Monday, September 23, 2024

इजराइल और उसकी देशभक्ति

 विज्ञान ने जहाँ लोगों को सुविधाएं दी हैं, उससे भी अधिक लोगों की जिंदगी को अस्थिर किया है इसकी जीती जागती मिसाल है इजराइल का हिज़बुल्लाह जैसे आतंकी संगठन का पुरानी तकनीक के बने, ट्रेस न किये जा सकने वाले उपकरण पेजर में विस्फोटक लगाकर, आतंकियों का नाश करना… अब यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि यही कार्य मोबाइल और लैपटॉप जैसे आधुनिक उपकरणों में भी विस्फोटक लगाकर तो नहीं किया जायेगा । न जाने कब इंसान की सुविधा के लिए बनाये गये उपकरण उसकी मौत का कारण बन जाये।


यह सच है कि इजराइल से जैसे एक छोटे से देश ने अपने दुश्मनों को एक ऐसी तकनीक के जरिये धराशाह कर दिया जिससे पूरा विश्व हतप्रभ तो है ही, स्वयं की सुरक्षा के लिए भी चिंतित हो गया है होना भी चाहिए और इसकी काट भी खोजनी चाहिए।


वैसे भी हम भारतीयों को इजराइल जैसे छोटे से देश से देशभक्ति की भावना ग्रहण करनी चाहिए जहाँ देश का हर नागरिक देश पर हुए हमले को स्वयं पर हुआ हमला मानता है।


Sunday, September 22, 2024

एक देश एक चुनाव आज की आवश्यकता

 एक देश एक चुनाव आज की आवश्यकता 

 1951-52 से वर्ष 1967 तक लोक सभा और राज्य विधान सभाओं के निर्वाचन अधिकांशतः साथ-साथ कराए गए थे और इसके पश्चात् यह चक्र टूटता गया। कभी बहुमत की कमी तो कभी राजनीतिक साजिश के तहत अनुच्छेद 356 की आड़ लेकर अब तक केंद्र सरकार द्वारा 100 से अधिक बार विधान सभायेँ भंग की गईं। 

 अब स्थिति यह हो गई है कि देश में हर वर्ष, कभी-कभी कुछ ही महीनों के अंतराल में किसी न किसी राज्य के चुनाव करवाये जाते हैं। देश के सदा चुनावी मोड में रहने के कारण चुनाव के समय नेताओं द्वारा एक दूसरे पर अनावश्यक टिप्पणियाँ करने से सामाजिक समरसता तो भंग होती ही है, समाज में अनावश्यक तनाव भी पैदा होता है। बार-बार आदर्श आचार संहिता लागू की जाने के कारण सरकार कोई नीतिगत फैसले नहीं ले पाती। प्रशासनिक और नीतिगत निर्णय तो प्रभावित होते ही हैं, देश के खजाने पर भी भारी बोझ पड़ता है। इसके साथ ही चुनाव ड्यूटी में लगाए गए निर्वाचन अधिकारियों तथा सुरक्षा बलों को लंबे समय तक अपने मूल कर्तव्यों से दूर रहना पड़ता है। वे अपने क्षेत्र में अपने कार्य का निर्वहन नहीं कर पाते।  

इस स्थिति से बचने के लिए भारत के विधि आयोग ने निर्वाचन विधियों में सुधारार्थ अपनी 170 वीं रिपोर्ट में कहा है कि प्रत्येक वर्ष बार-बार चुनावों के इस चक्र का अंत किया जाना चाहिए। हमें उस पूर्व स्थिति का फिर से अवलोकन करना चाहिए जहां लोकसभा और सभी विधानसभाओं के लिए निर्वाचन साथ-साथ किए जाते थे। इसी के साथ समिति ने अपनी रिपोर्ट में विधानसभा और लोकसभा के चुनावों के अगले 100 दिनों में नगर निकायों के चुनावों को भी करवाने की सिफारिश की है। 

