Sunday, March 15, 2020
माटी की सुगंध
माटी की सुगंध
मिसेज नमिता चौधरी बंगले के आहते में बेचैनी से चहल कदमी कर रहीं थीं । आज सुबह स्वप्न में न जाने ऐसा क्या देख लिया था कि मन विचलित हो उठा था । यद्यपि वह जानती थी कि स्वप्न, स्वप्न ही होते हैं । उनका यथार्थ से कोई संबंध नहीं होता लेकिन फिर भी मन में एक अज्ञात भय उथल- पुथल मच आने लगता है और खासतौर से तब जब इंसान अकेला होता है ।
देवेश किसी केस के सिलसिले में दो दिन के लिए बाहर गए थे । उनसे फोन पर बात करनी चाहिए तो पता चला कि वह निकल चुके हैं। बच्चे विदेश में सेटल हैं बड़ा बेटा निनाद न्यूजर्सी की एक बड़ी कंपनी में कार्य कर रहा है तथा बेटी निवेदिता तथा दामाद परेश इंग्लैंड में कंप्यूटर इंजीनियर हैं । दोनों ही दूर हैं किससे अपने मन की बात कहे ।
नामिता को आज भी याद है जब निनाद ने विदेश जाने की बात की थी तब उसने अपने अकेलेपन की दुहाई देते हुए जाने से मना किया था तब उसने कहा था,‘ माॅम, आज दूरी कोई मायने नहीं रखती, यदि पैसा है तो कोई कभी भी कहीं भी आ जा सकता है ।'
लेकिन ग्रीन कार्ड न बन पाने के कारण वह पिछले चार वर्षों से नहीं आ पाया है...। आज सुबह से दो बार उसने फोन पर बात करने का प्रयास भी किया लेकिन कोई फोन उठा ही नहीं रहा था । टेलीफोन आंसरिंग मशीन पर भी संदेश छोड़ दिया था लेकिन अभी तक किसी ने भी फोन नहीं किया था । मन परेशान हो उठा तो वह उठकर चहल कदमी करने लगी ...यह उसकी पुरानी आदत है । बच्चे अगर बाहर गए होते तथा उन्हें आने में देर हो जाती तो वह बार-बार उठ कर बाहर देखती या जब तक आ नहीं जाते वही घूमती रहती थी ।
देवेश उसकी इस आदत का मजाक यह कहकर बनाते कि क्या तुम्हारे इस तरह बाहर खड़े रहने से बच्चे जल्दी आ जायेंगे…। .तब बात कहती,
' इस समय आप यदि एक माँ के अंदर चल रहे झंझावात को देख पाते तो शायद ऐसा नहीं कहते । इन विचित्र क्षणों में अपनी मानसिक स्थिति से मैं इतनी मजबूर हो जाती हूँ कि न चैन से बैठ पाती हूँ और न ही किसी काम में मन लगा पाती हूँ शायद अनहोनी की आशंका से भयभीत होकर । जानती हूँ कि यदि कभी अनहोनी घटना घटित हुई भी तो दूर रहकर शायद ही हम कुछ कर पाएं लेकिन फिर भी ना जाने क्यों एक अव्यक्त भय मन में सदैव समाया रहता है ।'
कुछ दिन पूर्व ही बहू शिवानी का ई मेल आया था, लिखा था,‘ मम्मीजी, मुझे एक अच्छा जाॅब मिल गया है, मेरा तथा निनाद का आफिस पास ही है अतः मैंने ज्वाइन कर लिया है...। जाते समय हम दिव्या को क्रेच में छोड़ देते हैं तथा लौटते हुए ले लेते हैं...। यहाँ के क्रेच बहुत अच्छे हैं, बच्चों की प्रत्येक सुविधा को देखकर उनका निर्माण किया जाता है, एकदम घर जैसा ही वातावरण ही मिलता है, अतः कोई असुविधा नहीं हो रही है ।'
बहु के मेल को पढ़कर लगा कि आज के युवा अपने अस्तित्व को लेकर इतने जागरूक हो गये हैं कि उन्हें अपने मासूम बच्चे के मनोभावों को कुचलने में भी उन्हें कोई संकोच नहीं होता....भला क्रेच में भी घर जैसा वातावरण मिल सकता है…!! लेकिन इसमें बच्चों का भी कोई दोष नहीं है भौतिकता वादी परिवेश ने लोगों की इच्छाएं , आवश्यकताएं इतनी बढ़ा दी है कि जब तक पति-पत्नी दोनों काम न करें शायद घर का खर्च चलाना भी कठिन हो जाए । फिर आज स्त्री केवल घर की चारदीवारी में घुट कर रहना पसंद नहीं करती वरन समय के साथ-साथ वह भी उड़ना चाहती है । अपनी योग्यता और क्षमता का उपयोग करना चाहती है । आत्मनिर्भर बनना चाहती है । केवल वही क्यों घर के लिए त्याग करती रहे । घर केवल उसका ही नहीं वरन पुरुष का भी है । अतः दोनों को ही घर की छोटी या बड़ी ,आर्थिक हो या सामाजिक समस्याओं को मिलजुलकर हल करना होगा और शायद उसकी या धारणा अनुचित भी नहीं है । लेकिन स्त्री पुरुष की महत्वाकांक्षा और अहम के टकराव में बच्चों की मासूम भावनाएं आहत हो रही है इसकी ओर शायद किसी का भी ध्यान नहीं है । उसे दिव्या का ख्याल आया, जब वह गई थी तब छह महीने की थी, अब तो खूब बातें करती होगी। न जाने क्रेच में उसे कैसा लगता होगा ?
नमिता को महसूस हो रहा था कि आज की स्थिति और उनके समय की स्थिति में कितना अंतर आ गया है....। उनके समय में लोग अपने लिये नहीं वरन् दूसरों के लिये जीते थे....। दूसरों की खुशी के लिये अपनी खुशी, अपने हितों का बलिदान करने में भी नहीं हिचकते थे तभी तो देवेश की माँ के पैरालिसिस होने पर देवेश के पिताजी के आग्रह पर उसके पिताजी ने उसका हाथ देवेश के हाथ में सौंप दिया था । देवेश और उसके पिताजी दोनों एक ही आफिस में काम करते थे तथा अच्छे मित्र थे...। देवेश उस समय लाॅ कर रहे थे तथा वह इंटर में थी....दोनों ही पढ़ना चाहते थे पर माँ पिताजी की आज्ञा के सामने दोनों ने ही सिर झुका दिया था ।
वस्तुतः देवेश के पिताजी ने देवेश का विवाह इसलिये शीघ्र किया था क्योंकि उन्हें लगा था कि घर में बहू आ जाने से पत्नी की बीमारी से हुई अव्यवस्था में न केवल सुधार आयेगा वरन् पत्नी तथा दो छोटी पुत्रियों की देखभाल भी उचित रूप से हो पायेगी...। नमिता ने अपनी जिम्मेदारियों को तहेदिल से स्वीकारा था तथा किसी को भी शिकायत का मौका नहीं दिया था और न ही अपनी परेशानियों का जिक्र कभी देवेश से किया था ।
घर की जिम्मेदारियों के कारण उसे उस समय अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी लेकिन देवेश को घर की चिंताओं से मुक्त कर सदा पढ़ने के लिये प्रेरित करती रही थी...। उसकी सहनशीलता और धैर्य का ही परिणाम था कि देवेश जुडीशियल मजिस्टफेट की परीक्षा में सफल रहे थे....उनकी सफलता से प्रसन्न होकर उसके श्वसुर ने उसे ढेरों आशीश देते हुए कहा था....
‘पत्नी के सत्कर्मो....सद्गुणों का प्रभाव तो पति की सफलता में पड़ना ही था । पति की सफलता में पत्नी का हाथ होता है....आज तुमने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है ।’
उससे तथा उसके धीर गंभीर स्वभाव से वह काफी प्रभावित थे । उनके अनुसार उसके कारण ही उनकी गृहस्थी सुचारू रूप से चल पाई थी....खुशी तो उन्हें इस बात की थी कि उन्हें अपने निर्णय पर पछताना नहीं पड़ा था ।
नमिता की नन्दें मीरा और नीरा उस समय मात्र आठ और दस वर्ष की थीं । उनकी समस्याओं को उसने कभी भाभी बनकर तो कभी मित्र बनकर सुलझाया था....। यहाँ तक कि विवाह पर आवश्यकता पड़ने पर उसने अपने गहने भी सहर्ष दे दिये थे....प्रतिदान में उसे उनसे उतना ही मान-सम्मान और प्यार दुलार मिला था ।
विवाह में गहने लेते समय श्वसुर ने कृतज्ञता से कहा था,‘ बेटा, जब भी स्थिति सुधरेगी, तुझे गहनों से लाद देंगे...।’
‘ पिताजी हमें तो आपका प्यार और आशीर्वाद ही चाहिए....गहनों और कपड़ों का क्या, वह तो जितने भी हों कम ही हैं ।’ उसने नम्रता से उत्तर दिया था ।
‘ काश, ऐसी बेटी समान बहू सबको मिले तो हर घर ही स्वर्ग बन जाए ।’ प्रेम से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था लेकिन लाख छिपाने पर भी वह अपनी भर आई आँखों को उससे छिपा नही सके थे ।
लेकिन उनका प्यार और आशीर्वाद ज्यादा दिन कहाँ रह पाया था....। छोटी ननद नीरा के विवाह के कुछ दिन पश्चात् ही उनका सीवियर हार्ट अटैक में निधन हो गया । माँजी तन से तो पहले ही लाचार थी अब मन से भी बुरी तरह टूट गई....। बस इतना संतोष था कि पिताजी अपनी पूरी जिम्मेदारियाँ पूरी कर गये थे....किंतु यह भी एक शाश्वत सत्य है कि बेटा बहू चाहे जितनी भी सेवा कर लें, पति का स्थान तो नहीं ले सकते...। पहले तब भी व्हील चेयर पर बैठकर अपना थोड़ा बहुत कार्य कर भी लेती थीं लेकिन अब तो वह बिस्तर से उठना ही नहीं चाहती थीं....शायद जीवन की लालसा ही समाप्त हो गई थी ।
देवेश की पोस्टिंग बनारस होने के कारण पैतृक घर किराये पर उठाकर माँजी को भी अपने साथ ले आये....। माँजी का अपनी जगह छोड़कर आने का बिल्कुल भी मन नहीं था किंतु वह इस अवस्था में अकेली कैसे रह पाती इसलिये साथ आ तो गई थी लेकिन सदा अनमयस्क रहतीं । थोड़ी-थोड़ी बात पर नाराज हो जाती तब उन्हें तथा देवेश को उन्हें बच्चों की तरह मनाना पड़ता था ।
उसी समय निनाद का जन्म हुआ....। उसकी दोनों ननदें बधाई देने आई थीं । विदाई के समय उन्होंने उन्हें यथाशक्ति साड़ी, अंगूठी तथा दोनों जीजाजी के लिये सूट का कपड़ा दिया था । दोनों रूठकर बोली,‘ भइया, यह क्या....? आज डैडी नहीं हैं तो हमारी इस घर में कोई इज्जत ही नहीं रही....। बस एक साड़ी और एक अंगूठी देकर ही मुक्ति पा ली, ससुराल में जाकर हम क्या मुँह दिखायेंगे ?’
