Tuesday, September 10, 2024

मोहब्बत की दुकान

 मोहब्बत की दुकान खोलने वाले न जाने राहुल गाँधी देश से और देश के बहुसंख्यकों से इतनी नफरत क्यों करते हैं! 


हिंदू, मुस्लिम, सिखों के बीच सामाजिक समरसता को भंग कर देश में आग लगाने का स्वप्न देखते राहुल गाँधी क्या सचमुच देश का भला करना चाहते हैं?

नहीं... उन्हें किसी तरह सत्ता चाहिए। वह सत्ता के लिए कुछ भी कर सकते हैं।

अगर ऐसा न होता तो दूर देश में वह चीन की प्रशंसा न करते। बी. जे. पी. और आर. एस. एस. की बुराई करते हुए वह भूल जाते हैं। 78 वर्षो में बी. जे. पी. ने तो सिर्फ 15 वर्ष शासन किया जबकि शेष वर्षो में कांग्रेस या उसकी समर्थित सरकारों ने शासन किया तब देश में सुधार क्यों नहीं कर पाये। तब तो वे सिर्फ अपना बैंक बैलेंस बढ़ाने में लगे रहे। अब ज़ब देश आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है तब ये तथा इनका इंडी अलान्स  राह में कीलें ठोकने का प्रयास रहे हैं।

काश! देश के लोग इनकी विभाजनकारी राजनीती को समझें तथा इनकी मोहब्बत की दुकान को बंद कर दें।

Thursday, August 22, 2024

संविधान की हत्या

 कांग्रेस के नेता और वकील के बाद अब तथाकथित किसान नेता राकेश टिकेत ने कहा है कि हत्या देश में तानाशाह नरेंद्र मोदी को हटाने के लिए बांग्लादेश जैसे हालत पैदा करने होंगे।


समझ में नहीं आता कि लोग नरेंद्र मोदी का विरोध करते -करते देश के विरोध में क्यों आवाज़ उठाने लगते हैं? संविधान बदलने और आरक्षण खत्म करने का आरोप लगाकर भी बहुमत न पा सके तो क्या अब चुनी हुई सरकार को बल से गिराना लोकतंत्र है?


जहाँ तक तानाशाही का प्रश्न है, अगर मोदी तानाशाह होते तो क्या इन जैसे लोगों के मुँह से ऐसे शब्द निकल पाते? लोकतंत्र और संविधान की हत्या कौन कर रहा है, यह विचारणीय प्रश्न है।

Wednesday, August 14, 2024

याद करें कुर्बानी

 याद उन्हें भी कर लें 


आज विभाजन विभीषिका दिवस 

कल स्वतंत्रता दिवस 

स्वतंत्रता तो हमने पा ली 

कीमत भी बहुत चुकाई…


आजादी का जश्न मना 

सत्ता भी पाई

करोड़ों ने आहुति दी 

मौज कुछ की ही आई।


देश के दो टुकड़े हुए 

दिलों में दरार पड़ी

लाखों बेघर हुए 

खेली खून की होली। 



आज भी वे ढूंढ़ रहे हैं  पहचान निज की 

सुलग रही आज हर दिल में नफरतों की चिंगारी।


सत्ता के लिए देश के आमजन को धर्म,

बहुसंख्यक,अल्पसंख्यक, अनेक जाति प्रजातियों में  बांटा।

आरक्षण की बाजी चली।


नहीं दिए समान अधिकार

देश का गौरव मातृभाषा, 

स्वार्थो में लिप्त जन-जन 

लुप्त हुई भावना देशभक्ति की।


77 वर्ष कम नहीं होते 

सुधरें, सुधारें...

