Thursday, March 31, 2011

ak sach

जीवन सहज और सरल नहीं होता अगर होता तो जीवन में इतनी परेशानियाँ नहीं होती....क्यों हर पल हमें अहसास दिला जाता हे कि कहीं  तो हमारे जीवन में कुछ तो कमी है, उस कमी को हमें स्वयं  दूर करना है....आखिर कब तक हम ऐसे ही हाथ पर हाथ धरे नहीं बेठे रहेंगे....अगर  हमें  अपनी मंजिल पानी हे तो पत्थरो को तोड़ कर राह  बनानी ही होगी....शायद जीवन की यही  खूबी हमें निरंतर प्रयास करने के लिए प्रेरित  करती  हे और हम बार बार असफलता के घूंट पीकर भी सफलता की कामना के साथ आगे बढ़ते जाते है....सही दिशा में आगे बढ़ने वाला कभी असफल नहीं होता, सच तो यह है प्रयास नहीं करने वाले ही भाग्य  को दोष देते है , सबको काम करने के लिए दिन में २४ घंटे ही मिलते है कोई इनका उपयोग करके अमर हो जाता है  तो कोई गन्दी नाली में पड़े कीड़े की मानिंद, बिना किसी का ध्यान  अपनी ओर आकर्षित किए  इस दुनिया से चला जाता है....अब तुम्हें स्वयं  निर्धरित करना हे तुम्हे कौन सा जीवन चाहिए.....?       

Friday, January 28, 2011

NIRASH HU ME

पिछले दो तीन दिन से मन बहुत परेशान हे, बचपन से हम सुनते आये हे कश्मीर  से लेकर कन्याकुमारी तक भारत एक हे कश्मीर भारत का  अभिन  अंग  हे अगर ऐसा हे तो वहा एक आम हिन्दुस्तानी तिरंगा क्यूँ  नहीं फहरा सकता....KAISI अजीब बात हे तिरंगा फहराने वालो को रोकने के लिए राज्य और केंद्र सरकार  ने पूरी ताकत लगा दी....इसका क्या अर्थ निकाला जाये....क्या ऐसा करके हमने देश और दुनिया को यह सन्देश नहीं दिया की कश्मीर हमारे देश का हिस्सा नहीं हे....अगर यह सच हे तो हमारी सेना वहाँ क्या कर रही वह ऐसे देश की रक्षा में क्यों  लगी हे जिसे हमारे देश के हुकुमरान अपना मानते ही नहीं हे....अगर ऐसा होता तो वह वहां तिरंगा फहराने जाने वालो को नहीं रोकते, रोकते भी तो उन्हें रोकते जो तिरंगा फहराने का विरोध कर रहे थे....इतिहास ऐसे नेत्रत्व को कभी माफ नहीं करेगा. उन्हें देश को जबाब देना ही होगा विशेषतया उन्हें जिनके पुत्र, पति या भाइयो ने देश के भाल की रक्षा करने में अपना सर्वस्य अर्पित  कर दिया....वाह क्या श्रधांजलि दी हे हमने उन्हें....शर्म से हमे मर नहीं जाना CHAHIYE  आज TO जय हिंद , जय भारत कहने में भी जबान लड़खड़ाने लगी हे.....     

Saturday, January 8, 2011

hatash nirash

कई बार ऐसा होता है की न चाहते हुऐ  भी इन्सान जिंदगी से हताश निराश हो जाता हे विभिन्न तरह के विचार आकर उसकी दशा और दिशा बदल देते हे पर वह कोई उपाय नहीं  खोज पाता....स्तिथी  इतनी  अजब गजब हो जाती हे की वह उससे निकलने का सही मार्ग खोजने में असमर्थ रहता हे कुछ ऐसी ही स्तिथि हमारे  देश की हे....राजनेताऔ ने अपने स्वार्थ के लिए समाज के इतने  टुकड़े कर दिए हे की हमारी अस्मिता ही खतरे में पडा गई हे बचपन से  हम सुनते आये हे की कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत एक हे....दुःख होता हे जब कुछ तथागत  बूधिजिवियो को        भारत का अभिन्न अंग कहलाने वाले कश्मीर के बारे में  कहते हुए सुनते हे की वह तो भारत का हिस्सा कभी था ही नहीं....लालचौक   पर तिरंगा   झंडा फहराने के जज्बे   वालौ  को आज चुनोती    दी  जाती की यदि  आपके  कारण  घाटी में कोई समस्या आती हे तो उसके लिए आप ही जिम्मेवार होगे, वहां  एक चुनी हुई सरकार  हे, कानून व्यवस्था की जिम्मेवारी सरकार की हे, ऐसा कह कर वह देशभक्तों का साथ दे रही या अलगाववादियों का....समझ में यह नहीं आ रहा हे हमारी केंद्रीय  सरकार यह सब देख सुन कर चुप क्यों हे....कही इसके पीछे कोई गहरी चाल तो नहीं हे....कही सरकार यह सब किसी के इशारे पर तो नहीं होने दे रही वरना ऐसा क्यों हे की हम अपने ही देश के एक भूभाग पर तिरंगा नहीं फहरा सकते न ही ऐसे लोगो पर कोई कार्यवाही कर पाते जो हमारे देश की अखंडता पर कुठाराघात करता हे....आखिर हम इतने विवश क्यों हे....हमारी सीमाओं पर हमरे वीर सपूत जान की बाजी लगा देते हे पर हम उनकी शहादत को मूल्य समझने को भी   तेयार नहीं हे आखिर यह कैसी मजबूरी  हे....न जाने कब हमारे राजनेता छुद्र स्वार्थ को तिलांजलि देकर देश हित में सोचेंगे और करेंगे....आज  का हताश निराश सामान्य  नागरिक गर्वे से एक बार पुनः कह सकेगा हम उस भारत देश के नागरिक हे जहाँ के हर नागरिक के दिल में देश के लिए अथाह प्रेम हे वह मर जायेगा पर अपने देश के टुकड़े नहीं होने देगा....                 

