Tuesday, March 3, 2020

अनबूझ पहेली है जीवन

अनबूझ पहेली है जीवन जीवन एक ऐसी पहेली है जिसका उत्तर ढूंढते ढूंढते पूरी उम्र गुजर जाती है पर फिर भी उसका उत्तर इंसान को नहीं मिल पाता । रिश्तो के चक्रव्यूह में फंसा मानव ना सबको खुश रख पाता है और ना ही स्वयं खुश रह पाता है । अक्सर ऐसा होता है कि हम अड़ोसी पड़ोसी से तो स्नेहिल व्यवहार करते हैं पर जहाँ खून के रिश्तो की बात आती है हम उनसे बिना यह जाने अपेक्षा करने लगते हैं कि हम स्वयं उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतर भी पा रहे हैं या नहीं । बस यही से रिश्तों में दरार पैदा होने लगती है । जरा जरा सी बात पर दोषारोपण करना आम बात होती जाती है । इसी के साथ तकरार प्रारंभ हो जाती है । इस तकरार में यदि कोई किसी अनुचित बात पर अपनी प्रतिक्रिया प्रकट करता है तो उसे घमंडी, अहंकारी कहा जाता है ...अगर कोई संस्कारी व्यक्ति रिश्तो का सम्मान करते हुए चुप रहता है तो उसे नासमझ या कमजोर मान लिया जाता है . ..उसका मानसिक शोषण करने से भी तथाकथित अपने ही बाज नहीं आते । स्थिति तब भयावह हो जाती है जब व्यक्ति अपने पालकों के प्रति निःस्पृह हो जाता है । उसे उनके दुख दिखाई नहीं देते या यूँ कहिए वह उनका भार उठाने हेतु अपने सुखों की बलि नहीं चढ़ाना चाहता । दोनों ही स्थितियां एक सच्चे ईमानदार पारिवारिक एवं सामाजिक मूल्यों के प्रति समर्पित व्यक्ति के लिए असह्य हैं । इंसान को इन समाजिक परिस्थितियों के बीच रहते हुए जीवन यापन करना पड़ता है । एक सच्चा और निस्वार्थ इंसान रिश्तो को बनाए रखने के लिए खून के घूंट पीकर भी न सिर्फ रिश्ते निभाता है वरन उन्हें बचाए रखने के लिए सर्वस्व अर्पित करने का प्रयास करता है क्योंकि उसके लिए रिश्ते दुनिया की सर्वश्रेष्ठ अमानत है । कुछ लोग कहते हैं सम्मान खोकर , रिश्ते निभाना स्वयं को स्वयं की नजरों से गिराना होता है पर सच तो यह है अगर ऐसा करके भी हम रिश्तो को बचा पाए तो यह इंसान की हार नहीं जीत ही होगी..आखिर अपनों के बीच मान अपमान कैसा ? अगर जीवन में रिश्ते ही नहीं रहे तो जीवन, जीवन नहीं पाषाण बन जाएगा । पाषाण तो बन ही गया है मानव, ऐसे रिश्ते निभाते निभाते । तभी उसे अपनों के दुख दिखाई नहीं देते तथा दूसरों के सुखों से ईर्ष्या होती है । संवेदनहीनता की पराकाष्ठा इतनी हो गई है कि वह कामयाबी का रास्ता स्वयं अपने परिश्रम से नहीं वरन दूसरों की राह में रोड़ा अटका कर पाना चाहता है । शायद वह यह समझकर भी नहीं समझना चाहता कि जो कामयाबी मेहनत से प्राप्त नहीं की जाती वह स्थाई नहीं होती । कुतर्कों के जाल में फंसे ऐसे इंसान अपनी शारीरिक क्षमता सकारात्मक कार्यों के बजाय नकारात्मक कार्यों में जाया करने से बाज नहीं आते । यह तो हुई इंसान की संवेदनहीनता की बात ...पर हमारे समाज में आज भी कुछ परंपराएं , प्रथायें, अंधविश्वास इस कदर व्याप्त है कि जाने-अनजाने कितने ही मासूमों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है पर फिर भी वे ऐसी घटनाओं को दैवी प्रकोप मानते हैं । ऐसे व्यक्ति डॉक्टर के पास जाने की बजाय , गाँव के ओझा के कहने पर झाड़-फूंक का सहारा लेते हैं । समाज में व्याप्त इस घुन से तभी निजात पाई जा सकती है जब देश के कोने -कोने में शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार हो । शिक्षा न केवल व्यक्ति को सभ्य एवं सुसंस्कृत बनाती है वरन उनके विचारों में परिपक्वता लाकर दुनिया को देखने , समझने एवं तदनुसार आचरण करने के नजरिए में भी बदलाव लाती है । अगर हममें से प्रत्येक इंसान एक अनपढ़ को शिक्षित करने का बीड़ा उठा ले तो समाज में व्याप्त अशिक्षा से मुक्ति पाई जा सकती है । प्रत्येक इंसान के जीवन में कभी-कभी कुछ ऐसे भी पल आते हैं जब इंसान निराशा में डूब जाता है । उसे अपने आगे पीछे अंधेरा ही अंधेरा नजर आने लगता है । निराशा और सिर्फ निराशा ही उसके जीवन का हिस्सा बनती जाती है । ऐसे समय में यह न भूलें कि दिन-रात जीवन चक्र के हिस्से हैं । अंधेरा कितना ही घना क्यों ना हो कुछ समय अंतराल के पश्चात प्रकाश, अंधकार को चीरकर तन- मन को प्रफुल्लित कर ही देता है । कभी भी किसी भी परिस्थिति में अपना हौसला टूटने मत दीजिए क्योंकि जब जीवन का एक रास्ता बंद होता प्रतीत होता है तब कोई दूसरा रास्ता अवश्य खुल जाता है अतः अपनी सूझबूझ के साथ दूसरा रास्ता खोजने का प्रयत्न कीजिए मंजिल ना मिले हो ही नहीं सकता । माना पथ है कंटकाकीर्ण, मंजिल है दूर हौसला हो गर बना ही लेंगे आशियाना अपना । सुधा आदेश