ईर्ष्या द्वेष को देकर तिलांजलि 

याद कर अनाम शहीदों को 

आज शपथ लें  

बढ़ायेंगे शान तिरंगे की।



© सुधा आदेश 


Monday, October 16, 2023

मेरी पुस्तक 'याद करें कुर्बानी ' की समीक्षा

 याद करें कुर्बानी : अमर सेनानियों की कुर्बानियों के मह्त्वपूर्ण दस्तावेज : सुधा आदेश। एक चर्चित नाम । मैंने जब लिखना शुरू किया था तब यह नाम देश भर की पत्र-पत्रिकाओं में छाया हुआ था। दशकों तक सुधा आदेश जी की लेखनी से श्रेष्ठ कहानियों का सृजन होता रहा और वे विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हो लोकप्रिय होती रही हैं। पिछले कुछ वर्षों से सुधा जी ने पत्र-पत्रिकाओं में लेखन कम कर दिया है और अपना ध्यान पुस्तकों के प्रकाशन पर केंद्रित कर रखा है। इसीलिए प्रतिवर्ष उनके कई कहानी संग्रह और उपन्यास सामने आते रहे हैं। पिछले वर्ष उन्होंने बाल साहित्य के क्षेत्र में भी पदार्पण किया था और उनका एक उपन्यास ‘मोबाइल में गांव’ काफी चर्चित हुआ था। हाल ही में उनका इतिहासकार के रूप में एक नया पक्ष सामने आया है। प्रलेक प्रकाशन द्वारा उनकी एक पुस्तक ‘याद करें कुर्बानी’ प्रकाशित की गई है जिसके दो खंडों में देश के आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले अमर सेनानियों की गाथाएं संग्रहित की गई है। पहले खंड में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के 11 सेनानियों की तथा दूसरे खंड में उन्नीसवीं शताब्दी के 11 क्रांतिकारियों की जीवन गाथाएं सम्मिलित है।


 मुझे नहीं याद आता कि इससे पूर्व सुधा आदेश जी ने इतिहास संबंधी कोई लेख भी लिखा हो। एक कहानीकार से इतिहासकार के रूप में उनकी यह यात्रा परकाया प्रवेश जैसी मालूम पड़ती है। खासकर इसलिए कि उन्होंने इस संग्रह में प्रत्येक सेनानी के जीवन के आरंभिक कल से उसके बलिदान तक के घटनाक्रमों के जो तथ्य प्रस्तुत किये हैं वे प्रमाणिकता की कसौटी पर खरे उतरते हैं। निश्चित रूप से इसके लिए उन्होंने गहन शोध किया होगा। पुस्तक के हाथ में लेते ही अंतर्मन में यह प्रश्न कौंधता है कि लेखिका का अचानक यह कायाकल्प कैसे और क्यों हो गया? किंतु पुस्तक की भूमिका की प्रथम पंक्ति में ही इस प्रश्न का उत्तर मिल जाता है? वे कहती हैं ‘कुछ वर्षों पूर्व जब अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कुछ नवयुवकों ने देश के टुकड़े-टुकड़े करने की बात कही तब मेरा मन आंदोलित हो उठा। बार-बार मन में यही विचार आ रहा था कि आखिर इन नवयुवकों के मन मस्तिष्क में ऐसे भाव, ऐसी मानसिकता क्यों और कैसे उत्पन्न हुई?’’ इन्हीं प्रश्नों के उत्तर खोजने और वर्तमान पीढ़ी को सही मार्ग दिखाने के उद्देश्य से सुधा आदेश जी की लेखनी ने अमर सेनानियों की जीवनगाथाओं को इस पुस्तक में संजोने का बीड़ा उठाया ताकि युवा पीढ़ी उनकी कुर्बानियों को पढ़कर अंधेरे में भटकने के बजाय सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित हो सके।


