूरी तैयारी हो चुकी है....।’ नर्स ने आकर सूचना दी । ‘ठीक है, मैं आता हूँ ।’ कहकर वह ऑपरेशन करने चल दिया किन्तु उसके किसी घर वाले के न आने से वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे....? उस आदमी के मोबाइल से घर का नंबर देखकर उसने उसके घरवालों को फोन करवा दिया था किंतु अब तक कोई नहीं आया था....। मरीज की हालत बेहद नाज़ुक थी । एक पैर के घुटने के नीचे का हिस्सा बुरी तरह क्रश हो चुका था तथा दूसरे पैर में भी फ्रेक्चर था । यदि तुरंत आपरेशन नहीं किया तो पैर को घुटने के नीचे काटना भी पड़ सकता था....। विधि का कैसा विधान है कि जिस आदमी की वजह से उसके घर की सुख-शांति भंग हो गई थी वही आज उसके रहमों करम पर पड़ा है....। वह चाहता तो उसे देखकर वहीं मरने के लिये छोड़ सकता था लेकिन वह डाक्टर है, उसका काम जान बचाना है जान लेना नहीं....। अपने विचारों को झटकते हुए आपरेशन थियेटर में गया तथा चार घंटे के अथक प्रयत्नों से उसने उसकी टूटी टांग को जोड़ दिया....। जब वह आपरेशन थियेटर से बाहर आया तो देखा उस आदमी की पत्नी और बेटा , जो बाहर खड़े बेसब्री से उसका इंतजार कर रहे थे, दौड़कर आये । उससे सांत्वना पाकर वह उसे ढेरों असीस देने लगे....। विनय थका हारा घर पहुँचा....उसने सारी घटना विस्तार से माँ को बताई ...। ‘ क्या वही आदमी था ? तूने ठीक से पहचाना....।’ सारी घटना सुनकर माँ ने पूछा । ' हाँ माँ, उसको पहचानने में भूल कैसे हो सकती है ।' विनय ने उत्तर दिया । ‘ जब वह अपने ऊपर आई विपदा को नहीं टाल पाया तो दूसरों के जीवन में होने वाली अच्छी बुरी घटनाओं के लिये कैसे दोषी हो सकता है....सच जीवन में होने वाली कोई भी घटना मात्र संयोग होती है न कि किसी के श्राप का कुफ़ल ।’ विनय की बात सुनकर गहरी सांस लेकर माँ ने कहा । शायद अब माँ को समझ में आ गया था कि शब्द सिर्फ शब्द ही होते हैं....। ऐसे साधू, महात्मा और फ़कीरों के शब्द उनके मन की कुंठा,आक्रोश तथा समाज के प्रति नफ़रत का प्रतिफ़ल होते हैं....। अपना प्रयोजन सिद्ध न होने पर ऐसे शब्दों का प्रयोग कर, लोगों पर मनोवैज्ञानिक दवाब बनाकर,अपना मतलब साधना ही उनका एक मात्र उद्देश्य होता है....। उस समय माँ के तनावरहित चेहरे को देखकर लगा जैसे सदियों के तनाव से उन्हें मुक्ति मिल गई है। इसके साथ ही दिलों में बेवजह ही उग आये नागफ़नियों ने सच्चाई की कड़ी घूप में झुलसकर असमय ही दम तोड़ दिया । दूसरे दिन जब विनय नियमानुसार अपने नर्सिंग होम के मरीजों को चैक करने के क्रम में उस आदमी के कमरे में गया तोे वह होश में आ चुका था । डॉक्टर के रूप में विनय को देखकर वह अचानक संकुचित हो उठा … ‘ अब कैसे हो ? दर्द तो ज्यादा नही है ।’ उसकी मुखमुद्रा पर ध्यान दिये बिना विनय ने शांत स्वर में पूछा । विनय का आत्मीय स्वर सुनते ही वह फफक-फफक कर रोने लगा तथा दुखित स्वर में अपना अपराध स्वीकर करते हुए कहा, ‘ डाक्टर साहब, आप महान हो । यदि आप मुझे यहाँ नहीं लाते तो शायद मैं वहीं तड़प-तड़पकर दम तोड़ देता....। शायद आपने नहीं पहचाना मैं वही आदमी हूँ जिसने आपके भीख न देने पर आपके पूरे परिवार के लिये अपशब्द कहे थे....