आंदोलित है मन

आंदोलित है मन जैसा मैंने अब तक सुना समझा और जाना है, लेखक संवेदनशील होता है । शायद यही कारण है दुनिया में घटती कोई भी अच्छी घटना उसे सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करती है वहीं बुरी घटनाओं की नकारात्मक ऊर्जा उसके तन-मन को आंदोलित कर देती है ...पर पिछले कुछ दिनों की घटनायें मन को आंदोलित कर रही हैं...क्या लेखक वामपंथी या दक्षिणपंथी होता है ? क्या अपनी विचारधारा के चश्मे से ही वह समाज में व्याप्त अनाचार और दुराचार के विरुद्ध लेखनी चलाता है... वरना सबका साथ सबका विकास का नारा देने वाली सरकार द्वारा दोनों सदनों में पारित विधेयक का ऐसा विरोध...ऐसी हिंसा !!! माना ऐसी हिंसाएं पहले भी होती रही हैं क्योंकि कोई भी समाज अचानक असहिष्णु नहीं होता । विचारणीय प्रश्न यह है कि इन हिंसाओं से फायदा किसे होता है ? आम आदमी को अपनी रोजी -रोटी से ही फुर्सत नहीं है वे इन आंदोलनों में भाग ले ही नहीं सकते । यह कौन स्वार्थी तत्व हैं जो हमारे देश के सामाजिक ढांचे को तोड़ने के साथ सामाजिक एकरसता को छिन्न- भिन्न करने में लगे हैं । अगर हमें देश को विकास के रास्ते पर ले जाना है तो इन स्वार्थी तत्वों को पहचान कर इन्हें नेस्तनाबूद करना होगा । किसी एक व्यक्ति या दल पर हिंसा का ठीकरा फोड़ने से काम नहीं चलेगा । एक बात और क्या ऐसी घटनाएं पहले इस देश में नहीं हुई थीं ? क्या समाज में अचानक असहिष्णुता पैदा हो गई? जनसमाज तो वही है जो आज से दशकों पूर्व था । एक आदमी अचानक देश में अराजकता कैसे फैला सकता है ? अगर ऐसा हुआ है तो उसमें उस आदमी या दल का नहीं वरन समाज का दोष है । समाज एक दिन में नहीं बनता, उसे बनने में सदियाँ लग जाती है । यह सच है कि हर व्यक्ति अपनी-अपनी विचारधारा अपनाने को स्वतंत्र है पर लेखक का दायित्व आम जन से अलग है । उसे निष्पक्ष रहते हुए समाज के उत्थान तथा भाईचारे के महत्व को ध्यान रखते हुए अपनी लेखनी को बल प्रदान करना चाहिए । लेखक को समाज को जोड़ने का प्रयत्न करना चाहिये न की तोड़ने का । आज मुझे यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है कि हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी समाज को जोड़ने की बजाय अपनी करनी से देश में नफरत भड़काने का कार्य कर रहे हैं । सदियों से हम आपस में ही लड़ते रहे...शायद इसी कारण हमें गुलाम रहना पड़ा । जो देश या देशवासी अपनी मूल जड़ों से नाता तोड़ लेते हैं, अपनी ही संस्कृति पर गर्व करने के बजाय उसका मज़ाक बनाते है वह देश या समाज कभी उन्नति नहीं कर सकता । शायद अपनी इसी कमजोरी के कारण ही हम पिछड़े रह गए..। हमारे देश को दो दलीय व्यवस्था होनी चाहिये...कांग्रेस ने 60 वर्षो तक इस देश में शासन किया है फिर भी हम पिछड़े है...आखिर क्यों ? किसी दल का विरोध करते हुए यह मत भूलिये कि कोई भी व्यक्ति चाहे वह नरेंद्र मोदी हो या कोई और , जब तक सबको साथ लेकर नहीं चलेगा,शासन नहीं कर पाएगा । एक को संतुष्ट करने के प्रयास में दूसरे को असंतुष्ट कर सामाजिक भेद-भाव की प्रवृत्ति असहिष्णुता को ही जन्म देगी जो किसी भी देश और समाज के लिए घातक है । सुधा आदेश

Monday, March 2, 2020

मन की बात

मन की बात हमारा देश प्राचीन विराट सांस्कृतिक विरासत एवं परंपराओं वाला देश है । इस देश में कण-कण में भगवान व्याप्त हैं , की मात्र अवधारणा ही नहीं है , पूजने की परंपरा भी रही है । जहाँ हमारे शास्त्रों में पुरुष रूप में ब्रह्मा, विष्णु ,महेश पूजनीय हैं वहीं स्त्री रूप में लक्ष्मी , सरस्वती और दुर्गा भी है । पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव में पिछले कुछ वर्षों से हमारी युवा पीढ़ी दिग्भ्रमित होती जा रही है । वह अपनी प्राचीन परंपराओं को अक्षुण्ण रखने की बजाय उन्हें तोड़ने पर आमदा है । वह भूल रही है कि किसी देश की पहचान उसकी सांस्कृतिक धरोहरों से होती है जब धरोहरें ही नहीं रहीं तो देश कहाँ बचेगा !! जिस देश में रानी लक्ष्मीबाई ,अहिल्याबाई होलकर जैसी वीरांगनायें, इंदिरा गांधी ,सुचेता कृपलानी, सुषमा स्वराज जैसी राजनीतिज्ञ, अरुंधति राय, किरण बेदी, चंद्रा कोचर इंदिरा नूई जैसी प्रशासनिक, कल्पना चावला ,सुनीता विलियम जैसी भारतीय मूल की अंतरिक्ष यात्री, पी.टी. ऊषा , मैरी कॉम, पी.वी. सिंधु जैसी अनेक खिलाड़ी तथा लोपामुद्रा , गार्गी जैसी अनेक विदुषियां हुई हैं, उस देश में 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ ' जैसा नारा जहाँ आश्चर्यचकित करता है वही मन को दुखी भी कर देता है । यह जानते हुए भी कि नारी हमारी सृष्टि की अनुपम कृति है ,वह जीवनदायिनी है... उसके बिना संसार संभव ही नहीं है । हम क्यों नहीं उसके हृदय के कोमल तन्तुओं को समझ पाते ? क्यों सदा उसे उपभोग की वस्तु समझते रहे ? जब चाहा उसे सीने से लगा लिया जब चाहा बेरहमी से उसकी भावनाओं को कुचल दिया । शायद कोई भी इस प्रश्न का उत्तर ना दे पाए कि हमारी मानसिकता में बदलाव कब क्यों और कैसे आया । माना समाज के कुछ लोग पूरे समाज का दर्पण नहीं हुआ करते पर यह भी सच है कि आज नकारात्मक विचार ही पूरे समाज में हावी है । तीन चार वर्ष की बच्ची से लेकर सत्तर वर्ष की स्त्री भी इन नर पिचाशों की हवस से बच नहीं पा रही हैं । पुरुषों के सौ गुनाह भी माफ है ...समाज में प्रचलित इस उक्ति के कारण पुरूष तो घिनोना से घिनोना काम करके भी बच निकलता है पर स्त्री को संपूर्ण जीवन अनकिए अपराध की सजा भुगतनी पड़ती है । समाज भी स्त्री को ही दोषी ठहराता है ...मसलन अकेली क्यों जा रही थी ? अब स्त्रियां ही अपने हाव-भावों से पुरुषो को निमंत्रण दे तो पुरुष बेचारा क्या करे ? ना जाने कितनी ही बेसिर पैर की बातें और दलीलें ...। आखिर ऐसा क्यों ? क्या इस संसार में पुरुषों को ही अपनी इच्छा अनुसार जीने का हक है ,स्त्रियों को नहीं ? आखिर यह कैसी सामाजिक व्यवस्था है जिसमें स्त्री -पुरुष को एक ही गाड़ी के दो पहिए कहने के बावजूद , उनमें भेद किया जाता है । लड़के के होने पर खुशियां तथा लड़की के होने पर मातम मनाया जाता है । इन सब बातों के लिए सिर्फ समाज को या पुरुषों को दोष देने से काम नहीं चलेगा ...कहीं ना कहीं इसके लिए स्त्रियां भी दोषी हैं । लड़कियों को तो वे हजार पहरे में रखती हैं । यह न करो , वह न करो की तमाम बंदिशें लगाती हैं जबकि लड़कों को वे खुली छूट देती हैं । लड़कों को वे मर्यादा में रहने और नैतिकता का पाठ पढ़ाने में चूक जाती हैं । अगर वे लड़के-लड़की में भेद करना बंद कर दें लड़कियों के साथ लड़कों को भी नैतिकता और सदाचार की उचित शिक्षा दें तो वह दिन दूर नहीं समाज की मानसिकता बदलने के साथ लड़कियों के प्रति कटुता अनाचार दुराचार की प्रवृत्ति में कमी आ जाये । इसके साथ ही युवावस्था में कदम रखती लड़कियों से विनम्र निवेदन है कि वह स्वयं को प्रदर्शन की वस्तु न बनायें । माना सौंदर्य व्यक्ति की खूबसूरती में चार चाँद लगाता है पर सुंदरता का भोंडा प्रदर्शन वितृष्णा ही पैदा करता है । प्रदर्शन करना है तो अपने आंतरिक सौंदर्य एवं अपने अंतर्निहित योग्यता का करें । स्वयं को इतना सबल एवं योग्य बनाए कि लोग आपकी योग्यता से प्रभावित होकर स्वयं आपकी प्रशंसा के लिए बाध्य हों । इसके साथ ही अपने आत्मसम्मान के साथ कभी समझौता ना करें । अगर कभी आपको ऐसा लगे कि आपका मानसिक या शारीरिक शोषण हो रहा है तो उसे चुपचाप सहन करने की बजाय उसके विरुद्ध आवाज़ उठायें ।। यह न भूलें कि जब तक आप स्वयं का सम्मान नहीं करेंगी , कोई दूसरा भी आपका सम्मान नहीं करेगा । नारी परिवार की धुरी है वह जैसा चाहे वैसे ही समाज का निर्माण कर सकती है । कहते हैं बच्चे का पहला शिक्षक माँ होती है । अगर शिक्षक की मानसिकता ही दोषपूर्ण भेदभाव वाली होगी तो बच्चे का स्वस्थ विकास नहीं हो पाएगा । बच्चा ही अगर प्रदूषित मानसिकता का होगा तो स्वस्थ समाज का निर्माण संभव ही नहीं है । जब तक समाज स्वस्थ नहीं होगा तब तक स्वस्थ देश की कल्पना अकल्पनीय ही होगी । अंत में इतना कह इतना ही कहना चाहूँगी अगर हम स्वयं की मानसिकता को बदलने में कामयाब हो पाए तो समाज स्वयं ही बदल जाएगा । लड़कियाँ भार नहीं उपहार हैं , सृष्टि की रचयिता घर की बहार हैं । मत कुचलो, समझो महत्व उनका तुम्हारा गुलशन इनसे ही गुलजार है…। मानो या न मानो जीत ही लेंगी जंग अपनी सामर्थ्य उनमें, आज नहीं वे लाचार हैं । सुधा आदेश