उनकी बात सुनकर माँजी ने तुरंत अपनी चैक बुक निकाल कर दोनों को पाँच-पाँच हजार का चैक काटकर देते हुए कहा था,‘ दिल क्यों छोटा करती हो, अभी मैं हूँ न, मेरे रहते तुम्हें कभी शर्म से मुँह नहीं छिपाना पड़ेगा....। इनसे जमाई राजा के लिये एक-एक चेन खरीद लेना ।’
माँजी के शब्दों तथा चेहरे पर आये भावों को पढ़कर देवेश बहुत आहत हुए थे....। क्रोध भी आया था माँ पर....आखिर जितनी हैसियत है उतना ही तो देंगे...।प्रेम से जितना भी दिया जाए , ले लेना चाहिए, माँगकर लेना तो इंसानियत नहीं है....। उन्हें समझाना तो दूर तुरंत चैक काटकर दे दिया....देना ही था तो बाद में किसी अन्य तरीके से दे देती या उन्हीं के हाथ से दिलवातीं....। माँ से उनकी हालत छिपी तो नहीं है...। उनकी पेंशन का एक चौथाई हिस्सा तो उनकी दवा में ही खर्च हो जाता है...।
तब उसने ही देवेश की दुखती रग पर यह कहकर मलहम लगाया था कि आप दें या माँजी क्या फर्क पड़ता है किंतु आहत वह भी हुई थी....। अनजाने में मन में दरार आती जा रही थी....। अब वह पहले जैसी नहीं रही थी जितना भी करो सदा दोष निकालती ही रहती थीं ....। खासतौर पर तब, जब बेटियाँं आ जातीं । वे तीनों एक हो जाती तथा वह अलग-थलग पड़ जाती....दो बैड रूम के छोटे से घर में उन्हें ही बाहर ड्राइंगरूम में सोना पड़ता था....। वे दोनों तो मेहमान थीं अतः उनकी सुख-सुविधा का ख्याल रखना हमारा कर्तव्य था...।
माँ के अनपेक्षित व्यवहार से उसे दुखी देखकर देवेश कहते, ‘ माँ बीमारी के कारण चिड़चिड़ी होती जा रही हैं....वैसे भी नीरा-मीरा कुछ समय के लिये आती हैं अतः ध्यान मत दो....बस अपना कर्तव्य किये जाओ....।’
कर्तव्य तो वह कर ही रही थी पर माँ जी के बदलते स्वभाव को देखकर उसे लगता था कि उसका वर्षो का त्याग, तपस्या और बलिदान सब व्यर्थ होते जा रहे थे....वह चाहकर भी उनके व्यवहार में परिवर्तन का कारण समझ नहीं पा रही थी...।
बात उन दिनों की है जब निवेदिता होने वाली थी....पता नहीं क्यों उस समय थोड़ा भी ज्यादा काम करने पर वह थक जाती थी....। उसी समय माँजी की तबियत ज्यादा खराब हो गई, उनको देखने नीरा और मीरा आ गई ।
एक दिन खेल-खेल में निनाद ने नीरा की पुत्री पल्लवी को गिरा दिया, एकदम बिफर पड़ी थी नीरा....‘ इस घर में मेरे और मेरे बच्चे की कोई कद्र नहीं है....भाभी में इतनी भी तमीज नहीं है कि बच्चे को कैसी शिक्षा दी जाए ।’
आफिस से उसी समय लौटे देवेश के कानों में नीरा के शब्द पड़े, अत्यंत आहत हुए थे तथा बोले,‘ नीरा, यह तुम्हारी वही भाभी हैं जिसे तुम कभी मेरी प्यारी भाभी....अच्छी भाभी कहते हुए नहीं थकती थीं....। अपने सारे दुख-सुख आकर उसे बताती थी....यहाँ तक कि तुम्हारे विवाह में इसे अपने गहने देने में भी उसे संकोच नहीं हुआ था....। पिछले कुछ वर्षो में ऐसा क्या हो गया कि तुम्हें उसमें दोष ही दोष नजर आने लगे हैं ।’
‘ तब वह नई-नई इस घर में आई थीं, हमसे प्यार जताकर वह हमसे हमारी माँ छीनना चाहती थीं, गहने दिये तो क्या हुआ....कौन सा अहसान कर दिया....सभी की भाभियाँ करती हैं ।’
‘ तुम्हारी भी ननद हैं, देखूँगा तुम अपनी ननद के लिये कितना करती हो?’ बौखलाकर कह उठे थे देवेश ।
उस समय माँजी ने नीरा का पक्ष लेते हुए देवेश को ही बुरा भला कहा था....नीरा उसी दिन शाम की बस से दुबारा न आने की कसम खाते हुए चली गई । मीरा जब तक रही शीतयुद्ध जैसी ही स्थिति रही....यद्यपि नमिता ने अपनी तरफ से शीतयुद्ध को तोड़ने की हर संभव प्रयत्न किया पर असफल ही रही थी...।
तब उसे लगा था इंसान अपने अहंकार में कभी-कभी इतना स्वार्थी क्यों हो जाता है कि वर्षो का प्यार, स्नेह और अपनत्व को क्षण भर में भुलाकर दूसरों को तड़पने के लिये छोड़ देता है....माना उनके पास उसकी ससुराल के समान सुख-सुविधायें नहीं थी लेकिन घर तो वहीं था जिसमें उसने अपना बचपन गुजारा था...।
मन में एक बार दरार पड़ जाए तो उसे मिटाना बहुत ही कठिन होता है....शायद यही कारण था कि वे दोनों आई भी तब आई जब माँजी ने भी इस संसार से संबंध तोड़ लिये....। तेरहवीं भी नहीं हुई थी कि पिता की संपत्ति पर अपना हक जमाने लगी....आखिर पिता की संपत्ति पर लड़कियों का भी तो हक होता है....। मीरा यद्यपि ज्यादा ही समझदार थी अब उसे लगने लगा था कि माता-पिता के बाद भाई-भाभी से ही मायका बनता है अतः वह नीरा के विचारों से सहमत नहीं हो पाई थी लेकिन देवेश ने दोनों को आमने सामने बिठाकर ,पूरा हिसाब किताब दिखाकर, उसके दो भाग कर दिये थे, अपने लिये कुछ भी नहीं रखा था...।
मीरा के मना करने पर देवेश ने कहा था,‘ रूपया, पैसा जमीन जायदाद सब क्षणभंगुर है, स्थाई है तो सिर्फ प्यार, स्नेह और अपनत्व....जो पिताजी का है, वह हम सबका है....अतः बड़ा होने के नाते, मैं तुम दोनों में बराबर-बराबर बाँटता हूँ...। मना मत करो वरना मुझे दुख होगा...। एक आग्रह और है....हो सके तो बीती बातों को भुलाकर प्रेम और स्नेह के पक्के धागों में बंध जाओ क्योंकि यही धागे इंसान को बड़ी से बड़ी मुश्किलों को पार करने में सहायता देते हैं ।’
देवेश की बातों को सुनकर नीरा भी पिघल गई तथा रोते हुए हिस्सा लेने से मना करने लगी तब देवेश ने उसके सिर पर हाथ पर फेरते हुए प्यार से कहा था,‘ रो क्यों रही है पगली, मैं कोई बँटवारा थोड़े ही कर रहा हूँ, बड़ा भाई होने के नाते पिता की संपत्ति का हिस्सा ही तो उपहार में दे रहा हूँ ।’
देवेश के इस बलिदान से परिवार में फिर से एकता हो गई थी । प्रत्येक रक्षाबंधन तथा भइया दौज पर दोनों आती और हम से जो भी बन पड़ता, उनको देते । समय पर देवेश की तरक्की होती गई, रूतबे के साथ-साथ कार्यभार भी बढ़ता गया....आज वे हाईकोर्ट के जज के पद पर सुशोभित हैं ।
फोन की निरंतर बजती घंटी ने उसकी विचारतंद्रा को भंग कर दिया । फोन अमेरिका से निनाद का था....,‘ ममा, हम ठीक हैं....चिंता की कोई बात नहीं है.... मैं जानता था तुम चिंता करोगी....इसलिये मैंने शिवानी को मना किया था एक्सीडेंट के बारे में बताने को ....अब टाँके भी कट गये हैं आज से हम दोनों ने आफिस ज्वाइन कर लिया है ।’
निनाद से बात कर दिल को सुकून मिला....।। नमिता को अपनी बेचैनी का कारण अब पता चला । पुत्र या पुत्री विश्व के किसी भी कोने में क्यों न हों, कुछ भी अनहोनी होने पर माँ को अपनी आंतरिक शक्ति , छठी इन्द्रिय द्वारा आभास मिल ही जाता है । पास होते तो वह जा सकती थी किंतु इतनी दूर ...मन मसोसकर रह जाना पड़ता है ।
उसे याद आया नन्हा निनाद बीमार होने पर उसे जरा भी अपने पास से हटने नहीं देता था । वह लगभग सात वर्ष का था , उसे बुखार आ गया । उसी समय उसे अति आवश्यक कार्य से बाहर जाना पड़ा । वह उसे सुलाकर नौकर को उसके पास बिठाकर निकली तथा एक घंटे में ही वापस आ गई किंतु इसी बीच निनाद की आँख खुल गई । उसने जो हाय तौबा मचाई कि नौकर घबरा गया । निनाद का बुखार भी बढ़ गया था । उसके आने पर निनाद क्रोधित होकर बोला था…
' आप और जाइए घूमने, आपको हमारी कोई चिंता ही नहीं है ।अब आप हमसे बात भी नहीं कीजिएगा । हमको हाथ भी मत लगाइएगा । '
वास्तव में उसने काफी देर तक उसे हाथ भी नहीं लगाने दिया था । देवेश को पता चलने पर वह भी काफी बिगड़े थे और आज चाहकर भी वह नहीं जा सकती ।
तभी देवेश की कार के रूकने की आवाज सुनकर नौकर को चाय बनाने का आदेश देते हुए दरवाजा खोला, चेहरे पर छाई उदासी को देखकर वह पूछ बैठे,‘ क्या बात है, बहुत उदास लग रही हो ?’
निनाद को चोट लगने की बात सुनकर वह व्यथित हो उठे । रूपया, पैसा, नाम,शोहरत होते हुए भी इतनी दूर जा न पाने की विवशता उनके चेहरे पर स्पष्ट दिखाई दे रही थी....बात करनी चाही पर लाइन बिजी होने के कारण बात भी नहीं हो सकी ।
‘ परेशान क्यों हो रहे हैं, वहाँ तो यहाँ से ज्यादा सुविधा है, फिर वह अकेला तो नहीं है, उसकी देखभाल के लिये शिवानी तो है ही...।’ उनको परेशान देखकर नमिता ने कहा ।
‘ नमिता, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ, हमारी युवा पीढ़ी विदेश की ओर क्यों भाग रही है....!! माना हमारे देश में विदेश की तुलना में सुख-सुविधायें कम हैं लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं कि हम अपनी ही जमीन से नाता तोड़ लें...।’
‘ आप इतना क्यों सोचते हो....सबकी अपनी-अपनी सोच है, वैसे भी जो जितना उड़ेगा, उतना ही सफल होगा ।’
‘ उड़ना है तो उड़ो, लेकिन अपनी जमीन पर पर ही, इतनी भी छलांग न लगाओ कि अपने देखने के लिये भी तरसते रह जायें ।’
तभी फोेन की घंटी टनटना उठी, आवाज कमिश्नर के सेक्रेटरी की थी,‘ साहब आप कब आ रहे हैं, यहाँ सभी आपका इंतजार कर रहे हैं ।’
‘ ओह, मैं तो भूल ही गया था, अभी आधे घंटे में आ रहा हूँ ।’
‘ नमिता तैयार हो जाओ, हमें मंत्रीजी के सम्मान में दिये जा रहे भोज में सम्मिलित होने जाना है ।’
‘ आप जाइये मेरा मन नहीं है ।’
‘ मन तो मेरा भी नहीं है लेकिन कुछ सामाजिक बाध्यताओं का पालन तो करना ही पड़ेगा और फिर अभी तो तुम कह रही थीं कि निनाद ठीक है, चिंता की कोई बात नहीं है । चलो, तुम्हारा मन भी ठीक हो जायेगा....पूरे दिन घर में बोर होती रहती हो...। न जाना भी उचित नहीं होगा....न जाने लोग क्या सोचें ।’
उस समय नमिता को महसूस हुआ कि थोड़ी देर पूर्व जब देवेश चिंतित थे तब वह उन्हें समझा रही थी और अब उसके अनमयस्क होने पर वह उसे समझाने का प्रयास कर रहे हैं....। सच है उम्र के इस पड़ाव में पति-पत्नी सिर्फ पति-पत्नी ही न रहकर दुख-सुख मे एक दूसरे को संबल प्रदान करते हुए एक अच्छे मित्र....सहचर बन जाते हैं ।
नमिता जानती थी कि मना करने का कोई अर्थ नहीं है....। यदि जाना है तो जाना ही है अतः तैयार होने चली गई किंतु विवशता भरे दिल ने सोचने को मजबूर कर दिया....यह नौकरी भी क्या चीज है... जब बड़े घर की आवश्यकता होती है तो छोटे घर मिलते है और जब बच्चों के व्यवस्थित होने के पश्चात् जब पति-पत्नी रह जाते हैं तब गाड़ी, बंगला,शोफर तथा सदा सेवा के लिये नौकर की भी सुविधा मिलने लगती हैं । नित होने वाली पार्टियों में जाना भी आवश्यक हो जाता है जबकि बढ़ती उम्र के साथ होती तरह-तरह की बीमारियों के कारण खाने-पीने में भी परहेज करना पड़ता हैं और जब खाने की उम्र होती है तब घर की जिम्मेदारियों के कारण न तो बाहर खाने और न ही घूमने जा सकते थे ।
हल्की जरी के बाॅडर वाली आसमानी साड़ी पहनकर नमिता बाहर आई तो देवेश प्रसंशात्मक नजरों से कहते हुए कह उठे,‘ कौन कह सकता है कि तुम दो जवान बच्चों की माँ हो ?’
