Thursday, September 14, 2023

हिन्दी अपनाइये, पहचान बनाइये

 



 हिन्दी अपनाइये, पहचान बनाइये 

हिन्दी दिवस के अवसर पर आज मैं लॉर्ड मैकाले की बात बताना चाहूँगी जो उन्होंने 2 फरवरी 1835 को ब्रिटेन की संसद में भारत के संदर्भ में कहा था,"भारत का विस्तृत भ्रमण करने पर मैंने पाया कि वहां एक भी व्यक्ति बेईमान नहीं है। लोगों के अंदर उच्च नैतिक आदर्श एवं चरित्र वहां के सामाजिक संरचना की पूंजी है जैसा कि मैंने और कहीं नहीं देखा। लोगों के मन में आध्यात्मिकता, धार्मिकता एवं अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति अटूट आस्था है । वे बड़े मनोबली हैं। लोगों के आपसी विश्वास एवं सहयोग की भावनाओं को तोड़ें बिना, उन्हें भ्रष्ट किए बिना भारत को जीतना और उसपर शासन करना असंभव है। अतः मैं प्रस्ताव रखता हूँ कि नई शिक्षा नीति बनाकर वहां की प्राचीन शिक्षा प्रणाली एवं संस्कृति पर हमला किया जाए ताकि लोगों का मनोबल टूटे, वे विदेशी खासकर अंग्रेजी और अंग्रेजियत को अपनी तुलना में महान समझने लगें। तब वही होगा जैसा कि हम चाहते हैं। अपनी संस्कृति और स्वाभिमान को खोया हुआ भारत पूर्णतः गुलाम और भ्रष्ट भारत होगा।" 

अपनी योजना के अनुरूप मैकाले ने ‘अधोगामी निस्पंदन का सिद्धांत’ (Downward Filtration Theory) दिया। जिसके तहत, भारत के उच्च तथा मध्यम वर्ग के एक छोटे से हिस्से को शिक्षित करना था। जिससे, एक ऐसा वर्ग तैयार हो, जो रंग और खून से भारतीय हो, लेकिन विचारों और नैतिकता में ब्रिटिश हो। यह वर्ग सरकार तथा आम जनता के मध्य एक कड़ी की तरह कार्य करे।

मैकाले खुले तौर पर धार्मिक तटस्थता की नीति का दावा करते थे, लेकिन उसकी आंतरिक नीति का खुलासा वर्ष 1836 में अपने पिता को लिखे एक पत्र से होता है। जिसमें मैकाले ने लिखा है कि,”मेरा दृढ़ विश्वास है कि यदि हमारी शिक्षा की यह नीति सफल हो जाती है तो 30 वर्ष के अंदर बंगाल के उच्च घराने में एक भी मूर्तिपूजक नहीं बचेगा।” ( गुगुल से साभार)

और यह सच हुआ। 14 सितम्बर को हम हिन्दी को क़ब्र से खोदकर बाहर निकालते हैं तथा कुछ आयोजन कर उसके गुणगान कर फिर कब्र में गाड़ देते हैं। अगर ऐसा न होता तो विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली चौथी भाषा को हम राष्ट्र भाषा के स्थान पर सुशोभित नहीं कर पाते क्योंकि अंग्रेजी में पले बढे लोगों को अपने देश की भाषा उसकी संस्कृति से कोई लगाव हो ही नहीं सकता।


वे यह भूल जाते हैं कि किसी देश की पहचान जैसे उसका राष्ट्रध्वज होता है, वैसे ही उसकी राष्ट्रभाषा होती है। अफ़सोस तो तब होता है ज़ब कोई विदेशी हमसे हिन्दी में बात करता है तो हम उसका उत्तर अंग्रेजी में देते हैं। आज अंग्रेजी पढ़े लिखों की भाषा तथा हिन्दी अनपढ़ो की भाषा मानी जाती है। अगर हमने अपनी मानसिकता नहीं बदली तो कितने भी हिन्दी दिवस मना लें, हिन्दी भाषा की स्थिति में कोई सुधार नहीं होने वाला।

अगर आपको अपनी और अपने देश की पहचान बनानी है तो आपको इसे स्वयं तो अपनाना होगा ही, दूसरों को भी अपनाने के लिए प्रेरित करना होगा। दशकों पूर्व भाषा के महत्व को समझाते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी ने लिखा था।


निज भाषा उन्नति अहै,

             सब भाषा को मूल॥

बिनु निज भाषा ज्ञान के,

           मिटे न हिय को शूल॥


आप चाहे जितनी भी भाषाएं सीखिए, बोलिये पर अपनी मातृ भाषा को मत भूलिए, अपनी पहचान न भूलिए।


जय हिन्दी, जय भारत


 हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं

🌹🌹





        ©सुधा आदेश 

 




Friday, June 2, 2023

एक प्रश्न


राहुल गाँधी देश के बाहर भी देश के लोकतान्त्रिक स्वरुप पर अंगुली उठा रहे हैं। पता नहीं उन्हें नरेन्द्र मोदी से नफरत है या उन्हें भारत का विकास अच्छा नहीं लग रहा है। देश से प्यार करने वाला कभी भी भारत जाकर देश की संस्थाओं की बुराई नहीं करेगा।

उनकी भारत जोड़ो यात्रा में भी राहुल गांधी का बार -बार सेना को दोष देना, आरएसएस तथा मोदी के दो दोस्तों को कोसना…वह भी ऐसे दोस्त जो लाखों करोड़ों को रोजगार दे रहे हैं, भारत की प्रगति में जिनका अमूल्य योगदान है को पिछले साथ वर्षों से कोसना समझ से परे है। इसके साथ ही पकोड़े बनाकर अपनी जीविका चलाने वालों के प्रति भी असंवेदनशील रवैया अपनाना क्या उचित है। उनका तथा उनके पेशे को. लांक्षित करना तो उचित नहीं, किन्तु जो चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए हों वे श्रम का. महत्व क्या जाने। शायद वे नहीं जानते कि इन मेहनतकश इंसानों में वह ताकत है कि वे रेत को भी सोना बना सकते हैं।


 जहाँ तक रोजगारी और मंहगाई का प्रश्न है वह सिर्फ भारत में ही नहीं पूरी दुनिया ही उससे परेशान है। समस्या का हल सुलझाने की बजाय सात वर्षों से वे एक ही रट लगाए हुए हैं। 


Wednesday, March 1, 2023

अन्चीहीं

 

अन्चीहीं


नीलांजना आज बेहद प्रसन्न थी। आज उसकी बेटी दिव्यांका एवं दामाद दीपेश विवाह के पश्चात् पहली बार घर आ रहे हैं। हफ्ते भर के लिये विभिन्न तरह के नाश्ते बनाकर रखने के साथ, आज रात्रि के खाने के लिये उसने दिव्यांका की पसंद की उड़द दाल की कचौड़ी, पनीर बटर मसाला की सब्जी के साथ, दीपेश की पसंद की आलू गोभी की सब्जी, दही बड़ा, वेजीटेबिल पुलाव तथा फ्रूट कस्टर्ड बनाने का भी इंतजाम किया है। दिव्यांका का कमरा भी उसकी  मनपसंद गुलाबी रंग की फूलदार चादर बिछाने के साथ,गुलाबी रंग के ही टॉवल बाथरूम में रख दिये हैं। यहाँ तक कि माली से बगीचे से गुलाबी रंग के गुलाब मँगाकर, उन्हें गुलदस्ते में सजाकर उसके कमरे के खिड़की के पास रखी मेज पर रख आई है।

दीपेश तो दो दिन रहकर चला जायेगा पर दिव्यांका पूरे एक हफ्ते रूकेगी। हनीमून के लिये वे पंद्रह दिन के यूरोप टूर पर गये थे। यद्यपि दिव्यांका जहाँ-जहाँ गई थी उन जगहों की फोटो वह उसके वाट्सअप पर भेजती रही थी किन्तु वह हर जगहों के अनुभवों  को उसके मुख से सुनना तथा उसकी आवाज की खुशी को महसूस कर, यह जानना चाहती है कि वह दीपेश के साथ खुश है या नहीं...। वैसे उसकी दीपेश के साथ दोस्ती दो वर्ष पुरानी है। उन्होंने दो वर्ष डेटिंग कर, एक दूसरे को समझकर, जीवन साथ बिताने का निर्णय किया है किन्तु विवाह के पूर्व स्त्री पुरूष सिर्फ प्रेमी रहते हैं जबकि विवाह के पश्चात् कर्तव्यों के मकड़जाल में फंसे, घर बाहर की जिम्मेदारी संभालते सिर्फ पति पत्नी...। एक माँ के रूप में वह जानना चाहती है कि पति बनने के पश्चात् दीपेश वैसा ही है या बदल गया है। 

अरे ! तुम भी क्या सोचने लगीं...। अभी तो महीना भर नहीं हुआ उनके विवाह को...और तुम सोलहवीं सदी की माँ  की तरह ससुराल से आई बेटी से खोद-खोदकर पूछने की सोच रही हो कि वह अपने इस रिश्ते से खुश है या नहीं...पर मन में विचारों का सैलाब थमने का नाम ही नहीं ले रहा था...    

चार वर्ष पश्चात् यह उसका पहला अवसर होगा जब दिव्यांका उसके पास इतने दिन रहेगी वरना जॉब के कारण उसे छुट्टी ही नहीं मिल पाती थी । वह घर भी आती थी तो वर्क फ़्रोम करते हुए व्यस्त ही रहा करती थी। आजकल आई.टी. वालों की यही तो मुश्किल है कहीं भी रहो टारगेट पूरा करने के लिये दिन रात लगे ही रहना पड़ता है। इस बार उसने विवाह के लिये महीने भर की छुट्टी ली है तथा अपने बॉस शलभ से भी कह दिया कि प्लीज सर, मुझे इस बीच कोई काम मत दीजियेगा। बॉस उसके काम से खुश था अतः उसने उसकी समस्या को समझते हुये, इस बार पूरी तरह से  आफिस के काम से दूर रखने की उसकी इच्छा को मान लिया था ।

दिव्यांका उसकी बेटी अवश्य है पर उसने सदा उससे मित्रवत व्यवहार रखा है। यही कारण था कि जब उसकी दीपेश से जान पहचान हुई तब भी उसने उससे कुछ नहीं छिपाया। उनकी डेटिंग  को एक वर्ष हो गया तब एक दिन उसने दिव्यांका से कहा था,  “बेटा, जब वह तुझे प्रपोज नहीं कर रहा है तब तू ही उससे पूछ ले, कहीं वह तुझे धोखा तो नहीं दे रहा है।” 

“ममा, मैं क्यों पूछूँ ? जब उसे हड़बड़ी नहीं है तो मैं क्यों अपनी बेसब्री दिखाऊँ । वैसे भी कुछ दिन हम एक दूसरे को और समझ लें फिर निर्णय लेंगे।” 

वह दीपेश से मिल चुकी थी । घर परिवार अच्छा था अतः उसे तथा नीरज को भी उनकी दोस्ती पर कोई आपत्ति नहीं थी किन्तु फिर भी माँ का दिल दिव्यांका से कह ही बैठा...

“बेटा, दोस्ती तक तो ठीक है पर उसके आगे मत बढ़ना, तुझे तो पता है हमारा समाज लड़के के अवगुणों पर ध्यान नहीं देता लेकिन अगर लड़की से भूल हो गई तो उसे सारी जिंदगी ताने सुनने को मिलते हैं ।” 

“माँ, हम अपनी जिम्मेदारी समझते हैं । हम ऐसा कुछ नहीं करेंगे जिससे आपकी बदनामी हो।”   

नीलांजना को अपनी बेटी पर पूर्ण विश्वास था। वे रूढ़िवादी नहीं थे। बच्चों को ज्यादा रोकना-टोकना उनके स्वभाव में नहीं था। उसका मानना था कि अगर बच्चों की कोई बात गलत लगे तो प्यार से समझाओ न कि डाँट-डपट कर। ज्यादा डाँटने से बच्चे सुधरते नहीं वरन् बिगड़ते ही हैं। उसने और नीरज ने बच्चों को सदा स्वतंत्र निर्णय के लिये प्रेरित किया। वे जानते थे कि  इससे न केवल बच्चों में आत्मविश्वास की वृद्धि होगी वरन् जीवन के रणसमर में आने वाली चुनौतियों का सामना भी भली प्रकार कर पायेंगे। समय के साथ चलना और स्वयं को बदलना उनके लिये ही नहीं हर इंसान के लिये श्रेयस्कर है तभी बच्चों के साथ तारतम्य बिठाया जा सकता है  किन्तु बच्चों को ऊँच-नीच समझाना माता-पिता को कर्तव्य ही नहीं, दायित्व भी है ।




अपनी इसी सोच के कारण उसने रात का खाना एक साथ बैठकर, बातें करते हुये खाने का नियम बना रखा था जिससे हम कुछ उनकी सुन सकें तथा कुछ अपनी सुना सकें। उनकी डायनिंग टेबिल सिर्फ खाने की टेबिल मात्र नहीं वरन् सभी सदस्यों के मिलन स्थल के साथ संवाद स्थल भी है। जहाँ वे खाना खाने के साथ, अपने दिन भर के अनुभव शेयर किया करते हैं शायद इसीलिये उसके दोनों बच्चे दिव्यांका और दिव्यांशु उससे अपने मन की हर बात कह लेते हैं। लगभग दो वर्ष की डेटिंग के पश्चात्, दीपेश ने जब उसे प्रपोज किया तब सबसे पहले दिव्यांका ने उसे ही बताया था। उन्होंने भी उसकी इच्छा का सम्मान करते हुये दोनों का विवाह धूमधाम से कर दिया था। आज बेटी दामाद के पहली बार घर आने पर वह बेहद खुश थी। 