Thursday, February 27, 2020

मन

मन मन सा चंचल, मन सा दुर्गम, मन सा गतिशील, मन सा स्थिर, जग में जड़ या चेतन कोई नहीं है । मन हंसे तो जग हंसे, मन कलपे तो जग कलपे... मन की अबाध गति को आज तक कोई नहीं समझ पाया है ।कभी बड़ी से बड़ी घटना पर मन कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करता तो कभी एक छोटी सी घटना दुख के सागर में डुबो देती है । मन तो मन है फिसला तो हंसी का कारण बन गया अगर सत्कर्म में लिप्त रहा तो जहां को एक नई रोशनी दे गया । सबसे बड़ी बात मन जैसा चाहे वैसा होता रहे तो सब ठीक वरना एक चिंगारी आक्रोश की दुनिया को तहस-नहस करने की क्षमता रखती है । सुख -दुख को महसूस करने वाला मन ही वास्तव में मन कहलाने का अधिकारी है । मन में उमड़ते-घुमड़ते विचारों से भरा पूरा मन कभी अपने निकटस्थ संगी साथियों से अपने मन की बात बताते हुए कहता है प्लीज, किसी से ना कहना ...तो कभी सामाजिक विषमता रूढ़िवादिता तथा ढकोसला से आहत मन परंपराओं को चुनौती देता अपनी चुनी अलग राह पर चलते हुए कहता है आई डोंट केयर .. । समाज में व्याप्त टूटन ,घुटन, संत्रास ,भेदभाव ,अविश्वास तथा विश्वासघात का मन मूक दर्शक बनता जा रहा है । दर्द है मन के संवेदनशून्य होने का, एक दूसरे की भावनाओं को न समझ पाने का ...सामाजिक व्यवस्था के प्रति आक्रोश मन को सदा उद्वेलित करता है । दर्द से ही जीवन की उत्पत्ति होती है इससे भला कौन अपरिचित है पर अपने संसार सागर में खोए हम सभी सब अपनी ही चिता करते हैं दूसरों की नहीं । जिस दिन हम दूसरों के सुख-दुख की चिंता करने लगेंगे, सच मानिये उस दिन हम अपनी नजरों में ही संसार के सबसे सुखी प्राणी बन जायेंगे। मत भूलिये… संसार सागर रंग -बिरंगा प्यारा -प्यारा गुलदस्ता मुख न मोड़ बंदे ,राह आयें चाहे कितने भी मोड़ मेरी तुम्हारी इसकी उसकी नहीं यह दुनिया बिना थके , बिना रुके चला जो ,रच दिया इतिहास नया । सुधा आदेश

फरियाद

फरियाद जीवन रूपी रथ के पहिए जीवन की चुनौतियों से होकर त्रस्त जा पहुँचे दरबार में परमपिता के । ' पशु ,पक्षी ,नदी ,नाले जलथरों ,नभचरों को दिया खुला आकाश आपने पर हे सृष्टि के रचयिता क्यों नहीं नसीब नारी के मुट्ठी भर आकाश । पिता की बाहों में झूला झूल कर मां के ममतामई आंचल में छिपकर पराए पन का दिल में लिए एहसास बढ़ती रही । भोग्या बनी पति के आगोश में बेदाम की दासी बनी सासरे में सामाजिक बंधन ढीले पड़े मातृत्व सुख के सामने… तड़पी वही मां जब अपने ही अंश के हाथों कठपुतली बनी । काश ! दिया होता थोड़ा सा आकाश थोड़ी सी जमीन तो छली तो न जाती इस निर्मम विश्व में ।' ' छला तो मैं गया हूँ हे ईश्वर, तेरे इस निर्मम जहां में , बाल रूप तोतली बोली मधुर मुस्कान ले लुभाया बहुत पराया धन जानकर प्रेम अथाह सागर लुटाया मैंने ...। जवानी में अर्धांगिनी रूप को सिर आंखों पर बिठाकर सर्वस्व अर्पित किया , रात दिन कठोर परिश्रम कर छोटे बड़ों को संतुष्ट करने का प्रयास दिल से किया । गोधूलि के सुहाने क्षणों में जब लेना चाहता था सांस चैन की तब पत्नी और मां के आपसी संघर्ष में पिसा मैं ही करती रही अपनी मनमानी दोनों ही बेगुनाह होते हुए भी पाई सजा मैंने । मगरमच्छी आँसूओं के समंदर में डूबता उतराता रहा चार जोड़ी कपड़ों में स्वयं को छुपाकर अलमारियां भरी साड़ियों और ज़ेवरों से दलील पर दलील सुनते सुनते थक गए कर्ण संत्रास ,घुटन और यातना के जिस दौर से गुजरा कर नहीं सकता बयाँ, अब आप ही न्याय कीजिए प्रभु किसने किसको छला । ईश्वर ने क्षण भर को दोनों को निहारा फिर बोले, ' वत्स , तुम दोनों मेरी सृष्टि की हो अनुपम कृति… पूरक हो.. स्वभाव और रुचियां एक हो जायेंगी तो क्या जीवन नहीं हो जाएगा रसहीन …। रात के बाद दिन का होता है आगमन जिस तरह उसी तरह आपसी संबंधों में परिवर्तन के लिए थोड़ी नोकझोंक भी है आवश्यक । दुख के बाद सुख का आगमन सदा होता है आनंददायक बस एक बात मत भूलो परस्पर प्यार ,विश्वास , समर्पण और समझदारी किसी भी रिश्ते की होती है अटूट डोर । जाओ...वत्स जाओ तर्क वितर्क में व्यर्थ मत उलझो , उलझाओ जैसा विधान मैंने रचा जिओ वैसे ही और जीने दो ।' प्रभु के वचन सुन मायूस दोनों बहुत हुये दोषारोपण बहुत हुआ समस्या का हल ढूंढना होगा स्वयं ही सोचते हुए दोनों ने एक दूसरे को देखा कुछ गुना, कुछ समझा । आंखों -आंखों में एक मौन संवाद कायम हुआ एक हाथ बढ़ा दूसरे ने थामा… प्यार ,विश्वास और समझदारी की डोर थामे चल पड़ा युगल अनंत की ओर । सुधा देश