‘ हटो, आप भी...।’ वाक्य अधूरा छोड़कर अचानक ही नमिता बीस वर्षीया युवती की तरह शर्मा उठी ।
दो वर्ष ऐसे ही पंख लगाकर उड़ गये....देवेश की सेवानिवृत्ति का दिन भी आ गया....। निनाद भी महीने भर की छुट्टी लेकर आया हुआ था । वह काफी दिनों से कह रहा था कि पापा आप हमारे साथ आकर रहिए....पर हमेशा काम का बहाना बनाकर टाल देते थे किन्तु इस बार उसके आग्रह को ठुकराने का कोई बहाना भी नहीं था । सदैव के लिये जाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था लेकिन देश-विदेश घूमने की इच्छा अवश्य थी अतः उसके साथ चले आये ।
वहाँ पहुँचकर लगा कि सचमुच काफी विकसित देश है लेकिन फिर भी वहाँ की दौड़ती भागती जिंदगी से अपने देश की सीधी साधी जिंदगी अच्छी लगती...। कम से कम लोगों के पास एक दूसरे के लिये समय तो है । कभी-कभी घर उन्हें घर नहीं होटल लगता जिसमें सुख-सुविधाओं की सारी चीजें तो उपस्थित थीं लेकिन उन्हें भोगने वाला कोई नहीं था । हफ्ते के पाँच दिन सुबह से शाम तक ऐसे दौड़ते भागते कि देखकर आश्चर्य होता था । छुट्टी के दो दिन में पूरे हफ्ते के बचे काम निबटाये जाते तथा शापिंग की जाती, कभी कहीं घूमने जाना होता तो वीक एन्ड में ही जाते । घर के जिन कामों को करना हम भारतीय अपने हाथों से करना निकृष्ट समझते हैं, उन्हें दोनों पति-पत्नी बिना किसी हीन भावना के निबटाते क्योंकि नौकररूपी शख्स रखना उनके लिये कठिन ही है ।
नन्ही दिव्या के कारण ही थोड़ा मन लगा हुआ था । दादा-दादी के कारण उसे क्रेच में रहना नहीं पड़ रहा था अतः वह खुश थी...। कभी नमिता उसे लोरी गाकर सुलाती तो कभी कहानी सुनाकर....। बच्ची के साथ बच्चा बनकर उन्हें असीम खुशी मिलती....। सच कहें तो इस अनजान जगह में वही उनके जीने का सहारा थी । तभी उसकी छोटी से छोटी फरमाइश पूरी करने में वह न तो हिचकिचाते और न ही झुंझलाते ।
दीपावली आने वाली थी....नमिता ने पूजा का सामान मँगाने के लिये निनाद को लिस्ट पकड़ाई तो वह बोला,‘ माँ, यहाँ दिये घर में नहीं लगा पायेंगे और न ही पटाखे छुड़ा पायेंगे । इस अवसर पर छुट्टी न होने के कारण हम भारतीय सप्ताहांत में एक जगह इकट्ठे होकर त्यौहार मना लेते हैं तथा एक दूसरे से मिलना भी हो जाता है....हाँ घर में थोड़ी बहुत पूजा करना हो तो कर लेना ।’
निनाद का उदासीन भाव से कहना नमिता को विचलित कर गया, कहीं कुछ दरक गया मन में....। विदेशों में आकर जहाँ हम भारतीय वहाँ के रीति रिवाज अपनाते जा रहे हैं वहीं कहीं अपनी संस्कृति को भूलते तो नहीं जा रहे....।
उसे याद आये वह दिन जब वह दीपावली के महीने भर पूर्व ही घर की साफ सफाई प्रारंभ हो जाती थी । वहीं हफ्ते भर पूर्व ही विभिन्न पकवान बनने प्रारंभ हो जाते थे । सबके लिये नये कपड़े बनते,मिट्टी के दिये के साथ-साथ बिजली के बल्बों से घर जगमगा उठता था । देवेश को पटाखे छुड़ाने का अत्यंत ही शौक था । निनाद और वह मिलकर न जाने कितने ही रुपये आतिशबाजी में उड़ा देते थे किर भी अनंत को संतोष नहीं होता था....आज वही निनाद इतना उदासीन हो गया है...।
नमिता को सदा ही पटाखों पर इतना पैसा खर्च करना अपव्यय लगता था, उसके विरोध करने पर देवेश कहते,‘ इंसान कमाता किसलिये है, खुशियाँ प्राप्त करने के लिये ही न, और यदि मुझे इससे खुशी मिलती है तो मैं इसे अपव्यय नहीं समझता ।’
बच्चों के जाने के पश्चात् भी वह हर वर्ष पटाखे खरीदते थे लेकिन वह स्वयं न छुड़ाकर अनाथाश्रम में दे आते....। उनके द्वारा दिये पटाखों और मिठाई को पाकर बच्चों के चेहरे पर जो खुशी झलकती, वह उन्हें अत्यंत सुकून पहुँचाती थी । नमिता के कहने पर कभी फुलझड़ी छुड़ा लेते तथा कहते,‘ नमिता, अब तो रस्म ही निभानी है, अकेले रहकर भी कहीं दीवाली मनाई जाती है....!! वास्तव में दीपावली तो मन की उमंग,उल्लास,प्रेम और सद्भाव का त्यौहार है यदि मन में प्रसन्नता है तो हर दिन हर रात दीवाली है वरना दीवाली एक काली अँधियारी रात के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है ।’
यहाँ रहकर तो रस्म अदाइगी भी नहीं हो पाई । मन व्यथित हो उठा था....अपने देश की मिट्टी की सुगंध उन्हें विचलित करने लगी थी....पीढ़ी अंतराल था या पीछे छूटे रिश्तों का अपनापन, वे दोनों ही वहाँ के वातावरण में सहज अनुभव नहीं कर पा रहे थे ।
कुछ दिन बेटी दामाद...निवेदिता और विकास के पास जाकर रहे पर वहाँ भी वही भाग दौड़, मन उब गया था....। पता नहीं इंसान पैसे के पीछे इतना पागल क्यों है....? भारत में तो एक कमाता है....चार खा लेते हैं पर यहाँ तो सब कमाते हैं....। किसी के पास किसी के लिये समय ही नहीं है....बच्चे भी मीट्रिक करने के पश्चात् अपना खर्च स्वयं उठाने लगते हैं.... शायद यही नजरिया उन्हें अपनों से दूर ले जाता है....। आखिर वापस लौटने का अपना फैसला सुना दिया । पहले तो निनाद और शिवानी ने रोकने की कोशिश की लेकिन उनकी जिद देखकर लौटने की टिकट बुक करा दी ।
जैसे-जैसे लौटने के दिन पास आते जा रहे थे उनकी प्रसन्नता बढ़ती जा रही थी । अपने सभी रिश्तेदारों तथा परिचितों के लिये उपहार ले जाना चाहते थे अतः हफ्ते भर तो वह एक डिपार्टमेंन्टल स्टोर से दूसरे डिपार्टमेंन्टल स्टोर के चक्कर काटते रहे फिर भी शापिंग पूरी होने का नाम नहीं ले रही थी ।
एक दिन निनाद और शिवानी आफिस गये हुए थे, अचानक देवेश बोले,‘ न जाने क्यों आँखों के आगे अँधेरा छाता जा रहा है.....। दिल घबड़ा रहा है....। देखते ही देखते पूरा शरीर पसीने से नहा गया । निनाद को फोन किया किंतु जब तक कोई आ पाता....पंक्षी पिंजड़ा छोड़कर उड़ गया....। वह चीख-चीख कर रोई पर इस बेगाने देश में कोई उनकी आवाज सुनने वाला ही नहीं था । निनाद और शिवानी के आने तक उनकी चीखें भी बंद हो गई थी....। कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं थी । डाक्टर ने आते ही उन्हें मृत घोषित कर दिया । निनाद और शिवानी भी स्तब्ध रह गये थे । निवेदिता को फोन किया तो वह फोन पर ही रो पड़ी...।
निनाद ने शवगृह की वैन को बुलाकर, अपने दो चार मित्रों के साथ अंतिम संस्कार कर दिया । सब कुछ कितना शांत और सहज था....न कोई सांत्वना देने वाला और न ही कोई आँसू पोंछने वाला...। कहते हैं इंसान मौत को नहीं वरन् मौत इंसान को खींच लाती है....दो दिन बाद ही वह अपने देश की धरती पर पैर रखने वाले थे किंतु विधि के विधान को कौन टाल पाया है....? पूरी दुनिया को अपनी अपनी मुट्ठी में कैद करने का स्वप्न देखने वाला इंसान यहीं आकर मजबूर हो जाता है ।
टिकट कैंसिल करवाये गये । तीसरे दिन हवन संस्कार कर सामान्य काम-काज ऐसे शुरू हो गये मानो कुछ हुआ ही न हो....निवेदिता तथा विकास भी आये....निवेदिता को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि डैडी नहीं रहे....कुछ दिन पूर्व डैड जब उसके घर से आये थे तब उसने सोचा भी नहीं था कि वह उन्हें आखिरी बार देख रही है....उसके आने से स्मृतियों के घाव तेज हो गये किंतु फिर भी सूनी आँखें सूनी ही रही....वह भी कुछ दिन रहकर चली गई ।
घर में रह गई नमिता और यादें जीवन साथी की....दिन होता, रातें होती किंतु आँखों से नींद गायब हो गई थी । कभी अपरिचितों की तरह निहारती रह जाती दिव्या का प्यार भरा आवाहन भी उसके दिल की सूखी नदिया में हिलोर पैदा करने में असमर्थ हो गया था । उनकी ऐसी हालत देखकर निनाद और शिवानी भी समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें ? अनेक डाक्टरों को दिखाया लेकिन कोई रोग हो तो समझ में आये....आखिर मनोरोग विशेषज्ञ से सलाह ली, उन्होंने केस स्टडी करने के पश्चात् कहा,‘ इस जमीन ने इनके पति को निगल लिया है अतः यहाँ रहना इन्हें अभिशाप लगने लगा है....स्थान परिवर्तन से शायद इनकी स्थिति में कुछ सुधार आ पाये ।’
‘ माँ, भारत चलोगी...।’ एक दिन निनाद ने पूछा ।
‘ सच कह रहा है, मुझे मेरे देश ले चलेगा....बहुत याद आती है तेरे पिताजी की, वे वहाँ मिल जायेंगे ।’ कहते हुए वह बच्चों की तरह खिल उठी ।
सचमुच भारत पहुँचकर उन्हें जीवनदान मिल गया । उनके आने का समाचार सुनकर नीरा ,मीरा तथा अनेक रिश्तेदार और परिचित आये....। महीनों से रूके आँसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे.....। लगता था कि सूखी नदी में बाढ़ आ गई है, उस बाढ़ के साथ मन के गिले शिकवे, दुख बहते चले जा रहे थे....। अपने चारों ओर अपने हमदर्दो की भीड़ देखकर उन्हें लग रहा था कि इतनी बड़ी दुनिया में वह अकेली नहीं हैं ।
घर की एक-एक ईट में उन्हें देवेश की झलक दिखाई देती, उन्हें सदा अपने पास ही पाती तो उनका दर्द कम हो जाता । उनका पुराना नौकर नंदू मालकिन-मालिकिन कहते उनकी सेवा में लगा रहता वहीं उसकी पत्नी चमेली कभी उनके हाथ पैर दबाती तो कभी उनके सिर में तेल लगाने लगती....। नंदू और चमेली उनके पुराने नौकर ही नहीं उनके घर के सदस्य जैसे ही थे....। नमिता ने भी समय-समय पर उनकी सहायता की थी तथा अपने घर के सर्वेन्ट रूम में उनके रहने इंतजाम कर दिया था । उनके प्रयासों के कारण ही उनके बच्चे पढ़कर अच्छी नौकरी में लग गये थे पर वे दोनों ही अपने बच्चों के पास न रहकर उनके पास ही रहना चाहते थे....उनका कहना था जीवन की सवेरा जिनके साथ बिताया उन्हीं के साथ साँझ भी बितायेंगे ।
‘ ममा, अब चलो, यहाँ सबसे तो मिल लीं ।’ माँ की ठीक स्थिति देखकर एक दिन निनाद ने कहा ।
‘ बेटा, तू जा मैं यही रहूँगी ।’
‘ ममा, तुम अकेली कैसे रहोगी....? तुम्हारा स्वास्थय भी ठीक नहीं रहता....फिर यहाँ तुम्हारी देखभाल कौन करेगा ?’