लेकिन तब मैं आपके मन में छिपी मानवता को नहीं पहचान पाया था । आपने न केवल मेरी मदद की वरन् मेरा अपने इस नर्सिग होम में आपरेशन भी किया....बिना यह जाने कि मैं गरीब आपका बिल भी चुका पाऊँगा या नहीं। ’ ‘ मैंने एक डाक्टर....उससे भी बढ़कर एक इंसान का कर्तव्य निभाया है लेेकिन तुमने मुझे पहचान कैसे ? वहाँ तो रोज ही सैकड़ों लोग नित्य दर्शन के लिये आते हैं ।’ विनय ने अनजान बनते हुए पूछा । ‘ आप सच कह रहे हैं डाक्टर साहब, मंदिर में नित्य ही सैकडों लोग दर्शन के लिये आते हैं लेकिन नौकरी का आफ़र तो कोई नहीं देता....। तब मैं अनपढ़ , गंवार आपकी बात कहाँ समझ पाया था....!! जब बिना कुछ करे ही दानदक्षिणा के रूप में पाये धन से काम चल जाता है तो काम क्यों करें ? जैसे विचार उस समय मन में घर जमाये हुए थे....किन्तु आपके जाने के पश्चात सोचा तो लगा कि आप ठीक ही कह रहे हैं....। भीख-भीख ही होती है....। मेहनत की कमाई से खाई रोटी ही इज्जत की रोटी कहलाती है....। फिर मेरा बच्चा भी है, उसे भी पढ़ाना है....। आपके जाने के पश्चात मैंने आपको ढूँढने की बहुत कोशिश की किन्तु अब जब मिले हैं तो भी इस स्थिति में ।’ ‘ अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है...यदि चाहो तो पैर ठीक होते ही काम पर आ जाना ।’ विनय ने सहज भाव से कहा था लेकिन चाहकर भी नहीं कह पाया कि जैसे तुम हमें नहीं भूल पाये वैसे ही हम भी तुम्हें कहाँ भूल पाये थे....!! तुम्हारी अर्नगल बातों ने अनजाने ही हमारे मन मेें भी अज्ञात डर के ऐसे बीज बो दिये थे जिसके कंटीले पौधे उगकर न जीने दे रहे थे और न ही मरने....। पता नहीं कैसा मनोवैज्ञानिक दबाब था जिसके कारण सब कुछ जानते समझते हुए भी वह कुछ दिनों से अपने स्वभाव के विपरीत आम आदमियों की तरह जरा सी परेशानियों से घबराकर उल्टा सीधा सोचने लगा था....। वह भटक गया था या शायद ऐेसा अपनों के लिये अतिशय प्रेम के कारण होता रहा हो....। उसे रह-रहकर सुजाता के कहे वह शब्द भी याद आये जो उसने स्त्रीमन की व्याख्या करते हुए कहे थे....। अब वे बीते कल की बातें हैं....। कल भले ही भीषण झंझावातों से भरा रहा हो लेकिन आने वाले कल के सूरज की नई किरणें मन में छाये अँधेरों को अवश्य दूर करेंगी....जिससे कि फिर कभी ऐसे विचार मन पर हावी न हों....। मन में इस विश्वास के आते ही उसका बोधिसत्व से साक्षात्कार हुआ । एकाएक विनय को लगा कि वह गहरे अंधकूप में गिरने से बाल-बाल बच गया है....। सच है कुछ हादसे जीवन से कुछ छीन लेते हैं तथा वहीं कुछ हादसे नुचे तुड़े जीवन को नया आयाम दे जाते हैं । सुधा आदेश

Sunday, November 10, 2019

सुव्यवस्था ही घर की शोभा है ।

