Sunday, November 10, 2019
सुव्यवस्था ही घर की शोभा है ।
सुव्यवस्था ही घर की शोभा है
सुव्यवस्थित घर आपकी कार्यक्षमता में वृद्धि करता है इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती । कल्पना कीजिये आप थके हारे ऑफिस से लौटे हैं, दो क्षण आराम करना चाहते हैं किंतु बेड पर कपड़ों का अंबार हो , चादर ठीक से न बिछी हो तो थकान के बावजूद आप आराम नहीं कर पायेंगे । आपकी झुंझलाहट क्रोध में बदल जायेगी तथा आपका क्रोध घर भर में सबको अस्तव्यस्त कर देगा ।
यही हालत किचन की है । मान लीजिये आप चाय बनाने जा रही हैं, गैस पर पानी चढ़ा दिया । अब न चीनी का डिब्बा मिल रहा है न चाय का या चाय की पत्ती ही समाप्त हो गई है , अब आपको चाय की पत्ती लेने जाना पड़ेगा तभी चाय बन पायेगी... मेरे कहने का अर्थ है जिसको बनाने में पांच मिनट का समय लगना चाहिये उसमें दस मिनट लगना , या बिना पीये ही रह जाना, आपकी ऊर्जा का ह्रास करेगा साथ ही मूड भी खराब होगा ।
अगर आपने किचन तथा अन्य आवश्यकताओं में लगने वाले समान की पूरी योजना उचित तरीके से की है, हर चीज रखने की जगह निर्धारित कर ली है तथा उसे उसी जगह रखने की आदत डाल ली है तो विश्वास मानिये आपके काम का समय कम होगा तथा आप अपना समय अन्य कार्यो में लगा सकती हैं ।
अक्सर मैंने महिलाओं को कहते सुना है क्या करें, समय ही नहीं मिलता ...। हर व्यक्ति को काम करने के लिये चौबीस घंटे ही मिलते हैं अगर आप नियोजित तरीके से काम करें तो कोई कारण नहीं कि आप अपने लिये समय न निकाल पायें ।
कुछ लोग कहते हैं घर को घर ही रहने दें, उसे शो रूम न बनायें । ऐसा कहने वाले भी किसी मेहमान के आने पर घर को व्यवस्थित करने लगते हैं । जब मेहमान के आने घर व्यवस्थित होने की मानसिकता है तो घर के सभी सदस्यों को अपना सामान निर्धारित स्थान पर रखने की आदत डालकर, थोड़े से प्रयास से घर को सदा व्यवस्थित रखकर अपनी ऊर्जा को बचाना क्या उचित नहीं है ?
साफ-सुथरा घर किसे अच्छा नहीं लगता लेकिन सफाई की सनक में घर भर को परेशान करना उचित नहीं है । धैर्य रखें, अच्छी आदत को अपनाने में समय लगता है । कोई माने या न माने , मेरे विचार से सुव्यवस्था ही घर की शोभा है ।
सुधा आदेश
Saturday, November 9, 2019
जहाँ चाह वहाँ राह
जहां चाह वहाँ राह
सुजय को एक मल्टीनेशनल कंपनी द्वारा अमेरिका के न्यूजर्सी में काम करने के लिये नियुक्ति पत्र मिलने का समाचार सुनकर उसके माता-पिता की खुशी का ठिकाना नहीं रहा । खुश भी क्यों न होते आखिर आज वह योग्य पुत्र के योग्य माता-पिता बन गये है । उनका बेटा विदेश जायेगा यह उन जैसे मध्यमवर्गीय परिवार के लिये गर्व का विषय है । बहन सपना अपने भाई की इस उपलब्घि पर खुश होने के साथ दुखी भी थी क्योंकि उसे भाई के दूर जाने के कारण पढ़ाई में व्यवधान के साथ अपने जीवन में सूनापन दस्तक देता प्रतीत होने लगा है ।
जबसे उसने होश संभाला था तबसे उसने भाई को अपने आस-पास ही पाया है वरना उसके माता-पिता अपने कार्य के सिलसिले में ही इतना व्यस्त रहते थे कि कभी-कभी उसे लगता था कि उनके जीवन में बच्चों के लिये कोई जगह है भी या नहीं । पढ़ाई में भी जब भी उसे कोई समस्या होती वह भाई सुजय के पास जाती, वह उसे चुटकियों में हल करने के साथ इतनी अच्छी तरह समझाता कि फिर उसे दुबारा पूछने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी ।