Saturday, December 18, 2010

हमारा मन या हमारी चाहत ही हमारे सारे दुखों का कारण है ...

हमारा मन या हमारी चाहत ही हमारे सारे दुखों का कारण है....सच तो यह है कि हम चाहे कितने भी साधन संपन्न क्यों न हों अगर हमारा मन संतुष्ट नहीं हे तो दुनिया के सारे सुख बेमानी है....यही कारण है कि कुटिया में रहने वाले,आधे पेट खाने वाले गरीब मजदूर भी चैन की नीद सोते है जबकि सब सुख-साधनों से भरपूर तथाकथित अमीर मखमली गद्दो पर भी करवट बदलते रहते है....क्यों....शायद इसलिए कि वे अपनी परिस्थितियो के साथ समझौता नहीं कर पाते...और अधिक पाने की चाह में निरंतर भौतिक सुखो की ओर भागते रहते है यही मनोवृति उनमें असंतुष्टि का कारण बनती है...। यह असंतुष्टि तभी दूर हो सकती है जब हम ऊपर यानि अपने से समर्थ को न देख कर नीचे अर्थात ग़रीबों को देखें....उनकी तकलीफों को महसूस करें....अभावों में भी उनकी हँसी का रहस्य जानने की कोशिश करें....पूर्ण विश्वास है की आप जीने की कला सीख जायेंगे ।

Sunday, November 28, 2010

आज हम नई जिन्दगी में प्रवेश कर रहे हे....एक ऐसी जिन्दगी जिसका दिन निश्चित होता हे....यधपि मेरे पति को अवकाश तो अगस्त में ही प्राप्त हो गया था पर पूर्ण रूप  हम  नई जिन्दगी में दो दिन पूर्व यानि २६ तारीख को प्रवेश किया हे....३८ वर्ष की सर्विस के पश्चात् नई जगह आकर रहना, फिर से घर  बसाना आसन नहीं होता जबकि सारी सुख सुविधाओं से जिंदगी बीती हो....पर कहते हे इंसानी  मन सब कुछ भूल कर सहज हो जाता हे हमारे साथ भी ऐसा ही होगा....शायद समय लगे पर फिर से सब कुछ ठीक हो जायेगा....पुराने दोस्तों को भुलाना  आसान नहीं होता पर आज दुनिया सिमट गई हे यदि इचा हो तो फ़ोन के जरिये हम आपस में सम्बन्ध बनाये रख सकते हे....आज बस इतना ही....        

Friday, November 19, 2010

jivan ke rang

जीवन जीवन सुख और दुःख का बसेरा हे....शायद ही ऐसा कोई जीवन हो जिसमे सुख दुःख न हो, शायद हम इनके बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकते....सच तो यह हे की दोनों ही एक दुसरे के पूरक हे....जीवन में अगर दुख न होगा तो भला हम सुख की आनंददई अनुभूति को जी कैसे पायेगे....सुख ही सुख होगा तो दुःख की भयावता  से कैसे परिचित होंगे....जीवन नीरस तो होगा ही जीवन जीते हुए भी जीवन रस से वंचित रहेंगे. अतः जीवन की धूप  छाव से मत घबराइए बढते चलिए, बढ़ते चलिए जीवन सुखमय बन जायेगा....  &n

Thursday, November 18, 2010

pariwar

व्यक्ति से परिवार बनता हे तथा परिवार से समाज....अर्थात व्यक्ति पर ही समाज के निर्माण का दायित्व होता हे, अगर व्यक्ति किसी काम की अलख मन में जगा ले तो चाहे कितनी ही कठिनाइया आये वह अलख को बुघने नहीं देगा....उसके आदशो की अलख स्वयं  तो जलेगी ही दुसरो के घर को भी अपने प्रकाश से प्रकाशित करेगी इसमें संदेह नहीं हे. आवश्कता हे  इक्च्शक्ति की....ऐसा व्यक्ति अपने मनोबल के कारन न केवल अपना ध्येय प्राप्त करता हे वरन अपने साथ समाज को चलने के लिए भी प्ररित करता हे....बड़े- बड़े महापुरुष इसके उदाहरण हे....जिन्होंने  अपनी सोच और कर्म से समाज और देश को एक  नई  दिशा दी....जो व्यक्ति समाज को साथ लेने की शक्ति रखता हे वही  सही अर्थो में मानव कहलाने का अधिकारी होता हे....आइये हम सब भी समाज के लिए एक नेक काम करे समाज में परिवर्तन अवश्य ही होगा....