दिव्यांका के स्वागत की इतनी उत्सुकता देखकर, उसके पुत्र दिव्यांशु ने भी उसे कहा था, “ ममा, आप तो दीदी के स्वागत की तैयारी ऐसे कर रहीं हैं जैसे दीदी-जीजू नहीं कोई वी.वी.आई.पी. आ रहे हैं।”

दिव्यांशु की बात सुनकर वह मुस्कराकर रह गई थी। अब वह उससे क्या कहती कि माँ के लिये पहली बार ससुराल से आती बेटी के लिये कैसी भावनायें होती हैं !! तू नहीं समझ पायेगा एक माँ का दिल...पुत्री से जुड़ाव...दिल पर पत्थर रखकर बेटी को विदा करती है माँ । आज जब वह कुछ दिनों के लिये आ रही है तब मैं उस पर अपनी सारी ममता उड़ेलना चाहती हूँ । वैसे भी दिव्यांशु की सदा से शिकायत रही थी कि मैं दिव्यांका को उससे ज्यादा चाहती हूँ । पता नहीं क्यों और कैसे उसे लगता था कि मैं दिव्यांका को कुछ नहीं कहती हूँ, बस उसे ही जब-तब टोकती-रोकती  रहती हूँ। हाँ, यह अवश्य है लड़की होने के कारण तीज त्यौहारों पर दिव्यांका की शापिंग उसकी तुलना में थोड़ी ज्यादा हो जाया करती थी। उसका यह दोषारोपण तब बंद हुआ जब दिव्यांका जॉब  करने मुंबई  चली गई ।    

अभी वह सोच ही रही थी कि नीरज आफिस के लिये तैयार होकर आ गये। उसने उन्हें नाश्ता परोसते हुये कहा,“दिव्यांका और दीपेश  की शाम चार बजे की फ्लाइट है। मैं उन्हें लेने जाऊँगी।”

“अरे, दिव्यांका ने कहा तो है कि वे कैब से आ जायेंगे । तुम क्यों परेशान होती हो?”  

“उसके कहने से क्या होता है...!! विवाह के पश्चात् वह पहली बार दीपेश के साथ घर आ रही है । हममें से किसी को तो उसे लेने जाना ही चाहिये।”

“तुम जैसा चाहो करो...आज मेरी अर्जेन्ट मीटिंग है, मैं छह बजे से पहले नहीं आ पाऊँगा।”

“हम छह बजे से पहले आ ही जायेंगे, अगर नहीं आ पाये तो घर की चाबी तो है ही आपके पास।”

“वह तो मुझे रखनी ही पड़ती है, पता नहीं तुम्हें कब कहाँ जाना पड़ जाये।” नीरज ने मुस्कराकर उठते हुये कहा।

नीलांजना ने नीरज के आरोप का कोई उत्तर नहीं दिया...वह बेवजह बात नहीं बढ़ाना चाहती थी। बच्चों के बड़े होने तथा नीरज के व्यस्त होने के कारण वह अपनी खुशी अपनी दोस्तों, किटी पार्टी में ढूँढने लगी है...। कभी देर हो ही जाती है।  बस यही बात नीरज के लिये ताना मारने के लिये काफी है किंतु इसके साथ ही वह इस बात को भूल जाते हैं कि उनकी अतिव्यस्तता के कारण, उनकी पत्नी ने घर बाहर की सारी जिम्मेदारी उठा रखी हैं। बच्चों की पढ़ाई, घर के राशन से लेकर बिजली का बिल, हाउस टैक्स, पानी का बिल वही तो भरती है। वह क्रेडिट एवं डेबिट कार्ड उसे थमाकर निश्चिन्त हो गये हैं । इस सबके बावजूद उसके आने में जरा सी देर होने पर उनकी भृकुटियों में बल पड़ना आम बात है। अब तो उसने इन सब बातों पर ध्यान देना ही बंद कर दिया है। सच जो बातें दिल को दुखी करें उनके बारे में क्यों सोचना !! वैसे भी इन छोटी-छोटी बातों के अतिरिक्त नीरज में कोई कमी नहीं है । वह उसे बेहद प्यार करते हैं । सच तो यह है कि थोड़ी नोक-झोंक के साथ प्रेम की चाशनी में डूबा उनका प्यार, खट्टे-मीठे रिश्ते का अहसास कराता हुआ अनमोल है। यही कारण है कि वह नीरज के बिना रहने की कल्पना भी नहीं कर सकती है । 

नीरज के आफिस तथा दिव्यांशु के कालेज जाने के पश्चात् नीलांजना ने अपना मनपसंद जगजीत सिंह की गजल का कैसेट लगा लिया तथा जल्दी-जल्दी रात्रि के खाने की तैयारी करने लगी । गाने सुनते-सुनते काम करने से उसे थकान नहीं होती थी। गाने उसके लिये हीलिंग थेरेपी हैं। देखते ही देखते तीन बज गये। फ्लाइट राइट टाइम थी। उसने जल्दी से घर बंद किया तथा कार निकालकर एअरपोर्ट के लिये चल दी।

नियत समय पर दिव्यांका और दीपेश आ गये...

“हाय ममा...।” कहकर दिव्यांका उसके गले से लग गई वहीं दीपेश ने उसके पैर छूकर अभिवादन किया।



दिव्यांका की आवाज में खुशी तथा चेहरे पर संतुष्टि पाकर उसका मन खिल उठा। बातें करते-करते एक घंटे का सफर कैसे निकल गया पता ही नहीं चला। घर के आहते में गाड़ी पार्क की ही थी कि नीरज और दिव्यांशु बाहर आ गये।  हाय हैलो के पश्चात् दिव्यांशु ने कार की डिक्की से सामान निकाला तथा लेकर चलने लगा। दीपेश ने जब उससे सामान लेना चाहा तो उसने विनम्रता से कहा, “जीजाजी आप मेहमान हैं।  आज मुझे अपनी सेवा को अवसर दें।”  कहकर उसने नीरजा की ओर देखा...मानो पूछ रहा हो ममा, मैं ठीक कर रहा हूँ  न । 

दिव्यांशु ने सामान उनके कमरे में रख दिया । दीपेश तो दिव्यांशु के साथ कमरे में गये किन्तु दिव्यांका उसके साथ ही किचन में लग गई। दिव्यांशु और दीपेश के आते ही गर्मागर्म चाय के साथ उसने खस्ता कचौड़ी और अन्य सामान परोस दिया।

“खस्ता कचौड़ी आपने बनाई हैं!! बहुत ही टेस्टी हैं।”  एक टुकड़ा खाकर दीपेश ने उसकी ओर देखते हुये पूछा।  

“माँ, बहुत अच्छी खस्ता कचौड़ी  बनाती हैं।” दिव्यांका ने कहा।

नीरज यद्यपि दीपेश से पहले भी मिल चुके थे पर आज जितनी बातें पहले नहीं हुई थीं। देश विदेश के साथ और भी अन्य तरह की बातें होतीं रहीं। वे बेहद खुश थे। यही हाल दिव्यांशु का था। जब दिव्यांका अपने यूरोप टूर के बारे में बता रही थी तब दिव्यांशु ने कहा, “दीदी आपने इतनी अच्छी तरह हमें अपने ट्रिप  के बारे में बताया कि मुझे लग रहा है कि आपके साथ मैं भी यूरोप घूमकर आ रहा हूँ।”

जब दिव्यांका ने उसे यूरोप से उसके लिये खरीदा शर्ट और जींस के साथ परफ्यूम दिया तो वह खुशी से उछल ही पड़ा। वह उसके लिये भी एक पर्स तथा अपने पापा के लिये शर्ट लेकर आई थी। खाने का समय हो गया अतः नीलांजना खाना परोसने लिये उठी। उसे उठते देखकर दीपेश और दिव्यांका खाने के लिये मना करने लगे। 

“बेटा, जितना मन हो खा लो। तुम्हारी ममा ने बहुत मन से बनाया है।” उनकी आनाकानी सुनकर नीरज ने कहा।  

खाने में अपनी मनपसंद का खाना देखते ही दोनों के चेहरे खिल उठे। थोड़ी देर पहले खाने के लिये मना करने वाले दीपेश और दिव्यांका ने मन से खाना खाया। दीपेश तो हर चीज की प्रशंसा कर रहा था। उसे ऐसा करते देखकर नीरजा को बहुत अच्छा लग रहा था वरना चाहे जितना ही अच्छा खाना बना लो, पुरूषों के मुख से प्रशंसा के दो शब्द  निकलते ही नहीं हैं। खाते-पीते बातें करते हुये रात के ग्यारह बज गये। अंततः सब आराम करने के लिये उठ गये।

“माँ आपने अकेले इतना सब किया थक गई होंगी।” दिव्यांका ने रात्रि में किचन सिमटवाते हुये उससे कहा।

“बेटा, बच्चों के लिये कुछ भी करने में माँ कभी नहीं थकती । जब तू माँ बनेगी तब मेरी बात को समझ पायेगी।”

“माँ मुझे अभी इस झंझट में नहीं पड़ना...मुझे अभी जिंदगी जी लेने दो।” दिव्यांका ने कहा।   

“ठीक है बेटा... जैसा तुम्हारा मन हो करना पर यह मत भूलना समय पर ही सब अच्छा लगता है...। मातृत्व से ही स्त्री के स्त्रीत्व को पूर्णता मिलती है । खैर इन बातों को छोड़, तू खुश तो है न।” नीलांजना ने उसकी आँखों में देखते हुये कहा।

“हाँ माँ...मैं दीपेश के साथ बहुत खुश हूँ। वह बहुत केयरिंग है...सबसे बड़ी बात यह रही कि  इन दिनों हमें कोई काम का कोई टेंशन नहीं रहा।” 

“हर वक्त काम ही काम...सच आज की पीढ़ी तो जाना ही भूल गई है।” नीलांजना ने गहरी श्वास लेते हुये कहा।  

“ममा, एक बात कहूँ, आप बुरा तो नहीं मानेंगी।” 

“तेरी बात का कभी बुरा माना है जो आज मानूँगी...कह, क्या कहना चाहती है।”

“ममा, हमारा प्रोग्राम थोड़ा चेंज हो गया है। दीपेश की माँ की तबियत ठीक नहीं चल रही है। दीपेश ने मुझसे कुछ कहा तो नहीं है किन्तु मुझे लगता है मुझे भी दीपेश के साथ उसके घर जाना चाहिये। तुम तो जानती ही हो वह अकेली रहतीं हैं। अब उस घर के प्रति मेरी भी जिम्मेदारियाँ हैं। अगर आवश्यकता हुई तो हम उन्हें अपने साथ मुंबई  ले जायेंगे।” 

“क्या...? मैं तो सोच रही थी कि तू पंद्रह दिन मेरे पास रूकेगी...। हम खूब घमेंगे फिरेंगे...ढेरों बातें करेंगे।”  नीलांजना स्थिति की गंभीरता को समझे बिना कह गई।

“चाहती तो मैं भी थी ममा, पर क्या करूँ परिस्थितियाँ ही कुछ ऐसी निर्मित हो गईं हैं...। सॉरी ममा, मैं फिर आपके पास आकर रहूँगी । वैसे भी आप ही तो कहा करती हैं कि विवाह के पश्चात् लड़की के लिये ससुराल फ़र्स्ट होनी चाहिये तथा मायका बाद में।” कहते हुये दिव्यांका ने उसकी ओर देखा।

लेकिन तू अपने जॉब और उनकी सेवा में तारतम्य कैसे बैठा पाएगी...शब्द मुंह से निकालने ही वाले थे कि उसके अन्तर्मन की आवाज ने  उन्हें मुंह में ही रोक लिया...उसका अन्तर्मन कह उठा...तुमने अपनी ननद शिवानी की लड़की नंदिता को नहीं देखा। .उसकी सास को अल्जाइमर की बीमारी हो गई है। वह अपना कुछ काम नहीं कर पातीं हैं अतः उसने उनके लिये चौबीस घंटे की आया एक एजेन्सी से लेकर उनकी देखरेख के लिए रखी हुई है। वह उनका काम ठीक से कर रही है या नहीं, इसके लिये उसने उनके कमरे में सी.सी.टी.वी.लगवाकर उसे अपने मोबाइल से कनेक्ट कर दिया है। जब वह घर में रहती है तब तो वह उनकी निगरानी करती ही है आफिस में सी.सी.टी.वी.द्वारा उनकी निगरानी करती रहती है जिससे उनकी कामवाली अपने काम में कोई कोताही न कर पाये। अरे ! आज के बच्चे जहाँ दिन रात मेहनत करके पैसे कमा रहे हैं वहीं जिंदगी को जीना भी जानते हैं और अपने कर्तव्यों को निभाना भी...। कुढ़ना और दोषारोपण करना उनका स्वभाव नहीं रहा है...अंतर्मन की आवाज सुनकर नीलांजना ने अपने मन के विचारों को झटका था तथा दिल पर पत्थर रखकर, दिव्यांका की मनःस्थिति समझते हुये, उसके  कंधे थपथपाते हुये  कहा,“सच कह रही है तू बेटा...अब वह भी तेरा घर है । जैसा तू ठीक समझे कर...।” 

