Saturday, December 12, 2015
चलो हैपी वीक एनड पर
कांग्रेस के आनंद शर्मा ने शुक्रवार को कहा चलो हैपी वीक एनड मनायें...सच सार्थक काम करने की अपेक्षा शोर गुल मचाने में एनर्जी की अधिक खपत होती है ...पर एक प्रश्न मन को मथ रहा है अगर एेसा ही सरकारी और ग़ैर सरकारी संस्थानों में भी होने लगे तो देश का क्या होगा ?
Friday, December 11, 2015
अच्छे दिन ...
अपनी कामवाली शशि से जो पंचायत चुनाव में वोट देकर आई थी, से मैंने पूछा किसे जिता रही हो ?
उसने बड़ी ही निसपृहता से कहा,'भाभी कोई भी जीते हमें क्या ? हम तो जैसे हैं वैसे ही रहेंगे ।
हम तो इस बार देना ही नहीं चाह रहे थे
पर हमारे मर्द ने कहा कि दे दो तो हमने दे दिया । '
' अच्छा किया , अपने मताधिकार का प्रयोग हर इंसान को करना चाहिये ।'
'बस इसीलिये हम चले गये पर ये लोग कोई काम करें तब न ...टी.वी. में इनके करतब देखकर मन खिन्न
हो जाता है । मेरा बेटा कह रहा था जब हम लोग
क्लास में शोर मचाते हैं तो मास्टर जी हमें दंड देते हैं पर ये लोग भी तो संसद में शोर मचाते हैं , इन्हें दंड क्यों दिया
जाता , एेसे अच्छे दिन कैसे आयेंगे ? मैंने उससे कहा बेटा अच्छे दिन ये लोग नहीं वरन् तुम स्वयं अपनी मेहनत से ला पाओगे ...
मेहनत करो
और कुछ बनकर दिखाओ ।'
कहकर वह तो काम में लग गई तथा मैं सोचने लगी कितनी सारगर्भित बात कही इस अनपढ़ ने...काश हमारे राजनेता समझ पाते
कि अब मतदाता जागरूक हो गया है । वह उनके हर कार्य को बारीकी से देख भी रहा है और समझ भी रहा है अगर अभी ये नहीं चेते
तो इनका तो कुछ नहीं बिगड़ेगा पर देश वर्षों पीछे चला जायेगा ।
Thursday, December 10, 2015
सोनिया गांधी और राहुल गांधी को संसद को बाधित करने की बजाय सलमान खान से शिक्षा लेने हुये न्यायपालिका का सम्मान करते हुये कोर्ट के फ़ैसले का इंतज़ार करना चाहिये । मेरा कहने का आशय यह है कि वह कोर्ट में चाहे जो भी हथकंडे अपनायें पर वह स्वयं को विशिष्ट नागरिक दर्शाते हुये संसद की, भारतीय संविधान की अवहेलना न करें ।
Monday, November 2, 2015
जैसा मैंने अब तक सुना समझा और जाना है, लेखक सवेदनशील होता है । शायद यही कारण है दुनिया में घटती कोई भी अच्छी बुरी घटना उसे आंदोलित कर देती है तथा उसकी लेखनी चल पड़ती है...पर पिछले कुछ दिनों की घटनायें मन को परेशान कर रही है...क्या लेखक वामपंथी या दक्षिणपंथी होता है ? उसी के चश्मे से वह समाज में व्याप्त अनाचार और दुराचार के विरुद्ध लेखनी चलाता है वरना सबका साथ सबका विकास का नारा देने वाले प्रधान मंत्री का मात्र डेढ़ साल के शासन का ऐसा विरोध...क्या एसी घटनाये पहले इस देश में नहीं हुई थीं ? क्या समाज में अचानक असहिशुता पैदा हो गई । जनसमाज तो वही है जो आज से दशकों पूर्व था । एक आदमी अचानक देश में अराजकता कैसे फेला सकता है ? अगर ऐसा हुआ है तो उसमें उस आदमी या दल का नहीं समाज का दोष है । समाज एक दिन में नहीं बनता, उसे बनने में सदियाँ लग जाती है ।