सुव्यवस्था ही घर की शोभा है सुव्यवस्थित घर आपकी कार्यक्षमता में वृद्धि करता है इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती । कल्पना कीजिये आप थके हारे ऑफिस से लौटे हैं, दो क्षण आराम करना चाहते हैं किंतु बेड पर कपड़ों का अंबार हो , चादर ठीक से न बिछी हो तो थकान के बावजूद आप आराम नहीं कर पायेंगे । आपकी झुंझलाहट क्रोध में बदल जायेगी तथा आपका क्रोध घर भर में सबको अस्तव्यस्त कर देगा । यही हालत किचन की है । मान लीजिये आप चाय बनाने जा रही हैं, गैस पर पानी चढ़ा दिया । अब न चीनी का डिब्बा मिल रहा है न चाय का या चाय की पत्ती ही समाप्त हो गई है , अब आपको चाय की पत्ती लेने जाना पड़ेगा तभी चाय बन पायेगी... मेरे कहने का अर्थ है जिसको बनाने में पांच मिनट का समय लगना चाहिये उसमें दस मिनट लगना , या बिना पीये ही रह जाना, आपकी ऊर्जा का ह्रास करेगा साथ ही मूड भी खराब होगा । अगर आपने किचन तथा अन्य आवश्यकताओं में लगने वाले समान की पूरी योजना उचित तरीके से की है, हर चीज रखने की जगह निर्धारित कर ली है तथा उसे उसी जगह रखने की आदत डाल ली है तो विश्वास मानिये आपके काम का समय कम होगा तथा आप अपना समय अन्य कार्यो में लगा सकती हैं । अक्सर मैंने महिलाओं को कहते सुना है क्या करें, समय ही नहीं मिलता ...। हर व्यक्ति को काम करने के लिये चौबीस घंटे ही मिलते हैं अगर आप नियोजित तरीके से काम करें तो कोई कारण नहीं कि आप अपने लिये समय न निकाल पायें । कुछ लोग कहते हैं घर को घर ही रहने दें, उसे शो रूम न बनायें । ऐसा कहने वाले भी किसी मेहमान के आने पर घर को व्यवस्थित करने लगते हैं । जब मेहमान के आने घर व्यवस्थित होने की मानसिकता है तो घर के सभी सदस्यों को अपना सामान निर्धारित स्थान पर रखने की आदत डालकर, थोड़े से प्रयास से घर को सदा व्यवस्थित रखकर अपनी ऊर्जा को बचाना क्या उचित नहीं है ? साफ-सुथरा घर किसे अच्छा नहीं लगता लेकिन सफाई की सनक में घर भर को परेशान करना उचित नहीं है । धैर्य रखें, अच्छी आदत को अपनाने में समय लगता है । कोई माने या न माने , मेरे विचार से सुव्यवस्था ही घर की शोभा है । सुधा आदेश

Saturday, November 9, 2019

जहाँ चाह वहाँ राह

जहां चाह वहाँ राह सुजय को एक मल्टीनेशनल कंपनी द्वारा अमेरिका के न्यूजर्सी में काम करने के लिये नियुक्ति पत्र मिलने का समाचार सुनकर उसके माता-पिता की खुशी का ठिकाना नहीं रहा । खुश भी क्यों न होते आखिर आज वह योग्य पुत्र के योग्य माता-पिता बन गये है । उनका बेटा विदेश जायेगा यह उन जैसे मध्यमवर्गीय परिवार के लिये गर्व का विषय है । बहन सपना अपने भाई की इस उपलब्घि पर खुश होने के साथ दुखी भी थी क्योंकि उसे भाई के दूर जाने के कारण पढ़ाई में व्यवधान के साथ अपने जीवन में सूनापन दस्तक देता प्रतीत होने लगा है । जबसे उसने होश संभाला था तबसे उसने भाई को अपने आस-पास ही पाया है वरना उसके माता-पिता अपने कार्य के सिलसिले में ही इतना व्यस्त रहते थे कि कभी-कभी उसे लगता था कि उनके जीवन में बच्चों के लिये कोई जगह है भी या नहीं । पढ़ाई में भी जब भी उसे कोई समस्या होती वह भाई सुजय के पास जाती, वह उसे चुटकियों में हल करने के साथ इतनी अच्छी तरह समझाता कि फिर उसे दुबारा पूछने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी । दसवीं बोर्ड में उसके अपेक्षा से कम नम्बर आने पर वह बहुत उदास हुई थी तब भाई ने उसे यह कहकर दिलासा दी थी कि दुखी होने की बजाय नम्बर कम क्यों आये इस पर चिंतन मनन कर, उन कारणों का निवारण करने का प्रयास करो...। जीवन में आई किसी विफलता से घबराना नहीं चाहिए वरन् उससे सीख लेते हुये अपने हौसले को बनाये रखना चाहिये । इसके साथ ही जीवन में अपना लक्ष्य निर्धारित कर, उसे पाने के लिये सतत प्रयत्नशील रहो । सदा याद रखो विषम परिस्थितियों में भी हौसला रखने वालों की कभी हार नहीं होती । भाई के हौसलों का ही परिणाम था आई.