“कुछ और तो नहीं करना ममा, अब मैं चलूँ, दीपेश मेरा इंतजार कर रहे होंगे।” दिव्यांका ने काम समाप्त होने पर कहा ।

“हाँ जा...अब मैं भी आराम करना चाहती हूँ।” कहते हुये थोड़ी देर पहले उर्जा से ओत-प्रोत नीलांजना के चेहरे पर थकान झलकने लगी थी ।

“गुड नाइट ममा...।” कहते हुये दिव्यांका उसके गले लगी ।

“गुड नाइट बेटा, स्वीट ड्रीम।” बचपन की तरह उसने दिव्यांका के माथे पर चुम्बन अंकित करते हुये कहा ।

दिव्यांका के जाते ही अपने कमरे में जाते हुये नीलांजना सोच रही थी अब उसे भी व्यवहारिक बनना पड़ेगा । दिव्यांका को अपने मोह के जाल से मुक्त करना होगा तभी वह अपने घर परिवार में खुश रह पायेगी । वैसे भी जो मोह व्यक्ति को कर्तव्यविमुक्त कर दे वह मोह नहीं बेड़ियाँ बन जाता है। उसे खुशी थी कि उसके दिये संस्कार उसकी बेटी में जिंदा हैं किन्तु फिर भी आज उसे अपनी बेटी अन्चीन्हीं लग रही थी ।  

  सुधा आदेश  

                

 

  

  

     


Wednesday, September 14, 2022

सबसे प्यारी भाषा -हिन्दी

 



सबसे प्यारी भाषा


ह से हिन्दी

द से देश

सबसे प्यारा देश हमारा 

सबसे प्यारी भाषा।


अनेकों भाषाएं

विभिन्न धर्मावलंबी

एक सूत्र में जो बांधे

भारत माँ के भाल शोभा हिन्दी।


सहज़, सरल भाषा हिन्दी

मुख में मिठास घोले,

दिल में बसे ऐसे

पूजा का दीप जैसे।


शब्द सामर्थ्य,मुहावरे,

लोकोत्तियों से भरपूर

जन-जन को भाये

दूर अपनों से न कभी जाये।


हिन्दी बोलें, लिखें

प्रण आज करें हम 

सीखें विश्व की हर भाषा 

नाज हिन्दी पर करें हम ।


हिन्दी दिवस की शुभकामनायें


©सुधा आदेश



Thursday, July 7, 2022

 




 

 

अभिशप्त

 

            धड़ाम...धड़ाम...धड़ाम... नए बनते फ़्लाईओवर का आधा हिस्सा टूटकर गिरने के साथ ही कोहराम मच गया। सुधिया, बबुनी, वीरू, रामू, सरस्वती, दीपू,  फुलवा, श्यामू,रामलोचन नाम वातावरण में गूँजकर दहशत फैलाने लगे थे। सभी अपनों को खोज रहे थे। जितने लोग उतनी आवाजें...उससे भी ज्यादा दर्दनाक थी लोगों की चीखने,चिल्लाने और कराहने की आवाजें...। जिनके अपने मिल गए थे उनकी आँखों में ख़ुशियाँ थीं तथा जिनके अपने नहीं मिले थे, उनकी आँखों के आँसू उनके दर्द को बयान करते-करते धीरे-धीरे सूखने लगे थे, रह गई थी उनके चेहरे से झलकती चिंता, उनके दिल में व्याप्त दहशत, एक दर्दनाक खामोशी,आगत की चिंता एवं डर...।   

            ठेकेदार तथा उसके आदमी पीड़ित व्यक्तियों को मलबे से बाहर निकालने में सहायता करने की बजाय इस घटना में अपनी गर्दन फँसती देखकर,डर के कारण भाग गए थे। कोई अन्य उपाय न देखकर, बचे मजदूरों ने ही मलबे में दबे अपने मजदूर साथियों को बचाने का कार्य प्रारंभ कर दिया। किसी तरह से वे सरिया, मिट्टी,गारा हटाने का प्रयास कर रहे थे। जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा था...। कोई सरकारी सहायता न आने के कारण उनमें रोष भी व्याप्त होने लगा था। इसके साथ ही लोगों के अधिक संख्या में मरने की आशंका भी बढ़ती जा रही थी। उधर ठेकेदार तथा उसके आदमी इंजीनियर साहब के घर बैठे मजदूरों की चिंता छोड़कर, अपनी आगे की रणनीति पर विचार विमर्श कर रहे थे। दरअसल ठेकेदार और इंजीनियर को इस घटना में अपनी गर्दन फंसती नजर आ रही थी। वे लोग शहर के नामी वकील को बुलवाकर अग्रिम जमानत करवाने की जुगत में लगे हुए थे ।

            पिछले 2 वर्षों से इस पुल के निर्माण का कार्य चल रहा था पर पुल था कि बनने का नाम ही नहीं ले रहा था। कभी फंड का अकाल पड़ जाता तो कभी पुल का कोई हिस्सा टूटकर गिर जाता था। ऐसा होता देखकर कोई कहता कि इस पर किसी देवी देवता का प्रकोप है तभी पुल बार-बार टूट जाता है। कोई कहता लगता है शुभ साइत देखकर, इस पुल का निर्माण प्रारंभ नहीं किया गया है। वहीं दूसरा कुछ अपनी समझदारी दिखाते हुए कहते...अरे भाई, पल पर किसी देवी देवता का प्रकोप नहीं है। इस पुल का बार-बार टूटकर गिरना इंसानी राक्षसों की करतूत है जो कमीशन खोरी के चक्कर में, सीमेंट की जगह बालू भर रहे हैं।

            पुल के ढहने की  खबर आग की तरफ फैलने के बावजूद कोई रेस्क्यू टीम तो नहीं आ पाई पर मीडिया कर्मी तुरंत पहुँच गए। लोगों के दुख दर्द से बेखबर वे इस खबर को ऐसे पेश करने लगे जैसे यह कोई दुर्घटना नहीं वरन उनके न्यूज़ चैनल की टी.आर.पी.बढ़ाने के लिए कोई बढ़िया चटपटा मसाला है।


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2-

            “ माँजी, आप ऐसे क्यों रो रही हैं ? क्या इस हादसे में आपका अपना भी कोई फंसा है ?” न्यूज़ चैनल के एक रिपोर्टर ने एक रोती बिलखती महिला के पास जाकर पूछा।

            “ हाँ बचवा, बबुआ के बाबा नाहीं मिलल रहे हैं ।” उसने रोते हुए कहा।

            “ जरा इधर देखते हुए फिर से कहो...। ” उसने कैमरे की तरफ इशारा करते हुए उस महिला से पुनः कहा।  मानो उसे उस महिला के दर्द से अधिक, उसके चेहरे को अपने टी.वी. चैनल पर दिखाने फिक्र की अधिक  हो। 

            उस स्त्री ने अपनी बात पुनः दोहराई। तुरंत ही कैमरा घुटनों में मुँह छुपाए बूढ़े की ओर घूम गया …

            “ बाबा, आप चुप क्यों हैं ? क्या आपका भी कोई इस दुर्घटना में नहीं मिल रहा है ?” रिपोर्टर ने उससे प्रश्न किया।

            “ हाँ बचवा,  मेरी पोती फुलवा नहीं मिल रही है।” दर्द भरे स्वर में कहते हुए उस बूढ़े व्यक्ति ने अपना चेहरा थोड़ा ऊपर उठाया।   

            “कितनी उम्र रही होगी उसकी ?”

            “ 14 साल…।”

            “14 साल यानी नाबालिग...।” रिपोर्टर ने कैमरे के सामने देखते हुए कहा।  

            “ कितना देते थे उसे ?”रिपोर्टर ने पुनः उस बूढ़े व्यक्ति की ओर मुखातिब होकर पूछा।

            “कभी 200 या 300 रुपए...काम के हिसाब से मजूरी  मिलत रही। वह हमारा एकमात्र सहारा रही, अब हम उसके बिना कैसे जिएंगे?” कहते हुए उसकी आँखों से आँसू टपकने लगे।

            दुख के समय सांत्वना के दो बोल इंसान को हौसला देते है किन्तु रिपोर्टर के शब्दों में सांत्वना नहीं वरन अपनी डियूटी पूरी करने की भावना प्रबल थी...शायद इसीलिए उसने अपनी रिपोर्ट ऐसे पेश की...      

            “ देखा आपने...यहाँ नाबालिग बच्चों से भी काम लिया जाता है  किन्तु  मजदूरी कम दी जाती है।”

             तभी एक औरत के रोने की आवाज सुनकर, उस मीडियाकर्मी का ध्यान उस औरत की ओर गया । वह अपनी छाती पीट-पीटकर रोती हुई कह रही थी…

            “ इन मरदूदों ने 300 -400 रुपल्ली के लिए मेरी सरस्वती की जान ले ली ।”

            “ माँजी, सरस्वती कौन थी आपकी ?” रिपोर्टर ने माइक उसके मुंह के सामने रखते हुए पूछा।  

            “अरे बेटा, सरस्वती मेरी बहू थी...मेरा सहारा थी...। मेरा बेटा तो कुछ करता नहीं है...निखट्टू है...। मुझसे मेरी सांस की बीमारी के कारण अब कुछ नहीं हो पाता है। उसी के दम पर घर चल रहा था। अब अगर सरस्वती नहीं रही तो हम सबकी भूखों मरने की नौबत आ जाएगी।” कैमरे को देखकर वह और भी जोर-जोर से रोने लगी।

            सरस्वती की सास का दुख दिखाने के पश्चात कैमरा कई और लोगों की तरफ और घूमा तथा रिपोर्टर ने टी.वी. न्यूज़ कुछ इस तरह से पेश की...अभी-अभी आपने इतने बड़े हादसे को देखा।  किसी का पति, किसी का भाई, किसी की बेटी तो किसी की बहू इस हादसे में फंसे हैं। सभी बेहद परेशान और दुखी हैं। 5 घंटे बीतने के पश्चात भी अभी तक कोई सरकारी सहायता इन बेबस और बेसहारा मजदूरों तक नहीं पहुँच पाई है। लगभग 15 मजदूर लापता हैं। धीरे-धीरे उनके बचने की उम्मीद भी कम होती जा रही है। हमारे मजदूर भाई ही अपने मजदूर भाइयों की जान बचाने में लगे हुए हैं लेकिन सरकारी महकमा अभी भी चैन की नींद सो रहा है।


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3-

            टी.वी. पर इस घटना की न्यूज़ फ्लैश होते ही प्रशासन की नींद खुली। एक दूसरे पर आरोप मढ़ते हुए अंततः रेस्क्यू टीम भेजी गई। इसके साथ ही अधिकारियों का एक दल स्थिति का जायजा लेने के लिए घटना स्थल की ओर रवाना हुआ। इधर मजदूर यूनियन वाले घटना स्थल पर एकत्रित होकर बयान बाजी करते हुए प्रशासन को कोस रहे थे। अफसरों के आते ही उन्होंने   मुर्दाबाद के नारे लगाने प्रारम्भ कर दिये। जब तक रेस्क्यू टीम पहुँची तब तक मजदूरों तथा आसपास के गाँव के कुछ युवकों के सम्मिलित प्रयास से 3 शव तथा 5 घायल मजदूर निकाले जा चुके थे। एंबुलेंस आ चुकी थी। घायलों को तुरंत पास के अस्पताल में शिफ्ट करने का प्रयास किया जाने लगा।

            शवों को देखते ही भीड़ लग गई। वीरू का क्षत-विक्षत शव देखते ही बुधनी गश खाकर गिर पड़ी तथा उसके शव से चिपककर फफक-फफककर  रोते हुए बोली, “ मुझे किसके सहारे छोड़कर चले गए तुम, अब मैं तुम्हारे बिना कैसे जिऊंगी...इस बच्चे को कैसे पालूंगी ?”

            उसकी छाती से चिपका उसका 2 वर्षीय बेटा भी माँ को रोता देखकर रोने लगा …

            “धीरज धर बहन, जो हुआ, सो हुआ...कम से कम अपने बच्चे को तो देख, जो तुझे रोता देखकर रो रहा है।” उसे रोता देखकर उसके पास आकर एक औरत ने उसे संभालते हुए कहा। 

            बुधनी जैसा ही हाल सरस्वती की सास कमला का था जो अपनी बहू के शव को देखकर पागल सी हो गई थी। वह छाती पीटकर रोते-रोते बार-बार यही दोहराए जा रही थी, “मुऐ राक्षसों ने 300 -400 रुप्पली के लिए मेरी सरस्वती की जान ले ली है। इन्हें कभी चैन न मिले, कीड़े पड़ें, कुत्ते की मौत मरें। हे भगवान! तूने ये क्या किया,तू ही बता अब हम कैसे जीयेंगे?”