Wednesday, February 26, 2020

अपराध बोथ

अपराध बोध 'मम्मा सावन आ गया ।' आठ वर्षीय आयुष ने अंदर आते हुए बाल सुलभ चपलता के साथ कहा । 'सावन आ गया । तुझे कैसे मालूम ?' सब्जी चलाते-चलाते विशाखा ने आश्चर्य मिश्रित स्वर में पूछा । ' यह लो आपको नहीं मालूम!! खिड़की से बाहर झांक कर देखिए... बरसी री बुंदिया सावन की, सावन की मनभावन की ...।' नन्हा आयुष विशाखा की नकल उतारते हुए बोला । ' हट शरारती...।' विशाखा की मीठी झिड़की सुनकर अबोध आयुष सावन की सुखद सलोनी रिमझिम फुहारों का आनंद लेने लग गया किंतु वह सोच में डूब गई यह सच है कि उसे यह गाना अत्यंत ही प्रिय है तथा पिछले कुछ दिनों से सोते जागते उठते बैठते ना जाने क्यों अनायास ही यह गाना उसके लबों पर थिरकने लगता है किंतु उसके हृदय का मासूम टुकड़ा उसका बेटा आयुष उसकी प्रत्येक हरकत और व्यवहार का इतनी बारीकी से अवलोकन करता रहता है इसका पता उसे आज ही लगा। हम बड़े बच्चों को नादान मासूम समझकर उनकी उपस्थिति को अनदेखा करके कभी-कभी अनपेक्षित असामान्य व्यवहार कर बैठते हैं बिना इसकी कल्पना के कहीं हमारी क्रियाकलाप अविकसित नाजुक फूल के अवचेतन मन में जड़ें तो नहीं जमा रहे हैं भविष्य में अब उसे सतर्क रहना होगा क्योंकि आयुष अब उतना अबोध एवं मासूम नहीं रहा है जितना कि वह सोचती थी। नन्हे आयुष ने अपनी निर्दोष अदाओं से अनायास विशाखा की सुषुप्त अभिलाषा ओं की अग्नि में कुछ कम कर फेंक दिए थे वास्तव में उसका कलाकार मन सदैव अतृप्त ही रहता था निरंतर स्थानांतरण के कारण वह अपनी कला में कोई निकाल नहीं ला पाई थी नई जगह जाकर जब तक वह थोड़ा व्यवस्थित होती टूटे सूत्रों को सहेजने का प्रयास करती स्थानांतरण का आदेश आ जाता और तिनका तिनका जोड़ा स्वप्न फिर बिखर जाता है । संगीत नृत्य नाटक में विशाखा की बाल्यावस्था से ही रुचि रही है स्कूल से लेकर कालेज तक कोई भी सांस्कृतिक कार्यक्रम उसके बिना अपूर्ण ही रहता था आज भी शादी विवाह का मौका हो जन्मदिन हो या विवाह की वर्षगांठ लोग उससे फरमाइश कर ही बैठते हैं तथा प्रत्येक अवसर के लिए उपस्थित गानों के खजाने में से कोई गाना सुना कर वह महफ़िल की रौनक में चार चांद लगा ही देती है सच पूछिए तो उसके पति राजीव भी उसकी प्रशंसा सुनकर गौरवान्वित हो उठते हैं उन्हें अपनी सहधर्मिणी कि इस योग्यता पर नाज है । राजीव पी.डब्ल्यू.डी में एग्जीक्यूटिव इंजीनियर हैं । गाड़ी ,बंगला ,नौकर चाकर सब मिले हैं । नाम है, इज्जत है और इससे भी बढ़कर है राजीव का सुदर्शन एवं आकर्षक व्यक्तित्व तथा उनका उसके प्रति अगाध प्रेम और विश्वास । जिसके कारण उसको अपने सद्य:स्नाता स्वप्न के बिछड़ने का दुख तो अवश्य होता है किंतु हताशा नहीं । घूरे के भी दिन फिरते हैं , प्रत्येक कार्य का अपना एक वक्त होता है विशाखा उसी वक्त का इंतजार कर रही है जब उसके अविकसित स्वप्न साकार रूप में आकर निज हस्तों से उसे गढ़ेंगे, तराशेंगे एवं संवारेंगे । ' क्या बात है ? कहां खोई हुई हो ? 'राजीव ने रसोई में आकर उसके समीप खड़े होकर कहा । 'आज इतनी जल्दी कैसे ?'राजीव की आवाज सुनकर विशाखा चकित होकर बोली । वह अपने ख्यालों में इतनी खोई हुई थी कि राजीव की गाड़ी का हॉर्न भी उसे सुनाई नहीं पड़ा था । ' बस तुम्हारी याद आई और चला आया ।'राजीव ने प्रेमासिक्त दृष्टि उस पर डालते हुए कहा । ' क्यों झूठ बोलते हो !! 'लजाई शरमाई सी विशाखा बोल उठी थी । ' झूठ... मैडम इतनी सुहाने मौसम में आपका साथ हो ,और हाथ में गर्मागर्म पकौड़ियों की प्लेट हो तो मजा आ जाए । अगर आपको कोई तकलीफ ना हो तो…।' वाक्य अधूरा छोड़ कर राजीव ने प्रश्नवाचक मुद्रा में उसे देखा । 'तकलीफ कैसी ?आप फ्रेश हो कर आइए तब तक मैं गर्मागर्म पकौड़ियाँ बनाती हूँ ।' पकौड़ियाँ खाने की इच्छा कर रही है यदि मैडम को कोई तकलीफ ना हो तो... राजीव के मुख से औपचारिक वाक्य सुनकर मन में कहीं कुछ दरक गया । नौकर छुट्टी पर चला गया है तो क्या अधिकार पूर्वक मनवांछित डिशेज के लिए आग्रह भी नहीं कर सकते । माना वह अमीर माता-पिता की इकलौती संतान है । विवाह के समय ही उसके पिता ने अपने विश्वस्त नौकर रामू के पुत्र श्यामू को घर के अन्य कार्यों के साथ खाना बनाने के लिए उसके साथ भेज दिया था । पिछले दस वर्षों से उसने रसोई की जिम्मेदारी संभाल रखी है । पिछले हफ्ते ही वह अपने विवाह के लिए डेढ़ महीने की छुट्टी लेकर गया है। ऐसा नहीं है कि वह खाना नहीं बनाती या उसे खाना बनाना नहीं आता । विशिष्ट अवसरों पर उसके बनाए व्यंजनों की लोग भरपूर प्रशंसा करते रहे हैं लेकिन न जाने क्यों खाना बनाना उसे सदा ही नीरस लगता है । आज राजीव का संकोच मिश्रित स्वर उसे चौका गया था । कहीं यह दांपत्य जीवन में आई आंधी का सूचक तो नहीं... तुरंत ही मन में अनपेक्षित उभर कर आई भावनाओं को उसने यह सोचकर झटकने का प्रयास किया कि भविष्य में रसोई की जिम्मेदारी भी वह स्वयं संभालने का प्रयास करेगी क्योंकि इंसान के मन को जीतने का एक रास्ता पेट से होकर भी जाता है । राजीव के फ्रेश होकर आते ही उसने राजीव के मनपसंद प्याज के पकोड़े, हरे धनिए की चटनी के साथ परोस दिये । 