‘ अरे, पगले, मैं अकेली कहाँ हूँ....इस घर में तेरे डैडी की यादें बसी हुई हैं....अड़ोसी-पड़ोसी नाते रिश्तेदार सब तो यहीं हैं, मेरी सेवा के करने के लिये नंदू और चमेली हैं ही....और अब मुझे किस चीज की आवश्यकता है ?’ नमिता ने सहज स्वर में कहा ।
‘ लेकिन ममा....,’
‘ देख बेटा, जिद मत करना, उनकी यादों के सहारे जीवन काट लूँगी पर जिस धरती ने मेरा सुहाग छीन लिया, उस धरती पर फिर कदम नहीं रखूँगी....वैसे भी बेटा, अपने देश की माटी जैसी सुगंध और कहीं नहीं है....मैं चाहती हूँ कि मेरी नश्वर देह उसी देश की माटी में समर्पित हो जहाँ के अन्न जल से यह फली फूली है...।
समय पंख लगाकर उड़ रहा था....। रूपये पैसे की कोई कमी नहीं थी....पर फिर भी अकेलापन काट खाने को दौड़ता था....। देवेश की मृत्यु के पश्चात् वह अकेली रह गई थी....आखिर कब तक अड़ोसी पड़ोसी उनका दुख बाँटते....। वैसे सब सुख के साथी हैं, .दुख तो इंसान को अकेले ही काटना पड़ता है....। स्वयं पर नजर डाली तो पाया....वह अभी चुकी नहीं हैं....। चाहे तो बहुत कुछ कर सकती हैं....वरना उनका खाली तन-मन शीध्र ही शिथिल होता जायेगा....। अचानक उसने एक निर्णय ले लिया था कि अब वह श्रीमती मेहता....चीफ जस्टिस मेहता की बेबा बनकर नहीं वरन् नमिता मेहता बनकर जीयेगी....। पहले तो यह न करो वह न करो की बंदिश थी....। अब सब बंदिशें देवेश के जाने के साथ ही समाप्त हो गई हैं....उन्होंने कभी फैशन डिजाइनर का कोर्स किया था पर पहले समय की कमी के कारण तो बाद में स्टेटस के कारण अपनी हाॅबी को पूरा नहीं कर पाई थीं...।
नमिता अपनी हाॅबी को पूरा करने में जुट गई । प्रारंभ में उन्हें कुछ परेशानी हुई पर धीरे-धीरे सब सहज होता गया । अपनी सहायता के लिये नमिता ने दो लड़कियाँ रख ली थीं....। थोड़े से समय के अंदर ही उसने अपने ही घर के हाॅल में अपनी ड्रेसेज की प्रदर्शनी आयोजित की....। रिसपान्स इतना अच्छा मिला कि वह स्वयं आश्चर्यचकित रह गई....। सारी की सारी ड्रेसेस बिकने के बाद उसे कई अच्छी रेडीमेड कपड़ों की दुकानों से आडॅर मिल गये....। इन आडॅर को पूरा करने के लिये अपना स्टाफ बढ़ाना पड़ा....अंततः उसने अपना बुटिक खोल लिया...।
कई बार निनाद और शिवानी ने उसे अपने पास आने के लिये कहा पर उसके पास समय ही कहाँ था जो जाती....। प्रियेश के होने के समय पुरानी सारी बातों को भुलाकर उसने जाना भी चाहा पर उन्हीं दिनों उनके शहर की एक लड़की अपूर्वा मिस इंडिया चुन ली गई । उसे मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में भाग लेने जाना था, उसने अपनी ड्रेसेज बनाने का जिम्मा उसे सौंपा था अतः जा नहीं पाई...। बीच-बीच में निनाद और निवेदिता आकर मिल जाते....। उन्हें माँ को इस उम्र में इतनी मेहनत और लगन से काम करते देखकर आश्चर्य होता था....तब उन्हें लगता सच काम करने की कोई उम्र नहीं होती....वस्तुतः इंसान तन से नहीं मन से बूढ़ा होता है ।
वैसे लगभग हर दिन ही निनाद फोन करता रहता था लेकिन पिछले एक हफ्ते से उनका फोन खराब पड़ा था....। टेलीफोन डिर्पाटमेंन्ट में कई बार कंप्लेंट करने के बावजूद अभी तक ठीक नहीं हुआ था । उसका मोबाइल भी चार्ज नहीं हो रहा था शायद बैटरी खराब हो गई थी । उसे भी बदलवाना था । निनाद की कोई खबर न मिलने पर नमिता परेशान थीं....आखिर निनाद को मैसेज देने के लिये उसने कम्प्यूटर में ई-मेल साइट खोली ही थी कि स्क्रीन पर उसका मैसेज दिखाई दिया....माॅम, मैं इंडिया आ रहा हूँ...शायद हमेशा के लिये....। माँ मैं दिव्या और प्रियेश को अपनी धरती पर अपनी संस्कृति के साथ पालना चाहता हूँ....माना यहाँ रूपया....पैसा, सुख सुविधा सब कुछ है पर संस्कार नहीं....। जानती हो माँ, कल दिव्या डेंटिग पर जा रही थी ,शिवानी ने पूछा तब उसने बताया....। न जाने देने पर उसने खूब हाय तौबा मचाई....। हम सबकी यहाँ यही स्थिति है न अपनी मानसिकता छोड़ पाते है और न वहाँ की मानसिकता अपना पाते हैं । आखिर ऐसे दोराहे पर कब तक खड़े रहेंगे...? मैंने सोच लिया है अब और नहीं रहूँगा....कहीं बहुत देर न हो जाए इसलिये हमने भारत लौटने का निर्णय ले लिया है ।’
पढ़कर नमिता की आँखों में आँसू भर आये....खुशी या गम में यह आँखें पता नहीं क्यों भर आती है....? लिखा....आ जाओ बेटा, यहाँ भी काम की कोई कमी नहीं है....। तुम्हारी धरती, तुम्हारी जमीन तुम्हारा इंतजार कर रही है... लिखकर उसने मेसेज भेज दिया था । कंप्यूटर बंदकर कुर्सी पर बैठे-बैठे आँखें बंद कर ली....आखिर शाख का पंक्षी शाख पर लौट ही आया....निज माटी की सुगंध उन्हें खींच ही लाई, सोचकर उन्होंने संतोष की सांस ली ।
सुधा आदेश
Tuesday, March 3, 2020
अनबूझ पहेली है जीवन
अनबूझ पहेली है जीवन
जीवन एक ऐसी पहेली है जिसका उत्तर ढूंढते ढूंढते पूरी उम्र गुजर जाती है पर फिर भी उसका उत्तर इंसान को नहीं मिल पाता । रिश्तो के चक्रव्यूह में फंसा मानव ना सबको खुश रख पाता है और ना ही स्वयं खुश रह पाता है । अक्सर ऐसा होता है कि हम अड़ोसी पड़ोसी से तो स्नेहिल व्यवहार करते हैं पर जहाँ खून के रिश्तो की बात आती है हम उनसे बिना यह जाने अपेक्षा करने लगते हैं कि हम स्वयं उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतर भी पा रहे हैं या नहीं । बस यही से रिश्तों में दरार पैदा होने लगती है । जरा जरा सी बात पर दोषारोपण करना आम बात होती जाती है । इसी के साथ तकरार प्रारंभ हो जाती है । इस तकरार में यदि कोई किसी अनुचित बात पर अपनी प्रतिक्रिया प्रकट करता है तो उसे घमंडी, अहंकारी कहा जाता है ...अगर कोई संस्कारी व्यक्ति रिश्तो का सम्मान करते हुए चुप रहता है तो उसे नासमझ या कमजोर मान लिया जाता है . ..उसका मानसिक शोषण करने से भी तथाकथित अपने ही बाज नहीं आते । स्थिति तब भयावह हो जाती है जब व्यक्ति अपने पालकों के प्रति निःस्पृह हो जाता है । उसे उनके दुख दिखाई नहीं देते या यूँ कहिए वह उनका भार उठाने हेतु अपने सुखों की बलि नहीं चढ़ाना चाहता ।
दोनों ही स्थितियां एक सच्चे ईमानदार पारिवारिक एवं सामाजिक मूल्यों के प्रति समर्पित व्यक्ति के लिए असह्य हैं । इंसान को इन समाजिक परिस्थितियों के बीच रहते हुए जीवन यापन करना पड़ता है । एक सच्चा और निस्वार्थ इंसान रिश्तो को बनाए रखने के लिए खून के घूंट पीकर भी न सिर्फ रिश्ते निभाता है वरन उन्हें बचाए रखने के लिए सर्वस्व अर्पित करने का प्रयास करता है क्योंकि उसके लिए रिश्ते दुनिया की सर्वश्रेष्ठ अमानत है । कुछ लोग कहते हैं सम्मान खोकर , रिश्ते निभाना स्वयं को स्वयं की नजरों से गिराना होता है पर सच तो यह है अगर ऐसा करके भी हम रिश्तो को बचा पाए तो यह इंसान की हार नहीं जीत ही होगी..आखिर अपनों के बीच मान अपमान कैसा ? अगर जीवन में रिश्ते ही नहीं रहे तो जीवन, जीवन नहीं पाषाण बन जाएगा ।
पाषाण तो बन ही गया है मानव, ऐसे रिश्ते निभाते निभाते । तभी उसे अपनों के दुख दिखाई नहीं देते तथा दूसरों के सुखों से ईर्ष्या होती है । संवेदनहीनता की पराकाष्ठा इतनी हो गई है कि वह कामयाबी का रास्ता स्वयं अपने परिश्रम से नहीं वरन दूसरों की राह में रोड़ा अटका कर पाना चाहता है । शायद वह यह समझकर भी नहीं समझना चाहता कि जो कामयाबी मेहनत से प्राप्त नहीं की जाती वह स्थाई नहीं होती । कुतर्कों के जाल में फंसे ऐसे इंसान अपनी शारीरिक क्षमता सकारात्मक कार्यों के बजाय नकारात्मक कार्यों में जाया करने से बाज नहीं आते ।
यह तो हुई इंसान की संवेदनहीनता की बात ...पर हमारे समाज में आज भी कुछ परंपराएं , प्रथायें, अंधविश्वास इस कदर व्याप्त है कि जाने-अनजाने कितने ही मासूमों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है पर फिर भी वे ऐसी घटनाओं को दैवी प्रकोप मानते हैं । ऐसे व्यक्ति डॉक्टर के पास जाने की बजाय , गाँव के ओझा के कहने पर झाड़-फूंक का सहारा लेते हैं । समाज में व्याप्त इस घुन से तभी निजात पाई जा सकती है जब देश के कोने -कोने में शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार हो । शिक्षा न केवल व्यक्ति को सभ्य एवं सुसंस्कृत बनाती है वरन उनके विचारों में परिपक्वता लाकर दुनिया को देखने , समझने एवं तदनुसार आचरण करने के नजरिए में भी बदलाव लाती है । अगर हममें से प्रत्येक इंसान एक अनपढ़ को शिक्षित करने का बीड़ा उठा ले तो समाज में व्याप्त अशिक्षा से मुक्ति पाई जा सकती है ।
प्रत्येक इंसान के जीवन में कभी-कभी कुछ ऐसे भी पल आते हैं जब इंसान निराशा में डूब जाता है । उसे अपने आगे पीछे अंधेरा ही अंधेरा नजर आने लगता है । निराशा और सिर्फ निराशा ही उसके जीवन का हिस्सा बनती जाती है । ऐसे समय में यह न भूलें कि दिन-रात जीवन चक्र के हिस्से हैं । अंधेरा कितना ही घना क्यों ना हो कुछ समय अंतराल के पश्चात प्रकाश, अंधकार को चीरकर तन- मन को प्रफुल्लित कर ही देता है । कभी भी किसी भी परिस्थिति में अपना हौसला टूटने मत दीजिए क्योंकि जब जीवन का एक रास्ता बंद होता प्रतीत होता है तब कोई दूसरा रास्ता अवश्य खुल जाता है अतः अपनी सूझबूझ के साथ दूसरा रास्ता खोजने का प्रयत्न कीजिए मंजिल ना मिले हो ही नहीं सकता ।
माना पथ है
कंटकाकीर्ण,
मंजिल है दूर
हौसला हो गर
बना ही लेंगे
आशियाना अपना ।
सुधा आदेश
आंदोलित है मन
आंदोलित है मन
जैसा मैंने अब तक सुना समझा और जाना है, लेखक संवेदनशील होता है । शायद यही कारण है दुनिया में घटती कोई भी अच्छी घटना उसे सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करती है वहीं बुरी घटनाओं की नकारात्मक ऊर्जा उसके तन-मन को आंदोलित कर देती है ...पर पिछले कुछ दिनों की घटनायें मन को आंदोलित कर रही हैं...क्या लेखक वामपंथी या दक्षिणपंथी होता है ? क्या अपनी विचारधारा के चश्मे से ही वह समाज में व्याप्त अनाचार और दुराचार के विरुद्ध लेखनी चलाता है... वरना सबका साथ सबका विकास का नारा देने वाली सरकार द्वारा दोनों सदनों में पारित विधेयक का ऐसा विरोध...ऐसी हिंसा !!!