 इस पर विचार करने के लिए केंद्र सरकार ने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया गया। इस कमेटी ने एक देश-एक चुनाव पर अपनी रिपोर्ट पेश की जिसे केंद्रीय मंत्रीमंडल द्वारा मंजूरी मिल गई है। अब इसे आगामी शीतकालीन सत्र में संसद में पेश किया जाएगा। जहां विभिन्न दल इस पर अपनी राय देंगे किन्तु इसको क्रियान्वित करना इतना आसान भी नहीं है क्योंकि एक देश एक चुनाव के मुद्दे पर सभी राजनीतिक दलों के अलग-अलग विचार हैं। यद्यपि कुछ पार्टियां समर्थन भी कर रही हैं लेकिन कुछ दलों का कहना है एक साथ चुनाव से राष्ट्रीय दलों को तो फायदा होगा, लेकिन क्षेत्रीय दलों को इससे नुकसान होगा। इनका मानना है कि अगर एक देश एक चुनाव की व्यवस्था लागू की गई तो राष्ट्रीय मुद्दों के सामने राज्य स्तर के मुद्दे दब जाएंगे जिससे राज्यों का विकास प्रभावित होगा। 

 फिल्म अभिनेता कमल हासन जो जन न्याय केंद्र पार्टी के संस्थापक हैं, ने एक देश-एक चुनाव के प्रस्ताव को खतरनाक और त्रुटिपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि इस तरह के चुनाव कुछ देशों में समस्याएं पैदा कर चुके हैं। इसलिए भारत में इसकी आवश्यकता नहीं है और भविष्य में भी इसकी आवश्यकता नहीं होगी।

 इस संदर्भ में पक्ष-विपक्ष का जो भी मत हो लेकिन अगर देश के आर्थिक और सामाजिक विकास की गति को आगे बढ़ाना है तो देश में एक देश,एक चुनाव की योजना को लागू करना ही होगा।

Monday, September 16, 2024

मेरी नई पुस्तक

 नई किताब

भूल गए हम जिनको

सुधा आदेश

किताब वेबसाइट और अमेजन फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध है!

https://www.amazon.in/dp/B0DFYRTQ9Z

https://www.flipkart.com/bhul-gaye.../p/itm75448f65ec8cf...

https://indianetbooks.com/shop/bhul-gaye-ham-jinko/

स्त्रियों को सदा अबला कहा जाता है लेकिन अगर हम अपने देश के समृद्ध और गौरवशाली अतीत पर नजर डालें तो हमें हमारे देश में ऐसी वीरांगनाओं की कमी नहीं मिलेगी जिन्होंने अपने देश के लिए हँसते-हँसते अपने प्राण न्योछावर कर दिये। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे इतिहासकार उनके योगदान के बारे में मौन रहे हैं। इसका कारण शायद यह है कि हमारा देश पहले मुगलों का तथा बाद में अंग्रेजों के आधिपत्य में रहा जिन्होंने हमारी सभ्यता और संस्कृति को कुचलने के साथ हमारे मस्तिष्क को भी कुंद बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

 भारत को स्वतंत्र कराने जितना योगदान पुरुषों का रहा है उतना ही महिलाओं का भी, चाहे वह सन 1857 का स्वतन्त्रता संग्राम रहा हो या बाद का। सन 1857 से पहले भी अनेक वीरांगनाओं ने अपने राज्य को दुश्मनों की नजर से बचाने के लिए हथियार उठाए थे। रानी झाँसी लक्ष्मी बाई का नाम तो हम सब जानते हैं। उनके बारे में बहुत कुछ लिखा गया है किन्तु उसी समय गोरखपुर के निकट तुलसीपुर की रानी ईश्वरी देवी के त्याग और बलिदान के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।              

 कश्मीर की रानी दिद्दा हो या काकतीय राजवंश की रानी रुद्रमा देवी, मध्य प्रदेश की गोंड़ रानी दुर्गावती हों या कित्तूर की रानी चेन्नमा या फिर आम आदमी के संघर्ष का प्रतीक अजीजन बाई, उदा देवी, नीरा आर्या, सुशीला मोहन और कनकलता बरुआ। सबके मन में एक ही ज्वाला थी, देश भक्ति की ज्वाला। इस ज्वाला ने उन्हें देश के लिए सर्वस्य अर्पण करने का साहस दिया। 

