Wednesday, August 6, 2014

पलों का नाम है ज़िंदगी

पलों का नाम है ज़िंदगी जीवन का हर पल लिख रहा है इबारत ज़िंदगी की , सज़ा लो इसे या मिटा दो,नियंता हो तुम । मिटा दो भले ही पर मत भूलना,पल मिटते नहीं, शिद्दत के साथ याद आते हैं,अपवाद नहीं हो तुम । मत भूलों यह दुनिया गढ़ी है तुमने निज हस्तों से सहेज नहीं पाये, बिखरने दिया,दोषी हो तुम । नहीं बिगड़ा है कुछ भी, रूके क़दम आगे बढ़ाओ, मज़बूत इरादों के संग, विश्वास बनो तुम । पीछे जो छूट गया, वह अपना था ही नहीं, मोह का छोड़ दामन, निसपृह बनो तुम । टुकड़ा-टुकड़ा बदलेगी तक़दीर , चीर कर अंधकार, प्रकाश बनो तुम ।

ज़िंदगी

अच्छे बुरे पलों का जोड़ है ज़िंदगी
संगीत नहीं, गणित सी कठोर है ज़िंदगी ।

पल कभी टीस देते हैं, कभी ख़ुशी,
घबराना नहीं, बौराना नहीं,निचोड़ है ज़िंदगी ।

सहेजना सदा उन्हीं पलों को जो देते हैं ख़ुशी,
रजनीगंधा सी महकती जायेगी ज़िंदगी ।

ख़ुशियों को बाँटों, हर पल को जिओ,
रुको न कभी,  ख़ुदा की इनायत है ज़िंदगी ।

ज़िंदगी का फ़लसफ़ा गर समझ पाते,
बेगानी नहीं ,अपनी सी, इंद्रधनुषी  सी लगे ज़िंदगी ...।



Monday, August 4, 2014

नींव का पत्थर

नींव का पत्थर  बन
शमा सी जली
हर सुबह औ शाम
हर दिन औ रात...

तृप्ति के अहसास ने
ओस बन जहाँ
शीतलता प्रदान की
वहीं सैकड़ों आपदाओं का
संभाले बोझ
सुलगती रही इस आस में...
शायद कोई उसके
त्याग और बलिदान काे सराहेगा...

किंतु उगते सूरज की
अलौकिक छटा से
चौंधिया गये लोग
गर्वों मुक्त  हो उठे
भूल गये नींव के पत्थर को
जिसकी ठोस ज़मीं पर
भविष्य की इमारत खड़ी है।


Sunday, July 27, 2014

जीवन एक रंगमंच है तथा हम सब उसकी कठपुतलियाँ...यह कथन सोलह आने सच प्रतीत होता है जब हम अपने आस-पास के किरदारों को नाटक करते देखते है, कभी-कभी वे अपनी अति नाटकीयता के कारण हँसी के पात्र बनने लगते है...पर फिर भी अपनी मनोवृति के कारण इस खुशफहमी में जीते है कि उनके नाटक ( तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की कोशिश )का किसी को पता नहीं चला...।

Monday, June 9, 2014

मुझे बताते हुए अत्यंत हर्ष हो रहा हे कि मेरी कहानी 'ढाई आखर प्रेम का ' सरिता पत्रिका के मई के दूसरे अंक में प्रकाशी हुई है...

Friday, April 11, 2014

फसल

बोई थी मैंने फसल प्यार की,विश्वास की, उमंग की,उत्साह की, अपनत्व की,सहयोग की... कोपलें फूटी भी न थीं कि कुछ सिरफिरों ने काट डाली और बो दी... फसल नफरत की, ईर्ष्या,द्वेष की, वेमनस्य की, क्रोध की, बदले की,जहर की...। पर भूल गये नफरत को नफरत के जल से नहीं, प्यार के जल से सींचा जाता है...। अगर ऐसा न होता तो न यह जमीं होती न ही यह अलौकिक सौन्दर्य, न ही हम और तुम...।

Wednesday, April 9, 2014

एक मौका और दीजिये

एक मौक़ा और दीजिये 

 पाँच वर्ष पश्चात 
 खादी के 
कुर्ता पाजामे में 
सुसज्जित 
 सिर पर 
गांधी टोपी लगाये 
आँखों पर 
रे-बेन का
 काला चश्मा पहने 
 पेरों में 
रिबोक के 
जूते पहने 
 सुरक्षाकर्मियों के घेरे में  
एक बार फिर 
द्वार पर हाथ बांधे 
 व्यक्ति को देखकर 
हमने पूछा, 'कौन हो भाई,
 हमने पहचाना नहीं...।'

 'हम गरीबदास 
आपके सेवक... 
एक मौका और दीजिये। ' 

'आप वह गरीबदास नहीं हो
 जिन्हें हमने वोट दिया था... 
कंधों पर थैला लटकाये 
 चप्पल चटकारते, 
पेट को 
आंतों में धँसे 
 उस कमजोर और मरियल से 
व्यक्ति में समाज सुधार का
 जज्बा देख 
हमने सोचा था
हमारे मध्य पला बढ़ा 
 वह आदमी 
निश्चित रूप से 
 हमारी समस्याओं का 
हल ढूंढ पाएगा... 
पर तुम भी 
औरों की तरह ही निकले... 
जाइये...जाइये 
अब हमें और बेबकूफ 
मत बनाइये 
कहीं और जाकर 
वोट मांगिए। ' 

 'नहीं भाई 
हम वही गरीबदास है 
आपकी समस्याओं का
 हल ढूँढते-ढूँढते 
 हम स्वयं उलझ गये थे, 
आपकी मेहरबानी से 
 हमारी गरीबी तो हो गई दूर... 
एक मौका और 
दीजिये जहाँपनाह, 
जिससे अब  
आपकी गरीबी हम
 कर सकें दूर...।

@सुधा आदेश