आई.टी. करते ही मल्टीनेशनल कंपनी द्वारा नियुक्ति मिलना । वह अपने कारण भाई की खुशी में बाधक नहीं बनना चाहती थी अतः उसने भी माता-पिता के साथ भाई के भाल पर टीका लगाकर उसे जीवन की नई पारी प्रारम्भ करने के लिये खुशी-खुशी विदा किया । सुजय ने न्यूजर्सी पहुँचकर अपना कार्यभार संभाल लिया । कम से कम इतना संतोष था कि संचार के साधनो के कारण अब दूरी, इतनी दूरी नहीं रह गई है । लगभग रोज ही सुजय से फोन पर या वीडियो कॉल के जरिये बात होती ही रहतीं । उसका हाल चाल पता लगता रहता । सुजय को कुछ ही दिनों में लगने लगा था कि यहाँ....इस देश में, उसकी राह इतनी आसान नहीं है जितनी कि वह सोच रहा था । उसके कुछ सहयोगी विशेषकर जॉन उस पर नस्लवादी टिप्पणी करते हुये कभी उसके बात करने के तरीके पर तो कभी उसके रंग पर तो कभी उसके खानपान के तरीके पर व्यंग्य करते हुये उसे दोयम दर्जे का इंसान साबित करने में तुला हुआ था जबकि उसके अन्य साथी चुप रहकर एक तरह से परोक्ष रूप से उसका समर्थन ही कर रहे थे । यही बात उसे कचोटती रहती थी जिसके कारण उसकी कार्यक्षमता प्रभावित होने लगी थी । कभी-कभी उसे लगता कि कहीं वह वास्तव में इस विकसित देश में मिसफिट तो नहीं है या ये लोग एक विदेशी द्वारा उनके देश की कंपनी में नौकरी हथियाये जाने के कारण कुंठित हैं । बार-बार उसके प्रश्न से परेशान उसके अंतर्मन ने एक दिन उससे कहा... ‘ तुम मिसफिट नहीं हो वरन् तुम्हारे सहयोगी ही तुम्हारी योग्यता से ईष्र्याग्रस्त होकर तुम पर नस्लवादी टिप्पणी करते हुये तुम्हारे मन में हीनभावना पैदा करना चाहते हैं । माना भारतीय होने के कारण तुम्हारा बात करने का लहजा उनसे अलग है पर योग्यता में तुम उनसे कमतर नहीं हो...। क्या इसका तुम्हें भान नहीं है ? इस तरह निराश होकर तुम उनकी बातों को ही सिद्ध कर रहे हो । तुम्हीं तो कहा करते थे कि हौसले रखने वालों की कभी हार नहीं होती फिर अब यह कैसी दुविधा ? दुविधा से बाहर निकल कर लक्ष्य के प्रति ध्यान केन्द्रित करो...आज जो तुम्हारे कार्य में बाधा बन रहे हैं वही एक दिन तुम्हारी प्रशंसा करेंगे ।’ अंतर्मन की आवाज सुनकर उसका आत्मविश्वास बढ़ा जिसके कारण वह अपने सहयोगियों की फब्तियाँ सुनकर भी चुप रहकर अपना काम करता रहता । एक ऐसे ही दिन जब जॉन उसके खाने के तरीके को लेकर उसका मजाक बना रहा था तब कुछ ही दिन पूर्व ही उसके प्रोजेक्ट को ज्वाइन करने वाली उसकी सहयोगी क्रिस्टीना ने जॉन को न केवल रोका वरन अन्य सहयोगियों को भी उसका साथ देने के लिए टोका । अब तो जब भी ऐसा होता क्रिस्टीना ढाल बनकर खड़ी हो जाती । धीरे-धीरे सहयोगियों के रूख में भी परिवर्तन आता गया । अब वे भी उसके साथ बराबरी का व्यवहार करते हुये उसे