  संग्रह की पहली जीवनी अंतिम मुगल शासक बहादुर साहब जफर की है जिसमें लेखिका ने उनके जीवन के कई अनछुए प्रसंगों को सामने लाने का प्रयास किया है। वे बताती हैं कि उनके पिता कवि हृदय बहादुर शाह ज़फ़र को दिल्ली की गद्दी सौंपना नहीं चाहते थे लेकिन अंततः उन्होंने शासन की बागडोर संभाली और 82 साल की उम्र में देश के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम का नेतृत्व भी किया। पुस्तक के इस भाग से पता चलता है कि इस अंतिम मुगल शासक की मृत्यु अंग्रेजों की कैद में किन विषम परिस्थितियों में हुई थी और आज उनके वंशज हमारे स्वतंत्र देश में झुग्गी-झोपड़ी में रहने के लिए मजबूर हैं।


 रानी लक्ष्मी बाई की वीरता और बलिदान की गाथा से तो सभी परिचित हैं किंतु उनकी हमशक्ल, महिला शाखा की सेनापति, झलकारी बाई की वीरता के बारे में कम ही लोग जानते हैं। सुधा जी ने अपनी पुस्तक में इन दोनों वीरांगनाओं के बारे में विस्तार से लिखा है। इसी प्रकार वीर सेनानी तांत्या टोपे के बारे में पाठ्यक्रमों में तो बहुत कुछ पढ़ाया जाता है लेकिन उनकी समकालीन तवायफ अजीजन बाई के बलिदान के बारे में लोगों को ज्यादा मालूम नहीं। अजीजनबाई ने तवायफों को एकत्रित कर ‘मस्तानी टोली’ नाम से एक सेना बनाई थी जिसने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था। कानपुर और बिठूर की आजादी में तात्या टोपे के साथ-साथ अजीजन बाई की वीरता का भी बहुत बड़ा योगदान था। सुधा जी की लेखनी ने इन दोनों के बारे में भी काफी विस्तार से लिखा है। 


  इसी के साथ-साथ पुस्तक के प्रथम खंड में उन्होंने बेगम हजरत महल, कोतवाल धन सिंह गुर्जर, नाना साहब,ऊदा देवी,मंगल पांडे तथा अवंतीबाई की जीवनी एवं उनके संघर्ष व बलिदान के बारे में काफी विस्तार से चर्चा की है। इससे पाठकों को अनेक ऐसी गाथाओं के बारे में पता चलता है जो इतिहास के पन्नों में खामोश हो कर दफन हो गई हैं।


 पुस्तक के द्वितीय खंड में उन्नीसवीं शताब्दी के 11 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की जीवन गाथाएँ शमिल की गई हैं। जिनमे रामप्रसाद बिस्मिल, यतीन्द्र नाथ, सरदार भगत सिंह जैसे चर्चित वीरों के नाम शामिल है तो वही सुशीला देवी, प्रीतिलता वाडेकर, कल्पना दत्ता, महावीर सिंह जैसे उन शहीदों की जीवनियां भी शामिल की गई है जिनके बारे में लोगों को कम जानकारी है। सुधा जी ने उनके बलिदानो से आज की पीढ़ी को परिचित करवाने का पुनीत कार्य किया है इसके लिये उन्हें साधुवाद दिया जाना चाहिए।


  सामान्यतः पाठकों को इतिहास रटना पड़ता है किंतु सुधा आदेश मूल रूप से एक कहानीकार हैं अतः उन्होंने इतिहास की घटनाओं को श्रृंखलाबद्ध कर इस अंदाज़ में प्रस्तुत किया है कि पाठक एक बार जब उन्हें पढ़ना शुरू करता है तो उसमें डूबता चला जाता है और किसी चलचित्र की भांति सारी घटनाएं उसके अन्तर्मन में उभरती चली जाती हैं। यही कारण है कि इन अमर सेनानियों की बलिदान की गाथायें उन्हें देश प्रेम के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है।


