Thursday, February 2, 2012

हमारा संविधान कहता है कि हमारा राष्ट्र धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है पर आज हिंदुओं कि बात करने वाला सांप्रदायिक कहलाता है जबकि मुस्लिम हितों कि बात करने वाला धर्मनिरपेक्ष....समाज के तथाकथित धर्मनिरपेक्षों कि ऐसी मानसिकता कहीं हमारे देश का एक और विभाजन न करा दे....दलगत स्वार्थ में लिप्त यह लोग यह भूल रहे है कि देश विकासोन्मुख तभी हो सकता है जब देश के सभी प्राणी प्यार, अपनत्व और भाईचारे के साथ   रहें।
पर लगता है कि इन लोगों को देश से ज़्यादा अपना स्वार्थ प्यारा है तभी तो इन्हे भाई को भाई से लड़ाने  तथा एक दूसरे के विरुद्ध विष वमन कर नफरत के बीज बोने में ज़्यादा आनंद आता है....और इससे भी ज़्यादा आनंद आता है लोकलुभावन वादे करने में..... जनता   अब इन लोगों कि नौटंकी देखकर थक चुकी है उसे  पता चल गया है कि इनके सारे करतब  सिर्फ चुनाब जीतने के लिए है....कोई किसी का साथी नहीं है....चुनाव संपन्न होते ही ये अपने ए॰ सी॰ कमरो  मे बंद हो जायेंगे शायद पाँच वर्षों तक किसी को दिखाई भी न दें....।        

Monday, January 30, 2012

राहुल गांधी ने एक जन सभा में कहा कि मुस्लिम समुदाय की दयनीय स्थिति के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ज़िम्मेवार है...एक ऐसा व्यक्ति जिसे भारत का भावी पी.एम. कहा जा रहा है तथा जिस कांग्रेस पार्टी का इस देश पर लगभग पचास वर्षो तक शासन रहा है उसके तथाकथित राजकुमार के मुख से ऐसी बातें हास्यास्पद लगती है...ऐसा करके  वह देश को  तोड़ने का काम कर रहे है...आम नागरिक यह नहीं समझ पा रहा है कि यह वोट बैंक कि राजनीति देश को किधर ले जा रही है...इंसान के मन में प्यार की जगह नफरत के बीज बो कर कुछ समय के लिए वह भले सुख का अनुभव कर लें पर यह न भूलें अब जनता को मूर्ख नहीं बनाया जा सकता...जनता के पास भी कान,आँख और दिमाग है...समझदार व्यक्ति कोई उनके झांसे में नहीं आने वाला...अगर कांग्रेस को ज्यादा सीटें मिलती है तो इसका अर्थ यह नहीं कि युवराज को स्वीकृति मिल गई...जनता सिर्फ उसे ही पसंद करेगी जो हर संप्रदाय को साथ लेकर चले न कि वोट के लिये भाई को भाई से लड़ा कर अपना भले कि सोचे...  

Thursday, January 26, 2012

क्या भूलूँ क्या याद करूँ

ऐ मन मेरे तू ही बता स्वतंत्रता दिवस की सांध्य बेला में क्या भूलूँ क्या याद करूँ.... देश प्रेम से भरपूर वे तेजस्वी चेहरे या देश को बेचने को आतुर मुखोटों के पीछे छिपे भेड़िये, एक वे थे जिन्होने देश के लिए कर दिया सर्वस्य न्योछावर, एक ये है जिन्होने निज राष्ट्र को लूट कर भर लिया घर। भूल गए अपने ही सहोदरो का बलिदान, देश को विकासोन्मुख बनाने की कसमें माँ को दिया वचन। घोटालों में फँसकर भ्रष्टाचार, आतंकवाद,जातिवाद को देकर बढ़ावा जनता जनार्दन को समझ कर गूँगा बहरा सर्वदा गुमराह करते रहे। विश्व के मानचित्र पर देश की डावांडोल स्थिति देखकर राष्ट्र प्रेम की भावना क्यों उद्देलित नहीं होती। संवेदनाये, भावनाएं क्यों व्याकुल नहीं करती क्या यांत्रिक विश्व में निर्जीव तन-मन के साथ तुम भी यांत्रिक बन गए हो। परभाषा के माध्यम से पले बढ़े लोगों को निज राष्ट्र से क्यों होगा प्रेम ? मात्रभाषा बोलने में आने लगी है अब शर्म सिसक रही माँ भारती देख निज पुत्रों के कर्म। विराट सांस्कृतिक परम्पराओं वाले देश के सुनहरे भविष्य की सुदृढ़ नीव भी अकुशल हाथों में असमय ही होने लगी है क्षीण । ऐ मन मेरे तू ही बता स्वतंत्रता दिवस की सांध्य बेला में क्या भूलूँ क्या याद करूँ ?