 इन सब विभूतियों के बारे में जानने के लिए मैंने अखबारों, पुस्तकों यहाँ तक कि गुगुल को भी खंगाला। मुझे जानकार आश्चर्य हुआ कि जिस स्त्री को हम सुकुमारी, कोमलांगी समझते रहे हैं वह अदम्य साहस, वीरता और बुद्धिमत्ता का ऐसा संगम है जो पुरुषवादी मानसिकता के साथ उसके बुद्धिचातुर्य तथा बुद्धिबल को भी चुनौती देने में सक्षम है। इसके लिए उसे उचित प्रशिक्षण की आवश्यकता है। मुझे यह जानकार खुशी हुई कि राजकन्याओं को प्राचीन काल से ही, शिक्षा के साथ युद्ध कला का भी प्रशिक्षण दिया जाता था तभी आवश्यकता पड़ने पर वे दुर्गा का रूप लेने भी नहीं हिचकती थीं।     

   इस पुस्तक में मैंने सिर्फ स्त्री वीरांगनाओं की जीवनियों को ही सम्मिलित किया है जिससे कि हमारे समाज में स्त्रियों के बारे में फैली भ्रांत धारणा दूर हो सके। इतिहास के इन अनमोल नगीनों से प्रेरणा लेकर वे अपनी बेटियों को भी बल-बुद्धि में इतना ही समर्थ बनायेँ कि आवश्यकता पड़ने पर वे स्वयं की रक्षा करने में समर्थ हो सकें। 

 आजादी के अमृत महोत्सव से प्रेरणा लेते हुए इस संग्रह में मैंने उन 17 वीरांगनाओं की जीवनियों को संग्रहीत किया है जिनके बारे में हमने कम सुना या जाना है। इनमें से किसी का भी त्याग और बलिदान कम नहीं है। इसीलिए मैंने उन्हें नाम के आधार पर नहीं वरन उनके जन्म के आधार सूचीबद्ध किया है।  

 अंत में यही कहना चाहूंगी कि भारत का एक गौरवशाली अतीत रहा है। यह सच है कि कुछ इतिहासकारों ने अपनी विदेशी शिक्षा के प्रभाव कारण हमारे सुनहरे अतीत से छेड़छाड़ ही नहीं की वरन उसे झुठलाने का भी प्रयत्न किया है। विदेशी शिक्षा का ही प्रभाव है कि आज के युवा अपने देश की संस्कृति और परम्पराओं से दूर होते जा रहे हैं। देशप्रेम की जिस अग्नि ने हमें आजादी दिलवाई, उसका आज नितान्त अभाव हो गया है। आज देश को तोड़ने के षड्यंत्र रचे जा रहे हैं। आज लोग अपने स्वार्थ में इतना ड़ूबे हुए हैं कि उन्हें अपना देश नहीं वरन सिर्फ मैं, मेरा परिवार ही नजर आता है। न हम बच्चों को देशभक्ति का पाठ पढ़ा रहे हैं न उन्हें उचित शिक्षा दे पा रहे है। विदेशी भाषा में ज्ञान देकर हम उन्हें निज देश की प्रगति के लिए नहीं वरन विदेश भेजने के लिए तैयार कर रहे हैं। देश को अटूट रखने के लिए व्यक्ति में, समाज में देशभक्ति की भावना को जाग्रत करना आवश्यक है। आज राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त की इन पंक्तियों को आत्मसात करने की आवश्यकता है...भरा नहीं जो भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं, वह हृदय नहीं वह पत्थर है, जिसमें स्वदेश से प्यार नहीं।      

 इन सब विरोधाभासों के बीच भी मोहम्मद इकबाल के निम्न शब्द दिल में आस की नन्ही किरण जगा जाते हैं... 

यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा,सब मिट गए जहाँ से।

अब तक मगर है बाक़ी, नाम-ओ-निशाँ हमारा।

कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी।

सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़माँ हमारा।

Tuesday, September 10, 2024

मोहब्बत की दुकान

 मोहब्बत की दुकान खोलने वाले न जाने राहुल गाँधी देश से और देश के बहुसंख्यकों से इतनी नफरत क्यों करते हैं! 