  कुल मिलाकर इस पुस्तक का मूल्यांकन इतिहास के एक महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में किया जाना चाहिए और इसके सृजन के लिए सुधा आदेश जी की जितने भी प्रसंशा की जाए वह कम है। यदि ऐसी पुस्तकें स्कूल के पाठ्यक्रमों में लगाई जा सकें तो उनकी उपयोगिता सार्थक हो सकेगी। मुझे विश्वास है कि सुधा जी की लेखनी से भविष्य में कोई ऐतहासिक उपन्यास अवश्य देखने को मिलेगा। उनमें इतिहास को सूचीबद्ध करने की क्षमता है और उनके तरकश में अभी कई तीर बाकी हैं यह इस पुस्तक के लेखन ने स्पष्ट कर दिया है। मैं उनकी इस पुस्तक की सफलता की मंगलकामना करता हूँ. । इस पुस्तक का प्रकाशन प्रलेक प्रकाशन ने किया है और इसकी कीमत 299 रुपये है।

 -संजीव जायसवाल ‘संजय’

Saturday, September 23, 2023

मानसिक दबाव और साहित्यकार

 विपरीत परिस्थितियों में बढ़ते मानसिक दबाव के बीच साहित्यकारों का दायित्व एवं देन...


 आज मानसिक दवाब से कोई भी अछूता नहीं है चाहे वह बाल हो ,किशोर हो ,युवा या वृद्ध । वास्तव में मानसिक दबाव आज जिंदगी का हिस्सा बनता जा रहा है क्योंकि भौतिकता की चकाचौंध की ओर अंधाधुंध भागते इंसान के लक्ष्य बड़े हैं पर  उनको पाने के साधन सीमित या प्रयास कम हैं ।   बड़ा लक्ष्य निर्धारित करना गलत नहीं है .. अगर लक्ष्य ही नहीं तो जीवन कैसा ?  लक्ष्य को हासिल करने के प्रयास में मानसिक दबाव उचित नहीं है क्योंकि यही मानसिक दबाव कभी-कभी अवसाद में परिणित हो जाता है । वैसे भी अत्यधिक मानसिक दबाव  व्यक्ति की लक्ष्य प्राप्ति में भी बाधक  बन जाता है ।


गीता में कहा गया है…


 कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेशु कदाचिन... कर्म पर हमारा अधिकार है पर फल पर नहीं .. .इस आदि मंत्र को अपना मूलमंत्र बनाकर कर्तव्य पथ पर निरंतर चलते रहना ही हर इंसान का प्रयत्न होना चाहिए । 


समाज में फैली कुरीतियों, अनाचारों, दुराचारों पर कलम चलाकर समाज को जाग्रत करने का साहित्यकारों का न केवल दायित्व है, वरन उनकी समाज को देन भी है।  देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार रचनाएं लिखकर साहित्यकारों ने अपने दायित्व का सदा निर्वाह किया है तथा कर भी रहे हैं । मानसिक दबाव से उत्पन्न विकारों को दर्शाते हुए, विपरीत परिस्थितियों  के बीच कार्य करने की क्षमता के विकास से संबंधित रचनाएं लिखकर समाज को नकारात्मक से सकारात्मकता की ओर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करना, साहित्यकार का कर्तव्य है । आज की यही मांग है जो एक साहित्यकार के लिए चुनोती के रूप में उपस्तिथ  है । हमारा देश तभी उन्नति कर पायेगा जब उसके नागरिक, स्वस्थ तथा सकारात्मक रहें । यह तभी होगा जब उन्हें उच्चकोटि का साहित्य पढ़ने को मिले । उन्हें बताया जाय कि काम के अतिरिक्त कुछ दिन के कुछ घंटे उन्हें स्वयं के लिए तथा अपने परिवार के साथ बिताने चाहिए । आपकी उपलब्धियां नहीं, आपका परिवार ही बुरे वक्त में काम आएगा । भ्रमण तथा व्यायाम भी मानसिक सुदृढ़ी के आवश्यक है । जब तन-मन से खुश रहोगे तब कार्य भी सफलतापूर्वक संपन्न कर पाओगे ।