'मम्मा, आपके हाथ के बने पकौड़े खाकर तो मजा ही आ गया । मन कर रहा है कि बनाने वाले का हाथ ही चूम लूँ ।' आयुष ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए राजीव के अंदाज में कहा । आयुष का वाक्य एवं अंदाज देखकर राजीव भी चौंक गए तथा इशारे से पूछा कि माजरा क्या है ? उसकी अनभिज्ञता का पर आयुष का समर्थन करते हुए बोले , 'अच्छे क्यों न लगेंगे बेटा, इसमें तुम्हारी मम्मी का प्यार जो मिला हुआ है ।' ' बेटा , यदि तुम कहोगे तो रोज ही पकोड़े बना दिया करूंगी । वैसे भी इन सब चीजों को खाने का मजा इसी मौसम में ही है ।' एक बार फिर सिद्ध हो गया था कि आयुष का कथन अनजाने में उनके द्वारा किए गए व्यवहार का ही प्रतिफल है । विशाखा ने सोचा इस संदर्भ में वह राजीव से बात करेगी । आमोद प्रमोद युक्त वचनों के मध्य नाश्ते का आनंद ले ही रहे थे कि फोन की घंटी टन टना उठी । फोन विशाखा ने ही उठाया । लेडीज क्लब की सेक्रेटरी श्रीमती राय चौधरी की आवाज थी …' विशाखा जी इस वर्ष सावन संध्या के अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है । कार्यक्रम के निरूपण के लिए मीटिंग लेडीज क्लब में हो रही है । मैडम का आग्रह है कि आप अवश्य आयें ।' ' लेकिन मैं तो कार्यकारिणी समिति की सदस्य नहीं हूँ ।' ' मैं जानती हूँ किंतु मैडम का कहना है इस बार आपको ही प्रोग्राम का चयन, निर्धारण एवं संचालन करना है ।' विशाखा को अभी इस शहर में आये मात्र चार महीने ही हुए हैं । कुछ विशिष्ट अवसरों पर उसकी गायन प्रतिभा को देखकर शायद कार्यक्रम के निर्धारण एवं संचालन की जिम्मेदारी उसे सौंपी जा रही है । सांस्कृतिक कार्यक्रम की सेक्रेटरी श्रीमती भाटिया बड़ी तेज तर्रार एवं घमंडी महिला हैं । यद्यपि वह गाती अच्छा है किंतु उसके आने के पश्चात उनको अपना नंबर वन का सिंहासन हिलता प्रतीत होने लगा है अतः जब तब जाने अनजाने उससे अकारण तकरार कर बैठती हैं । उसके शांत एवं सहनशील व्यवहार के कारण अब तक अप्रिय स्थिति टलती रही है किंतु क्लब के कार्यक्रम में वह उसका हस्तक्षेप शायद सहन न कर पायें ।' ' क्या हुआ, किसका फोन था ?' उसे ध्यान मग्न देखकर राजीव ने पूछा । ' तुम स्वयं तो जा नहीं रही हो ...तुम्हें बुलाया जा रहा है अतः हस्तक्षेप का प्रश्न ही नहीं उठता ।' समस्या बताने पर राजीव ने प्रतिक्रिया व्यक्त की । ' आप नहीं जानते श्रीमती भाटिया को ...।' ' तो मना कर दो...।' ' लेकिन मैडम मिसेज नागपाल जिलाधीश की पत्नी को मना करना उचित नहीं होगा ।' ' अगर ऐसा है तो स्वीकार कर लो चुनोती को ...काम निकालना भी एक कला है । अपनी वाकपटुता ,बसहनशीलता तथा चातुर्य से विपक्षी के हृदय को जीतकर आसानी से अपना बनाया जा सकता है । वह भी ऐसा विरोधी जो ईर्ष्या रूपी नाग के चंगुल में फंसा सिर्फ विरोध करना ही अपना ध्येय समझता हो । याद रखो ऐसे लोग प्रशंसा के भूखे होते हैं । थोड़ी सी प्रशंसा भी उनके स्व को संतुष्ट कर सकती है । हो सकता है प्रारंभ में तुम्हें समझौते करने पड़े लेकिन अंततः तुम महसूस करोगी की विजय तुम्हारी ही हो रही है । ' विशाखा दूसरे दिन ग्यारह बजे लेडीज क्लब पहुँची तो उसे देखकर सभी चौके किंतु उसे देखकर श्रीमती नागपाल ने कहा,' आइए आइए , आपका ही इंतजार हो रहा था ।' श्रीमती नागपाल की बात सुनकर अनेकों चेहरों पर उगाए प्रश्नों का समाधान हो गया । फिर श्रीमती भाटिया को संबोधित करते हुए बोली ' 'श्रीमती भाटिया आपको इनसे कार्यक्रम के आयोजन में सहयोग मिलेगा । आप तो जानती ही हैं यह न केवल अच्छी गायिका है वरन गीतकार भी हैं ।' लगभग एक घंटे चली बैठक में स्वागत, सजावट , जलपान के लिए विभिन्न महिलाओं के नेतृत्व में कमेटियों का गठन किया गया । श्रीमती भाटिया एवं विशाखा को कार्यक्रम के निर्धारण की जिम्मेदारी सौंपी गई तथा मंच संचालन के लिए विशाखा को आग्रह मिश्रित आदेश दिया गया । सुबह ग्यारह बजे से सायं पाँच बजे तक कार्यक्रमों का रिहर्सल करवाने के लिए क्लब में रुकना पड़ता था । श्यामू भी नहीं था । सुबह नाश्ता करके राजीव ऑफिस चले जाते थे तथा आयुष स्कूल । दोपहर का खाना विशाखा हॉट केस में रख देती थी । निरंतर स्थानांतरण के कारण नौकरी तो वह कर नहीं पाई थी पर व्यक्तित्व के विकास के नाम पर हो रहे इस आयोजन में घर और परिवार के साथ सामंजस्य बिठाने का पूर्ण प्रयास कर रही थी । 'कब समाप्त होगी तुम्हारी यह सावन संध्या...।' एक दिन ऑफिस से जल्दी आए राजीव आयुष को बरामदे में अकेले बैठे इंतजार करते देखकर झुँझला उठे थे तथा विशाखा के आते ही उसकी बेवजह की व्यस्तता के लिए एटम बम की तरह क्रोध का गोला फूट ही पड़ा था । ड्रामे का रिहर्सल कराते कराते उसे देर हो गई थी । पड़ोसी मिसेस तलवार को भी आज कहीं जाना पड़ गया था जिससे वह चाबी भी नहीं दे पाई थी वरना उसकी अनुपस्थिति में वही आयुष का ध्यान रखती रही हैं । एक बार उसके आभार प्रकट करने पर वह बोली थीं इसमें आभार की क्या बात है आवश्यकता पड़ने पर पड़ोसी ही पड़ोसी के काम नहीं आएगा तो कौन आएगा । ' बस पच्चीस दिन बाकी हैं ।' विशाखा अपराधी से बोल उठी थी । ' अभी पच्चीस दिन बाकी हैं । दस दिन में ही घर की यह हालत हो गई है तो आगे क्या होगा ?'