दर्द इंसानी जीवन का सार्वभोमिक सत्य है...जिस जीवन का प्रारम्भ दर्द से हो तथा जिसका अंत दर्द की पीड़ा से मुक्त न हो वह जीवन भला दर्दरहित कैसे हो सकता है जबकि इंसान सदा सुख को गले लगाने के लिए तत्पर तथा दुख से भागने के लिए प्रयत्नशील रहता है...अगर हम सुख की तरह ही दुख को भी अपना साथी बना ले तो दुख की धड़ियाँ भी कट ही जाएंगी...यह सदा याद रखें कि दुख के पश्चात ही हम वास्तविक सुख का अनुभव कर पाते है,,,।
Saturday, March 16, 2013
दर्द
Tuesday, January 1, 2013
श्रद्धांजली
अनाम सी अंजान सी
वह मासूम कली,
मसली गई
दरिंदगी की हद तक...
मानवता सहमी,
जली,रोई सिसक-सिसककर,
भावनाओं,संवेदनाओं का
उमड़ा जनसेलाब,
अंधा कानून
आज फिर कटघरे में खड़ा है...
अनेकों शायद की तरह
एक शायद और...
क्या मिल पाएगा
पीड़िता को
या ऐसी ही
मसली जाती
अन्य अभागन
कलियों को न्याय...
औरत की ज़िंदगी
औरत की ज़िंदगी...
कभी सुबह, कभी शाम है औरत की ज़िंदगी,
नर्म रेशमी एहसास है औरत की ज़िंदगी...।
रिश्तों के अजीब चक्रव्वुह में फंसी औरत की ज़िंदगी,
फिर भी सदा अलग-थलग बेजार औरत की ज़िंदगी... ।
आदि से अंत तक पहेली रही औरत की ज़िंदगी,
पली कहीं सजी कहीं, बेआवाज,बेजुबान औरत की ज़िंदगी...।
जननी बनी नाम न दे पाई,बेनाम औरत की ज़िंदगी,
Sunday, December 30, 2012
शुभ नववर्ष
जीवन के
हर पल को
कर स्पंदित,
नूतन आभा से
कर आच्छादित,
नवसंदेश, नवचेतना का
लेकर उपहार,
स्वप्निल सुनहरे
स्वप्नों को
सजाकर अलकों पर,
प्रेम और सदभावना का
फैलाते हुए आँचल
लो आ गया नववर्ष...
शत-शत अभिनंदन,
शत-शत अभिनंदन...
हर पल को
कर स्पंदित,
नूतन आभा से
कर आच्छादित,
नवसंदेश, नवचेतना का
लेकर उपहार,
स्वप्निल सुनहरे
स्वप्नों को
सजाकर अलकों पर,
प्रेम और सदभावना का
फैलाते हुए आँचल
लो आ गया नववर्ष...
शत-शत अभिनंदन,
शत-शत अभिनंदन...
आज मै इतिहास बन गई हूँ
यह कविता मैंने नवसदी में प्रवेश के समय लिखी थी, लगभग बारह वर्ष बीतने के पश्चात भी आज भी इसके भाव और अर्थ में कोई अंतर नहीं आया है...उस समय यह कविता नवभारत के रविवारीय परिशिष्ट में भी प्रकाशित हुई थी...पेश है कविता आज मै इतिहास बन गई हूँ...
दुल्हन की तरह
सजी सँवरी,इठलाती, शर्माती
गर्वोन्मुक्त मुस्कान से सुसज्जित,
इक्कीसवीं सदी का
नवउमंग, नवउल्लहास के संग
स्वागत करते देखकर
थकी हारी बीसवीं सदी
थोड़ा सकुचाई, थोड़ा घबराई,
फिर साहस बटोरकर
धीरे से बोली,
'बहना, यह सच है
कि कल जो मेरा था
वह आज तुम्हारा हो गया,
आज मै इतिहास बन गई हूँ...
जैसा आज तुम्हारा
स्वागत हो रहा है
कल वैसा ही मेरा हुआ था...
