Monday, June 9, 2014

मुझे बताते हुए अत्यंत हर्ष हो रहा हे कि मेरी कहानी 'ढाई आखर प्रेम का ' सरिता पत्रिका के मई के दूसरे अंक में प्रकाशी हुई है...

Friday, April 11, 2014

फसल

बोई थी मैंने फसल प्यार की,विश्वास की, उमंग की,उत्साह की, अपनत्व की,सहयोग की... कोपलें फूटी भी न थीं कि कुछ सिरफिरों ने काट डाली और बो दी... फसल नफरत की, ईर्ष्या,द्वेष की, वेमनस्य की, क्रोध की, बदले की,जहर की...। पर भूल गये नफरत को नफरत के जल से नहीं, प्यार के जल से सींचा जाता है...। अगर ऐसा न होता तो न यह जमीं होती न ही यह अलौकिक सौन्दर्य, न ही हम और तुम...।

Wednesday, April 9, 2014

एक मौका और दीजिये

एक मौक़ा और दीजिये 

 पाँच वर्ष पश्चात 
 खादी के 
कुर्ता पाजामे में 
सुसज्जित 
 सिर पर 
गांधी टोपी लगाये 
आँखों पर 
रे-बेन का
 काला चश्मा पहने 
 पेरों में 
रिबोक के 
जूते पहने 
 सुरक्षाकर्मियों के घेरे में  
एक बार फिर 
द्वार पर हाथ बांधे 
 व्यक्ति को देखकर 
हमने पूछा, 'कौन हो भाई,
 हमने पहचाना नहीं...।'

 'हम गरीबदास 
आपके सेवक... 
एक मौका और दीजिये। ' 

'आप वह गरीबदास नहीं हो
 जिन्हें हमने वोट दिया था... 
कंधों पर थैला लटकाये 
 चप्पल चटकारते, 
पेट को 
आंतों में धँसे 
 उस कमजोर और मरियल से 
व्यक्ति में समाज सुधार का
 जज्बा देख 
हमने सोचा था
हमारे मध्य पला बढ़ा 
 वह आदमी 
निश्चित रूप से 
 हमारी समस्याओं का 
हल ढूंढ पाएगा... 
पर तुम भी 
औरों की तरह ही निकले... 
जाइये...जाइये 
अब हमें और बेबकूफ 
मत बनाइये 
कहीं और जाकर 
वोट मांगिए। ' 

 'नहीं भाई 
हम वही गरीबदास है 
आपकी समस्याओं का
 हल ढूँढते-ढूँढते 
 हम स्वयं उलझ गये थे, 
आपकी मेहरबानी से 
 हमारी गरीबी तो हो गई दूर... 
एक मौका और 
दीजिये जहाँपनाह, 
जिससे अब  
आपकी गरीबी हम
 कर सकें दूर...।

@सुधा आदेश

Friday, March 28, 2014

माँ

दर्द के सैलाब से गुजर कर मोती पाने की आकांक्षा की जिसने वही कहलाई माँ ।

रात भर जागकर, बाहों के झूले में झुलाकर, लोरी सुनकर ममत्व का अनिवर्चनीय आनंद पाया जिसने वही कहलाई माँ।
रोये तो रोई, हँसे तो हँसी, छोटी से छोटी सफलता पर हमारी बलैया लेते-लेते न थकी,वही कहलाई माँ।
न कोई चाहना, न कोई पावना गुजरता रहा हर पल जिसका साधना में, वही कहलाई माँ ।

हाथ देते रहे अभयदान आँचल उलीचता सदा आशीर्वाद, अनोखी रचना ईश्वर की वही कहलाई माँ ।  
 

Friday, February 21, 2014

कपास ( रुई )

आज मै पूजा कर रही थी तो रुई की बत्ती को जलते देख अनायास ही मेरा अवचेतन कह उठा...यह दिया तुमने भगवान के घर को प्रकाशित करने के लिए जलाया है या अपने मन के अंधकार को दूर करने के लिए...मुझे सोच मै पड़ा देखकर उसने पुनः कहा...अगर भगवान के घर को प्रकाशित करने के लिए जलाया है तो वहाँ तो प्रकाश ही प्रकाश है, सच्चाई का,ईमानदारी का,मानव मात्र की सेवा का...और अगर अपने मन को प्रकाशित करने के लिए जलाया है...तो क्या आज तक तुम ईर्ष्या,द्वेष, नफरत को त्याग कर मन को निर्मल कर पाई...दिया जलाना है तो जलाओ प्यार का वरना मुझ गरीब( रुई ) को मुक्ति दे दो...व्यर्थ दिखावे के लिए मुझे कष्ट मत दो...मै भगवान के मंदिर में जलने की अपेक्षा कपड़ों के रूप में स्वयं को ढाल कर किसी जरूरतमन्द के शरीर को ढ़क कर अपने जीवन को सफल बनाना चाहती हूँ...मुझे अपने स्वाभाविक स्वरूप में ही रहने दो मुझे असमय ही विनष्ट मत करो ।