राजीव का क्रोध अभी भी शांत नहीं हुआ था । अश्रु भर आए थे नयनो में , रुआँसा हो उठा था मन । कितना स्वार्थी होता है पुरुष ? स्त्री सदैव निज इच्छाओं को त्यागकर सुख- दुख , हारी बीमारी की परवाह किए बगैर प्रत्येक हाल में जीवन साथी के साथ चलना चाहती है किंतु उसका पुरुष मनमीत, आराम में आये तनिक से व्यवधान से तिल मिलाकर, संपूर्ण त्याग और बलिदान को पल भर में कटीले वाक्यों द्वारा तहस-नहस कर उसे कटघरे में खड़ा करने से नहीं चूकता है । मन विदीर्ण हो उठा था । इतना आगे बढ़ने के पश्चात पीछे हटना भी तो संभव नहीं था । काश ! आज श्यामू होता तो ऐसी स्थिति ही नहीं आती । विशाखा ने सोचा कि कोई अस्थाई नौकर मिल जाए तो रख ले लेकिन इतना विश्वास प्राप्त नौकर वह भी कुछ दिनों के लिए, मिलना संभव ही नहीं है । वैसे इस जिले में सभी अधिकारियों के घर सरकारी नौकर हैं । बस आज्ञा देने की देर होती है फील्ड से तुरंत आदमी आ जाते हैं । सरकारी नौकर होने के कारण चोरी का भी डर नहीं रहता है किंतु सरकारी व्यक्ति से व्यक्तिगत काम कराना राजीव के आदर्शवाद के विरुद्ध रहा है । पिछले दस वर्षों में जब वह अपने आदर्शों से नहीं डिगे तो अब तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता । अभी समस्याओं में उलझी विशाखा हैरान परेशान थी कि एक झटका और लगा पड़ोसन श्रीमती तलवार की सास का देहांत हो गया और वह सपरिवार घर चली गई । चाबी की समस्या उठ खड़ी हुई अतः एक ही ताले की तीन चाबियां बनवाई गई । एक राजीव , एक नन्हे आयुष एवं एक स्वयं उसके पास रहती । घर बाहर दोनों फ्रंट पर युद्ध चालू था । राजीव को पसंद नहीं था कि आयुष स्कूल से आने के पश्चात अकेला घर में रहे और उधर श्रीमती भाटिया से लोहा लेना पड़ रहा था । यहाँ राजीव की सलाह सफल सिद्ध होती नजर आ रही थी । प्रत्येक कार्यक्रम का निर्धारण श्रीमती भाटिया की रुचि को ध्यान में रखकर करने की विशाखा की योजना ने उनके स्वभाव में परिवर्तन ला दिया था । उनकी किसी भी सलाह की प्रशंसा करते हुए विशाखा तुरंत मान जाती थी जिसके कारण यदि बाद में वह उसमें संशोधन करना चाहती थी तो वह भी बिना प्रतिरोध किए अपनी सहमति दे देती थीं अर्थात हो वही रहा था जो वह चाहती थी पर वह श्रीमती भाटिया की सहमति से । उधर आयुष को वह स्कूल से सीधा क्लब बुलवा लेती थी तथा राजीव के घर लौटने से पूर्व भी लौटने का प्रयत्न करती । रात्रि की सब्जी भी यथासंभव सुबह ही बनाकर जाती जिससे शाम का समय समय वह दोनों के साथ बिता सके । योजनाबद्ध कार्य के द्वारा टकराव, मनमुटाव को टालने का वह हर संभव प्रयास कर रही थी । फाइनल रिहर्सल के दिन बीस नाच गानों में से सिर्फ पंद्रह का ही चयन हुआ । एक हास्य एकांकी कार्यक्रम की जान थी । कुछ गाने डांस तो सचमुच इतने अच्छे थे, वह भी उन महिलाओं द्वारा जिन्होंने घर से बाहर कभी कदम भी नहीं रखा था । यद्यपि डांस और नाटक का निर्देशन विशाखा ने किया था किंतु प्रशंसा की वास्तविक हकदार तो वे महिलाएं थी जो पूर्ण मनोयोग से उसकी कल्पना को साकार रूप प्रदान कर रही थीं । उनका उत्साह देखते ही बनता था । श्रीमती नागपाल भी व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहकर मार्गदर्शन करती रहती थीं । यदि कहीं किसी में तनाव होता या अहम से अहम टकराते तो वह अपनी वाकपटुता ,चातुर्य एवं निष्पक्ष निर्णय से सब की समस्याएं सुलझा कर वातावरण को सहज बना देती थीं । वह 'महिला क्लब' को एक नया आयाम देना चाहती थीं । महिलाओं की दबी छुपी प्रतिभा जो घर गृहस्ती के पाटों में पिसकर अर्थहीन होती जा रही थी, को उभारना, तराशना चाहती थीं । वह सामाजिक रूप से जागरूक महिला थीं । वह' महिला क्लब ' को केवल हाऊजी या खाने-पीने का निरर्थक माध्यम ही नहीं बने रहना चाहती थीं वरन वह ' महिला क्लब' के माध्यम से एक मंच का निर्माण करना चाहती थीं जहाँ महिलाओं का सर्वांगीण विकास के लिए वह सतत प्रयत्नशील रहती थीं । कैरम, टेबल टेनिस की प्रतियोगिता के अतिरिक्त उन्होंने दो महीने पूर्व वाद विवाद प्रतियोगिता का भी आयोजन किया था । उसमें भी महिलाओं का उत्साह देखते ही बनता था । क्लब की इमारत में ही उन्होंने टेबल टेनिस ,कैरम और चैस की व्यवस्था करवाई थी तथा बैडमिंटन के लिए हॉल के निर्माण का कार्य जारी था । पठन-पाठन की सुविधा की क्षुधा को शांत करने के लिए कुछ पत्रिकाएं तथा स्तरीय पुस्तकों के क्रय हेतु प्रत्येक माह निश्चित राशि का भी निर्धारण किया गया था । सामाजिक सेवा के लिए चार -चार महिलाओं की एक टीम बनाई गई थी जो हर सप्ताह एक दिन गरीब बस्ती में जाकर बच्चों तथा प्रौढ़ व्यक्तियों को शिक्षा प्रदान करती थी । उनके इन कार्यो की कुछ लोग प्रशंसा करते थे तथा कुछ लोग अपनी आदत अनुसार कमियां निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे । सावन संध्या का आयोजन इस शहर में पहली बार हो रहा था अतः चर्चा का विषय बन गया था । श्रीमती नागपाल भी आलोचना का शिकार बनी जिन्होंने इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए सरकारी महकमे का उपयोग किया था । ऊपर से सब शांत थे किंतु अंदर ही अंदर सब उबल रहे थे । घर की बड़ी बुढ़िया भी कहने लगी थी कि यदि यही हाल रहा तो एक दिन घर बर्बाद हो जाएगा । कुछ लोग व्यंग्य करते न थकते,व इस उम्र में इन औरतों को न जाने क्या सूझी है जो बच्चों को नौकरों के हाथों में सुपुर्द कर नाच गाने में लगी हुई हैं । एक-दो को छोड़कर सभी बौखलाये हुए थे किंतु व्यवस्था अपनी पत्नियों की महत्वाकांक्षाओं के आगे विवश थे । पत्नियां जो कुछ करना चाहती थीं उनके लिए अपनी कला और क्षमता को दिखाने का स्वर्णिम अवसर था और वह इसमें जी जान से लगी हुई थी । समस्या एकांकी को लेकर थी सभी मुख्य भूमिका निभाना चाहते थे जिसकी कम भूमिका थी उसके संवाद बढ़ाकर भूमिका में जान डाली गई । इस भूमिका को भी विशाखा ने सहजता से निभा ले गई । सभी संतुष्ट थे । कार्यक्रम की वीडियो रिकॉर्डिंग करवाने की बात सुनकर सभी महिलाओं में अतिरिक्त उत्साह भर गया था । आखिर वह दिन भी आ गया जब हरे हरे परिधानों में सजी संवरी महिलाएं किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थीं । हरे कपड़ों के द्वारा स्वागत द्वार बनाए गए थे । हरे पौधे वाले गमलों को सभागृह में जगह-जगह रखा गया था । सभा भवन की दीवारों पर मयूर आकृतियां नर्तन करती नजर आ रही थीं, मानो हरियाला, मस्ताना सावन स्वयं चलकर सभा भवन में हरियाली मनभावन छटा बिखेर कर कृत्रिमता के वातावरण को अपने नैसर्गिक प्राकृतिक स्वरूप से ढकने की चेष्टा कर रहा हो । अतिथि महिलाओं का स्वागत हल्दी , कुमकुम लगाकर तथा वेणी पहनाकर किया गया । शहर के गणमान्य व्यक्तियों की पत्नियों को अतिथि के रुप में बुलाया गया । कमिश्नर की पत्नी श्रीमती नीना दीक्षित मुख्य अतिथि थीं । कार्यक्रम का प्रारंभ स्वागत गान से हुआ । एक के बाद एक कार्यक्रम पर हास्य एकांकी ने सबका मन मोह लिया । 