            जबकि कमला का बेरोजगार बेटा रामू वहीं बैठा टुकुर-टुकुर सबको निहारे जा रहा था। अभी इनकी चीत्कार रुकी भी न थी कि एक और शव आ गया...उसे देखकर उसके बूढ़े दादा की सांसें जैसे थम ही गईं...। वह उसके पार्थिव शरीर को  गोद में लेकर फफक-फफक कर रोते हुए बोल उठा,“ सुधिया…मेरी बच्ची...तू मुझ अकेले को छोड़कर कहाँ चली गई…? एक तू ही तो मेरे जीने का सहारा थी। तेरे माँ बापू तुझे मुझे सौंप कर गये थे। मैं भी कितना अभागा हूँ जो मैं उनकी अमानत नहीं संभाल पाया। ना जाने इन बूढ़ी आँखों को क्या-क्या देखना और बदा है!! कहाँ तो मैं सोच रहा था कि तेरे हाथ पीले कर डोली में विदा  करूँगा और अब यह हादसा...!! हे भगवान! तू मुझे भी उठा ले। सुधिया के बिना अब मैं कैसे जीऊँगा ?” 

             बेबस और बदनसीब लोगों के रुदन से आस-पास खड़े सभी लोगों की आँखों में आँसू आ गए थे। होनी को कौन टाल सकता है...कहकर लोग पीड़ित व्यक्तियों को समझा रहे थे। रस्मी तौर पर समझाना सिवाय झूठी तसल्ली देने के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता।  वैसे भी जिसका कोई अपना जाता है, उसका दुख उसके सिवाय अन्य कोई समझ ही नहीं सकता है। पीड़ित व्यक्ति को तो अपना पूरा जीवन बिखर गया प्रतीत होता है। ऐसे क्षणों में अपने आत्मीय से बिछड़ने के दुख के साथ-साथ उसे अपने बचे जीवन को समेटने की चिंता अलग परेशान करने लगती है। 

            बुक्का फाड़कर रोती औरतों और बच्चों को देखकर जहाँ लोग गमगीन थे वहीं घायलों की कराह तथा उनके रिश्तेदारों की उन्हें शीघ्र अस्पताल पहुँचाने की गुहार वातावरण को गमगीन बनाए जा रही थी। बड़ा ही हृदय विदारक दृश्य था। 


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4-

            रेस्क्यू कार्य जारी था...छोटे बड़े सभी अधिकारी वहाँ पहुँच गए थे। स्थिति काफी गंभीर थी।  लगभग 10 घंटे के अथक प्रयास के पश्चात मलबे में फंसे सभी जीवित और मृत व्यक्तियों को  निकाल लिया गया था।  घायलों को अस्पताल पहुँचाने की व्यवस्था की जा रही थी वहीं मृत व्यक्तियों के दाह संस्कार की व्यवस्था भी सरकारी अधिकारी ही कर रहे थे। लोगों का क्रोध और अधिक न भड़के इसलिए प्रशासन की ओर से मृतकों के परिवारों को 10,000 रुपए तथा घायलों के परिवार वालों को 5,000 रुपए सहायता राशि के रूप में दिए जाने के साथ ही हफ्ते भर का खाने का भी सामान भी आनन फानन में पीड़ित परिवारों को दिये जाने की व्यवस्था की गई।  

             यूनियन लीडरों को मजदूरों में अपनी धाक जमाने के साथ, उन्हें अपनी उपस्थिति का एहसास भी दिलाना था। वैसे ऐसे मौकों पर ही तो उनकी लीडरी काम आती है। कुछ खाने पीने को मिलता है अतः उन्होंने मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए प्रशासन की ओर से मृतकों के परिवार को दो लाख रुपए तथा घायलों के परिवार वालों को पचास हजार रुपए मुआवजा राशि देने की माँग कर डाली। यूनियन लीडरों की सरकार से की इस मांग को सुनकर दुखी चेहरों पर थोड़ी शांति झलकी, वहीं कई अन्यों के चेहरों पर असंतोष व्याप्त हो गया।

            इस घटना के कारण हफ्ते भर से काम बंद था जिसके कारण मजदूरों को मजदूरी भी नहीं मिल रही थी। यह इस प्रोजेक्ट में काम करने वाले मजदूरों की ही नहीं, हर प्रोजेक्ट में दैनिक भत्ते पर गुजारा करने वाले मजदूर की यही हालत थी। काम नहीं तो मजदूरी नहीं। चाहे यह स्थिति मजदूरों की अपनी बीमारी की वजह से हो या ठेकेदारों के वक्त-बेवक्त काम रोक देने की वजह से हो...।

            इस बुरे वक्त में इस प्रोजेक्ट में काम करते एक मजदूर सलीम के बेटे को बुखार आ गया। काम रुकने तथा धीरे-धीरे खत्म होते पैसों के कारण वह अपने बुखार से पीड़ित बच्चे का उचित इलाज नहीं करवा पा रहा था। उचित इलाज के अभाव में अपने बच्चे को तड़पता देखकर वह दुखी स्वर में बोला,“ या अल्लाह! इससे तो तू मुझे उठा लेता। कम से कम मेरा बच्चा तो उन अभावों में नहीं पलता जिनमें मैं पला ।”

            उसकी पत्नी फरजाना ने उसकी बात सुनी और निर्विकार भाव से बुखार से तड़पते अपने बच्चे कासिम को गोद में उठाकर उसके माथे पर ठंडे पानी की पट्टी रखने लगी ।

             यह वही फरजाना थी जिसने कभी सलीम के साथ जीवन के हर सुख-दुख में जीने मरने की कसमें खाई थीं । घर चलाने के लिए उसके कंधे से कंधा मिलाकर ईंट गारा भी ढोया था पर जब से कासिम उसकी गोद में आया था तब से वह असंतुष्ट रहने लगी थी। शायद वह बच्चे के भविष्य को लेकर सशंकित हो चली थी । तभी बात-बात पर झगड़ा करना, बात-बात पर असंतोष जाहिर करना उसका स्वभाव ही बनता जा रहा है। अपनी इसी मनोवृति के कारण वह इस समय सलीम की बात का प्रतिकार नहीं कर पाई थी वरना पहले यदि मजाक में भी वह ऐसी बात कहता था तो वह उसके मुँह पर हाथ रखते हुए कहती थी...“ या अल्लाह !  मरे आपके दुश्मन,मैं तो सदा रब से यही दुआ माँगती हूँ कि वह आपसे पहले मुझे ही उठाए...। ”


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5-

            यह मानव स्वभाव  है कि परिस्थितिजन्य  कठिनाइयों या भीषण दुख के क्षणों में इंसान स्वयं को चाहे कितना भी कोस ले पर दूसरे से सहानुभूति चाहता है...। आज अपनी विवशता पर, अपनी अर्धांगिनी को चुप देखकर सलीम का दिल रो उठा और वह बिना कुछ कहे ही घर से निकल गया। जेब टटोली, उसमें बीस रुपये पाकर उसे लगा कि इतने रुपयों से क्या होगा ? उसने सोचा कि वह शिवा से उधार माँगकर देखे, आखिर बच्चे की दवा तो लानी ही होगी। उसे पिछले चार दिनों से ज्वर है। एक दो दिन तो वह यह सोचकर चुप लगा गया था कि मौसमी बुखार है, स्वयं ठीक हो जाएगा पर कल रात से वह मासूम तेज ज्वर से तड़प रहा है। अब भी अगर वह ढंग से इलाज नहीं करवाया पाया और खुदा न ख्वासता अगर कोई अनहोनी घट गई तो वह फरजाना से तो क्या स्वयं से भी नजरें नहीं मिला पाएगा...। उसके कदम शिवा  के घर की ओर मदद की उम्मीद में चल पड़े ।

            अभाव जहाँ इंसान को बुरी तरह तोड़ कर रख देते हैं वहीं कभी-कभी अभाव इंसान की इंसानियत, संवेदनाओं एवं भावनाओं को सूक्ष्मीकृत कर मुर्दा बना डालते हैं...। तभी तो कल तक जिनकी आँखों में आँसू थे उन्हीं में आज मुआवजे की राशि की बात को सुनकर, भविष्य की आशाओं के स्वप्न तिर आए थे।  

            सरस्वती की सास कमला सोच रही थी कि भगवान सरस्वती की आत्मा को शांति दे। जाते-जाते भी वह हमें स्वर्ग दे गई । इतने रुपयों से तो हमारे सारे दुख दर्द दूर हो जाएंगे । इन रुपयों से मैं रामू को ऑटो रिक्शा दिलवा दूँगी फिर तो उसके लिए लड़कियों की लाइन लगते देर न लगेगी। मैट्रिक पास होने के कारण ही तो वह ईट गारा नहीं ढोना चाहता...ऑटो चलाने में तो उसे कोई शर्म नहीं आएगी।

            “ हे भगवान! अगर इतना रुपया मिल गया तो मैं अपने बेटे कृष्णा को अच्छे इंग्लिश स्कूल में पढ़ाऊंगी ।  वह ऑफिस में नौकरी करेगा न कि मेरे और अपने पिता के समान ईंट, गारा ढोएगा । मैं इन पैसों में से कुछ पैसा बैंक में जमा करा दूँगी तथा कुछ पैसों से एक ढाबा खोल लूँगी जो कि इसके पिता वीरू का सपना था । इन रूपयों से वह न केवल वीरू के सपने को पूरा करेगी वरन कृष्णा को भी अच्छे स्कूल में पढ़ाकर बड़ा आदमी बनायेगी। वह अपने माता-पिता का नाम रोशन करेगा। ” बुधनी ने मन ही मन सोचा। कल तक जिन आँखों में चिंता के बादल झिलमिला रहे थे,आज उन्हीं आँखों में अपने सुनहरे भविष्य की चमक दिखाई देने लगी थी ।

            यही हाल सुधिया के बाबा का था। इतनी राशि मिलने की बात सुनकर, वह दूधिया के जाने का गम भूलकर, सोच रहे थे कि इतने रुपयों को वे कहाँ रखेंगे !! उन्होंने तो कभी एक हजार भी नहीं देखे...। दो लाख...बाप रे, इतने रुपए वह कहाँ और कैसे सहेजेंगे...कहाँ उसे खर्च करेंगे...? उन्हें संतोष था तो सिर्फ इतना कि कम से कम अब उन्हें अभाव में नहीं जीना पड़ेगा। उनका बुढ़ापा सुधर जाएगा ।

            आठ-दस दिनों में सब शांत हो गया...। प्रशासन ने दो लाख रुपये तो नहीं पर मृतकों के लिए एक लाख रुपये तथा घायलों के लिए पच्चीस हजार रुपये की राशि सहायता राशि अवश्य स्वीकार कर  ली। यूनियन के नेता मुआवजे की राशि पीड़ित व्यक्तियों को दिलवाने का श्रेय स्वयं ले रहे थे । लेते भी क्यों नहीं, आखिर उनकी वजह से ही मजदूरों को इतना पैसा मिल रहा है वरना उनको कौन पूछता । सभी  लोग यह सोचकर उनके आगे नतमस्तक थे कि चलो जितना मिल पा रहा है, बहुत है । मुआवजा राशि मिलने कि सूचना ने गमगीन चेहरों पर थोड़ी मुस्कान तो ला दी थी । उनके लिए तो इतना भी बहुत था । वहीं जिन मजदूरों का अपना कोई नहीं था उनके भी ढेरों रिश्तेदार निकल आए थे जो इस मुआवजे की रकम पर अपना दावा ठोकने लगे थे ।


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6-

            पुल का जो काम इतने दिनों से रुका हुआ था वह फिर चल निकला। महीना बीता, दो  महीने बीते पर मुआवजे की राशि अब तक किसी को नहीं मिल पाई। जब भी मजदूर शिकायत लेकर यूनियन नेताओं के पास जाते तो उनका एक ही जवाब होता...धीरज रखो, सरकारी काम में तो देरी होती ही है । वैसे भी सब कुछ इतना आसान थोड़े ही होता है । कुछ सर्टिफिकेट बनवाने पड़ेंगे ...आखिर यह तो सिद्ध करना ही पड़ेगा कि बुधनी वीरू की पत्नी है या सुधिया बालिग थी ।  सरस्वती, कमला की बहू या रामू की पत्नी थी...उनकी बात सुनकर वे लोग लौट जाते ।

             धीरे-धीरे छह महीने गुजर गए। समय के साथ दिल के जख्म भरने लगे थे...। मुआवजे की रकम मिलती न देख, सरकारी वायदे खोखले होते हैं, सोचकर वे सब फिर अपने-अपने कामों में लग गए थे।  वैसे भी उन जैसे गरीब अपनी  फरियाद लेकर जाते भी तो कहाँ जाते?  वे तो दैनिक भत्ते से गुजारा करने वाले गरीब मजदूर हैं जिन्हें पेट भरने के लिए हर दिन रोटी की चिंता रहती है। दिन भर खटने के बाद मामूली रकम उनके हाथ में ऐसे थमा दी जाती है मानो वे उन पर एहसान कर रहे हैं। यहाँ तक बीमारी में भी इन्हें दवा के लिए पैसे मिलने तो दूर, किसी की सहानुभूति भी नहीं मिलती है। ऐसा करते हुए ये अमीर लोग  यह भूल जाते हैं कि जिन गरीब मजदूरों की मेहनत पर वे ऐश कर रहे हैं वे नींव के ऐसे पत्थर हैं जिनकी वजह से ही कोई इमारत बुलंदियों को छूती है पर इस बात का इन्हें श्रेय देना तो दूर, किसी को भी इस बात का एहसास भी नहीं होता है...।