 मैं यहाँ श्री दुष्यंत कुमार की यह पंक्तियां उद्घृत करना चाहूँगी …


 कौन कहता है सुराख आसमाँ में हो नहीं सकता 

एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो ।


सच अगर लक्ष्य निर्धारित है, व्यक्ति समर्पित हैं, मन में विश्वास है , अपने प्रयासों के प्रति ईमानदार है तो लक्ष्य को हासिल करना मुश्किल नहीं है ।


यही बात सुप्रसिद्ध हस्ताक्षर कविवर रामधारी सिंह दिनकर की कविता में परिलक्षित होती है…


 गौण  अतिशय गौण है तेरे विषय में 

दूसरे क्या बोलते हैं , क्या सोचते हैं 

मुख्य है यह बात पर अपने विषय में 

तू स्वयं क्या सोचता क्या जानता है ।


 उल्टा समझे लोग समझने दे तू उनको 

बहने दे यदि बहती उल्टी ही बयार है 

आज ना तो कल जगत तुझे पहचानेगा ही 

अपने प्रति तू अगर आप ईमानदार है ।


सुप्रसिद्ध शायर इकबाल  का निज पर विश्वास का प्रतीक यह शेर भी व्यक्ति को सकारात्मकता का संदेश देता है ...


खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले 

खुदा बंदे से खुद पूछे कि बता तेरी रजा क्या है।


मत भूलिए


सफलता-असफलता एक ही 

सिक्के के दो पहलू

जो असफलता से न घबराए

सफलता से न बौराये

वही इतिहास बनाता है ।



सुधा आदेश





Thursday, September 14, 2023

हिन्दी अपनाइये, पहचान बनाइये

 



 हिन्दी अपनाइये, पहचान बनाइये 

हिन्दी दिवस के अवसर पर आज मैं लॉर्ड मैकाले की बात बताना चाहूँगी जो उन्होंने 2 फरवरी 1835 को ब्रिटेन की संसद में भारत के संदर्भ में कहा था,"भारत का विस्तृत भ्रमण करने पर मैंने पाया कि वहां एक भी व्यक्ति बेईमान नहीं है। लोगों के अंदर उच्च नैतिक आदर्श एवं चरित्र वहां के सामाजिक संरचना की पूंजी है जैसा कि मैंने और कहीं नहीं देखा। लोगों के मन में आध्यात्मिकता, धार्मिकता एवं अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति अटूट आस्था है । वे बड़े मनोबली हैं। लोगों के आपसी विश्वास एवं सहयोग की भावनाओं को तोड़ें बिना, उन्हें भ्रष्ट किए बिना भारत को जीतना और उसपर शासन करना असंभव है। अतः मैं प्रस्ताव रखता हूँ कि नई शिक्षा नीति बनाकर वहां की प्राचीन शिक्षा प्रणाली एवं संस्कृति पर हमला किया जाए ताकि लोगों का मनोबल टूटे, वे विदेशी खासकर अंग्रेजी और अंग्रेजियत को अपनी तुलना में महान समझने लगें। तब वही होगा जैसा कि हम चाहते हैं। अपनी संस्कृति और स्वाभिमान को खोया हुआ भारत पूर्णतः गुलाम और भ्रष्ट भारत होगा।" 

अपनी योजना के अनुरूप मैकाले ने ‘अधोगामी निस्पंदन का सिद्धांत’ (Downward Filtration Theory) दिया। जिसके तहत, भारत के उच्च तथा मध्यम वर्ग के एक छोटे से हिस्से को शिक्षित करना था। जिससे, एक ऐसा वर्ग तैयार हो, जो रंग और खून से भारतीय हो, लेकिन विचारों और नैतिकता में ब्रिटिश हो। यह वर्ग सरकार तथा आम जनता के मध्य एक कड़ी की तरह कार्य करे।

