Thursday, January 15, 2015

आक्रोश

दिलों में बंद आक्रोश जब निकलेगा चिंगारी उड़ेगी ही अब तुम जलो या मैं फ़र्क़ क्या पड़ता है ।

Tuesday, January 6, 2015

आस अभी बाक़ी है

मैं हुआ जब-जब हम पर हावी टूट गई संवेदनायें सारी कुलीन प्रवृत्तियाँ होने लगी क्षीण होने लगा मन विदीर्ण । श्वेत धवल खरगोशों ने मारी जब कुलांचें खोखला भुनभुना नींव पर स्थापित आस्थाओं के महल ढहने लगे अचानक क्यों ? व्यक्ति ... परिवार को टूटने से बचा नहीं पाया राष्ट्र की एकता के लिये चिंतित होगा क्यों ? अनिश्चित,अनैतिक,अमर्यादित व्यवस्थाओं में फँसकर क्यों और कैसे कहाँ से कहाँ आ गये हम ! टूटा ही है मानव साँस अभी बाक़ी है, बुझती साँसों को मिल जाये जीवन आस अभी बाक़ी है ।

Friday, December 12, 2014

ये राजनेता

मै प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा किए कुछ कार्यो की समर्थक हूँ...पहला योग...दूसरा स्वच्छता अभियान...मोदी जी ने संयुक्त राष्ट्रसंघ में योग को मानव जाति के लिए उपयोगी बताया था...कुछ हद तक उसी के परिणाम स्वरूप संयुक्त राष्ट्रसंघ ने 21 जनवरी को अंतर राष्ट्रीय योग दिवस घोषित कर दिया, इसके लिए 175 देशों का समर्थन मिला जबकि उनके अपने ही देश में उनके स्वच्छ भारत अभियान की कुछ लोग आलोचना कर रहे है...मुझे दुख हुआ जब राहुल गांधी ने कहा कि उन्होने आपके हाथ में झाड़ू पकड़ा दी और स्वयं ऑस्ट्रेलिया चले गये...आज एक बार फिर यू. पी. के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव की टिप्पणी पढ़कर आश्चर्य चकित रह गई...उन्होने कहा...झाड़ू लगाने के लिए मुझे नोमिनेट कर दिया गया लेकिन मैंने कभी झाड़ू नहीं उठाई, क्या झाड़ू मैनीफेस्टो में थी ? हद है राजनेताओं की...विरोध करना है तो क्या अच्छी बात का भी विरोध करेंगे...क्या अखिलेशजी आम जनसमाज से नहीं है...शायद नहीं तभी वह राजा-महाराजाओं जैसी बात कर रहे है...राजा –महाराजा तो चले गये पर उनकी जगह एक नई जमात पैदा हो गई है...क्या ऐसा कहकर वह सफाई कर्मचारियों को नीचा नहीं दिखा रहे...अगर एक दिन ये लोग कूड़ा न उठाये तो हालत होगी पृध्वी की ? सफाई कर्मचारी तो पूरी दुनिया को साफ रखते है... क्या हम अपने घर और मुहल्ले का कूड़ा उचित स्थान पर डाल कर उनकी सहायता नहीं कर सकते...ये लोग स्वयं न करें पर लोगों को हतोत्साहित तो न करें...कुछ भी कहने से पूर्व दस बार सोचें क्योंकि वे राज नेता है उनकी बातों का लाखों करोड़ों लोगों पर असर होता है । मोदी जी ने कहा था कि अगर स्वच्छता अभियान जनांदोलन का रूप ले ले तो हमारा भारत भी दुनिया के अन्य देशों कि तरह साफ-सुधरा हो जाये...भारत में गंदगी है, यह बात सिर्फ विदेशी ही नहीं, विदेश से आने वाला हर भारतीय भी कहता है...यह वही भारतीय है जो विदेश में वहाँ के नियमों का अनुसरण कर विदेशी धरती साफ-सुथरी रखता है जबकि भारत आते ही वही पुरानी आदतें अपना लेता है...इंसान एक ही है पर विदेशी धरती पर उसकी आदतें कुछ है तथा अपनी धरती पर कुछ और...जब हम विदेशी धरती पर अपनी आदतों में सुधार ला सकते है तो अपनी धरती पर क्यों नहीं...।