            आठ महीने पश्चात यूनियन लीडर राघवेंद्र का संदेश लेकर एक आदमी आया कि पीड़ित व्यक्तियों को साहब ने अपने डेरे पर बुलवाया है । आशा की किरण लेकर सभी लोग खुशी-खुशी उसके डेरे पर गये।  उन्होंने घायलों को पाँच-पांच हजार तथा मृतकों के परिवार वालों के हाथों में बीस- बीस हजार पकड़ाये। मजदूरों ने जब इतनी कम राशि मिलने का कारण पूछा तब तथाकथित हितेशी राघवेंद्र ने बेरुखी से कहा, “ क्या प्रमाण पत्र ऐसे ही बन जाता है? नीचे से लेकर ऊपर तक सबको खिलाना पड़ता है। तुम लोगों के इस काम के लिए हमें कहाँ-कहाँ नहीं जाना पड़ा,किस-किस के सामने नाक रगड़नी पड़ी, तुम क्या जानो! अब इधर-उधर आने जाने, खाने-पीने का खर्चा भी तो इसी मुआवजे की राशि में से ही निकालना पड़ेगा।  वैसे भी इतना पैसा मिल गया, गनीमत समझो...। यह हम सबकी मेहनत का फल है वरना सरकारी खजाने से पैसा निकालना इतना आसान नहीं होता ।”


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7-

             इतनी कम राशि पाकर सभी मजदूरों की उम्मीदों पर पानी फिर गया था । सब जानते थे कि पैसा कहाँ गया ? उन्हीं के पैसों से तो इनकी लीडरी चलती है...। वे तो उन कीड़े-मकोड़ों की तरह हैं जिन्हें रौंदते हुये हाथी चला जाता है। झुंड में होने के बावजूद भी बेचारी कमजोर चीटियां उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ पातीं। जब अपनी किस्मत ही फूटी हो तो दोष दें भी तो किसे दें !!

            घायलों में कुछ अपाहिज हो गए थे। रामू का तो घुटने के नीचे से पैर ही काटना पड़ गया था वहीं दीपू का हाथ...वहीं श्यामू कि हालत तो बेहद गंभीर थी।  उसकी रीढ  की हड्डी में चोट लगने के कारण उसका नीचे का हिस्सा ही बेकार हो गया था। वह खड़ा भी नहीं हो पाता था। उसकी पत्नी रामेश्वरी को उसके सारे काम  बिस्तर पर ही कराने  पड़ते थे। सच तो यह है कि अपाहिज होने के कारण वे सभी कोई काम करने लायक ही नहीं रहे थे। बोझ बनकर रह गए थे वे अपने-अपने परिवारों पर...। उनके लिए सिर्फ पाँच हजार...बैसाखी के सहारे आया रामू 25 हजार की जगह 5 हजार देखकर रोने लगा था । यही हाल दीपू का था और श्यामू की पत्नी रामेश्वरी का था। अभी भी उनके मन से उस दिन की घटना का असर ही समाप्त  नहीं हुआ था । घर परिवार की बेरुखी तथा अपनी स्थिति देखकर कभी-कभी उन्हें लगता था कि इससे अच्छा तो था कि वे भी मर जाते, कम से कम ऐसी जलालत भरी जिंदगी तो नहीं जीनी पड़ती ।

            रामू को हफ्ते भर पूर्व की घटना याद आई...वह ऐसे ही मन बहलाने के लिए बैसाखी के सहारे थोड़ा बाहर निकल गया था। लौटा तो भाभी की आवाज सुनकर उसके कदम बाहर दरवाजे पर ही रुक गये, “न जाने कब तक इस लंगड़े को रोटी खिलानी पड़ेगी ? अब तो इसकी शादी भी होने से रही ।”

            “ ऐसा न कह लालू की माँ, ,पच्चीस हजार मिल जायेंगे तो अपनी हालत भी सुधर जाएगी ।” भाई ने उसे टोकते हुए कहा।

            “ हमारे भाग्य ही फूटे थे...वरना यह भी मर जाता तो पूरे एक लाख मिल जाते, हमारे दिन भी बहुर जाते। अब यह  अपाहिज सारी उम्र हमारी छाती पर मूंग डालता रहेगा।”

            “ चुप रह कलमुंही, कुछ भी बोलती रहती है...अगर कहीं उसने सुन लिया तो वह हमें फूटी कौड़ी भी नहीं देगा ।” भाई ने भाभी को झिड़कते हुए कहा था।

             भाई-भाभी की बातें सुनकर रामू ठगा सा खड़ा रह गया...। उसके लिए उसके सगे भाई-भावज के मन में इतनी कड़वाहट...। कहाँ अपनी इसी भावज के हाथों में जब वह रोज की कमाई रखता था तब वह अपनी सहेलियों से उसकी तारीफ करते नहीं थकतीं थीं और अब जब उसे अपनों की जरूरत है तो वे इतने स्वार्थी हो गए हैं...रो पड़ा था उसका मन । कहाँ तो वह सोच रहा था कि मुआवजे की रकम मिलते ही वह सारी रकम भाभी के हाथ में पकड़ा देगा किन्तु उनका सारा वार्तालाप सुनकर वह वृतिष्णा से भर उठा… अब तो उन्हें कुछ भी देने का उसका मन नहीं कर रहा था। आज 25 हजार की जगह 5 हजार मिलते देख रामू भविष्य की आशंका से त्रस्त रोने के लिए किसी का कंधा चाहता था कि उसके साथ आया भाई उसके हाथ से रकम लेकर ऐसे मुँह फेर कर चला गया मानो वह उसका कुछ लगता ही नहीं है ।

            यही हालात दीपू की है। रामू की तो भाभी ऐसा सोचती है किन्तु उसकी तो अपनी पत्नी जब तब उसे उसकी अपंगता का एहसास कराती रहती है पर फिर भी  एक मोटी रकम मिलने की आस आस में वह उसे खाना पानी तो दे ही रही है। अब न जाने कैसे जिंदगी कटेगी ? आँखों में आँसू भरे वह समझ नहीं पा रहा था कहाँ जाये, क्या करे ? 

            सच अपंगता इंसान को इतना बेजार और असहाय बना देती है, उसने कभी सोचा भी ना था। उसे बचपन का वह दृश्य याद आया...उसका छोटा भाई बीमार हो गया था, पिताजी कहीं बाहर गए हुए थे। माँ ने उससे कहा, “ बेटा, तू इसे अस्पताल ले जाकर दिखा ला।”

            “ ना बाबा ना, इस लंगड़े को लेकर मैं अस्पताल नहीं जाऊँगा...। मेरे दोस्तों ने अगर मुझे इसके साथ देख लिया तो वे  मुझे चिढ़ायेंगे ।” अपने पोलियोग्रस्त भाई को अस्पताल ले जाने से मना करते हुए उसने माँ से कहा था ।  

            “बेटा, आज तूने अपने भाई के लिए जो कहा, वह आगे किसी के लिए न कहना...शरीर का क्या, आज है कल नहीं।  इसे लेकर इतना घमंड करना अच्छी बात नहीं है ।” कहते हुए उसकी माँ की आँखों से आँसू निकल आए थे ।

            माँ के दर्द को वह उस समय कहाँ समझ पाया था !! माँ के लिए तो उसका बच्चा चाहे जैसा भी हो जान से भी प्यारा होता है।  वह उसके लिए कुछ भी करने को तैयार रहती है। उसे आज भी याद है कि उसके मना करने पर माँ स्वयं उसके भाई को अस्पताल लेकर गईं थीं। यह बात अलग है कि माँ की देखभाल के बावजूद,पैसों की कमी के कारण, उचित  इलाज के अभाव में उसका वह अभागा भाई चल बसा था। आज बार-बार उसे माँ  के कहे शब्दों के साथ अपना वह भाई भी याद आ रहा है जो उसे इधर-उधर आते-जाते, खेलते देखकर एक कोने में बैठा टुकुर-टुकुर उसे देखता रहता था। वह उसकी अपंगता के कारण उसे अपने साथ न कहीं लेकर जाता था न ही किसी से उसे मिलवाता था। यहाँ तक कि उसके पास बैठ कर बातें करना भी उसे अच्छा नहीं लगता था । उसके लकड़ी से पैर न जाने क्यों उसके मन में वितृष्णा जगा देते थे। माँ-बाबूजी के लाख चाहने पर भी वह पढ़ नहीं पाया था। उनके जाने के बाद तो उसकी ज़िंदगी में मानो ग्रहण ही लग गया...। उसके अपने चाचा ने ही उसे उसका हिस्सा देने से मना करने के साथ उसे घर से ही निकाल दिया।  पेट भरने के लिए उसे मजदूरी करनी पड़ी किन्तु उस दुर्घटना ने उससे उसकी नौकरी भी छीन ली। मनुष्य को अपने अच्छे बुरे कर्मों का फल यहीं, इसी जन्म में  भुगतना पड़ता है, इस सत्य से उसका आज परिचय हो गया था। आज अगर उसकी पत्नी उसे ठीक से बात नहीं करती तो उसमें उसका क्या दोष ? आखिर उसने भी तो किसी के साथ ऐसा ही किया था। 

            रामेश्वरी की हालत तो और भी खराब थी। मन में ढेरों प्रश्न उमड़-घुमड़ रहे थे जिनका कोई उत्तर उसके पास नहीं था। उसके  विवाह को अभी सिर्फ छह महीने ही हुए हैं ।  क्या उसे अपना पूरा जीवन बीमार पति की देखरेख करते हुए ऐसे ही बिताना पड़ेगा? कैसे इलाज करा पाएगी वह श्यामू का ? उसकी अकेले की कमाई से क्या होगा ? इसके बावजूद श्यामू के अपाहिज होने के बाद उस ठेकेदार की उस पर पड़ती काम लोलुप नजरें। कैसे बचा पाएगी वह स्वयं को उन कामुक नजरों से ?


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            जिनके अपने नहीं रहे थे उनकी तो हालत और भी बुरी थी। सरस्वती की सास की तो सारी आशाओं पर ही पानी फिर गया था। रुपये मिलने के इंतजार में, पिछले आठ महीने से हर काम को छोटा समझने के कारण, हट्टा कट्टा, मुफ्त की रोटी खाने का आदि उसका बेटा रामू बेकार बैठा है । घर खर्च भी उधार के रुपयों से चल रहा है । बनिया अगर कभी तकाजा भी करता तो वह मुआवजे की रकम से उधार चुकाने की बात कहकर जरूरत का सामान उधार ले आया करती थी।  पाँच हजार तो उधार चुकाने में ही निकल जायेंगे। बाकी बचे पैसों से ऑटो तो क्या रिक्शा भी नहीं आ पाएगा...। अगर जुगाड़ करके रिक्शा खरीदवा भी दिया तो क्या उसका कामचोर बेटा रिक्शा चलाने के लिए तैयार होगा ? वह तो सिर्फ सपने देखना जानता है पर यह नहीं जानता कि सपने पूरे करने के लिए प्रयत्न भी करना पड़ता है, मेहनत करनी पड़ती है। काम कोई छोटा नहीं होता। अब तो उसे लग रहा था कि उसकी सारी समस्या की जड़ उसकी अधूरी शिक्षा है...न तो वह बाबू बन सका और न ही मजदूर । यहाँ तक कि चपरासी का काम भी उसे हेय लगता है पर निठल्ले बैठे दूसरे की कमाई खाने में उसे कोई शर्म नहीं आती। वह यह भी नहीं सोचता कि पिता की मृत्यु के बाद मेहनत मजदूरी करके जैसे-तैसे उसकी माँ  ने उसे पढ़ाया लिखाया, खुद भूखी रही पर उसे खाने को दिया,पढ़ने के लिए स्कूल भेजा,कम से कम अब तो वह अपनी माँ की परेशानी और ना बढ़ाये । जो भी काम मिले कर ले पर नहीं...पर जिसे बैठे-बैठे मुफ्त का खाने  की आदत पड़  गई हो, वह मेहनत क्यों करना चाहेगा...!! अब तक कम से कम उसकी बहू सरस्वती उसकी गृहस्थी की गाड़ी तो खींच रही थी पर अब उसके न रहने पर जिंदगी कैसे कटेगी, सोच सोच कर वह परेशान हो उठी थी। बस मन ही  मन यही प्रार्थना  करती रहती थी कि ईश्वर उसके निखट्टू बेटे को सदबुद्धि दे।