हिंदू, मुस्लिम, सिखों के बीच सामाजिक समरसता को भंग कर देश में आग लगाने का स्वप्न देखते राहुल गाँधी क्या सचमुच देश का भला करना चाहते हैं?

नहीं... उन्हें किसी तरह सत्ता चाहिए। वह सत्ता के लिए कुछ भी कर सकते हैं।

अगर ऐसा न होता तो दूर देश में वह चीन की प्रशंसा न करते। बी. जे. पी. और आर. एस. एस. की बुराई करते हुए वह भूल जाते हैं। 78 वर्षो में बी. जे. पी. ने तो सिर्फ 15 वर्ष शासन किया जबकि शेष वर्षो में कांग्रेस या उसकी समर्थित सरकारों ने शासन किया तब देश में सुधार क्यों नहीं कर पाये। तब तो वे सिर्फ अपना बैंक बैलेंस बढ़ाने में लगे रहे। अब ज़ब देश आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है तब ये तथा इनका इंडी अलान्स  राह में कीलें ठोकने का प्रयास रहे हैं।

काश! देश के लोग इनकी विभाजनकारी राजनीती को समझें तथा इनकी मोहब्बत की दुकान को बंद कर दें।

Thursday, August 22, 2024

संविधान की हत्या

 कांग्रेस के नेता और वकील के बाद अब तथाकथित किसान नेता राकेश टिकेत ने कहा है कि हत्या देश में तानाशाह नरेंद्र मोदी को हटाने के लिए बांग्लादेश जैसे हालत पैदा करने होंगे।


समझ में नहीं आता कि लोग नरेंद्र मोदी का विरोध करते -करते देश के विरोध में क्यों आवाज़ उठाने लगते हैं? संविधान बदलने और आरक्षण खत्म करने का आरोप लगाकर भी बहुमत न पा सके तो क्या अब चुनी हुई सरकार को बल से गिराना लोकतंत्र है?


जहाँ तक तानाशाही का प्रश्न है, अगर मोदी तानाशाह होते तो क्या इन जैसे लोगों के मुँह से ऐसे शब्द निकल पाते? लोकतंत्र और संविधान की हत्या कौन कर रहा है, यह विचारणीय प्रश्न है।

Wednesday, August 14, 2024

याद करें कुर्बानी

 याद उन्हें भी कर लें 


आज विभाजन विभीषिका दिवस 

कल स्वतंत्रता दिवस 

स्वतंत्रता तो हमने पा ली 

कीमत भी बहुत चुकाई…


आजादी का जश्न मना 

सत्ता भी पाई

करोड़ों ने आहुति दी 

मौज कुछ की ही आई।


देश के दो टुकड़े हुए 

दिलों में दरार पड़ी

लाखों बेघर हुए 

खेली खून की होली। 



आज भी वे ढूंढ़ रहे हैं  पहचान निज की 

सुलग रही आज हर दिल में नफरतों की चिंगारी।


सत्ता के लिए देश के आमजन को धर्म,

बहुसंख्यक,अल्पसंख्यक, अनेक जाति प्रजातियों में  बांटा।

आरक्षण की बाजी चली।


नहीं दिए समान अधिकार

देश का गौरव मातृभाषा, 

स्वार्थो में लिप्त जन-जन 

लुप्त हुई भावना देशभक्ति की।


77 वर्ष कम नहीं होते 

सुधरें, सुधारें...