सहयोग देने लगे । धीरे-धीरे क्रिस्टीना के साथ उसकी दोस्ती बढ़ती गई । उसे जानकर आश्चर्य हुआ कि जब वह मेट्रिक में थी तब उसके माता-पिता उसकी तथा उसकी छोटी बहन की परवाह किए बिना अलग हो गये तथा उन दोनों ने ही दूसरा विवाह कर लिया । कुछ महीनों तक उसके पिता उन्हें पाकेट मनी देते रहे बाद में उन्होंने भी किनारा कर लिया । तब उसने नौकरी करते हुये न केवल अपनी पढ़ाई जारी रखी वरन् अपनी छोटी बहन कैथरीना को भी संभाला । छोटी बहन कैथरीना को पिछले माह ही हावर्ड कालेज में जॉब मिला है । उसे पढ़ाने का बहुत शौक है अतः उसने वहाँ लेक्चर का पद स्वीकार कर लिया । लगभग दो वर्ष पश्चात् प्रोजेक्ट के पूरा होने पर सुजय ने दो हफ्ते की छुट्टियों के लिये आवेदन किया । क्रिस्टीना को पता चला तो उसने भी यह कहकर साथ चलने की पेशकश की कि उसने भारत और उसकी संस्कृति के बारे में बहुत सुना है, वह एक बार भारत भ्रमण करना चाहती है विशेषकर प्यार की निशानी ताजमहल देखना चाहती है । सुजय उसे मना करके उसे आहत नहीं करना चाहता था क्योंकि उसने ही न केवल उसे अपने सहयोगियों के बीच सम्मानित स्थान दिलवाया वरन् उसके आत्मविश्वास को भी खंडित करने से रोका था । उसे क्रिस्टीना को अपने साथ ले जाने में कोई आपत्ति नहीं थी पर वह पर अपने माँ-पापा की वजह से सशंकित था । आखिर उसने माँ को बता ही दिया कि उसकी मित्र भी उसके साथ आ रही है । ‘ मित्र... वह भी एक लड़की । कहीं कुछ छिपा तो नहीं रहा है हमसे ? ’ पारंपरिक अंदाज में माँ ने रियेक्ट करते हुये सशंकित स्वर में पूछा । ‘ नहीं माँ, ऐसा कुछ नहीं है हमारे बीच...हम सिर्फ एक अच्छे दोस्त हैं ।’ उसने कहा । ‘ ठीक है...ठीक है लेकिन यह दोस्ती, दोस्ती तक ही सीमित रहनी चाहिये, मुझे विदेशी मेम बहू के रूप में स्वीकार्य नहीं है ।’ कहकर उसका उत्तर सुनने से पूर्व ही माँ ने फोन रख दिया । नियत समय पर घर पहुँचने पर ठंडेपन से माँ को स्वागत करते देख सुजय का मन बुझ गया । उसे लग रहा था क्रिस्टीना उसके घर के लोगों के बारे में कोई गलत धारणा न बना ले क्योंकि उसके मन में भारत की ‘ अतिथि देवो भवः ’ की मूर्ति विराजमान है । सुजय को इस बात की प्रसन्नता थी कि उसकी बहन सपना क्रिस्टीना की सारी आवश्यकताओं को समझते हुये उसका साथ देने की भरपूर कोशिश कर रही है । यद्यपि भारत आने से पहले क्रिस्टीना ने उससे साधारणतया प्रयोग में आने वाले कुछ हिंदी के शब्द सीखे थे पर अब सपना के सानिध्य में अपने हिंदी ज्ञानवर्धन करने में लगी हुई थी । सपना भी उसके हिंदी के प्रति लगाव देखकर उसके साथ सहयोग कर रही थी । माँ जब पूजा करती तब क्रिस्टीना उन्हें बड़े ध्यान से देखती तथा सपना से मंदिर में रखी विभिन्न मूर्तियों के बारे में पूछती । सपना भी उसकी हर जिज्ञासा का उत्तर देती थी । माँ के विरोध करने के बावजूद सुजय ने किसी तरह उनको मनाकर क्रिस्टीना को आगरा, जयपुर, उदयपुर घूमने का कार्यक्रम बना ही लिया । जयपुर में जहाँ हवा महल तथा किलों को देखकर क्रिस्टीना अभिभूत थी वहीं झीलों के शहर उदयपुर ने उसका मन मोह लिया । ताजमहल देखकर वह कह उठी, ‘ वाह ! अति सुंदर...