            ऐसी ही हालत बुधनी की भी थी। कहाँ तो वह सोच रही थी कि एक लाख रुपये मिलते ही, कुछ रकम से वह अपने पति वीरू का सपना  ‘कृष्णा ढाबा ' की इच्छा पूरी करेगी तथा बाकी रकम को बैंक में डलवा देगी।  जैसे-जैसे कृष्णा बड़ा होगा,उसके खर्चे बढ़ेंगे तब अगर जरूरत पड़ी तो उस रकम में से कुछ रकम निकालकर उसकी पढ़ाई में लगाएगी जिससे उसकी शिक्षा बेरोकटोक भली प्रकार पूरी हो सके  पर इतनी छोटी सी रकम से वह क्या कर पाएगी ? वह कृष्णा को गोद में उठाए, बुझे मन से उस रकम को हाथ में दबाये चली जा रही थी...तभी सड़क के किनारे उसे छोटी सी चाय की दुकान दिखाई दी। उसने देखा कि उस छोटी सी झोंपड़ी में  एक बूढ़ी औरत चाय बनाकर बेच रही है। झोंपड़ी के सामने पड़े स्टूलों में कुछ राहगीर बैठे चाय पीते हुए बातें कर रहे हैं । एकाएक उसे लगा कि वह ढाबा नहीं किन्तु इन पैसों से चाय की एक छोटी दुकान तो खोल ही सकती है। एकाएक आँखों में चमक आ गई। उसे लगा कि उसे राह मिल गई है। उसने मन ही मन कहा... हाँ यही ठीक है। वह इस रकम से टेबल कुर्सी खरीदकर हाईवे के किनारे अच्छी जगह देखकर चाय की दुकान खोलेगी, साथ में नमकीन बनाकर भी बेचेगी । अगर उसकी चाय की दुकान चल निकली तो धीरे-धीरे उसे ढाबे में परिवर्तित कर लेगी। उसने सुना था सच्चे मन से, सच्ची नियत से प्रारम्भ किए कार्य में सदा सफलता मिलती है। वह अपने कार्य अवश्य ही सफल होगी...। कृष्णा को पढ़ाने का अपना और वीरू का सपना जरूर साकार करने का प्रयास करेगी ।

             सुधिया के दादाजी की हालत दूसरी ही थी वह तो इतनी रकम हाथ में आते ही मानो बौरा ही गए थे । वह सुधिया को  ढेरों आशीष देते हुए मन ही मन बुदबुदाए...बिटिया, मैं तुझे कुछ भी नहीं दे पाया पर जब तक तू रही तब तक तो तूने इस बूढ़े का ख्याल रखा ही और अब मर कर भी कुछ दिनों तक मेरे खाने-पीने का इंतजाम भी कर गई है। घर आकर उन्होंने रूपयों को गिनने की कोशिश की पर बार बार गलती होने पर उन्होंने उन रुपयों में से 100 रुपये का एक नोट निकाल कर, बाकी बचे रुपयों को लोहे की संदूकची में रखकर, उसमे ताला लगाकर , उसे लोहे की चेन से चारपाई से बाँध दिया। सौ का नोट अपने कुर्ते की जेब में रखकर, यह सोचकर ,दारू के अड्डे की ओर चल दिये कि आज तो वह दारु के साथ भजिया भी खाएंगे...खाली दारू पीते-पीते पेट में ऐंठन होने लगी है ।

             सच इंसानी जीवन भी एक अनबूझ पहेली है। क्या समाज के रामू, दीपू,रामेश्वरी, सरस्वती की सास और सुधिया के दादा जी जैसे लोगों की यही नियति है या वे ऐसा जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं? शायद हाँ...शायद नहीं...कुछ अपवादों को छोड़कर कठिनाइयां,  सुख-दुख, अभाव तो हर एक व्यक्ति के हिस्से में आते ही हैं । किसी के आने जाने, रहने या ना रहने पर जिंदगी रुकती नहीं है। वह तो चलती रहती है सतत...अनवरत...निरंतर...। यह निरंतरता ही जीवन का शाश्वत सत्य है। हाँ यह बात अलग है कि जीवन के इस सत्य से अपरिचित कोई व्यक्ति विपरीत परिस्थिति को अपनी नियति मानकर रुके पानी की तरह सड़ता रहता है तो कोई बुधनी की तरह कठिन से कठिन परिस्थितियों से जूझते हुए भी अपनी राह खोज ही लेता है।

 

सुधा आदेश

समाप्त

 

 


Monday, May 30, 2022

सबक

 


                                                                        

        

            सबक 


    ‘ कांच का टूटना अच्छा नहीं होता । जरा संभालकर काम किया कर ।’ पुष्पा ने अपनी बहू अंजना को  टोकते हुए कहा ।

    अंजना चाहकर भी कुछ न कह पाई...पिछले एक हफ्ते से उसकी तबीयत ठीक नहीं चल रही थी, उस पर नौकरानी के न आने के कारण काम भी बढ़ गया था । चाय का कप धोते हुए न जाने कैसे उसके हाथ से फिसल गया और टूट गया...उसने झाडू उठाई तथा फर्श पर पड़े कप के टुकड़े साफ करने लगी ।

    ‘ तेरी माँ ने कुछ सिखाया है या नहीं, अरे शाम ढले घर में झाड़ू लगाने से लक्ष्मीजी घर में प्रवेश नहीं करतीं । झाड़ू से नहीं कपड़े से इन टुकड़ों को उठा ।’ पुष्पा ने क्रोध भरे स्वर में अंजना से कहा ।

    उसी समय भावेश ने घर में प्रवेश किया । माँ को अंजना पर क्रोधित होते देख उसने शांत स्वर में कहा,‘ माँ तुम्हें याद है जब मैं इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा के लिये जा रहा था तो मुझे अचानक छींक आ गई    । तुमने मुझे दही, पेड़ा दुबारा खिलाकर उस अपशगुन को शगुन में बदला किन्तु जैसे ही मैं घर के दरवाजे से बाहर निकला एक काली बिल्ली मेरे सामने से निकल गई । तुमने तुरंत मेरा हाथ पकड़ते हुये कहा था कि दस मिनट के अंदर  दो-दो अपशगुन...आज मैं तुझे कहीं नहीं जाने दूँगी । तुम्हारी हर बात सुनकर सदा शांत रहने वाले पिताजी ने उस दिन मेरा हाथ पकड़कर खींचते हुये कहा था...’बेटा, चल पहले ही हम लेट हो गये हैं । अगर अपनी माँ की बात सुनता रहा, परीक्षा में लेट हो गया तो उससे बड़ा अपशगुन कोई नहीं होगा । माँ तुम्हारे उस अपशगुन के बावजूद उस वर्ष हायर सेकेन्डरी की परीक्षा में मेरिट लिस्ट में न केवल मेरा नाम आया वरन उसी वर्ष मेरा आई.आई.टी. कानपुर के लिये चयन भी हो गया । इसके बावजूद भी तुम आज तक शगुन अपशगुन, यह न करो वह न करो में लगी हुई हो । जिसे जैसा करना है करने दो... दुनिया बदल रही है तुम भी स्वयं को बदलो, अब यह टोका-टोकी बंद करो ।’  माँ को छोटी सी बात पर बिगड़ते देख सदा शांत रहने वाले भावेश के स्वर में आज न जाने कैसे तीखापन आ गया था। 

    ‘ बहुत आया बीबी की तरफदारी करने वाला...ऐसे ही तोड़ती फोड़ती रही तो जम चुकी तेरी गृहस्थी । तिल-तिल करके जोड़ी जाती है गृहस्थी । एक तुम लोग हो पूरा सेट बिगड़ गया और कुछ फर्क ही नहीं पड़ा । तभी तो आज की पीढ़ी दोनों के कमाने पर भी सदा पैसे की कमी का रोना रोती रहती है । एक हम लोग थे...पाई-पाई जोड़ी तभी तुम्हें आज इस लायक बना पाये हैं।’ बेटे का तीखा स्वर सुनकर भी पुष्पा चुप न सकी तथा अंजना पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए आदतन बोल उठी ।

    ‘ क्यों राई का पहाड़ बनाने पर तुली हो ? जब देखो जरा-जरा सी बात पर टोका-टोकी...परेशान हो गया हूँ रोज की चिक-चिक सुनकर । एक कप ही तो टूटा है...घर आकर थोड़ा सुकून पाना चाहता हूँ पर यहाँ भी चैन नहीं !! वह प्रयत्न तो कर रही है तुम्हारे साथ निभाने की । तुम यह क्यों नहीं समझती कि तुम मेरी माँ हो तो वह मेरी पत्नी है...।’ 

    ‘ तो निभा न पत्नी के प्रति दायित्व...माँ का क्या वह तो कैसे भी रह लेगी !! भले की बात समझाओ तो वह भी बुरी लगने लगती है...न जाने कैसा जमाना आ गया है ?’ पुष्पा  ने कहा ।

    ‘ माँ, मैं तुम्हारी अवमानना नहीं कर रहा हूँ...सिर्फ यह समझाने का प्रयत्न कर रहा हूँ कि अगर अंजना से कभी कोई गलती हो भी जाती है तो उसे ताना मारकर समझाने की बजाय प्यार से भी तो समझाया जा सकता है...।’ भावेश ने स्वर में नर्मी लाते हुये कहा ।

    ‘ अब तो मेरी हर बात तुम लोगों को बुरी लगती है...। इसके कदम रखते ही तू इतना बदल जायेगा, मैं सोच भी नहीं सकती थी...। अब तो तेरे लिये सब कुछ वही है, वह सही, मैं गलत...।’ क्रोध से बिफरते हुए वह बोली ।

    ‘ मैं नहीं जानता क्या सही है और क्या गलत ? मैं घर में सुख शांति चाहता हूँ ।’ इस बार भावेश के स्वर में फिर तख्लली आ गई ।

    ‘ इसका मतलब मैं ही बेवजह लड़ाई करती हूँ...?’ पुष्पा ने क्रोधित स्वर में कहा । 

    अंजना ने बीच बचाव करने का प्रयत्न किया तो वह बिफरते हुई बोली,‘ पहले तो स्वयं आग लगाती है फिर अच्छी बनने के लिये पानी डालने आ जाती है...हट, मेरे सामने से, तेरी जैसी मैंने खूब देखी हैं...पहले मेरे बेटे को फँसा लिया, अब उसे मुझसे दूर करने पर तुली है...।’

    माँ की जली कटी सुनकर अंजना की आँखों में आँसू भर आए और वह अंदर चली गई...पर भावेश चुप न रह पाया । बहुत दिनों से माँ का अंजना पर छोटी-छोटी बात क्रोधित होना तथा चिल्लाना, यह न करो वह न करो की बंदिशों में बाँधना उससे सहन नहीं हो रहा था और आज कप टूटने पर इतना बखेड़ा… उसने बीच बचाव करते हुए माँ को समझाना चाहा तो बात संभलने की बजाये बिगड़ती ही चली गई । उसने सोचा कि जब बात इतनी बढ़ ही गई है तो आज निपटारा कर ही लिया जाये कम से कम रोज-रोज की चिक-चिक से तो छुट्टी मिलेगी अतः वह भी तेजी से बोला...

    ‘ तुमसे तुम्हारा बेटा दूर उसने नहीं वरन् तुम्हारी रोज की टोका-टोकी ने किया है । तुम समझती नहीं या समझना नहीं चाहती कि वह अब तुम्हारी बहू के साथ इस घर की सदस्य भी है । जब तुम उससे ठीक से बात करोगी तभी वह तुम्हारा सम्मान कर पायेगी ।’

    ‘ हाँ, हाँ मैं ही बुरी हूँ...। कितना कृतघ्न हो गया है तू...? तेरे लिये मैंने क्या-क्या नहीं किया...!! सब भूल गया । उस कल की छोकरी के लिये आज तू मेरा अपमान करने से भी नहीं चूक रहा है । इससे तो पैदा ही न हुआ होता तो कम कम से यह दुर्दिन तो नहीं देखना पड़ता...। अच्छा हुआ जो तेरे पिताजी यह अपमान सहने से पहले ही चले गये । हे ईश्वर ! तू मुझे पता नहीं क्या-क्या दिखायेगा । ’ क्रोध के साथ उनकी आँखों में आँसू भी आ गये थे । आज से पहले भावेश ने उनसे इस तरह की बात नहीं की थी ।

    ‘ उसी अहसान का बदला तो चुकाने की कोशिश कर रहा हूँ पर आखिर कब तक मुझे परीक्षा देनी होगी...? कब तक वक्त वेवक्त ताने सुनने पड़ेंगे...?’ माँ के इसी तरह के नित कड़ुवे वचन सुनकर भावेश भी स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख पाया तथा उसी तीक्ष्णता से उत्तर दिया और अंदर चला गया ।

    क्रोध से उबल रही पुष्पा ने बेटे बहू से तिरस्कार पाकर स्वयं को पूजा घर में बंद कर लिया । यही उनका ब्रह्मास्त्र था...। अंजना ने चाय के लिये आवाज दी पर उन्होंने दरवाजा नहीं खोला । खाने के लिये आवाज दी फिर भी वह नहीं पसीजीं । पसीजती भी कैसे...? इस बार बहू ही आकर पूछ रही थी । बेटा एक बार भी नहीं आया । आज से पहले जब-जब भी उसमें और बहू में तकरार हुई है वह उसे मनाकर उसके क्रोध को शांत कर दिया करता था तथा अंजना से भी ‘ सारी’ बुलवा दिया करता था पर आज बात कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थी । सदा शांत रहने वाले पुत्र के मुँह से निकले शब्द अब भी उसके मन को मथ रहे थे । साथ ही उसका उनसे खाने के लिये भी न पूछना, उन्हें दंशित करने लगा, वह कुढ़कर रह गईं । 

    रात में जब भूख बरदाश्त नहीं हुई तो धीरे से दरवाजा खोलकर वह बाहर आईं । किचन में कुछ न पाकर बड़बड़ाई कि किसी को भी मेरी चिंता नहीं है । दोनों खाकर मजे से सो गये हैं । मैं जीऊँ या मरूँ , इससे किसी को मतलब ही नहीं रहा है । हे भगवान, न जाने कैसा जमाना आ गया है !!