'ज्योति कलश छलके ' नाम गीत पर सीमा भंडारी ने इतना अच्छा नृत्य प्रस्तुत किया कि सब ने दांतों तले अंगुली दबा ली । वह कुशल नृत्यांगना लग रही थीं । सावन सुंदरी के ताज की हकदार भी वही बनी । सभी प्रसन्न थे कार्यक्रम का समापन जलपान से हुआ । पूरे दिन के अथक परिश्रम के पश्चात् जब विशाखा घर लौटी तो लगा पूरा बदन थक कर चूर चूर हो गया है । किचन से आवाजें आती सुनकर किचन की ओर पैर स्वयं मुड़ गए । राजीव आयुष के लिए गैस पर दूध गर्म कर रहे थे और वह जिद करते हुए कह रहा था, ' पापा, हम दूध नहीं पीयेंगे । हमें कल की तरह ब्रेड आमलेट खाना है ।' 'बेटा , जिद मत करो । पहले दूध पी लो फिर मैं ब्रेड आमलेट बना कर देता हूँ ।' राजीव का विवशता भरा स्वर सुनकर आँखों से गंगा जमुना बहने लगी । पत्नी और माँ का कर्तव्य कहीं दूर छिटक गया था । माना वह एक क्षेत्र में सफल रही थी किंतु दूसरा तो नहीं संभाल पाई । राजीव जिन्होंने कभी एक कप चाय तक बनाकर नहीं पी थी वही राजीव आज आयुष के लिए ब्रेड आमलेट बना रहे हैं । आंसुओं को आंखों में ही रोकने का यत्न करती हुई वह किचन में जाकर बोली , ' आप आराम कीजिए, मैं आयुष को ब्रेड आमलेट बना कर देती हूँ ।' ' कैसा रहा आपका सावन संध्या का कार्यक्रम ...आप थके होंगीं । आप आराम कीजिए । आज आप भी इस बंदे के हाथ का कच्चा पक्का खा कर देखिए ।' राजीव ने उसकी सहायता को नकारते हुए उसकी ओर मुस्कुराकर देखते हुए कहा । अपने घर में ही अजनबी बन गई थी विशाखा । वह समझ नहीं पा रही थी कि राजीव व्यंग्य कर रहे हैं या वास्तव में सहानुभूति प्रकट कर रहे हैं । 'मम्मा, आप झूठी हैं आपने कहा था कि सावन में आप हमें रोज पकोड़े बनाकर खिलाएंगी पर आपने एक दिन भी पकोड़े बनाकर नहीं खिलाए । सावन संध्या का नाम सुनकर नन्हा आयुष शिकायत भरे स्वर में बोला । 'बाबा ,;आपको पकौड़े खाने हैं । मैं अभी बना कर देखा हूँ ।' श्यामू ने अंदर आते हुए कहा । ' तू कब आया ? कैसी रही तेरी शादी ?। स्वर को यथासंभव संयत बनाते हुए उसने श्यामू से पूछा । यद्यपि बेटे का शिकायती स्वर जेहन में तीर की तरह दंशित किए जा रहा था । आँखों में आँसू भर आए थे किंतु वह कहाँ गलत थी ? क्या उसका सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेना गलत था या सब कुछ सामान्य ही है । स्वयं अपराध बोध से ग्रसित उसका मन सबके सहज व्यवहार को ही असहज समझने की भूल कर रहा है । लेकिन अपराध बोध क्यों और किसलिए ? जब पुरुष काम के सिलसिले में घर से बाहर कई-कई दिनों तक रहता है तब तो उसे कोई अपराध बहुत दंशित नहीं करता फिर एक स्त्री ही क्यों कुछ समय घर से बाहर रहने पर स्वयं को अपराधी मान बैठती है । एक ही समाज में यह दोहरा मापदंड क्यों ? मन में कुछ कसमसाने आने लगा था । 'मेम साहब , बस अभी आ रहा हूँ । विवाह तो हो गया गाना दो बरस बाद होगा । मेरे जाने से आपको बहुत तकलीफ हुई होगी ।' श्यामू ने हाथ धोकर किचन में घुसते हुए कहा । ' बाबा के लिए आमलेट बना कर, दो कप बढ़िया कड़क चाय बना दो । तुम भी थके होगे जाकर आराम करो आज हम सब बाहर ही खाना खाएंगे और तुम्हारे लिए पैक करा कर ले आएंगे ।' राजीव जो बात बात पर पार्टियां देखकर अपनी प्रसन्नता प्रकट करते थे वे ने उसके व्यथित हृदय को प्यार भरी बातों से सहलाने की चेष्टा करते हुए कहा । ' हिप हिप हुर्रे ...यू आर ग्रेट डैड । खूब मजा आएगा... मैं जल्दी से होमवर्क कर लेता हूँ ।' प्रसन्नता से लगभग नाचते हुए आयुष ने कहा तथा वह अपने स्टडी रूम में चला गया । 'क्यों चेहरे पर बारह बज रहे हैं मैडम ?आज तो आपका आपको प्रसन्न होना चाहिए, आप का कार्यक्रम सफल रहा । जिसके लिए आप महीने भर से परिश्रम कर रही थीं ।' आयुष के जाते ही राजीव ने उसको बेडरूम में खींच कर अंक में भरने का प्रयास करते हुए कहा । 'लेकिन आपको काम करना पड़ा ।' कहते हुए विशाखा का स्वर दयनीय को आया था । ' काम करना पड़ा तो क्या हुआ ? रोज तो आप करती ही हैं, एक-दो दिन मैंने कर लिया तो इसमें इतना सोचने की क्या बात हो गई !! कम से कम ब्रेड आमलेट तो बनाना सीख गया । कभी वक्त जरूरत पर फिर काम आएगा ।' कहते हुए राजीव के हाथों का बंधन कसता जा रहा था । पुरुष की सफलता के पीछे जिस तरह स्त्री का योगदान होता है उसी प्रकार स्त्री की सफलता के पीछे पुरुष का योगदान होता है, इस तथ्य से आज विशाखा का भली-भांति साक्षात्कार हो गया था पर यह तभी संभव है जब दोनों के विचारों में सामंजस्य हो , आदान-प्रदान की परिभाषा अच्छी तरह समझते हो । तभी वे एक दूसरे के पूरक बनकर मनवांछित लक्ष्य को सफलतापूर्वक प्राप्त कर सकते हैं राजीव के सशक्त बाहुपाश में , मन में उगे अपराध बोध का दंश कम होने लगा था तथा खोया आत्मविश्वास लौट आया था । विशाखा को लग रहा था कि उसके घर सावन आज ही आया है । अब तक मई-जून की उमस भरी हवाओं ने घर का सुख चैन छीन रखा था । सचमुच मेघ आए या ना आए, पपीहा बोले या ना बोले, जब भी तन मन खुशियों से भर उठे, वही दिन, वही रात ,वहीं महीना सावन है । सुधा आदेश