दसवीं बोर्ड में उसके अपेक्षा से कम नम्बर आने पर वह बहुत उदास हुई थी तब भाई ने उसे यह कहकर दिलासा दी थी कि दुखी होने की बजाय नम्बर कम क्यों आये इस पर चिंतन मनन कर, उन कारणों का निवारण करने का प्रयास करो...। जीवन में आई किसी विफलता से घबराना नहीं चाहिए वरन् उससे सीख लेते हुये अपने हौसले को बनाये रखना चाहिये । इसके साथ ही जीवन में अपना लक्ष्य निर्धारित कर, उसे पाने के लिये सतत प्रयत्नशील रहो । सदा याद रखो विषम परिस्थितियों में भी हौसला रखने वालों की कभी हार नहीं होती । भाई के हौसलों का ही परिणाम था आई.आई.टी. करते ही मल्टीनेशनल कंपनी द्वारा नियुक्ति मिलना । वह अपने कारण भाई की खुशी में बाधक नहीं बनना चाहती थी अतः उसने भी माता-पिता के साथ भाई के भाल पर टीका लगाकर उसे जीवन की नई पारी प्रारम्भ करने के लिये खुशी-खुशी विदा किया ।
सुजय ने न्यूजर्सी पहुँचकर अपना कार्यभार संभाल लिया । कम से कम इतना संतोष था कि संचार के साधनो के कारण अब दूरी, इतनी दूरी नहीं रह गई है । लगभग रोज ही सुजय से फोन पर या वीडियो कॉल के जरिये बात होती ही रहतीं । उसका हाल चाल पता लगता रहता ।
सुजय को कुछ ही दिनों में लगने लगा था कि यहाँ....इस देश में, उसकी राह इतनी आसान नहीं है जितनी कि वह सोच रहा था । उसके कुछ सहयोगी विशेषकर जॉन उस पर नस्लवादी टिप्पणी करते हुये कभी उसके बात करने के तरीके पर तो कभी उसके रंग पर तो कभी उसके खानपान के तरीके पर व्यंग्य करते हुये उसे दोयम दर्जे का इंसान साबित करने में तुला हुआ था जबकि उसके अन्य साथी चुप रहकर एक तरह से परोक्ष रूप से उसका समर्थन ही कर रहे थे । यही बात उसे कचोटती रहती थी जिसके कारण उसकी कार्यक्षमता प्रभावित होने लगी थी । कभी-कभी उसे लगता कि कहीं वह वास्तव में इस विकसित देश में मिसफिट तो नहीं है या ये लोग एक विदेशी द्वारा उनके देश की कंपनी में नौकरी हथियाये जाने के कारण कुंठित हैं । बार-बार उसके प्रश्न से परेशान उसके अंतर्मन ने एक दिन उससे कहा...
‘ तुम मिसफिट नहीं हो वरन् तुम्हारे सहयोगी ही तुम्हारी योग्यता से ईष्र्याग्रस्त होकर तुम पर नस्लवादी टिप्पणी करते हुये तुम्हारे मन में हीनभावना पैदा करना चाहते हैं । माना भारतीय होने के कारण तुम्हारा बात करने का लहजा उनसे अलग है पर योग्यता में तुम उनसे कमतर नहीं हो...। क्या इसका तुम्हें भान नहीं है ? इस तरह निराश होकर तुम उनकी बातों को ही सिद्ध कर रहे हो । तुम्हीं तो कहा करते थे कि हौसले रखने वालों की कभी हार नहीं होती फिर अब यह कैसी दुविधा ? दुविधा से बाहर निकल कर लक्ष्य के प्रति ध्यान केन्द्रित करो...आज जो तुम्हारे कार्य में बाधा बन रहे हैं वही एक दिन तुम्हारी प्रशंसा करेंगे ।’
अंतर्मन की आवाज सुनकर उसका आत्मविश्वास बढ़ा जिसके कारण वह अपने सहयोगियों की फब्तियाँ सुनकर भी चुप रहकर अपना काम करता रहता । एक ऐसे ही दिन जब जॉन उसके खाने के तरीके को लेकर उसका मजाक बना रहा था तब कुछ ही दिन पूर्व ही उसके प्रोजेक्ट को ज्वाइन करने वाली उसकी सहयोगी क्रिस्टीना ने जॉन को न केवल रोका वरन अन्य सहयोगियों को भी उसका साथ देने के लिए टोका । अब तो जब भी ऐसा होता क्रिस्टीना ढाल बनकर खड़ी हो जाती । धीरे-धीरे सहयोगियों के रूख में भी परिवर्तन आता गया । अब वे भी उसके साथ बराबरी का व्यवहार करते हुये उसे सहयोग देने लगे ।