    फ्रिज खोला तो उसमें सब्जी के साथ ही रोटी का डिब्बा रखा देखकर चैन की सांस ली । सब्जी की मात्रा तथा डिब्बे में रोटियों की संख्या देखकर उन्हें लगा कि किसी ने भी खाना नहीं खाया है । फिर मन में आया कुछ और खा लिया होगा । जब मेरे लिये इनके दिल में इतनी कड़ुवाहट है तो वे खाना क्यों छोड़ेंगे...? अशांत मन से सब्जी गर्म की और खाना खाकर सो गई । वह सुबह उठीं, पूरे कमरे को रोशनी से नहाया देखकर चौंक गईं । सुबह के आठ बज गये हैं...। इतनी देर तक तो वह कभी भी नहीं सोई । नित्य कृत्य से निवृत होकर बाहर आई तो देखा बहू किचन में थी तथा बेटा घर से आफिस के लिये निकल रहा है । उन्हें देखकर भी उसने उनसे कुछ नहीं पूछा न ही कहा, ‘ माँ मैं आता हूँ ।‘ उसे चुपचाप आफिस जाते देखकर मन में कुछ दरक गया...जिस बेटे के लिये इतना कुछ किया वह उनसे ऐसे मुँह मोड़ लेगा कभी सोचा ही नहीं था । 

    पति सिद्धार्थ के परमपिता में विलीन होने के पश्चात् उन्होंने अकेले ही पुत्र भावेश और पुत्री दीप्ति को हर कठिनाइयों से बचाते हुए पाला है । दीप्ति अपने घर संसार में इतनी डूब गई है कि उसे उनकी सुध ही नहीं है और आज भावेश ने अपनी पत्नी के लिये उसे खरी खोटी सुना दी । आज जब आराम करने का समय आया तो दोनों के ऐसे तेवर...अगर कुछ कह दिया तो दोनों के मुँह फूल गये...। यह भी नहीं सोचा कि माँ के दिल पर क्या बीत रही होगी ? 

    उसे देखकर अंजना ने उसके सामने चाय रखी तो वह भड़क कर बोलीं, ‘ बेटे को तो मुझसे दूर कर ही दिया...अब और भी कुछ करना बाकी है तो वह भी कर दे...। पता नहीं उसे क्या पट्टी पढ़ा दी है कि आज वह मुझसे बिना बात किये आफिस चला गया ।’

    इस बार अंजना भी चुप न रह सकी तथा बोली,‘ रात में चुपचाप उठकर आपने खाना खा लिया...। बहू की तो दूर पर क्या आप यह सोच भी पाईं कि बेटे ने भी रात में कुछ खाया है या नहीं । इस समय भी वह बिना खाये आफिस चले गये हैं...यहाँ तक कि टिफिन भी नहीं ले गये हैं ।’

    ‘ तेरा पति है, तू जाने उसने क्यों नही खाया...?’ चाय पीते हुये निर्लिप्त स्वर में उन्होंने कहा ।

    ‘ आप भी तो उनकी माँ हैं...। क्या आप का फर्ज नहीं है कि एक बार अपनी पेट पूजा से पहले अपने बेटे से भी पूछ लें कि उसने कुछ खाया है या नहीं...?’ सदा चुप रहने वाली अंजना भी आज चुप न रह पाई । वह भी आज भावेश के बिना खाये निकल जाने के कारण बेहद दुखी थी ।

    ‘ बहुत बोलने लगी है तू...। कर्म तो मेरे ही फूटे थे...वरना एक से एक लड़कियाँ आ रही थीं मेरे भावेश के लिये...। दहेज भी खूब मिलता, पर तूने उस पर न जाने कैसा जादू कर दिया कि वह तुझे ब्याह लाया...। एक तो गरीब घर की और ऊपर से बेशऊर...न बात करने का तरीका और न रहने का । मैं तो यह सोचकर तुझे अपनाने के लिये तैयार हो गई थी कि गरीब है तो क्या हुआ मेरे भावेश की पसंद है और शायद मेरे इस अहसान के बदले तू मुझसे दबकर रहेगी तथा मेरी हर बात मानेगी । पर बात माननी तो दूर, तू तो मेरे भावेश को ही मेरे विरूद्ध भड़काती रहती है वरना वह पहले ऐसा नहीं था...।’

    ‘ आखिर कब तक आप मुझे ताने देती रहेंगी...? गरीब हूँ तो क्या मैं इंसान नहीं हूँ ...? क्या मेरा कोई आत्मसम्मान नहीं है ? गरीब होने के बावजूद मेरे माता-पिता ने मुझे पढ़ाया, मुझे आई.आईटियन बनाया । भावेश ने मेरी योग्यता के कारण मुझसे विवाह किया था...। इस सबके बावजूद भी दिन रात ताने...आखिर कितना सहूँ ।’ अंजली ने रोते हुए कहा तथा अपने कमरे में चली गई ।

    ‘ जा...जा...इन टसुओं से मैं पिघलने वाली नहीं...। इन टसुओं के सिवा लाई ही क्या है...? मेरे सोने से घर को नर्क बनाकर रख दिया है ।’ पुष्पा ने जोर से चिल्लाते हुए कहा ।

    सास के स्वर अंजना के मनमस्तिष्क में शीशे की तरह चुभ-चुभकर उसे लहूलुहान कर रहे थे । विवाह के पश्चात् लड़की का जीवन बदल जाता है...यह तो उसने सुना था पर रिश्ते निभाने के लिये उसे अपमान भी सहना होगा यह उसने नहीं सोचा था । उसने अपनी सास की हर बात मानने तथा उनकी इच्छानुसार काम करने की भरपूर कोशिश की पर उसकी हर कोशिश नाकामयाब रही । उसकी हर बात में कमी निकालकर उसे बेशऊर सिद्ध करना उसकी सास को सुकून पहुँचता था । घर की सजावट में थोड़ा भी फेर बदल करने का प्रयत्न करती तो तुरंत कह देतीं कि यह मेरा ड्रीम हाउस है जब तक मैं हूँ, कोई फेरबदल नहीं होगा । आखिर उसने घर की साजसज्ज्जा के बारे में सोचना ही छोड़ दिया । उसके हिस्से में अधिकार की बजाय कर्तव्य ही आये । कर्तव्य करते-करते अगर कहीं कुछ भूल चूक हो जाती तो ऐसे ताने देकर लहूलुहान कर दिया जाता कि उसे लगता ही नहीं था कि वह इस घर की बहू है । छुटपन में माँ के गुजर जाने के कारण उसे बचपन से माँ का प्यार नहीं मिला था । सोचा था सास के रूप में माँ को प्राप्त कर वह सारी कमी पूरी कर लेगी पर माँ तो ऐसे व्यवहार करती जैसे वह उनकी बहू नहीं नौकरानी हो । 

    कल तो हद ही कर दी । जब वह उनको खाने के लिये कहने गई तब तो उन्होंने खाना खाने से मना कर दिया किन्तु भूख बर्दाशत न होने पर उन्होंने रात में चुपचाप उठकर खाना खाया और सो गईं जबकि माँ के न खाने के कारण भावेश ने भूख नहीं है, कहकर खाने से मनाकर दिया था । वह अकेले कैसे खाती !! उसे बना बनाया  खाना उठाकर फ्रिज में रखना पड़ा तथा आज सुबह भी भावेश नाश्ता बनने के बावजूद बिना कुछ खाये आफिस चले गये । वह समझ नहीं पा रही थी कि भावेश का गुस्सा उस पर है या माँ पर...। आखिर कैसे वह सामंजस्य स्थापित करे...? वही कितना झुके...? सब कुछ भूलकर वह सुबह की चाय देने गई तो फिर वैसी ही जली कटी...आँखों से आँसुओं की अविरल धारा बह रही थी...। मन इतना खराब था कि आज उसका ऑफिस जाने का भी मन नहीं हुआ । कमरे में आकर उसने छुट्टी का मेल कर दिया । 

    पुष्पा ने अंजना को कमरे में जाते देखा तो सोचा जाती है तो जाये, मुझे क्या ? मैं किसी को मनाने नहीं जाऊँगी ...। अपने आप अक्ल ठिकाने आ जायेगी । तेवर तो देखो इस लड़की के...पता नहीं अपने को क्या समझती है...?

    पूरी जिंदगी तो उसने बच्चों की परवरिश में लगा दी....दीप्ति के विवाह के बाद सोचा था कि बेटे का विवाह अपनी इच्छानुसार करूँगी । उसके विवाह में मोटा दहेज लेकर अपनी उन सारी इच्छाओं को पूरा करूँगी जो पारिवारिक दायित्वों के चलते पूरा नहीं कर पाई पर भावेश ने उसके सारे अरमानों पर पानी फेर दिया...। एक दिन इसे सामने लाकर खड़ा कर दिया तथा कहा,‘ माँ आशीर्वाद दो...।’

    वह भावेश के बर्ताव से अवाक थीं । वह सोच या समझ पातीं उससे पहले ही भावेश और अंजना उसके पैरों पर झुक गये । एकलौता बेटा है, विद्रोह करके जाती भी तो कहाँ जातीं...सोचकर उन्होंने उन्हें आशीर्वाद दे दिया ।  अग्नि में घी का काम किया उनकी पड़ोसन सीमा और मीनाक्षी के शब्दों ने...जो खबर मिलते ही उसे बधाई देने पहुँची तथा उससे पूछा,‘ पुष्पा बहन, बहू है तो सुंदर, सुना है लव मैरिज है...। अकेली ही आई है या साथ में कुछ लाई भी है...।’

    अब उनसे क्या कहती...मन मसोसकर रह गई थी । पुत्र से तो वह कुछ नहीं कह पाई लेकिन जब तब मन का आक्रोश अंजना पर निकलने लगा । कल जब वह अंजना को टोक रही थी तभी भावेश आ गया और वह उनसे उलझ पड़ा । उसे इस बात की कतई उम्मीद नहीं थी कि वह बहू का पक्ष लेगा । इससे पहले भी वह अंजना को यह न करो, वह न करो की हिदायतों के साथ उसे छोटी-छोटी बातों पर टोकती आई थी तथा अक्सर भावेश से उसकी शिकायत भी कर दिया करती थी पर हर बार वह अंजना को ही डाँटकर उनका पक्ष मजबूत करता रहा था...पर आज तो हद ही हो गई...। उसने न केवल अंजना का पक्ष लिया वरन् उसके रूठने पर भी उसे मनाने नहीं आया...पर मैं भी किसी से कम नहीं, इनसे दबूँगी नहीं, वरना ये मेरा रहना ही दूभर कर देंगे, सोचकर उसने स्वयं को समझाया तथा अंजना के द्वारा बनाई चाय पीकर नहाने चली गई । नहाकर पूजाकर जब बाहर आईं तो देखा अंजना कमरे से बाहर नहीं आई है । वे किचन में गई तो देखा भावेश का लंच पैक है । खोलकर देखा तो उसमें सब्जी परांठा था । कुछ बनाने की अपेक्षा उन्होंने उसे ही खाना श्रेयस्कर समझा तथा नित्य की तरह टी.वी. पर अपना मनपसंद सीरियल देखने लगीं ।

    दोपहर का एक बज गया । अंजना को कमरे से बाहर न आते देखकर उन्होंने टोस्टर में ब्रेड सेकी तथा एक कप चाय बनाकर खाने बैठ गई । उन्होंने न ही अंजना को आवाज दी और न ही उसके कमरे में गई...चार बजे चाय की तलब लगने पर स्वयं ही चाय भी बनाकर पी ली...पर अब तक उनका क्रोध चरम सीमा तक पहुँच चुका था । अब वह भावेश के आने का इंतजार करने लगीं...जैसे ही वह आया । मन का आक्रोश निकलने लगा...