Sunday, February 23, 2020

तलाश जारी है

तलाश जारी है मानव जीवन एक मृगमरीचिका का है । वस्तुतः संपूर्ण इंसानी जीवन है तलाश पर आधारित है । जन्म से लेकर मृत्यु तक मानव स्व की तलाश में संलग्न रहता है । आसपास के वातावरण में उपस्थित किरण रश्मि नवजात शिशु के चक्षुओं में कौतुकता , जिज्ञासा उत्पन्न कर उसे निज और अन्य के अस्तित्व को तलाशने के लिए प्रेरित करती हैं । यही तलाश उसके जीवन के अंतिम पल तक चलती रहती है । स्कूल जाना प्रारंभ करते ही बच्चा एक दूसरी दुनिया में पहुँच जाता है । जहाँ उसे नये- नये साथी मिलते हैं । अक्षर ज्ञान प्रारंभ होत्र ही उसकी तलाश नई-नई वस्तुओं के साथ नये-नये प्राणियों से होती है । जैसे-जैसे वह बड़ा होता जाता है , ज्ञान वृद्धि के साथ-साथ वह अपना कार्यक्षेत्र तलाशने लगता है । कभी उसके माता-पिता तो कभी सगे संबंधी उसका संबल बनते हैं तो कभी सच्चे मित्र तो कभी उसके सपनों का आकाश देती जीवन संगिनी उसके सहयात्री बनते हैं । सब कुछ प्राप्त करने कर लेने पर भी उसकी तलाश समाप्त नहीं होती ...वह भटकने लगता है , कभी निज की तो कभी अपनों की तलाश में , कभी आत्मा की तो कभी परमात्मा की , कभी सृष्टि के अंग -अंग में व्याप्त सौंदर्य की, तो कभी पृथ्वी पर व्याप्त असमानता की । कभी नीला आकाश व्यक्ति के सपनों को आकाश देता है तो कभी धरती की हरीतिमा उसे अपनी मखमली चादर में लपेट कर उसे इतना अभिभूत कर डालती है कि वह अपनी सुध बुध खोकर उसमें डूब जाता है । यायावर बना प्रकृति के रहस्य को तलाशने के लिए यहाँ से वहाँ घूमता रहता है । एक समय ऐसा भी आता है जब इंसान यथार्थ के धरातल से टकराकर कभी धन की तलाश में दिन रात एक कर देता है तो कभी छीजते रिश्तो को सहेजने की... कोई सत्य की तलाश में दुनिया भर के ऐशो आराम छोड़कर सत्य की तलाश में जुट जाता है तो कोई शांति की तलाश में मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और गिरजाघर की शरण लेने लगता है । अगर वहाँ भी शांति नहीं मिलती तो ध्यान केंद्रों में जाकर आत्मिक सुख की तलाश करने लगता है । ऐसा व्यक्ति कभी दुनिया की भीड़ में अपनों को तलाशता है तो कभी अपने अहंकार , ईर्ष्या और संदेह के मन में कुलबुलाते नागफनियों के कारण अपनों को भी बेगाना बनाने से नहीं चूकता । दुख से पीड़ित व्यक्ति तो शांति की तलाश में मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे और गिरजाघर जाते ही हैं पर आश्चर्य तो तब होता है जब साधन संपन्न, सुख , समृद्धि से भरपूर व्यक्ति भी इनके चक्कर लगाकर और पाने की चाह में दान दक्षिणा देकर अपनी मुक्ति का मार्ग तलाशते हैं । सच तो यह है संतुष्ट रूपी अमृत के अभाव में व्यक्ति की तलाश कभी समाप्त नहीं होती । कभी अपनी तो कभी अपनों की छोटी-बड़ी हर चाहत को पूरा करने के प्रयास में वह रीतता जाता है । संतोष एवं शांति रूपी कस्तूरी उसके हाथ से छिटकती जाती है । अंततः माया मोह के तिलस्मी जाल को तोड़ने का असफल प्रयास करते हुए शांतिप्रिय अंत की तलाश में जुट जाता है … खुली आँखें खुला मस्तिष्क, न भटक इधर-उधर, निज में निज में तलाश बंदे, मिलेगा आकाश यहीं मिलेगी जमीं यही। सुधा आदेश