यह सच है की हर व्यक्ति अपनी-अपनी विचारधारा अपनाने को स्वतंत्र है पर लेखक का दायित्व आम जन से अलग है । उसे निष्पक्ष रहते हुए समाज के उत्थान तथा भाईचारे के महत्व को ध्यान रखते हुए अपनी लेखनी को बल प्रदान करना चाहिए । लेखक को समाज को जोड़ने का प्रयत्न करना चाहिये न की तोड़ने का । आज मुझे यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है कि हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी समाज को जोड़ने की बजाय अपनी करनी से देश में नफरत भड़काने का कार्य कर रहे है ।
सदियों से हम आपस में ही लड़ते रहे...शायद इसी कारण हमे गुलाम रहना पड़ा । जो देश या देशवासी अपनी मूल जड़ों से नाता तोड़ लेते है, अपनी ही संस्कृति पर गर्व करने के बजाय उसका मज़ाक बनाते है वह देश या समाज कभी उन्नति नहीं कर सकता । शायद अपनी इसी कमजोरी के कारण ही हम पिछड़े रह गए..। हमारे देश को दो दलीय व्यवस्था चाहिये...कांग्रेस ने 60 वर्षो तक इस देश में शासन किया है फिर भी हम पिछड़े है...आखिर क्यों ? किसी दल का विरोध करते हुए यह मत भूलिये कि कोई भी चाहे वह नरेंद्र मोदी हो या कोई और जब तक सब को साथ लेकर नहीं चलेगा,शासन नहीं कर पाएगा । एक को संतुष्ट करने के प्रयास में दूसरे को असंतुष्ट कर सामाजिक भेद-भाव के साथ असहिशुंता को ही जन्म देगे जो किसी भी समाज के लिए घातक है ।
Saturday, October 31, 2015
Friday, August 28, 2015
माँ को श्रद्धांजली
आज से छह वर्ष पूर्व की 28-29 अगस्त की वह कालरात्रि जिसने मेरी माँ को मुझसे छीन लिया था...आज फिर से मेरे मनमस्तिष्क में उमड़-घुमड़ कर उस पल को जीवित कर रही है...परिस्थितियाँ कुछ ऐसी थी कि चाहकर भी में उनके अंतिम दर्शन के लिए नहीं पहुँच पाई थी पर उनका हँसता मुस्कराता चेहरा मेरे सम्मुख आकर मेरी मजबूरी को समझते हुये सदा अपना वरदहस्त मेरे सिर पर रखकर मुझे दिलासा देता प्रतीत होता है । माँ के लिए मेरे लिए ज्यादा कहना सूरज को दिया दिखाने जैसा होगा पर फिर भी माँ के लिए दिल से निकले दो शब्द...
माँ का अंश हूँ में,
माँ का वंश हूँ में ।
माँ की अनुकृति हूँ में,
माँ का प्रतिबिम्ब हूँ में ।
पर माँ जैसी सहनशीलता, त्याग
बलिदान की भावना क्यों नहीं ?
माँ जैसी प्रतिबद्धता
वचनबद्धता क्यों नहीं ?
रिश्तों के प्रति समर्पण
संतुष्टि क्यों नहीं ?
भाग रही हूँ अनवरत
क्यों और किसके लिए ?
समझ पाती जीवन का फलसफा
माँ जैसी सौम्य, सरल बन पाती ।
Monday, August 24, 2015
दिलों में बंद आक्रोश
जब निकलेगा
चिंगारी उड़ेगी ही
तुम जलो या मैं
फ़र्क़ क्या पड़ता है ।
फ़र्क़ क्या पड़ता है
जब आदमी ही आदमी के
ख़ून का हो जाये प्यासा
ख़ून बन जाये पानी ।
ख़ून बन गया है पानी
तभी दरिंदगी पर
दहशतगर्दों की
ख़ून नहीं खौलता ।
ख़ून खौले भी तो
भला खौले कैसे
जब हम आस-पास की
दुनिया से बेख़बर
अपनी ही दुनिया में
रम गये हैं ...।
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