गिला शिकवा किसी से
कुछ भी नहीं,
संतोष है तो सिर्फ इतना
कि मैने तुम्हें तराशा सँवारा,
समृद्ध एवं गौरवशाली
अतीत दिया है...
फूलो-फलो, हँसो,मुस्कराओ,
खिलखिलाओ सदा यूँ ही
पर मत भूलना मेरा योगदान,
साहस और धैर्य
क्योंकि अतीत की
नींव पर ही
भविष्य की इमारत खड़ी है...।
दुल्हन की तरह
सजी सँवरी,इठलाती, शर्माती
गर्वोन्मुक्त मुस्कान से सुसज्जित,
इक्कीसवीं सदी का
नवउमंग, नवउल्लहास के संग
स्वागत करते देखकर
थकी हारी बीसवीं सदी
थोड़ा सकुचाई, थोड़ा घबराई,
फिर साहस बटोरकर
धीरे से बोली,
'बहना, यह सच है
कि कल जो मेरा था
वह आज तुम्हारा हो गया,
आज मै इतिहास बन गई हूँ...
जैसा आज तुम्हारा
स्वागत हो रहा है
कल वैसा ही मेरा हुआ था...
गिला शिकवा किसी से
कुछ भी नहीं,
संतोष है तो सिर्फ इतना
कि मैने तुम्हें तराशा सँवारा,
समृद्ध एवं गौरवशाली
अतीत दिया है...
फूलो-फलो, हँसो,मुस्कराओ,
खिलखिलाओ सदा यूँ ही
पर मत भूलना मेरा योगदान,
साहस और धैर्य
क्योंकि अतीत की
नींव पर ही
भविष्य की इमारत खड़ी है...।
Tuesday, December 11, 2012
सुख-दुख हर इंसान के जीवन के हिस्से है...ये मानव जीवन की ऐसी अवस्थाये है जिनके वशीभूत इंसान की मानसिक क्रियाओ का निर्धारण होता है,यही कारण है कि एक ही अवस्था में कोई सुख का अनुभव करता है तो कोई दुख का,कोई आशा का तो कोई निराशा का...आवश्यकता है अपने मन को वशीभूत करने की जिससे कि छोटी - छोटी बाते मन को उद्देलित न कर पाये और इंसान विषम से विषम परिस्थितियों में भी अपना संतुलन न खोये...अगर इंसान ऐसा कर पाया तो उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि होगी...।
मेरी पुस्तक वीरान मन के खंडहर का अंश...
Wednesday, October 31, 2012
ऐसा कहर बरपाया
प्रकृति के तांडव से आज तक कोई नहीं बच पाया है...इंसान भले ही अपनी सफलताओ पर कितना ही क्यों न इतरा ले, पर क्या अपने सारे संसाधनों के बल प इस तरह की आपदाओ को रोक पाया है...नहीं...अपनी इस व्यथा को व्यक्त किया अपनी कविता... ऐसा कहर बरपाया...
ऐसा कहर बरपाया
प्रकृति का अजब खेल है निराला, ऐसा कहर बरपाया,
कल तक थी जहाँ खुशियाँ, आज मातम वहाँ छाया...
मौत के बीच सिसकती ज़िंदगी, आज खड़ी है दोराहे पर,<
अपनों के लिए रोये या अपनी बदनसीबी पर,समझ कोई न पाया...
डूबा बचपन, डूबी जवानी, डूब गई खुशियाँ सारी,
जलभक्षक बना, विनाश का काला अध्याय खून से लिखाया...
उजड़ गई बस्तियाँ लाशों के बिछे मंजर,
ज्ञान विज्ञान सब पीछे छूटे, प्रकृति ने तांडव मचाया...
आकाश,जल और धरा को बाँधकर, इतराता रहा मानव,
एक झटके में तोड़कर गुरूर को उसके,बेबस बनाया...
कुदरत के संग कर खिलवाड़, मसीहा बनने की कोशिश न करो,
इंसा हो इंसा ही बने रहो, नियति तूने सबक सिखया...।
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