Sunday, January 12, 2014

एक बार फिर भ्रष्टाचार का मुद्दा देश के मानस पर छाया हुआ है...अरविंद केजरीवाल धूमकेतु बनकर उभरे है पर उनको यह बात याद रखनी पड़ेगी कि कोई आदमी प्रारम्भ से भ्रष्टाचारी नहीं होता उसे भ्रष्टाचारी व्यवस्था और परिस्थितियाँ बनाती है...कुछ दबंग लोग अपना काम निकालने के लिए तथाकथित भ्रष्टाचारी को रकम पकड़ा कर उसे भ्रष्टाचार करने के लिए आमंत्रित करते है,सबसे छोटी और सच्ची बात रेलवे में आरक्षण न मिलने पर एक सीट पाने के लिए लोग 100 रुपए देने से नहीं हिचकते...तो जरा सोचिए अन्य काम निकालना ऐसे लोगों के लिए कुछ भी कठिन नहीं होगा,धीरे-धीरे देना-लेना इनके स्वभाव का हिस्सा बनता जाता है और उन्हें देने लेने में कोई शर्मिंदगी नहीं होती...भ्रष्टाचार को केवल कानून बनाकर या स्टिंग ऑपरेशन करवाकर व्यवस्था में सुधार की कल्पना करना बेमानी है...इसके लिए व्यक्ति की मानसिकता में परिवर्तन लाना आवश्यक है...व्यक्ति के मन में यह धारणा बननी आवश्यक है कि रिश्वत लेना और देना अपराध है...देने वाला मेरे विचार से लेने वाले से भी बड़ा अपराधी है,देने वाला ही व्यक्ति को भ्रष्टाचारी बनाने के लिए प्रेरित करता है। लगभग दो वर्ष पूर्व मेरे पति ने एक अर्धसरकारी विभाग से उच्चपदस्थ अधिकारी की हैसियत से अवकाशप्राप्त किया...अवकाशप्राप्ति के पश्चात मिलने वाले सारे लाभ प्राप्त करने के लिए इनके कुछ सहयोगियो ने सलाह दी कि संबंधित अधिकारी को कुछ नजराना पेश कर दो तो आनन फानन में तुम्हारा काम हो जाएगा पर इन्होने अपना पूरा जीवन ईमानदारी से जिया था किसी को कभी दिया न लिया,लोगों के कहने के बावजूद इनके मन में विश्वास था कि मेरा काम हो जायेगा और हुआ भी यही...मेरे कहने का मतलब है कि अगर हम व्यवस्था पर विश्वास रखें और संयम से काम लें तो कोई कारण नहीं कि भ्रष्टाचार का समूल नाश न हो पाये।

Tuesday, January 7, 2014

एक सच

आज व्यक्ति के लबों से मुस्कराहट तिरोहित होती जा रही है...ठहाकेदार हँसी,जहाँ अंदरूनी खुशी का परिचायक हुआ करती थी आज फूहड़ता का प्रतीक बनती जा रही है...मंद-मंद मुसकराना,ओठों पर नकली मुस्कान लिए घूमना आज आभिजात्य वर्ग का फेशन बनता जा रहा है। हँसना,खिलखिलाना और मुस्कराना इंसान का प्राकृतिक स्वभाव है...सच तो यह है स्वाभाविक एवं निर्दोष मुस्कान दुखी इंसान के चेहरे पर भी मुस्कान ला सकती है...नन्हा शिशु जब अकारण मुस्कराता है तब उसकी मुस्कान निर्दोष और स्वार्थरहित होती है पर जैसे-जैसे शिशु बड़ा होता जाता है उसकी मुस्कान कम होती जाती है किशोरावस्था तक आते-आते मुस्कान ओढ़ी हुई प्रतीत होने लगती है...कारण है चिंता और तनाव...। इंसान तनावों में भी अगर मुस्कराने की आदत डाल ले तो तनाव स्वयं ही भागने की राह खोजने लगेंगे...तनाव और चिंताओं से आज कोई भी अछूता नहीं रहा है...हमें जीवन की परिभाषा बदलते हुए इनके संग-संग ही जीना होगा...अगर हम इन्हें अपने जीवन का अंश बना लें तो इसमें कोई दो राय नहीं है कि जीवन सहज,सरल और सुगम होता जाएगा...तब ओठों की मुस्कान ओढ़ी हुई नहीं वरन व्यक्ति के व्यक्तित्व का अंश बनती जायेगी और व्यक्ति सर्वनाशक प्रवृतियों से दूर सर्वहित कार्य करता हुआ,अनायास ही सर्वप्रिय,सर्वमान्य और सर्वजयी होता जाएगा...।