Friday, January 13, 2012

शुचिता

मानव जीवन में शुचिता का होना अत्यंत आवश्यक है पर यह तभी संभव है जब हम मन,कर्म और वचन से ईमानदार रहें....कभी किसी का बुरा न सोचें न बुरा करे और न ही बुरा सुनें....बुरा सुनने, करने और कहने से ही इंसान के अंदर आसुरी शक्तियों का निवास होने लगता है जिसके कारण  वह अपनी मानवीय विशेषतायों से दूर होता जाता है....यह प्रवृति न केवल इंसान के लिए वरन परिवार और  समाज के लिए भी घातक है....अगर हम वास्तव में परिवर्तन लाना चाहते है तो हमें स्वयं को बदलना होगा कोई कारण नहीं की हम स्वस्थ समाज का निर्माण न कर पाएँ....

चाह है अगर दिल में, राह निकल ही आएगी,
कठिन भले हो  डगर, मिलेगी मंजिल,
गुजारिश है इस दिल की बस इतनी,
इरादों पर अपने, जंग मत लगने देना....।      

















Tuesday, November 22, 2011

पल



आज दुनिया जिस दौर से गुजर रही है उसमे हर गुजरता पल महत्वपूर्ण होता जा रहा है....जो पलो के महत्व को नकार देते वे स्वयं को भुलावे मे रखते है क्योंकि गुजरते पल लौट कर नहीं आते.... इस बात को शब्दों में कुछ इस तरह पिरोया हे,,,,,

दो पल की है ज़िंदगी


कतरा-कतरा बूँद-बूँद सजती रही ज़िंदगी,
कभी बिहंसती कभी चटकती रही ज़िंदगी।

शबनमी बुंदों ने जब-जब भिगोया तन मन,
सूरज की उजली किरण सी सँवरती गई ज़िंदगी।

पतझड़ की कंटीली हवाओं ने जब-जब भी दी चुभन,
तिनका-तिनका बेताहशा,बेतरतीब बिखरती  गई ज़िंदगी।

भागे ज़िंदगी की जद्दोजेहद के पीछे जितना ही,
उतनी ही छिटकती चली जा रही जिंदगी।

अरमानों को सहेजकर अलकों पर ,कहती है 'सुधा',
कैद कर लो सुख-दुख के पल,दो पल की है ज़िंदगी।

Tuesday, November 8, 2011

मुखोटा

इंसान अपने चेहरे पर न जाने कितने मुखोटे लगाए रहता है । अंदर से कुछ बाहर से कुछ...सच तो यह है कि कभी-कभी वह स्वयं ही मुखोटे के पीछे छिपे अपने चेहरे को नहीं पहचान पाता या अपने अहंकार के वशीभूत इसे स्वीकार करने में हिचकता है पर शायद वह नहीं जानता कि वह दूसरों को धोखा दे सकता है पर स्वयं को नहीं... मुखोटा जो स्वयं के साथ सच्चा नहीं वह दूसरों के साथ सच्चा कैसे होगा, साथ चलना है तो चलेंगे ही पर विश्वास पर दाग लगा ही होगा...। अपनों के साथ छल कपट कर गर तुम आगे बढ़े भी मत भूलो, स्वयं तुम्हारा भी भला नहीं होगा....। मुखोटों में कैद ज़िंदगी भी क्या जिदगी, छिपकर नज़रों से अपनी जीना भी भला जीना होगा....। जीना है तो जियो शान से आत्मसम्मान, आत्मगौरव के संग, विश्वास करो न करो तुम सारा जमीन,सारा आकाश तुम्हारा होगा....। सुधा आदेश

Sunday, November 6, 2011

मन

मन को आज तक कोई नहीं समझ पाया है मन अगर चाहे कठिन से कठिन समस्याओ का हल चुटकियों मे कर दे,नहीं तो सरल से सरल समस्याओ के समाधान में महीनो लगा दे....किसी ने सच ही कहा है....मन की गति मन ही जाने....मेंने मन की गति को कुछ इस तरह उकेरने का प्रयत्न किया है.... उलझनों में घिरा मन अगर मगर में हैरान परेशान मन फिर भी चलता चला जा रहा है मन...। कितना कैद रहे मन, उड़ना है तो उड़ेगा मन फिद्रत से मजबूर मन.... हँसोगे तो हँसेगा मन रोओगे तो रोएगा मन नाचता नचाता रहा सदा मन....। आवश्यकता में तीव्रता से भागा मन रुका तो रुका ही रह गया मन, मन को ही नहीं समझ पाया मन...। मित्र बना जब मन का मन, अंधेरों में जुगनू सा जगमगाया मन, इन्द्रधनुष सा लहराया, सुकून पाया मन....।