माना ऐसी हिंसाएं पहले भी होती रही हैं क्योंकि कोई भी समाज अचानक असहिष्णु नहीं होता । विचारणीय प्रश्न यह है कि इन हिंसाओं से फायदा किसे होता है ? आम आदमी को अपनी रोजी -रोटी से ही फुर्सत नहीं है वे इन आंदोलनों में भाग ले ही नहीं सकते । यह कौन स्वार्थी तत्व हैं जो हमारे देश के सामाजिक ढांचे को तोड़ने के साथ सामाजिक एकरसता को छिन्न- भिन्न करने में लगे हैं ।
अगर हमें देश को विकास के रास्ते पर ले जाना है तो इन स्वार्थी तत्वों को पहचान कर इन्हें नेस्तनाबूद करना होगा । किसी एक व्यक्ति या दल पर हिंसा का ठीकरा फोड़ने से काम नहीं चलेगा ।
एक बात और क्या ऐसी घटनाएं पहले इस देश में नहीं हुई थीं ? क्या समाज में अचानक असहिष्णुता पैदा हो गई? जनसमाज तो वही है जो आज से दशकों पूर्व था । एक आदमी अचानक देश में अराजकता कैसे फैला सकता है ?
अगर ऐसा हुआ है तो उसमें उस आदमी या दल का नहीं वरन समाज का दोष है । समाज एक दिन में नहीं बनता, उसे बनने में सदियाँ लग जाती है ।
यह सच है कि हर व्यक्ति अपनी-अपनी विचारधारा अपनाने को स्वतंत्र है पर लेखक का दायित्व आम जन से अलग है । उसे निष्पक्ष रहते हुए समाज के उत्थान तथा भाईचारे के महत्व को ध्यान रखते हुए अपनी लेखनी को बल प्रदान करना चाहिए । लेखक को समाज को जोड़ने का प्रयत्न करना चाहिये न की तोड़ने का । आज मुझे यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है कि हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी समाज को जोड़ने की बजाय अपनी करनी से देश में नफरत भड़काने का कार्य कर रहे हैं ।
सदियों से हम आपस में ही लड़ते रहे...शायद इसी कारण हमें गुलाम रहना पड़ा । जो देश या देशवासी अपनी मूल जड़ों से नाता तोड़ लेते हैं, अपनी ही संस्कृति पर गर्व करने के बजाय उसका मज़ाक बनाते है वह देश या समाज कभी उन्नति नहीं कर सकता । शायद अपनी इसी कमजोरी के कारण ही हम पिछड़े रह गए..। हमारे देश को दो दलीय व्यवस्था होनी चाहिये...कांग्रेस ने 60 वर्षो तक इस देश में शासन किया है फिर भी हम पिछड़े है...आखिर क्यों ?
किसी दल का विरोध करते हुए यह मत भूलिये कि कोई भी व्यक्ति चाहे वह नरेंद्र मोदी हो या कोई और , जब तक सबको साथ लेकर नहीं चलेगा,शासन नहीं कर पाएगा । एक को संतुष्ट करने के प्रयास में दूसरे को असंतुष्ट कर सामाजिक भेद-भाव की प्रवृत्ति असहिष्णुता को ही जन्म देगी जो किसी भी देश और समाज के लिए घातक है ।
सुधा आदेश
Monday, March 2, 2020
मन की बात
मन की बात
हमारा देश प्राचीन विराट सांस्कृतिक विरासत एवं परंपराओं वाला देश है । इस देश में कण-कण में भगवान व्याप्त हैं , की मात्र अवधारणा ही नहीं है , पूजने की परंपरा भी रही है । जहाँ हमारे शास्त्रों में पुरुष रूप में ब्रह्मा, विष्णु ,महेश पूजनीय हैं वहीं स्त्री रूप में लक्ष्मी , सरस्वती और दुर्गा भी है । पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव में पिछले कुछ वर्षों से हमारी युवा पीढ़ी दिग्भ्रमित होती जा रही है । वह अपनी प्राचीन परंपराओं को अक्षुण्ण रखने की बजाय उन्हें तोड़ने पर आमदा है । वह भूल रही है कि किसी देश की पहचान उसकी सांस्कृतिक धरोहरों से होती है जब धरोहरें ही नहीं रहीं तो देश कहाँ बचेगा !!
जिस देश में रानी लक्ष्मीबाई ,अहिल्याबाई होलकर जैसी वीरांगनायें, इंदिरा गांधी ,सुचेता कृपलानी, सुषमा स्वराज जैसी राजनीतिज्ञ, अरुंधति राय, किरण बेदी, चंद्रा कोचर इंदिरा नूई जैसी प्रशासनिक, कल्पना चावला ,सुनीता विलियम जैसी भारतीय मूल की अंतरिक्ष यात्री, पी.टी. ऊषा , मैरी कॉम, पी.वी. सिंधु जैसी अनेक खिलाड़ी तथा लोपामुद्रा , गार्गी जैसी अनेक विदुषियां हुई हैं, उस देश में 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ ' जैसा नारा जहाँ आश्चर्यचकित करता है वही मन को दुखी भी कर देता है । यह जानते हुए भी कि नारी हमारी सृष्टि की अनुपम कृति है ,वह जीवनदायिनी है... उसके बिना संसार संभव ही नहीं है । हम क्यों नहीं उसके हृदय के कोमल तन्तुओं को समझ पाते ? क्यों सदा उसे उपभोग की वस्तु समझते रहे ? जब चाहा उसे सीने से लगा लिया जब चाहा बेरहमी से उसकी भावनाओं को कुचल दिया । शायद कोई भी इस प्रश्न का उत्तर ना दे पाए कि हमारी मानसिकता में बदलाव कब क्यों और कैसे आया ।
माना समाज के कुछ लोग पूरे समाज का दर्पण नहीं हुआ करते पर यह भी सच है कि आज नकारात्मक विचार ही पूरे समाज में हावी है । तीन चार वर्ष की बच्ची से लेकर सत्तर वर्ष की स्त्री भी इन नर पिचाशों की हवस से बच नहीं पा रही हैं । पुरुषों के सौ गुनाह भी माफ है ...समाज में प्रचलित इस उक्ति के कारण पुरूष तो घिनोना से घिनोना काम करके भी बच निकलता है पर स्त्री को संपूर्ण जीवन अनकिए अपराध की सजा भुगतनी पड़ती है । समाज भी स्त्री को ही दोषी ठहराता है ...मसलन अकेली क्यों जा रही थी ? अब स्त्रियां ही अपने हाव-भावों से पुरुषो को निमंत्रण दे तो पुरुष बेचारा क्या करे ? ना जाने कितनी ही बेसिर पैर की बातें और दलीलें ...।
आखिर ऐसा क्यों ? क्या इस संसार में पुरुषों को ही अपनी इच्छा अनुसार जीने का हक है ,स्त्रियों को नहीं ? आखिर यह कैसी सामाजिक व्यवस्था है जिसमें स्त्री -पुरुष को एक ही गाड़ी के दो पहिए कहने के बावजूद , उनमें भेद किया जाता है । लड़के के होने पर खुशियां तथा लड़की के होने पर मातम मनाया जाता है । इन सब बातों के लिए सिर्फ समाज को या पुरुषों को दोष देने से काम नहीं चलेगा ...कहीं ना कहीं इसके लिए स्त्रियां भी दोषी हैं । लड़कियों को तो वे हजार पहरे में रखती हैं । यह न करो , वह न करो की तमाम बंदिशें लगाती हैं जबकि लड़कों को वे खुली छूट देती हैं । लड़कों को वे मर्यादा में रहने और नैतिकता का पाठ पढ़ाने में चूक जाती हैं । अगर वे लड़के-लड़की में भेद करना बंद कर दें लड़कियों के साथ लड़कों को भी नैतिकता और सदाचार की उचित शिक्षा दें तो वह दिन दूर नहीं समाज की मानसिकता बदलने के साथ लड़कियों के प्रति कटुता अनाचार दुराचार की प्रवृत्ति में कमी आ जाये ।
इसके साथ ही युवावस्था में कदम रखती लड़कियों से विनम्र निवेदन है कि वह स्वयं को प्रदर्शन की वस्तु न बनायें । माना सौंदर्य व्यक्ति की खूबसूरती में चार चाँद लगाता है पर सुंदरता का भोंडा प्रदर्शन वितृष्णा ही पैदा करता है । प्रदर्शन करना है तो अपने आंतरिक सौंदर्य एवं अपने अंतर्निहित योग्यता का करें । स्वयं को इतना सबल एवं योग्य बनाए कि लोग आपकी योग्यता से प्रभावित होकर स्वयं आपकी प्रशंसा के लिए बाध्य हों । इसके साथ ही अपने आत्मसम्मान के साथ कभी समझौता ना करें । अगर कभी आपको ऐसा लगे कि आपका मानसिक या शारीरिक शोषण हो रहा है तो उसे चुपचाप सहन करने की बजाय उसके विरुद्ध आवाज़ उठायें ।। यह न भूलें कि जब तक आप स्वयं का सम्मान नहीं करेंगी , कोई दूसरा भी आपका सम्मान नहीं करेगा ।
नारी परिवार की धुरी है वह जैसा चाहे वैसे ही समाज का निर्माण कर सकती है । कहते हैं बच्चे का पहला शिक्षक माँ होती है । अगर शिक्षक की मानसिकता ही दोषपूर्ण भेदभाव वाली होगी तो बच्चे का स्वस्थ विकास नहीं हो पाएगा । बच्चा ही अगर प्रदूषित मानसिकता का होगा तो स्वस्थ समाज का निर्माण संभव ही नहीं है । जब तक समाज स्वस्थ नहीं होगा तब तक स्वस्थ देश की कल्पना अकल्पनीय ही होगी । अंत में इतना कह इतना ही कहना चाहूँगी अगर हम स्वयं की मानसिकता को बदलने में कामयाब हो पाए तो समाज स्वयं ही बदल जाएगा ।
लड़कियाँ भार नहीं उपहार हैं ,
सृष्टि की रचयिता घर की बहार हैं ।
मत कुचलो, समझो महत्व उनका
तुम्हारा गुलशन इनसे ही गुलजार है…।
मानो या न मानो जीत ही लेंगी जंग अपनी
सामर्थ्य उनमें, आज नहीं वे लाचार हैं ।
सुधा आदेश
Thursday, February 27, 2020
मन
मन
मन सा चंचल, मन सा दुर्गम, मन सा गतिशील, मन सा स्थिर, जग में जड़ या चेतन कोई नहीं है । मन हंसे तो जग हंसे, मन कलपे तो जग कलपे... मन की अबाध गति को आज तक कोई नहीं समझ पाया है ।कभी बड़ी से बड़ी घटना पर मन कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करता तो कभी एक छोटी सी घटना दुख के सागर में डुबो देती है । मन तो मन है फिसला तो हंसी का कारण बन गया अगर सत्कर्म में लिप्त रहा तो जहां को एक नई रोशनी दे गया । सबसे बड़ी बात मन जैसा चाहे वैसा होता रहे तो सब ठीक वरना एक चिंगारी आक्रोश की दुनिया को तहस-नहस करने की क्षमता रखती है ।
सुख -दुख को महसूस करने वाला मन ही वास्तव में मन कहलाने का अधिकारी है । मन में उमड़ते-घुमड़ते विचारों से भरा पूरा मन कभी अपने निकटस्थ संगी साथियों से अपने मन की बात बताते हुए कहता है प्लीज, किसी से ना कहना ...तो कभी सामाजिक विषमता रूढ़िवादिता तथा ढकोसला से आहत मन परंपराओं को चुनौती देता अपनी चुनी अलग राह पर चलते हुए कहता है आई डोंट केयर .. ।