ईर्ष्या द्वेष को देकर तिलांजलि 

याद कर अनाम शहीदों को 

आज शपथ लें  

बढ़ायेंगे शान तिरंगे की।



© सुधा आदेश 


Monday, October 16, 2023

मेरी पुस्तक 'याद करें कुर्बानी ' की समीक्षा

 याद करें कुर्बानी : अमर सेनानियों की कुर्बानियों के मह्त्वपूर्ण दस्तावेज : सुधा आदेश। एक चर्चित नाम । मैंने जब लिखना शुरू किया था तब यह नाम देश भर की पत्र-पत्रिकाओं में छाया हुआ था। दशकों तक सुधा आदेश जी की लेखनी से श्रेष्ठ कहानियों का सृजन होता रहा और वे विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हो लोकप्रिय होती रही हैं। पिछले कुछ वर्षों से सुधा जी ने पत्र-पत्रिकाओं में लेखन कम कर दिया है और अपना ध्यान पुस्तकों के प्रकाशन पर केंद्रित कर रखा है। इसीलिए प्रतिवर्ष उनके कई कहानी संग्रह और उपन्यास सामने आते रहे हैं। पिछले वर्ष उन्होंने बाल साहित्य के क्षेत्र में भी पदार्पण किया था और उनका एक उपन्यास ‘मोबाइल में गांव’ काफी चर्चित हुआ था। हाल ही में उनका इतिहासकार के रूप में एक नया पक्ष सामने आया है। प्रलेक प्रकाशन द्वारा उनकी एक पुस्तक ‘याद करें कुर्बानी’ प्रकाशित की गई है जिसके दो खंडों में देश के आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले अमर सेनानियों की गाथाएं संग्रहित की गई है। पहले खंड में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के 11 सेनानियों की तथा दूसरे खंड में उन्नीसवीं शताब्दी के 11 क्रांतिकारियों की जीवन गाथाएं सम्मिलित है।


 मुझे नहीं याद आता कि इससे पूर्व सुधा आदेश जी ने इतिहास संबंधी कोई लेख भी लिखा हो। एक कहानीकार से इतिहासकार के रूप में उनकी यह यात्रा परकाया प्रवेश जैसी मालूम पड़ती है। खासकर इसलिए कि उन्होंने इस संग्रह में प्रत्येक सेनानी के जीवन के आरंभिक कल से उसके बलिदान तक के घटनाक्रमों के जो तथ्य प्रस्तुत किये हैं वे प्रमाणिकता की कसौटी पर खरे उतरते हैं। निश्चित रूप से इसके लिए उन्होंने गहन शोध किया होगा। पुस्तक के हाथ में लेते ही अंतर्मन में यह प्रश्न कौंधता है कि लेखिका का अचानक यह कायाकल्प कैसे और क्यों हो गया? किंतु पुस्तक की भूमिका की प्रथम पंक्ति में ही इस प्रश्न का उत्तर मिल जाता है? वे कहती हैं ‘कुछ वर्षों पूर्व जब अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कुछ नवयुवकों ने देश के टुकड़े-टुकड़े करने की बात कही तब मेरा मन आंदोलित हो उठा। बार-बार मन में यही विचार आ रहा था कि आखिर इन नवयुवकों के मन मस्तिष्क में ऐसे भाव, ऐसी मानसिकता क्यों और कैसे उत्पन्न हुई?’’ इन्हीं प्रश्नों के उत्तर खोजने और वर्तमान पीढ़ी को सही मार्ग दिखाने के उद्देश्य से सुधा आदेश जी की लेखनी ने अमर सेनानियों की जीवनगाथाओं को इस पुस्तक में संजोने का बीड़ा उठाया ताकि युवा पीढ़ी उनकी कुर्बानियों को पढ़कर अंधेरे में भटकने के बजाय सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित हो सके।


  संग्रह की पहली जीवनी अंतिम मुगल शासक बहादुर साहब जफर की है जिसमें लेखिका ने उनके जीवन के कई अनछुए प्रसंगों को सामने लाने का प्रयास किया है। वे बताती हैं कि उनके पिता कवि हृदय बहादुर शाह ज़फ़र को दिल्ली की गद्दी सौंपना नहीं चाहते थे लेकिन अंततः उन्होंने शासन की बागडोर संभाली और 82 साल की उम्र में देश के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम का नेतृत्व भी किया। पुस्तक के इस भाग से पता चलता है कि इस अंतिम मुगल शासक की मृत्यु अंग्रेजों की कैद में किन विषम परिस्थितियों में हुई थी और आज उनके वंशज हमारे स्वतंत्र देश में झुग्गी-झोपड़ी में रहने के लिए मजबूर हैं।


