Thursday, December 4, 2014
भाव शून्य है
मैंने लिखी है इबारत,
शब्द ही शब्द है, भाव शून्य है।
इंसा ही जब इंसा का गला काटे,
तब इंसा बुत न बने तो क्या करे...?
काश बुत बन पाती, दिल में दर्द तो न होता
कलाम न रुकती,भाव न चूकते ।
आँखों में नमी है,दिल में बेचेनी है
फिर भी लेखनी चलती नहीं है ।
दोष जमाने का नहीं, हमारा है
असहाय क्यों, टक्कर क्यों नहीं लेते ।
अन्याय का कर प्रतिकार, आगे बढ़ो...
सहना, रोना है कायरों का काम ।
होगा जिस दिन ऐसा,लेखनी न रुकेगी,
विश्वास होगा,आस होगी,चहुं ओर सौहार्द होगा ।
ख़्वाहिश
लहू के आँसू पीकर
तमाम उम्र गुजार दी,
अब तो बाग के फूल भी
कांटे बन चुभने लगे है ।
तिल-तिल जलें भी
तो आखिर कब तक,
ज़िंदगी, ज़िंदगी नहीं
सजा बन चुकी है ।
कहने को मिला है
सोने का महल...
पर कैद खाने
कम नहीं ।
जीना आसान नहीं
पढ़ा था किताबों में,
दुश्वार इतना होगा
समझ अब पाये है।
समझोता करते-करते
कब तक जिये हम,
आखिर कोई तो हो
जिसे अपना कह सकें हम।
नहीं मिली ज़िंदगी
मेरे साथ मेरे कर्म ,
पल भर मिली खुशी
संतुष्टि बने मेरी ।
शिकवा- शिकायतें भूल
लम्हा-लम्हा गुजरे
ज़िंदगी के
चंद दिन यूँ ही ।
अंतिम ख़्वाहिश यही,
न रहे बदले की भावना,
न रहे कोई चाहना
मुक्ति मिले निर्दोष दीप सी।
Sunday, November 23, 2014
पल
मन को मत रोको
मन को मत टोको
उड़ता हे तो उड़ने दो
चलता है तो चलने दो।
यूँ मयूरपंखी सा
कब नाचा मन
इंद्रधनुष सा कब
लहलहाया मन ।
इस पल को पलने दो
इस पल को बहने दो
इस पल को सजने दो
इस पल को महकने दो।
यह पल संजीवनी है
यह पल बंदिगी है
यह पल ज़िंदगी है
यह पल खूबसूरत है।
मन को मत रोको
मन को मत टोको
उड़ता है तो उड़ने दो
चलता है तो चलने दो।
Wednesday, October 8, 2014
एक अनुभव
लखनऊ आने के पश्चात आज पहली बार मुझे अभिव्यक्ति संस्था की मासिक गोष्ठी में सम्मिलित होने का अवसर मिला...गोष्ठी अच्छी थी,पूरी तरह साहित्यिक वातावरण से भरपूर...पर उससे भी अच्छा लगा जब एक मेरी बेटी की उम्र की लड़की ने जब मुझसे पूछा,'आंटी, क्या आपकी सरिता और गृहशोभा में आपकी कहानियाँ छपी है। '
मेरे द्वारा सकारात्मक उत्तर प्राप्त कर उसने फिर पूछा, 'कब से छप रही है।'
मैने बताया की उन्नीसों छियानवे से ।'
तब उसने कहा,' उस समय तो में बारह वर्ष की रही होंगी, पर मै आपकी कहानियाँ पढ़ती रही हूँ ।'उसकी बात सुनकर लगा मेरी रचनाधर्मिता सफल हो गई है...।
आज वह स्वयं अच्छी लेखिका है...उसकी ( शुचिता श्रीवास्तव) की रचनाधर्मिता को नमन...
वैसे इस तरह की घटना पहली बार नहीं घटी है...आज से चौदह वर्ष पूर्व एक विवाह के स्वागत समारोह में एक लड़की ने मुझसे यही प्रश्न किया था पर वह सिर्फ पाठक थी लेखक नहीं...आज से सात वर्ष पूर्व की वह घटना भी नहीं भूल पाती हूँ जब में अपनी पुत्रवधू की तलाश कर रही थी...एक लड़की ने मुझसे पूछा कि क्या आप कहानियाँ लिखती है, मेरे हाँ कहने पर उसने कहा,मैंने आपकी कहानियाँ पढ़ी है ... खुशी की बात तो यह है कि वही कन्या आज मेरी पुत्रवधू है... ।
Friday, August 15, 2014
रोना छोड़ो,सोना छोड़ो, आगे क़दम बढ़ाओ ...
आगे क़दम बढ़ाओ
रोना छोड़ो,सोना छोड़ो,
आगे क़दम बढ़ाओ
देश है तुम्हारा
तुम इसको चमकाओ ।
संकल्प तुम्हारा,
विश्वास है तुम्हारा,
प्रयत्न है तुम्हारा,
होगा क्यों न दूर अंधेरा ?
ग़रीब मुक्त, अंधविश्वास मुक्त,
भ्रष्टाचार मुक्त, बेरोज़गारी मुक्त,
हिन्दुस्तान का कर निर्माण
आगे क़दम बढ़ाओ...।
न डरो, न रूको,
आँधी तूफ़ानों में भी बढ़ते चलो
यह देश है तुम्हारा
तुम इसको चमकाओ...।
Saturday, August 9, 2014
एक सत्य
अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है वहीं क्षमा मित्र, अहंकार के द्वारा हम मित्र को भी शत्रु बना लेते हैं वहीं क्षमा शत्रु को भी मित्र बना देती है अतः अहंकार का दामन छोड़ कर क्षमा को अपनाइये,आपकी बहुत सारी समस्यायें स्वयं ही दूर होती जायेंगी।
Wednesday, August 6, 2014
पलों का नाम है ज़िंदगी
पलों का नाम है ज़िंदगी
जीवन का हर पल लिख रहा है इबारत ज़िंदगी की ,
सज़ा लो इसे या मिटा दो,नियंता हो तुम ।
मिटा दो भले ही पर मत भूलना,पल मिटते नहीं,
शिद्दत के साथ याद आते हैं,अपवाद नहीं हो तुम ।
मत भूलों यह दुनिया गढ़ी है तुमने निज हस्तों से
सहेज नहीं पाये, बिखरने दिया,दोषी हो तुम ।
नहीं बिगड़ा है कुछ भी, रूके क़दम आगे बढ़ाओ,
मज़बूत इरादों के संग, विश्वास बनो तुम ।
पीछे जो छूट गया, वह अपना था ही नहीं,
मोह का छोड़ दामन, निसपृह बनो तुम ।
टुकड़ा-टुकड़ा बदलेगी तक़दीर ,
चीर कर अंधकार, प्रकाश बनो तुम ।
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