समाज में व्याप्त टूटन ,घुटन, संत्रास ,भेदभाव ,अविश्वास तथा विश्वासघात का मन मूक दर्शक बनता जा रहा है । दर्द है मन के संवेदनशून्य होने का, एक दूसरे की भावनाओं को न समझ पाने का ...सामाजिक व्यवस्था के प्रति आक्रोश मन को सदा उद्वेलित करता है । दर्द से ही जीवन की उत्पत्ति होती है इससे भला कौन अपरिचित है पर अपने संसार सागर में खोए हम सभी सब अपनी ही चिता करते हैं दूसरों की नहीं । जिस दिन हम दूसरों के सुख-दुख की चिंता करने लगेंगे, सच मानिये उस दिन हम अपनी नजरों में ही संसार के सबसे सुखी प्राणी बन जायेंगे। मत भूलिये…
संसार सागर रंग -बिरंगा प्यारा -प्यारा गुलदस्ता
मुख न मोड़ बंदे ,राह आयें चाहे कितने भी मोड़
मेरी तुम्हारी इसकी उसकी नहीं यह दुनिया
बिना थके , बिना रुके चला जो ,रच दिया इतिहास नया ।
सुधा आदेश
फरियाद
फरियाद
जीवन रूपी रथ के पहिए
जीवन की चुनौतियों से
होकर त्रस्त जा पहुँचे
दरबार में परमपिता के ।
' पशु ,पक्षी ,नदी ,नाले
जलथरों ,नभचरों को
दिया खुला आकाश आपने
पर हे सृष्टि के रचयिता
क्यों नहीं नसीब नारी के
मुट्ठी भर आकाश ।
पिता की बाहों में
झूला झूल कर
मां के ममतामई
आंचल में छिपकर
पराए पन का दिल में लिए
एहसास बढ़ती रही ।
भोग्या बनी
पति के आगोश में
बेदाम की दासी बनी
सासरे में
सामाजिक बंधन
ढीले पड़े
मातृत्व सुख के सामने…
तड़पी वही मां
जब अपने ही अंश के
हाथों कठपुतली बनी ।
काश ! दिया होता
थोड़ा सा आकाश
थोड़ी सी जमीन
तो छली तो न जाती
इस निर्मम विश्व में ।'
' छला तो मैं गया हूँ हे ईश्वर,
तेरे इस निर्मम जहां में ,
बाल रूप तोतली बोली
मधुर मुस्कान ले लुभाया बहुत
पराया धन जानकर
प्रेम अथाह सागर
लुटाया मैंने ...।
जवानी में अर्धांगिनी रूप को
सिर आंखों पर बिठाकर
सर्वस्व अर्पित किया ,
रात दिन कठोर परिश्रम कर
छोटे बड़ों को संतुष्ट करने का
प्रयास दिल से किया ।
गोधूलि के सुहाने क्षणों में
जब लेना चाहता था
सांस चैन की
तब पत्नी और मां के
आपसी संघर्ष में पिसा मैं ही
करती रही अपनी मनमानी दोनों ही
बेगुनाह होते हुए भी
पाई सजा मैंने ।
मगरमच्छी आँसूओं के
समंदर में डूबता उतराता रहा
चार जोड़ी कपड़ों में
स्वयं को छुपाकर
अलमारियां भरी
साड़ियों और ज़ेवरों से
दलील पर दलील
सुनते सुनते थक गए कर्ण
संत्रास ,घुटन और यातना के
जिस दौर से गुजरा
कर नहीं सकता बयाँ,
अब आप ही न्याय कीजिए प्रभु
किसने किसको छला ।
ईश्वर ने क्षण भर को
दोनों को निहारा
फिर बोले, ' वत्स ,
तुम दोनों मेरी सृष्टि की
हो अनुपम कृति…
पूरक हो..
स्वभाव और रुचियां
एक हो जायेंगी
तो क्या जीवन
नहीं हो जाएगा रसहीन …।
रात के बाद दिन का
होता है आगमन जिस तरह
उसी तरह आपसी संबंधों में
परिवर्तन के लिए
थोड़ी नोकझोंक
भी है आवश्यक ।
दुख के बाद सुख का आगमन
सदा होता है आनंददायक
बस एक बात मत भूलो
परस्पर प्यार ,विश्वास ,
समर्पण और समझदारी
किसी भी रिश्ते की
होती है अटूट डोर ।
जाओ...वत्स जाओ
तर्क वितर्क में
व्यर्थ मत उलझो , उलझाओ
जैसा विधान मैंने रचा
जिओ वैसे ही और जीने दो ।'
प्रभु के वचन सुन
मायूस दोनों बहुत हुये
दोषारोपण बहुत हुआ
समस्या का हल
ढूंढना होगा स्वयं ही
सोचते हुए
दोनों ने
एक दूसरे को देखा
कुछ गुना, कुछ समझा ।
आंखों -आंखों में
एक मौन
संवाद कायम हुआ
एक हाथ बढ़ा
दूसरे ने थामा…
प्यार ,विश्वास और समझदारी की
डोर थामे चल पड़ा युगल
अनंत की ओर ।
सुधा देश
Wednesday, February 26, 2020
अपराध बोथ
अपराध बोध
'मम्मा सावन आ गया ।' आठ वर्षीय आयुष ने अंदर आते हुए बाल सुलभ चपलता के साथ कहा ।
'सावन आ गया । तुझे कैसे मालूम ?' सब्जी चलाते-चलाते विशाखा ने आश्चर्य मिश्रित स्वर में पूछा ।
' यह लो आपको नहीं मालूम!! खिड़की से बाहर झांक कर देखिए... बरसी री बुंदिया सावन की, सावन की मनभावन की ...।' नन्हा आयुष विशाखा की नकल उतारते हुए बोला ।
' हट शरारती...।'
विशाखा की मीठी झिड़की सुनकर अबोध आयुष सावन की सुखद सलोनी रिमझिम फुहारों का आनंद लेने लग गया किंतु वह सोच में डूब गई यह सच है कि उसे यह गाना अत्यंत ही प्रिय है तथा पिछले कुछ दिनों से सोते जागते उठते बैठते ना जाने क्यों अनायास ही यह गाना उसके लबों पर थिरकने लगता है किंतु उसके हृदय का मासूम टुकड़ा उसका बेटा आयुष उसकी प्रत्येक हरकत और व्यवहार का इतनी बारीकी से अवलोकन करता रहता है इसका पता उसे आज ही लगा।
हम बड़े बच्चों को नादान मासूम समझकर उनकी उपस्थिति को अनदेखा करके कभी-कभी अनपेक्षित असामान्य व्यवहार कर बैठते हैं बिना इसकी कल्पना के कहीं हमारी क्रियाकलाप अविकसित नाजुक फूल के अवचेतन मन में जड़ें तो नहीं जमा रहे हैं भविष्य में अब उसे सतर्क रहना होगा क्योंकि आयुष अब उतना अबोध एवं मासूम नहीं रहा है जितना कि वह सोचती थी।
नन्हे आयुष ने अपनी निर्दोष अदाओं से अनायास विशाखा की सुषुप्त अभिलाषा ओं की अग्नि में कुछ कम कर फेंक दिए थे वास्तव में उसका कलाकार मन सदैव अतृप्त ही रहता था निरंतर स्थानांतरण के कारण वह अपनी कला में कोई निकाल नहीं ला पाई थी नई जगह जाकर जब तक वह थोड़ा व्यवस्थित होती टूटे सूत्रों को सहेजने का प्रयास करती स्थानांतरण का आदेश आ जाता और तिनका तिनका जोड़ा स्वप्न फिर बिखर जाता है ।
संगीत नृत्य नाटक में विशाखा की बाल्यावस्था से ही रुचि रही है स्कूल से लेकर कालेज तक कोई भी सांस्कृतिक कार्यक्रम उसके बिना अपूर्ण ही रहता था आज भी शादी विवाह का मौका हो जन्मदिन हो या विवाह की वर्षगांठ लोग उससे फरमाइश कर ही बैठते हैं तथा प्रत्येक अवसर के लिए उपस्थित गानों के खजाने में से कोई गाना सुना कर वह महफ़िल की रौनक में चार चांद लगा ही देती है सच पूछिए तो उसके पति राजीव भी उसकी प्रशंसा सुनकर गौरवान्वित हो उठते हैं उन्हें अपनी सहधर्मिणी कि इस योग्यता पर नाज है ।
राजीव पी.डब्ल्यू.डी में एग्जीक्यूटिव इंजीनियर हैं । गाड़ी ,बंगला ,नौकर चाकर सब मिले हैं । नाम है, इज्जत है और इससे भी बढ़कर है राजीव का सुदर्शन एवं आकर्षक व्यक्तित्व तथा उनका उसके प्रति अगाध प्रेम और विश्वास । जिसके कारण उसको अपने सद्य:स्नाता स्वप्न के बिछड़ने का दुख तो अवश्य होता है किंतु हताशा नहीं । घूरे के भी दिन फिरते हैं , प्रत्येक कार्य का अपना एक वक्त होता है विशाखा उसी वक्त का इंतजार कर रही है जब उसके अविकसित स्वप्न साकार रूप में आकर निज हस्तों से उसे गढ़ेंगे, तराशेंगे एवं संवारेंगे ।
' क्या बात है ? कहां खोई हुई हो ? 'राजीव ने रसोई में आकर उसके समीप खड़े होकर कहा ।
'आज इतनी जल्दी कैसे ?'राजीव की आवाज सुनकर विशाखा चकित होकर बोली । वह अपने ख्यालों में इतनी खोई हुई थी कि राजीव की गाड़ी का हॉर्न भी उसे सुनाई नहीं पड़ा था ।
' बस तुम्हारी याद आई और चला आया ।'राजीव ने प्रेमासिक्त दृष्टि उस पर डालते हुए कहा ।
' क्यों झूठ बोलते हो !! 'लजाई शरमाई सी विशाखा बोल उठी थी ।
' झूठ... मैडम इतनी सुहाने मौसम में आपका साथ हो ,और हाथ में गर्मागर्म पकौड़ियों की प्लेट हो तो मजा आ जाए । अगर आपको कोई तकलीफ ना हो तो…।' वाक्य अधूरा छोड़ कर राजीव ने प्रश्नवाचक मुद्रा में उसे देखा ।
'तकलीफ कैसी ?आप फ्रेश हो कर आइए तब तक मैं गर्मागर्म पकौड़ियाँ बनाती हूँ ।'
पकौड़ियाँ खाने की इच्छा कर रही है यदि मैडम को कोई तकलीफ ना हो तो... राजीव के मुख से औपचारिक वाक्य सुनकर मन में कहीं कुछ दरक गया । नौकर छुट्टी पर चला गया है तो क्या अधिकार पूर्वक मनवांछित डिशेज के लिए आग्रह भी नहीं कर सकते । माना वह अमीर माता-पिता की इकलौती संतान है । विवाह के समय ही उसके पिता ने अपने विश्वस्त नौकर रामू के पुत्र श्यामू को घर के अन्य कार्यों के साथ खाना बनाने के लिए उसके साथ भेज दिया था । पिछले दस वर्षों से उसने रसोई की जिम्मेदारी संभाल रखी है । पिछले हफ्ते ही वह अपने विवाह के लिए डेढ़ महीने की छुट्टी लेकर गया है।
ऐसा नहीं है कि वह खाना नहीं बनाती या उसे खाना बनाना नहीं आता । विशिष्ट अवसरों पर उसके बनाए व्यंजनों की लोग भरपूर प्रशंसा करते रहे हैं लेकिन न जाने क्यों खाना बनाना उसे सदा ही नीरस लगता है । आज राजीव का संकोच मिश्रित स्वर उसे चौका गया था । कहीं यह दांपत्य जीवन में आई आंधी का सूचक तो नहीं... तुरंत ही मन में अनपेक्षित उभर कर आई भावनाओं को उसने यह सोचकर झटकने का प्रयास किया कि भविष्य में रसोई की जिम्मेदारी भी वह स्वयं संभालने का प्रयास करेगी क्योंकि इंसान के मन को जीतने का एक रास्ता पेट से होकर भी जाता है । राजीव के फ्रेश होकर आते ही उसने राजीव के मनपसंद प्याज के पकोड़े, हरे धनिए की चटनी के साथ परोस दिये ।
'मम्मा, आपके हाथ के बने पकौड़े खाकर तो मजा ही आ गया । मन कर रहा है कि बनाने वाले का हाथ ही चूम लूँ ।' आयुष ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए राजीव के अंदाज में कहा ।
आयुष का वाक्य एवं अंदाज देखकर राजीव भी चौंक गए तथा इशारे से पूछा कि माजरा क्या है ?