    ‘ अब चुप भी करो माँ, क्या मैं तुम्हें नहीं जानता...? एक वक्त खाना बनाकर नहीं खिला पाई तो इतना हो क्रोध क्यों...? हो सकता है उसकी तबियत खराब हो...!! ’

    ‘ हाँ...हाँ अब तो माँ में ही तुझे कमी नजर आयेगी...वही तेरे लिये सब कुछ हो गई है । पल्लू से जो बाँध लिया है उसने तुझे...।’

    ‘ तुम सास बहू के चक्कर में मेरा जीना दुश्वार हुआ जा रहा है, तुम्हें जैसे रहना हो रहो...मैं ही घर छोड़कर जा रहा हूँ...।’ 

    ‘ तू क्यों जायेगा...जाना है तो मैं जाऊँगी...।’ सदा कि तरह उन्होने कहा ।  

    उनका वाक्य पूरा होने से पूर्व ही भावेश दनदनाता हुआ बाहर चला गया । वह जब तक बाहर आई तब तक वह जा चुका था ।

    भावेश को पैदल घर से जाते देखकर उसने सोचा, ऐसे ही किसी मित्र के घर चला गया होगा । क्रोध शांत होते ही आ जायेगा । सब मुझ पर ही गुस्सा निकालो...बहू के ऐसे तेवर...सुबह से पानी के लिये भी नहीं पूछा और शिकायत की तो बेटा भी घर छोड़ने की धमकी देने लगा । हे भगवान, अब तू मुझे उठा ही ले...उन्होने सदा की तरह ऊपर की ओर देखते हुये हाथ जोड़कर कहा ।

    आठ बजे पुष्पा बहू के कमरे की तरफ गई, एक बार सोचा आवाज लगाये पर स्वयं की अकड़ ने उसे रोक लिया । अपने लिये दो रोटी बनाई और पिछले दिन की बनी सब्जी से खा लीं तथा निश्चिन्त भाव से टी.वी. देखने लगी । नौ बजे, यहाँ तक कि दस बज गये, न बेटा लौटा और न ही बहू कमरे से बाहर निकली । अब उसे चिंता होने लगी...। एकाएक उसे लगा, बहू ठीक ही कह रही थी कैसी माँ हैं आप कि यह जाने बिना कि बेटे , बहू ने खाया है या नहीं, आपने खा कैसे लिया...? बहू की बात तो छोड़ दें पर उसके मन में रात में बिना खाये सोये तथा सुबह भूखा ही आफिस गये पुत्र के प्रति जरा सी भी संवेदना नहीं जगी । उससे कुछ खाने के लिये पूछने की बजाय उसके आते ही वह शिकायतों का पुलिंदा लेकर बैठ गई...। यह कैसी आत्मघाती प्रवृत्ति बनती जा रही है उसकी...?

    अब उन्हें पुत्र की चिंता हो रही थी वहीं बहू पर भी गुस्सा आ रहा था जो सुबह से अपने कमरे में बंद थी । उसकी नहीं, कम से कम अपने पति की तो चिंता होनी चाहिए उसे...भावेश के मोबाइल पर ट्राई किया तो स्विच आफ बता रहा था...। भावेश के मित्र नरेश को फोन किया तो उसने कहा, ‘ माँजी, भावेश मेरे पास तो नहीं आया...दीपक से पूछकर देखिये शायद उसे पता हो ।’

    दीपक के साथ पुष्पा ने भावेश के कुछ अन्य मित्रों को फोन किया वहाँ से नकारात्मक उत्तर पाकर उन्हें को कुछ नहीं सूझ रहा था । अब बहू के पास  जाने के सिवाय कोई चारा ही नहीं था । उसके कमरे में कदम रखा तो बिजली बंद थी...बिजली ऑन करते हुए कुछ कठोर शब्द मुँह से निकलने वाले थे कि देखा वह चादर ओढ़े लेटी है । शरीर बुरी तरह कंपकपा जा रहा है तथा मुँह से भी कुछ अस्पष्ट शब्द निकल रहे हैं...वह घबरा  गई...बहू की यह हालत और बेटे का कुछ पता नहीं...पास जाकर छूआ तो शरीर तप रहा था...। पहली बार आत्मग्लानि से भर उठा उनका मन...।

    कोई उपाय न देखकर अंजना की स्थिति बताते हुये दुबारा नरेश को फोन किया तो उसने कहा, ‘ आंटी, इतनी रात कोई डाक्टर आयेगा या नहीं, फिर भी मैं कोशिश करता हूँ...।’

    एक बार बेटी दीप्ति ने भी अंजना के प्रति उसके रूखे व्यवहार को देखकर कहा था,‘ माँ, रस्सी को इतना भी न ऐंठो कि वह टूट जाये...फिर यह मत भूलो कि तुम्हारे बुढ़ापे के यही सहारे हैं । आज तुम जैसा बोओगी वैसा ही पाओगी...।’

    ‘ तू अभी बच्ची है तभी ऐसा कह रही है । अगर अभी मैंने इन्हें टाइट करके नहीं रखा तो बाद में ये मेरे सिर पर चढ़कर नाचेंगे...।’ दीप्ति के उसे समझाने पर उसने उत्तर दिया था ।

    ‘ वह सब पुरानी बातें हैं...सच्चाई तो यह है कि हर संबंध प्यार दो और प्यार लो, के सिद्धांत पर टिका है, डराकर या दहशत पैदाकर आप कुछ समय के लिये भले ही उन्हें अपना गुलाम बना लो पर कभी न कभी तो उनके क्रोध का गुब्बारा फूटेगा तब उन्हें दोष मत देना ।’

    ‘ अच्छा, अब बंद भी कर अपना प्रवचन...।’ 

    उस समय उन्होंने दीप्ति को चुप करा दिया था पर आज अंजना की हालत देखकर तथा पुत्र का कोई अता पता न पाकर इस समय उसे दीप्ति का कहा एक एक शब्द सही लग रहा था...वरना सदा शांत रहने वाले तथा उसकी हर आज्ञा का अक्षरशः पालन करने वाले बेटे बहू मे इतना अंतर क्यों आया...? कहीं उसकी बेवजह की नुक्ताचीनी के कारण ही तो नहीं । 

    आज पुष्पा इस सबकी वजह स्वयं को समझने लगी थी...न ही वह इतनी कठोर या रूक्ष होती न ही भावेश घर छोड़कर जाता और न ही बहू की यह हालत होती...। आखिर किसी बात को सहने की भी एक सीमा होती है जब अति हो जाती है तो एक संवेदनशील इंसान ऐसे ही मानसिक संतुलन खो बैठता है...। उसे यह बात समझ में तो आई पर कुछ देर से...।

    लगभग आधे घंटे में नरेश डाक्टर को लेकर आया...आते ही उसने अंजना को इंजेक्शन दिया तथा समय से दवा खिलाने का निर्देश देते हुए ब्लड टेस्ट करवाने के लिये कहा । 

    भावेश का कहीं कोई पता नहीं था...इधर अंजना की तबियत ठीक होने का नाम नहीं ले रही थी...। पुष्पा जिसे अंजना के नाम से ही चिढ़ थी, अचानक उसके प्रति सहृदय होने लगीं । अंजना जब भी भावेश के लिये पूछती वह कह देती वह आफिस के काम से बाहर गया है...काम होते ही आ जायेगा । उसका मोबाइल अब भी स्विच आफ बता रहा था । अभी पुष्पा कशमकश से गुजर रही थी कि दीप्ति का फोन आया । न चाहते हुये भी उसे दीप्ति को बताना पड़ा । 

    दीप्ति ने सारी बातें सुनकर सिर्फ इतना कहा, ‘ माँ मेरी सासूमाँ की तबियत ठीक नहीं है वरना मैं आ जाती । जब तक भइया नहीं मिल जाते, तुम्हें संयम से काम लेना होगा, स्वयं के साथ भाभी को भी संभालना होगा ।’  

    जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा था झूठ बोलने के बावजूद अंजना सब समझ गई थी...। नरेश तथा उसके अन्य मित्र भी भावेश के बारे में कुछ नहीं बता पा रहे थे । अंजना पर इस बात का ऐसा असर हुआ कि उसने खाना पीना छोड़ दिया । यहाँ तक कि दवा खाने से भी उसने मना कर दिया । उसकी ऐसी हालत देखकर एक दिन वह उससे बोली,‘ बेटी, मैं तेरी दोषी हूँ , मुझसे  गलती हुई है , इसका प्रतिकार भी मुझे ही करना होगा । मुझे पूरा विश्वास है, भावेश एक दिन अवश्य आयेगा । वह तुझसे बहुत प्यार करता है आखिर कब तक वह तुझसे दूर रह पायेगा पर बेटा उसके लिये तुझे जीना होगा । यूँ खाना पीना छोड़ने से तो किसी समस्या का हल नहीं निकलेगा । कुछ दिन और देख लेते हैं वरना फिर पुलिस में कमप्लेंट करवाने के साथ पेपर में भी इश्तहार देगे...।’

    उसकी बात मानकर अंजना ने थोड़ा खाने की कोशिश की पर उसे उल्टी हो गई । ऐसा एक बार नहीं कई बार होने पर पुष्पा ने उसे डाक्टर को दिखाने का निर्णय लिया तथा वह अंजना को लेकर डाक्टर को दिखाने उनके नर्सिग होम गई...। 

    ‘ डाक्टर साहब, मेरी बहू ठीक तो है...।’ पुष्पा ने डाक्टर के चैक करने के पश्चात् पूछा ।

    ‘ हाँ...हाँ बिल्कुल ठीक है...मिठाई खिलाइये...आप दादी बनने वाली हैं...।’

    ‘ क्या...?’

    ‘ बिल्कुल सच अम्मा...आप दादी बनने वाली हैं...।’ 

    डाक्टर को दिखाकर वह कमरे से निकली ही थीं कि एक नर्स दौड़ती हुई आई तथा बगल के केबिन में घुसते हुए बोली, ‘ डाक्टर साहब, उस पेशेन्ट को होश आ गया है...।’

    ‘ सच, तुम चलो, मैं आता हूँ...।’

    ‘ क्या हुआ डाक्टर उस पेशेंट को...?’ नर्स की बात सुनकर अंजना से रहा नहीं गया, उसने डाक्टर के केबिन में घुसते हुए पूछा ।

    ‘ आप लोग कौन हैं तथा बिना इजाजत मेरे केबिन में कैसे घुस आये...?’ डाक्टर ने उसे ऊपर से नीचे तक निहारते हुए रूखे स्वर में कहा ।

    ‘ डाक्टर साहब, मेरे पति लगभग पंद्रह दिन से लापता हैं...इसलिये मैं इस पेशेन्ट के बारे में जानना चाहती हूँ ।’ अंजना ने डाक्टर की डाँट की परवाह किये बिना कहा ।

    ‘ पंद्रह दिन से लापता...लगभग इतने दिन पूर्व ही इस व्यक्ति को बुरी तरह जख्मी हालत में यहाँ लाया गया था । कोई पहचान का जरिया न होने पर हम उनके घर वालों को खबर नहीं कर पाये हैं । वह तो उस सज्जन की सज्जनता कहिए जो इसे इतनी जख्मी हालत में उठाकर लाये । वही इसके इलाज का खर्च भी उठा रहे हैं...।’ अचानक डाक्टर के स्वर में नर्मी आ गई ।

    ‘ क्या हम उससे मिल सकते है...?’ पुष्पा और अंजना ने एक साथ कहा ।

    ‘ हाँ...हाँ क्यों नहीं...।’

    वे दोनों डाक्टर के पीछे-पीछे गई...। भावेश को पाकर उनकी खुशी का ठिकाना न रहा पर भावेश ने उन्हें देखकर मुँह फेर लिया ।

    ‘ क्या आप इन्हें जानती हैं...?’

    ‘ यह मेरा बेटा भावेश है...हम पिछले पंद्रह दिन से इसे ढूँढ रहे हैं...।’ माँजी ने खुशी-खुशी डाक्टर से कहा ।

    ‘ चलो अच्छा हुआ...वरना हम इनकी आइडेंन्टी को लेकर परेशान हो रहे थे...।’ डॉक्टर ने कहा तथा समीप खड़ी सिस्टर को कुछ निर्देश देकर चला गया । 

    ‘ आज दो-दो खुशियाँ आपके दामन में समाई हैं माँजी...जमकर पार्टी दीजिए और हाँ मुझे बुलाना नहीं भूलियेगा...।’ पीछे से आवाज आई ।

    पुष्पा ने पीछे मुड़कर देखा तो वही नर्स खड़ी थी जिसने पेशेंन्ट के होश में आने की सूचना दी थी...

    ‘ आप अपना दवा का परचा वही भूल आई थीं । डाक्टर ने आवाज लगाई पर आपने सुना नहीं...लीजिए दवा का पर्चा...और हाँ पार्टी में बुलाने से नहीं भूलियेगा ।’ नर्स ने दवा का पुर्जा उसे पकड़ाते हुए पुनः कहा । 

    तुम्हें कैसे भूलूँगी...तुमने आज मुझे वह खुशी लौटाई हैं जो मुझसे मेरी गलती के कारण दूर हो गई थी माँजी मन ही मन बुदबुदाई ।

    ‘ मुझे माफ कर दे बेटा...।’ माँजी ने भावेश के बिस्तर पर बैठकर उसका मुँह अपनी ओर करती हुये कहा ।

    ‘ दूसरी खुशी कौन सी है, नहीं पूछेगा...।’

    बेटे की आँखों में प्रश्न देखकर वह फिर बोली,‘ तू पापा बनने वाला है और मैं दादी और यह खुशी मुझे मेरी बहू अंजना ने दी है...।’ कहते हुये पुष्पा ने अंजना की तरफ देखा तथा उससे कहा,‘ दूर क्यों खड़ी है, यहाँ आ न, तेरा भावेश तेरा इंतजार कर रहा है...।’

    पुष्पा अंजना भावेश के पास बैठाकर बाहर चली गईं तथा दीप्ति को फोन मिलाने लगीं । वह भी परेशान थी । बहुत दिनों के पश्चात् खुशियों ने उनके द्वार पर दस्तक दी है । वह अपनी जिंदगी जी चुकीं, बच्चों की जिंदगी में बेवजह दखल देकर अब वह ऐसा कोई काम नहीं करेंगी जिससे उनमें फिर से दरार आये । सच उन्हें आज जिंदगी से एक सबक मिला है । दीप्ति ठीक ही कहती कि प्यार देकर ही प्यार पाया जा सकता है । 


                            सुधा आदेश