Thursday, December 4, 2014

भाव शून्य है

मैंने लिखी है इबारत, शब्द ही शब्द है, भाव शून्य है। इंसा ही जब इंसा का गला काटे, तब इंसा बुत न बने तो क्या करे...? काश बुत बन पाती, दिल में दर्द तो न होता कलाम न रुकती,भाव न चूकते । आँखों में नमी है,दिल में बेचेनी है फिर भी लेखनी चलती नहीं है । दोष जमाने का नहीं, हमारा है असहाय क्यों, टक्कर क्यों नहीं लेते । अन्याय का कर प्रतिकार, आगे बढ़ो... सहना, रोना है कायरों का काम । होगा जिस दिन ऐसा,लेखनी न रुकेगी, विश्वास होगा,आस होगी,चहुं ओर सौहार्द होगा ।

ख़्वाहिश

लहू के आँसू पीकर तमाम उम्र गुजार दी, अब तो बाग के फूल भी कांटे बन चुभने लगे है । तिल-तिल जलें भी तो आखिर कब तक, ज़िंदगी, ज़िंदगी नहीं सजा बन चुकी है । कहने को मिला है सोने का महल... पर कैद खाने कम नहीं । जीना आसान नहीं पढ़ा था किताबों में, दुश्वार इतना होगा समझ अब पाये है। समझोता करते-करते कब तक जिये हम, आखिर कोई तो हो जिसे अपना कह सकें हम। नहीं मिली ज़िंदगी मेरे साथ मेरे कर्म , पल भर मिली खुशी संतुष्टि बने मेरी । शिकवा- शिकायतें भूल लम्हा-लम्हा गुजरे ज़िंदगी के चंद दिन यूँ ही । अंतिम ख़्वाहिश यही, न रहे बदले की भावना, न रहे कोई चाहना मुक्ति मिले निर्दोष दीप सी।

Sunday, November 23, 2014

पल

मन को मत रोको मन को मत टोको उड़ता हे तो उड़ने दो चलता है तो चलने दो। यूँ मयूरपंखी सा कब नाचा मन इंद्रधनुष सा कब लहलहाया मन । इस पल को पलने दो इस पल को बहने दो इस पल को सजने दो इस पल को महकने दो। यह पल संजीवनी है यह पल बंदिगी है यह पल ज़िंदगी है यह पल खूबसूरत है। मन को मत रोको मन को मत टोको उड़ता है तो उड़ने दो चलता है तो चलने दो।

Wednesday, October 8, 2014

एक अनुभव

लखनऊ आने के पश्चात आज पहली बार मुझे अभिव्यक्ति संस्था की मासिक गोष्ठी में सम्मिलित होने का अवसर मिला...गोष्ठी अच्छी थी,पूरी तरह साहित्यिक वातावरण से भरपूर...पर उससे भी अच्छा लगा जब एक मेरी बेटी की उम्र की लड़की ने जब मुझसे पूछा,'आंटी, क्या आपकी सरिता और गृहशोभा में आपकी कहानियाँ छपी है। ' मेरे द्वारा सकारात्मक उत्तर प्राप्त कर उसने फिर पूछा, 'कब से छप रही है।' मैने बताया की उन्नीसों छियानवे से ।' तब उसने कहा,' उस समय तो में बारह वर्ष की रही होंगी, पर मै आपकी कहानियाँ पढ़ती रही हूँ ।'उसकी बात सुनकर लगा मेरी रचनाधर्मिता सफल हो गई है...। आज वह स्वयं अच्छी लेखिका है...उसकी ( शुचिता श्रीवास्तव) की रचनाधर्मिता को नमन... वैसे इस तरह की घटना पहली बार नहीं घटी है...आज से चौदह वर्ष पूर्व एक विवाह के स्वागत समारोह में एक लड़की ने मुझसे यही प्रश्न किया था पर वह सिर्फ पाठक थी लेखक नहीं...आज से सात वर्ष पूर्व की वह घटना भी नहीं भूल पाती हूँ जब में अपनी पुत्रवधू की तलाश कर रही थी...एक लड़की ने मुझसे पूछा कि क्या आप कहानियाँ लिखती है, मेरे हाँ कहने पर उसने कहा,मैंने आपकी कहानियाँ पढ़ी है ... खुशी की बात तो यह है कि वही कन्या आज मेरी पुत्रवधू है... ।