मैकाले खुले तौर पर धार्मिक तटस्थता की नीति का दावा करते थे, लेकिन उसकी आंतरिक नीति का खुलासा वर्ष 1836 में अपने पिता को लिखे एक पत्र से होता है। जिसमें मैकाले ने लिखा है कि,”मेरा दृढ़ विश्वास है कि यदि हमारी शिक्षा की यह नीति सफल हो जाती है तो 30 वर्ष के अंदर बंगाल के उच्च घराने में एक भी मूर्तिपूजक नहीं बचेगा।” ( गुगुल से साभार)

और यह सच हुआ। 14 सितम्बर को हम हिन्दी को क़ब्र से खोदकर बाहर निकालते हैं तथा कुछ आयोजन कर उसके गुणगान कर फिर कब्र में गाड़ देते हैं। अगर ऐसा न होता तो विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली चौथी भाषा को हम राष्ट्र भाषा के स्थान पर सुशोभित नहीं कर पाते क्योंकि अंग्रेजी में पले बढे लोगों को अपने देश की भाषा उसकी संस्कृति से कोई लगाव हो ही नहीं सकता।


वे यह भूल जाते हैं कि किसी देश की पहचान जैसे उसका राष्ट्रध्वज होता है, वैसे ही उसकी राष्ट्रभाषा होती है। अफ़सोस तो तब होता है ज़ब कोई विदेशी हमसे हिन्दी में बात करता है तो हम उसका उत्तर अंग्रेजी में देते हैं। आज अंग्रेजी पढ़े लिखों की भाषा तथा हिन्दी अनपढ़ो की भाषा मानी जाती है। अगर हमने अपनी मानसिकता नहीं बदली तो कितने भी हिन्दी दिवस मना लें, हिन्दी भाषा की स्थिति में कोई सुधार नहीं होने वाला।

अगर आपको अपनी और अपने देश की पहचान बनानी है तो आपको इसे स्वयं तो अपनाना होगा ही, दूसरों को भी अपनाने के लिए प्रेरित करना होगा। दशकों पूर्व भाषा के महत्व को समझाते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी ने लिखा था।


निज भाषा उन्नति अहै,

             सब भाषा को मूल॥

बिनु निज भाषा ज्ञान के,

           मिटे न हिय को शूल॥


आप चाहे जितनी भी भाषाएं सीखिए, बोलिये पर अपनी मातृ भाषा को मत भूलिए, अपनी पहचान न भूलिए।


जय हिन्दी, जय भारत


 हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं

🌹🌹





        ©सुधा आदेश 

 




Friday, June 2, 2023

एक प्रश्न


राहुल गाँधी देश के बाहर भी देश के लोकतान्त्रिक स्वरुप पर अंगुली उठा रहे हैं। पता नहीं उन्हें नरेन्द्र मोदी से नफरत है या उन्हें भारत का विकास अच्छा नहीं लग रहा है। देश से प्यार करने वाला कभी भी भारत जाकर देश की संस्थाओं की बुराई नहीं करेगा।

उनकी भारत जोड़ो यात्रा में भी राहुल गांधी का बार -बार सेना को दोष देना, आरएसएस तथा मोदी के दो दोस्तों को कोसना…वह भी ऐसे दोस्त जो लाखों करोड़ों को रोजगार दे रहे हैं, भारत की प्रगति में जिनका अमूल्य योगदान है को पिछले साथ वर्षों से कोसना समझ से परे है। इसके साथ ही पकोड़े बनाकर अपनी जीविका चलाने वालों के प्रति भी असंवेदनशील रवैया अपनाना क्या उचित है। उनका तथा उनके पेशे को. लांक्षित करना तो उचित नहीं, किन्तु जो चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए हों वे श्रम का. महत्व क्या जाने। शायद वे नहीं जानते कि इन मेहनतकश इंसानों में वह ताकत है कि वे रेत को भी सोना बना सकते हैं।


 जहाँ तक रोजगारी और मंहगाई का प्रश्न है वह सिर्फ भारत में ही नहीं पूरी दुनिया ही उससे परेशान है। समस्या का हल सुलझाने की बजाय सात वर्षों से वे एक ही रट लगाए हुए हैं।