 रानी लक्ष्मी बाई की वीरता और बलिदान की गाथा से तो सभी परिचित हैं किंतु उनकी हमशक्ल, महिला शाखा की सेनापति, झलकारी बाई की वीरता के बारे में कम ही लोग जानते हैं। सुधा जी ने अपनी पुस्तक में इन दोनों वीरांगनाओं के बारे में विस्तार से लिखा है। इसी प्रकार वीर सेनानी तांत्या टोपे के बारे में पाठ्यक्रमों में तो बहुत कुछ पढ़ाया जाता है लेकिन उनकी समकालीन तवायफ अजीजन बाई के बलिदान के बारे में लोगों को ज्यादा मालूम नहीं। अजीजनबाई ने तवायफों को एकत्रित कर ‘मस्तानी टोली’ नाम से एक सेना बनाई थी जिसने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था। कानपुर और बिठूर की आजादी में तात्या टोपे के साथ-साथ अजीजन बाई की वीरता का भी बहुत बड़ा योगदान था। सुधा जी की लेखनी ने इन दोनों के बारे में भी काफी विस्तार से लिखा है। 


  इसी के साथ-साथ पुस्तक के प्रथम खंड में उन्होंने बेगम हजरत महल, कोतवाल धन सिंह गुर्जर, नाना साहब,ऊदा देवी,मंगल पांडे तथा अवंतीबाई की जीवनी एवं उनके संघर्ष व बलिदान के बारे में काफी विस्तार से चर्चा की है। इससे पाठकों को अनेक ऐसी गाथाओं के बारे में पता चलता है जो इतिहास के पन्नों में खामोश हो कर दफन हो गई हैं।


 पुस्तक के द्वितीय खंड में उन्नीसवीं शताब्दी के 11 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की जीवन गाथाएँ शमिल की गई हैं। जिनमे रामप्रसाद बिस्मिल, यतीन्द्र नाथ, सरदार भगत सिंह जैसे चर्चित वीरों के नाम शामिल है तो वही सुशीला देवी, प्रीतिलता वाडेकर, कल्पना दत्ता, महावीर सिंह जैसे उन शहीदों की जीवनियां भी शामिल की गई है जिनके बारे में लोगों को कम जानकारी है। सुधा जी ने उनके बलिदानो से आज की पीढ़ी को परिचित करवाने का पुनीत कार्य किया है इसके लिये उन्हें साधुवाद दिया जाना चाहिए।


  सामान्यतः पाठकों को इतिहास रटना पड़ता है किंतु सुधा आदेश मूल रूप से एक कहानीकार हैं अतः उन्होंने इतिहास की घटनाओं को श्रृंखलाबद्ध कर इस अंदाज़ में प्रस्तुत किया है कि पाठक एक बार जब उन्हें पढ़ना शुरू करता है तो उसमें डूबता चला जाता है और किसी चलचित्र की भांति सारी घटनाएं उसके अन्तर्मन में उभरती चली जाती हैं। यही कारण है कि इन अमर सेनानियों की बलिदान की गाथायें उन्हें देश प्रेम के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है।


  कुल मिलाकर इस पुस्तक का मूल्यांकन इतिहास के एक महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में किया जाना चाहिए और इसके सृजन के लिए सुधा आदेश जी की जितने भी प्रसंशा की जाए वह कम है। यदि ऐसी पुस्तकें स्कूल के पाठ्यक्रमों में लगाई जा सकें तो उनकी उपयोगिता सार्थक हो सकेगी। मुझे विश्वास है कि सुधा जी की लेखनी से भविष्य में कोई ऐतहासिक उपन्यास अवश्य देखने को मिलेगा। उनमें इतिहास को सूचीबद्ध करने की क्षमता है और उनके तरकश में अभी कई तीर बाकी हैं यह इस पुस्तक के लेखन ने स्पष्ट कर दिया है। मैं उनकी इस पुस्तक की सफलता की मंगलकामना करता हूँ. । इस पुस्तक का प्रकाशन प्रलेक प्रकाशन ने किया है और इसकी कीमत 299 रुपये है।

 -संजीव जायसवाल ‘संजय’