क्या कोई किसी को इतना प्यार कर सकता है कि वह उसकी याद में इतना सुंदर मेमोरियल बनवा दे ?’ ‘ सुजय क्या तुम मुझसे विवाह करोगे ? मैं भारत में रहकर ही तुम्हारे साथ अपना जीवन बिताना चाहती हूँ ।’ अचानक क्रिस्टीना ने उससे लिपटते हुये कहा । ‘ भारत में...। ’ अचकचाकर सुजय ने कहा । ‘ हाँ भारत में...लेकिन तभी जब हमें यहाँ अपनी पसंद का कोई काम मिलेगा ।’ यद्यपि सुजय के मन में क्रिस्टीना के प्रति इस तरह के भाव पनपे थे पर वह जानता था ऐसा संभव नहीं है । माँ-पापा इस संबंध के लिये कभी तैयार नहीं होंगे । माँ-पापा से इस संबंध में बात करने से कोई फायदा नहीं था । अगर कुछ कर सकती थी तो केवल सपना ही...उसने सपना को अपने मन की बात बताई । उसने माँ-पापा के सामने उनकी पैरवी भी की । एक समय ऐसा भी आया कि पापा ने बेमन से ही सही उनके इस संबंध के लिये अपनी स्वीकृति दे दी पर माँ नहीं मानी । वे लौट आये थे । समय के साथ सपना का विवाह तय हो गया । वह विवाह में सम्मिलित होने गया । माँ ने उसे विवाह योग्य लड़कियों की फोटो दिखाई पर उसने उन्हें देखने से भी मना कर दिया । उसने सिर्फ इतना कहा...‘माँ आप जानती हैं, मेरे दिल में कोई बसा है, मैं उससे प्यार करता हूँ । किसी से प्यार करूँ किसी से विवाह... यह मुझसे नहीं हो पायेगा । ऐसा करके मैं किसी को धोखा नहीं देना चाहता । मैं और क्रिस्टीना आपकी सहमति का अभी तक इंतजार कर रहे हैं ।’ ‘ इंतजार कर, मेरा फैसला बदलने वाला नहीं है ।’ दो टूक शब्दों में यह कहते हुये माँ ने अपनी मानसिकता बता दी थी कि अभी भी वह अपनी जिद छोड़ने को तैयार नहीं हैं । माँ के नकारने के बावजूद क्रिस्टीना ने हार नहीं मानी । वह हिंदी सीखने का प्रयास करने के साथ ही साथ भारतीय खानपान को भी अपनाने का भरपूर प्रयास करने लगी । एक दिन वह उससे अपने किसी आवश्यक काम के संदर्भ में जाने की बात कर छुट्टी लेकर चली गई । ‘ सुजय जितनी जल्दी हो सके तू घर आ जा ।’ एक दिन माँ ने फोन कर उससे कहा । ‘ माँ घर में सब ठीक है न ।’ उसने घबराकर पूछा था । ‘ सब ठीक है, बस तू जल्दी घर आ जा ।’ माँ ने अपनी बात दोहराई थी । माँ के मना करने के बावजूद सुजय ने बार-बार उनके आग्रह का कारण जानना चाहा क्योंकि चार वर्षो के विदेश प्रवास के दौरान माँ ने इस तरह से उससे कभी आग्रह नहीं किया था । वह बार-बार यही कहती रही कि तू घर आ जा फिर बता दूँगी । सुजय ने क्रिस्टीना को घर जाने की बात बताने के लिये फोन किया पर उसका फोन स्विच आफ बता रहा था । वैसे भी जाते समय उसने उससे कहा था तुम मुझे फोन मत करना जब मुझे अवसर मिलेगा मैं ही फोन कर लिया करूँगी । पिछले महीने भर से उससे कान्टेक्ट न कर पाने के कारण वह चिंतित भी था । कैथरीना को फोन कर उससे पूछा तो उसने भी कह दिया कि उसे पता नहीं, अब अचानक जाना...वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे ? आखिर क्रिस्टीना के लिये मैसेज छोड़कर वह घर के लिये चल दिया । यात्रा के दौरान पूरा समय उसका इसी उहापोह में बीता कि माँ ने उसे क्यों बुलाया है...!! कहीं पापा की तबियत तो खराब नहीं है । अगर ऐसा है तो माँ ने उसे बताया क्यों नहीं ? ‘ तू परेशान होगा, इसलिये नहीं बताया होगा ।’ अंतर्मन ने कहा । ‘ क्या मैं बच्चा हूँ ?’ ‘ माँ के लिये उसका पुत्र या पुत्री सदैव बच्चे ही रहते हैं ।’ चौबीस घंटे की यात्रा के दौरान मन बेहद परेशान रहा । घर पहुँचकर बेचैनी से घंटी बजाई...दरवाजा माँ ने ही खोला । उनके पीछे क्रिस्टीना को खड़ा देखकर वह चौंक गया । ‘ बहुत दिन आजाद घूम लिया । अब बेड़ियाँ पहनने के लिये तैयार हो जा । अगले हफ्ते तेरा विवाह है ।’ वह कुछ पूछ पाता, उससे पहले ही माँ ने कहा । ‘ विवाह पर किससे ?’ अनजान बनते हुये उसने पूछा । ‘ कह तो ऐसे रहा है जैसे तुझे पता ही नहीं...अरे, क्रिस्टीना को देखकर भी तुझे आभास नहीं हुआ...। तेरा विवाह क्रिस्टीना से है...बहुत प्यारी बच्ची है । मैंने इससे कह दिया है तुझे जैसे रहना हो इस घर में रहना । हमारी ओर से कोई बंदिश नहीं है । बस तू मेरे इस नादान बच्चे का ख्याल रखना ।’ माँ ने उसके चेहरे पर चपत लगाते हुये प्यार से कहा तथा क्रिस्टीना की ओर देखकर मुस्करा दीं । घर के अंदर आकर अवसर पाकर उसने क्रिस्टीना से माँ के अंदर आये परिवर्तन के बारे में पूछा तो उसने मुस्करा कर कहा,‘ प्यार देकर ही प्यार पाया जा सकता है । इस बात को हम स्त्रियाँ ही समझ और समझा सकती हैं । माँ ने मेरे दिल की सच्ची बात सुनी और हमारे रिश्ते को मंजूरी मिल गई । मुझे तुम्हारे साथ माँ-पापा और एक प्यारी बहन भी मिल गई । आज मैं बहुत खुश हूँ । ’ आखिर चार वर्षो की जद्दोजेहद के पश्चात् उनके प्यार को माँ-पापा का आशीर्वाद मिल ही गया । सच अगर दो दिल मिल जायें तो सात समुंदर की दूरियाँ भी मायने नहीं रखतीं...अंततः सरहदें टूट ही जाती हैं । सपना और उसके पति धीरज ने विवाह का इंतजाम संभाल लिया था । आखिर विवाह का दिन भी आ गया । क्रिस्टीना की बहन कैथरीना भी विवाह में सम्मिलित होने आ गई थी । वह भी बहन का घर संसार को देखकर बहुत ही खुश थी । खूब धूमधाम से उनका विवाह हुआ । विवाह वाले दिन क्रीम कलर के सुनहरे जरी के काम वाले लंहगे में सुजय के बगल में खड़ी क्रिस्टीना परी से कम नहीं लग रही थी । नाते रिश्तेदारों और पड़ोसियों से क्रिस्टीना की प्रसंशा सुनकर माँ बाग-बाग हो रही थीं । कुछ दिन माँ-पापा के पास रहकर आखिर उन्हें अपनी कर्मभूमि लौटना पड़ा । अब उन्होंने भारत में अपने योग्य काम खोजने की शुरूवात के साथ अपनी कंपनी में भी वापस अपने देश लौटने की इच्छा जताते हुए आवेदन कर दिया ।

 इस बीच क्रिस्टीना ने आग्रहकर माँ-पापा को अमेरिका बुलाया तथा उसने और सुजय ने उन्हें अमेरिका के मुख्य पर्यटन स्थल...नियाग्रा फाल, स्टेचू आफ लिबर्टी, वाशिंगटन डी.सी. तथा फ्लोरिडा का डिस्नेवर्ड भी घुमा दिया । वह सपना और धीरज को भी बुलाना चाहती थी किंतु धीरज अपने कार्य के सिलसिले में इतना व्यस्त था कि वह समय ही नहीं निकाल पाया । आखिर दो वर्ष पश्चात् सुजय और क्रिस्टीना का प्रयास रंग लाया, उनकी इच्छापूर्ण हुई । उन दोनों को उनकी कंपनी ने भारत में रहकर कार्य करने की इजाजत दे दी । कहते हैं जहाँ चाह है वहाँ राह भी निकल ही आती है । सुधा आदेश