उसकी अनभिज्ञता का पर आयुष का समर्थन करते हुए बोले , 'अच्छे क्यों न लगेंगे बेटा, इसमें तुम्हारी मम्मी का प्यार जो मिला हुआ है ।'
' बेटा , यदि तुम कहोगे तो रोज ही पकोड़े बना दिया करूंगी । वैसे भी इन सब चीजों को खाने का मजा इसी मौसम में ही है ।'
एक बार फिर सिद्ध हो गया था कि आयुष का कथन अनजाने में उनके द्वारा किए गए व्यवहार का ही प्रतिफल है । विशाखा ने सोचा इस संदर्भ में वह राजीव से बात करेगी ।
आमोद प्रमोद युक्त वचनों के मध्य नाश्ते का आनंद ले ही रहे थे कि फोन की घंटी टन टना उठी । फोन विशाखा ने ही उठाया । लेडीज क्लब की सेक्रेटरी श्रीमती राय चौधरी की आवाज थी …' विशाखा जी इस वर्ष सावन संध्या के अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है । कार्यक्रम के निरूपण के लिए मीटिंग लेडीज क्लब में हो रही है । मैडम का आग्रह है कि आप अवश्य आयें ।'
' लेकिन मैं तो कार्यकारिणी समिति की सदस्य नहीं हूँ ।'
' मैं जानती हूँ किंतु मैडम का कहना है इस बार आपको ही प्रोग्राम का चयन, निर्धारण एवं संचालन करना है ।'
विशाखा को अभी इस शहर में आये मात्र चार महीने ही हुए हैं । कुछ विशिष्ट अवसरों पर उसकी गायन प्रतिभा को देखकर शायद कार्यक्रम के निर्धारण एवं संचालन की जिम्मेदारी उसे सौंपी जा रही है । सांस्कृतिक कार्यक्रम की सेक्रेटरी श्रीमती भाटिया बड़ी तेज तर्रार एवं घमंडी महिला हैं । यद्यपि वह गाती अच्छा है किंतु उसके आने के पश्चात उनको अपना नंबर वन का सिंहासन हिलता प्रतीत होने लगा है अतः जब तब जाने अनजाने उससे अकारण तकरार कर बैठती हैं । उसके शांत एवं सहनशील व्यवहार के कारण अब तक अप्रिय स्थिति टलती रही है किंतु क्लब के कार्यक्रम में वह उसका हस्तक्षेप शायद सहन न कर पायें ।'
' क्या हुआ, किसका फोन था ?' उसे ध्यान मग्न देखकर राजीव ने पूछा ।
' तुम स्वयं तो जा नहीं रही हो ...तुम्हें बुलाया जा रहा है अतः हस्तक्षेप का प्रश्न ही नहीं उठता ।' समस्या बताने पर राजीव ने प्रतिक्रिया व्यक्त की ।
' आप नहीं जानते श्रीमती भाटिया को ...।'
' तो मना कर दो...।'
' लेकिन मैडम मिसेज नागपाल जिलाधीश की पत्नी को मना करना उचित नहीं होगा ।'
' अगर ऐसा है तो स्वीकार कर लो चुनोती को ...काम निकालना भी एक कला है । अपनी वाकपटुता ,बसहनशीलता तथा चातुर्य से विपक्षी के हृदय को जीतकर आसानी से अपना बनाया जा सकता है । वह भी ऐसा विरोधी जो ईर्ष्या रूपी नाग के चंगुल में फंसा सिर्फ विरोध करना ही अपना ध्येय समझता हो । याद रखो ऐसे लोग प्रशंसा के भूखे होते हैं । थोड़ी सी प्रशंसा भी उनके स्व को संतुष्ट कर सकती है । हो सकता है प्रारंभ में तुम्हें समझौते करने पड़े लेकिन अंततः तुम महसूस करोगी की विजय तुम्हारी ही हो रही है । '
विशाखा दूसरे दिन ग्यारह बजे लेडीज क्लब पहुँची तो उसे देखकर सभी चौके किंतु उसे देखकर श्रीमती नागपाल ने कहा,' आइए आइए , आपका ही इंतजार हो रहा था ।'
श्रीमती नागपाल की बात सुनकर अनेकों चेहरों पर उगाए प्रश्नों का समाधान हो गया ।
फिर श्रीमती भाटिया को संबोधित करते हुए बोली ' 'श्रीमती भाटिया आपको इनसे कार्यक्रम के आयोजन में सहयोग मिलेगा । आप तो जानती ही हैं यह न केवल अच्छी गायिका है वरन गीतकार भी हैं ।'
लगभग एक घंटे चली बैठक में स्वागत, सजावट , जलपान के लिए विभिन्न महिलाओं के नेतृत्व में कमेटियों का गठन किया गया । श्रीमती भाटिया एवं विशाखा को कार्यक्रम के निर्धारण की जिम्मेदारी सौंपी गई तथा मंच संचालन के लिए विशाखा को आग्रह मिश्रित आदेश दिया गया ।
सुबह ग्यारह बजे से सायं पाँच बजे तक कार्यक्रमों का रिहर्सल करवाने के लिए क्लब में रुकना पड़ता था । श्यामू भी नहीं था । सुबह नाश्ता करके राजीव ऑफिस चले जाते थे तथा आयुष स्कूल । दोपहर का खाना विशाखा हॉट केस में रख देती थी । निरंतर स्थानांतरण के कारण नौकरी तो वह कर नहीं पाई थी पर व्यक्तित्व के विकास के नाम पर हो रहे इस आयोजन में घर और परिवार के साथ सामंजस्य बिठाने का पूर्ण प्रयास कर रही थी ।
'कब समाप्त होगी तुम्हारी यह सावन संध्या...।' एक दिन ऑफिस से जल्दी आए राजीव आयुष को बरामदे में अकेले बैठे इंतजार करते देखकर झुँझला उठे थे तथा विशाखा के आते ही उसकी बेवजह की व्यस्तता के लिए एटम बम की तरह क्रोध का गोला फूट ही पड़ा था ।
ड्रामे का रिहर्सल कराते कराते उसे देर हो गई थी । पड़ोसी मिसेस तलवार को भी आज कहीं जाना पड़ गया था जिससे वह चाबी भी नहीं दे पाई थी वरना उसकी अनुपस्थिति में वही आयुष का ध्यान रखती रही हैं । एक बार उसके आभार प्रकट करने पर वह बोली थीं इसमें आभार की क्या बात है आवश्यकता पड़ने पर पड़ोसी ही पड़ोसी के काम नहीं आएगा तो कौन आएगा ।
' बस पच्चीस दिन बाकी हैं ।' विशाखा अपराधी से बोल उठी थी ।
' अभी पच्चीस दिन बाकी हैं । दस दिन में ही घर की यह हालत हो गई है तो आगे क्या होगा ?'राजीव का क्रोध अभी भी शांत नहीं हुआ था ।
अश्रु भर आए थे नयनो में , रुआँसा हो उठा था मन । कितना स्वार्थी होता है पुरुष ? स्त्री सदैव निज इच्छाओं को त्यागकर सुख- दुख , हारी बीमारी की परवाह किए बगैर प्रत्येक हाल में जीवन साथी के साथ चलना चाहती है किंतु उसका पुरुष मनमीत, आराम में आये तनिक से व्यवधान से तिल मिलाकर, संपूर्ण त्याग और बलिदान को पल भर में कटीले वाक्यों द्वारा तहस-नहस कर उसे कटघरे में खड़ा करने से नहीं चूकता है । मन विदीर्ण हो उठा था । इतना आगे बढ़ने के पश्चात पीछे हटना भी तो संभव नहीं था । काश ! आज श्यामू होता तो ऐसी स्थिति ही नहीं आती ।
विशाखा ने सोचा कि कोई अस्थाई नौकर मिल जाए तो रख ले लेकिन इतना विश्वास प्राप्त नौकर वह भी कुछ दिनों के लिए, मिलना संभव ही नहीं है । वैसे इस जिले में सभी अधिकारियों के घर सरकारी नौकर हैं । बस आज्ञा देने की देर होती है फील्ड से तुरंत आदमी आ जाते हैं । सरकारी नौकर होने के कारण चोरी का भी डर नहीं रहता है किंतु सरकारी व्यक्ति से व्यक्तिगत काम कराना राजीव के आदर्शवाद के विरुद्ध रहा है । पिछले दस वर्षों में जब वह अपने आदर्शों से नहीं डिगे तो अब तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता ।
अभी समस्याओं में उलझी विशाखा हैरान परेशान थी कि एक झटका और लगा पड़ोसन श्रीमती तलवार की सास का देहांत हो गया और वह सपरिवार घर चली गई । चाबी की समस्या उठ खड़ी हुई अतः एक ही ताले की तीन चाबियां बनवाई गई । एक राजीव , एक नन्हे आयुष एवं एक स्वयं उसके पास रहती । घर बाहर दोनों फ्रंट पर युद्ध चालू था । राजीव को पसंद नहीं था कि आयुष स्कूल से आने के पश्चात अकेला घर में रहे और उधर श्रीमती भाटिया से लोहा लेना पड़ रहा था ।
यहाँ राजीव की सलाह सफल सिद्ध होती नजर आ रही थी । प्रत्येक कार्यक्रम का निर्धारण श्रीमती भाटिया की रुचि को ध्यान में रखकर करने की विशाखा की योजना ने उनके स्वभाव में परिवर्तन ला दिया था । उनकी किसी भी सलाह की प्रशंसा करते हुए विशाखा तुरंत मान जाती थी जिसके कारण यदि बाद में वह उसमें संशोधन करना चाहती थी तो वह भी बिना प्रतिरोध किए अपनी सहमति दे देती थीं अर्थात हो वही रहा था जो वह चाहती थी पर वह श्रीमती भाटिया की सहमति से । उधर आयुष को वह स्कूल से सीधा क्लब बुलवा लेती थी तथा राजीव के घर लौटने से पूर्व भी लौटने का प्रयत्न करती । रात्रि की सब्जी भी यथासंभव सुबह ही बनाकर जाती जिससे शाम का समय समय वह दोनों के साथ बिता सके ।
योजनाबद्ध कार्य के द्वारा टकराव, मनमुटाव को टालने का वह हर संभव प्रयास कर रही थी । फाइनल रिहर्सल के दिन बीस नाच गानों में से सिर्फ पंद्रह का ही चयन हुआ । एक हास्य एकांकी कार्यक्रम की जान थी । कुछ गाने डांस तो सचमुच इतने अच्छे थे, वह भी उन महिलाओं द्वारा जिन्होंने घर से बाहर कभी कदम भी नहीं रखा था । यद्यपि डांस और नाटक का निर्देशन विशाखा ने किया था किंतु प्रशंसा की वास्तविक हकदार तो वे महिलाएं थी जो पूर्ण मनोयोग से उसकी कल्पना को साकार रूप प्रदान कर रही थीं । उनका उत्साह देखते ही बनता था ।
श्रीमती नागपाल भी व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहकर मार्गदर्शन करती रहती थीं । यदि कहीं किसी में तनाव होता या अहम से अहम टकराते तो वह अपनी वाकपटुता ,चातुर्य एवं निष्पक्ष निर्णय से सब की समस्याएं सुलझा कर वातावरण को सहज बना देती थीं । वह 'महिला क्लब' को एक नया आयाम देना चाहती थीं । महिलाओं की दबी छुपी प्रतिभा जो घर गृहस्ती के पाटों में पिसकर अर्थहीन होती जा रही थी, को उभारना, तराशना चाहती थीं ।
वह सामाजिक रूप से जागरूक महिला थीं । वह' महिला क्लब ' को केवल हाऊजी या खाने-पीने का निरर्थक माध्यम ही नहीं बने रहना चाहती थीं वरन वह ' महिला क्लब' के माध्यम से एक मंच का निर्माण करना चाहती थीं जहाँ महिलाओं का सर्वांगीण विकास के लिए वह सतत प्रयत्नशील रहती थीं । कैरम, टेबल टेनिस की प्रतियोगिता के अतिरिक्त उन्होंने दो महीने पूर्व वाद विवाद प्रतियोगिता का भी आयोजन किया था । उसमें भी महिलाओं का उत्साह देखते ही बनता था ।
क्लब की इमारत में ही उन्होंने टेबल टेनिस ,कैरम और चैस की व्यवस्था करवाई थी तथा बैडमिंटन के लिए हॉल के निर्माण का कार्य जारी था । पठन-पाठन की सुविधा की क्षुधा को शांत करने के लिए कुछ पत्रिकाएं तथा स्तरीय पुस्तकों के क्रय हेतु प्रत्येक माह निश्चित राशि का भी निर्धारण किया गया था । सामाजिक सेवा के लिए चार -चार महिलाओं की एक टीम बनाई गई थी जो हर सप्ताह एक दिन गरीब बस्ती में जाकर बच्चों तथा प्रौढ़ व्यक्तियों को शिक्षा प्रदान करती थी ।
उनके इन कार्यो की कुछ लोग प्रशंसा करते थे तथा कुछ लोग अपनी आदत अनुसार कमियां निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे । सावन संध्या का आयोजन इस शहर में पहली बार हो रहा था अतः चर्चा का विषय बन गया था । श्रीमती नागपाल भी आलोचना का शिकार बनी जिन्होंने इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए सरकारी महकमे का उपयोग किया था । ऊपर से सब शांत थे किंतु अंदर ही अंदर सब उबल रहे थे । घर की बड़ी बुढ़िया भी कहने लगी थी कि यदि यही हाल रहा तो एक दिन घर बर्बाद हो जाएगा ।
कुछ लोग व्यंग्य करते न थकते,व इस उम्र में इन औरतों को न जाने क्या सूझी है जो बच्चों को नौकरों के हाथों में सुपुर्द कर नाच गाने में लगी हुई हैं । एक-दो को छोड़कर सभी बौखलाये हुए थे किंतु व्यवस्था अपनी पत्नियों की महत्वाकांक्षाओं के आगे विवश थे । पत्नियां जो कुछ करना चाहती थीं उनके लिए अपनी कला और क्षमता को दिखाने का स्वर्णिम अवसर था और वह इसमें जी जान से लगी हुई थी ।
समस्या एकांकी को लेकर थी सभी मुख्य भूमिका निभाना चाहते थे जिसकी कम भूमिका थी उसके संवाद बढ़ाकर भूमिका में जान डाली गई । इस भूमिका को भी विशाखा ने सहजता से निभा ले गई । सभी संतुष्ट थे । कार्यक्रम की वीडियो रिकॉर्डिंग करवाने की बात सुनकर सभी महिलाओं में अतिरिक्त उत्साह भर गया था ।
आखिर वह दिन भी आ गया जब हरे हरे परिधानों में सजी संवरी महिलाएं किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थीं । हरे कपड़ों के द्वारा स्वागत द्वार बनाए गए थे । हरे पौधे वाले गमलों को सभागृह में जगह-जगह रखा गया था । सभा भवन की दीवारों पर मयूर आकृतियां नर्तन करती नजर आ रही थीं, मानो हरियाला, मस्ताना सावन स्वयं चलकर सभा भवन में हरियाली मनभावन छटा बिखेर कर कृत्रिमता के वातावरण को अपने नैसर्गिक प्राकृतिक स्वरूप से ढकने की चेष्टा कर रहा हो ।
अतिथि महिलाओं का स्वागत हल्दी , कुमकुम लगाकर तथा वेणी पहनाकर किया गया । शहर के गणमान्य व्यक्तियों की पत्नियों को अतिथि के रुप में बुलाया गया । कमिश्नर की पत्नी श्रीमती नीना दीक्षित मुख्य अतिथि थीं ।
कार्यक्रम का प्रारंभ स्वागत गान से हुआ । एक के बाद एक कार्यक्रम पर हास्य एकांकी ने सबका मन मोह लिया । 'ज्योति कलश छलके ' नाम गीत पर सीमा भंडारी ने इतना अच्छा नृत्य प्रस्तुत किया कि सब ने दांतों तले अंगुली दबा ली । वह कुशल नृत्यांगना लग रही थीं । सावन सुंदरी के ताज की हकदार भी वही बनी । सभी प्रसन्न थे कार्यक्रम का समापन जलपान से हुआ ।
पूरे दिन के अथक परिश्रम के पश्चात् जब विशाखा घर लौटी तो लगा पूरा बदन थक कर चूर चूर हो गया है । किचन से आवाजें आती सुनकर किचन की ओर पैर स्वयं मुड़ गए । राजीव आयुष के लिए गैस पर दूध गर्म कर रहे थे और वह जिद करते हुए कह रहा था, ' पापा, हम दूध नहीं पीयेंगे । हमें कल की तरह ब्रेड आमलेट खाना है ।'
'बेटा , जिद मत करो । पहले दूध पी लो फिर मैं ब्रेड आमलेट बना कर देता हूँ ।'
राजीव का विवशता भरा स्वर सुनकर आँखों से गंगा जमुना बहने लगी । पत्नी और माँ का कर्तव्य कहीं दूर छिटक गया था । माना वह एक क्षेत्र में सफल रही थी किंतु दूसरा तो नहीं संभाल पाई । राजीव जिन्होंने कभी एक कप चाय तक बनाकर नहीं पी थी वही राजीव आज आयुष के लिए ब्रेड आमलेट बना रहे हैं । आंसुओं को आंखों में ही रोकने का यत्न करती हुई वह किचन में जाकर बोली , ' आप आराम कीजिए, मैं आयुष को ब्रेड आमलेट बना कर देती हूँ ।'
' कैसा रहा आपका सावन संध्या का कार्यक्रम ...आप थके होंगीं । आप आराम कीजिए । आज आप भी इस बंदे के हाथ का कच्चा पक्का खा कर देखिए ।' राजीव ने उसकी सहायता को नकारते हुए उसकी ओर मुस्कुराकर देखते हुए कहा ।
अपने घर में ही अजनबी बन गई थी विशाखा । वह समझ नहीं पा रही थी कि राजीव व्यंग्य कर रहे हैं या वास्तव में सहानुभूति प्रकट कर रहे हैं ।
'मम्मा, आप झूठी हैं आपने कहा था कि सावन में आप हमें रोज पकोड़े बनाकर खिलाएंगी पर आपने एक दिन भी पकोड़े बनाकर नहीं खिलाए । सावन संध्या का नाम सुनकर नन्हा आयुष शिकायत भरे स्वर में बोला ।
'बाबा ,;आपको पकौड़े खाने हैं । मैं अभी बना कर देखा हूँ ।' श्यामू ने अंदर आते हुए कहा ।
' तू कब आया ? कैसी रही तेरी शादी ?। स्वर को यथासंभव संयत बनाते हुए उसने श्यामू से पूछा ।
यद्यपि बेटे का शिकायती स्वर जेहन में तीर की तरह दंशित किए जा रहा था । आँखों में आँसू भर आए थे किंतु वह कहाँ गलत थी ? क्या उसका सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेना गलत था या सब कुछ सामान्य ही है । स्वयं अपराध बोध से ग्रसित उसका मन सबके सहज व्यवहार को ही असहज समझने की भूल कर रहा है । लेकिन अपराध बोध क्यों और किसलिए ? जब पुरुष काम के सिलसिले में घर से बाहर कई-कई दिनों तक रहता है तब तो उसे कोई अपराध बहुत दंशित नहीं करता फिर एक स्त्री ही क्यों कुछ समय घर से बाहर रहने पर स्वयं को अपराधी मान बैठती है । एक ही समाज में यह दोहरा मापदंड क्यों ? मन में कुछ कसमसाने आने लगा था ।
'मेम साहब , बस अभी आ रहा हूँ । विवाह तो हो गया गाना दो बरस बाद होगा । मेरे जाने से आपको बहुत तकलीफ हुई होगी ।' श्यामू ने हाथ धोकर किचन में घुसते हुए कहा ।
' बाबा के लिए आमलेट बना कर, दो कप बढ़िया कड़क चाय बना दो । तुम भी थके होगे जाकर आराम करो आज हम सब बाहर ही खाना खाएंगे और तुम्हारे लिए पैक करा कर ले आएंगे ।'
राजीव जो बात बात पर पार्टियां देखकर अपनी प्रसन्नता प्रकट करते थे वे ने उसके व्यथित हृदय को प्यार भरी बातों से सहलाने की चेष्टा करते हुए कहा ।
' हिप हिप हुर्रे ...यू आर ग्रेट डैड । खूब मजा आएगा... मैं जल्दी से होमवर्क कर लेता हूँ ।' प्रसन्नता से लगभग नाचते हुए आयुष ने कहा तथा वह अपने स्टडी रूम में चला गया ।
'क्यों चेहरे पर बारह बज रहे हैं मैडम ?आज तो आपका आपको प्रसन्न होना चाहिए, आप का कार्यक्रम सफल रहा । जिसके लिए आप महीने भर से परिश्रम कर रही थीं ।' आयुष के जाते ही राजीव ने उसको बेडरूम में खींच कर अंक में भरने का प्रयास करते हुए कहा ।
'लेकिन आपको काम करना पड़ा ।' कहते हुए विशाखा का स्वर दयनीय को आया था ।
' काम करना पड़ा तो क्या हुआ ? रोज तो आप करती ही हैं, एक-दो दिन मैंने कर लिया तो इसमें इतना सोचने की क्या बात हो गई !! कम से कम ब्रेड आमलेट तो बनाना सीख गया । कभी वक्त जरूरत पर फिर काम आएगा ।' कहते हुए राजीव के हाथों का बंधन कसता जा रहा था ।
पुरुष की सफलता के पीछे जिस तरह स्त्री का योगदान होता है उसी प्रकार स्त्री की सफलता के पीछे पुरुष का योगदान होता है, इस तथ्य से आज विशाखा का भली-भांति साक्षात्कार हो गया था पर यह तभी संभव है जब दोनों के विचारों में सामंजस्य हो , आदान-प्रदान की परिभाषा अच्छी तरह समझते हो । तभी वे एक दूसरे के पूरक बनकर मनवांछित लक्ष्य को सफलतापूर्वक प्राप्त कर सकते हैं
राजीव के सशक्त बाहुपाश में , मन में उगे अपराध बोध का दंश कम होने लगा था तथा खोया आत्मविश्वास लौट आया था । विशाखा को लग रहा था कि उसके घर सावन आज ही आया है । अब तक मई-जून की उमस भरी हवाओं ने घर का सुख चैन छीन रखा था । सचमुच मेघ आए या ना आए, पपीहा बोले या ना बोले, जब भी तन मन खुशियों से भर उठे, वही दिन, वही रात ,वहीं महीना सावन है ।
सुधा आदेश
Subscribe to:
Posts (Atom)