धीरे-धीरे क्रिस्टीना के साथ उसकी दोस्ती बढ़ती गई । उसे जानकर आश्चर्य हुआ कि जब वह मेट्रिक में थी तब उसके माता-पिता उसकी तथा उसकी छोटी बहन की परवाह किए बिना अलग हो गये तथा उन दोनों ने ही दूसरा विवाह कर लिया । कुछ महीनों तक उसके पिता उन्हें पाकेट मनी देते रहे बाद में उन्होंने भी किनारा कर लिया । तब उसने नौकरी करते हुये न केवल अपनी पढ़ाई जारी रखी वरन् अपनी छोटी बहन कैथरीना को भी संभाला । छोटी बहन कैथरीना को पिछले माह ही हावर्ड कालेज में जॉब मिला है । उसे पढ़ाने का बहुत शौक है अतः उसने वहाँ लेक्चर का पद स्वीकार कर लिया ।
लगभग दो वर्ष पश्चात् प्रोजेक्ट के पूरा होने पर सुजय ने दो हफ्ते की छुट्टियों के लिये आवेदन किया । क्रिस्टीना को पता चला तो उसने भी यह कहकर साथ चलने की पेशकश की कि उसने भारत और उसकी संस्कृति के बारे में बहुत सुना है, वह एक बार भारत भ्रमण करना चाहती है विशेषकर प्यार की निशानी ताजमहल देखना चाहती है ।
सुजय उसे मना करके उसे आहत नहीं करना चाहता था क्योंकि उसने ही न केवल उसे अपने सहयोगियों के बीच सम्मानित स्थान दिलवाया वरन् उसके आत्मविश्वास को भी खंडित करने से रोका था । उसे क्रिस्टीना को अपने साथ ले जाने में कोई आपत्ति नहीं थी पर वह पर अपने माँ-पापा की वजह से सशंकित था । आखिर उसने माँ को बता ही दिया कि उसकी मित्र भी उसके साथ आ रही है ।
‘ मित्र... वह भी एक लड़की । कहीं कुछ छिपा तो नहीं रहा है हमसे ? ’ पारंपरिक अंदाज में माँ ने रियेक्ट करते हुये सशंकित स्वर में पूछा ।
‘ नहीं माँ, ऐसा कुछ नहीं है हमारे बीच...हम सिर्फ एक अच्छे दोस्त हैं ।’ उसने कहा ।
‘ ठीक है...ठीक है लेकिन यह दोस्ती, दोस्ती तक ही सीमित रहनी चाहिये, मुझे विदेशी मेम बहू के रूप में स्वीकार्य नहीं है ।’ कहकर उसका उत्तर सुनने से पूर्व ही माँ ने फोन रख दिया ।
नियत समय पर घर पहुँचने पर ठंडेपन से माँ को स्वागत करते देख सुजय का मन बुझ गया । उसे लग रहा था क्रिस्टीना उसके घर के लोगों के बारे में कोई गलत धारणा न बना ले क्योंकि उसके मन में भारत की ‘ अतिथि देवो भवः ’ की मूर्ति विराजमान है । सुजय को इस बात की प्रसन्नता थी कि उसकी बहन सपना क्रिस्टीना की सारी आवश्यकताओं को समझते हुये उसका साथ देने की भरपूर कोशिश कर रही है ।
यद्यपि भारत आने से पहले क्रिस्टीना ने उससे साधारणतया प्रयोग में आने वाले कुछ हिंदी के शब्द सीखे थे पर अब सपना के सानिध्य में अपने हिंदी ज्ञानवर्धन करने में लगी हुई थी । सपना भी उसके हिंदी के प्रति लगाव देखकर उसके साथ सहयोग कर रही थी । माँ जब पूजा करती तब क्रिस्टीना उन्हें बड़े ध्यान से देखती तथा सपना से मंदिर में रखी विभिन्न मूर्तियों के बारे में पूछती । सपना भी उसकी हर जिज्ञासा का उत्तर देती थी ।
माँ के विरोध करने के बावजूद सुजय ने किसी तरह उनको मनाकर क्रिस्टीना को आगरा, जयपुर, उदयपुर घूमने का कार्यक्रम बना ही लिया । जयपुर में जहाँ हवा महल तथा किलों को देखकर क्रिस्टीना अभिभूत थी वहीं झीलों के शहर उदयपुर ने उसका मन मोह लिया । ताजमहल देखकर वह कह उठी, ‘ वाह ! अति सुंदर...क्या कोई किसी को इतना प्यार कर सकता है कि वह उसकी याद में इतना सुंदर मेमोरियल बनवा दे ?’
‘ सुजय क्या तुम मुझसे विवाह करोगे ? मैं भारत में रहकर ही तुम्हारे साथ अपना जीवन बिताना चाहती हूँ ।’ अचानक क्रिस्टीना ने उससे लिपटते हुये कहा ।
‘ भारत में...। ’ अचकचाकर सुजय ने कहा ।
‘ हाँ भारत में...लेकिन तभी जब हमें यहाँ अपनी पसंद का कोई काम मिलेगा ।’
यद्यपि सुजय के मन में क्रिस्टीना के प्रति इस तरह के भाव पनपे थे पर वह जानता था ऐसा संभव नहीं है । माँ-पापा इस संबंध के लिये कभी तैयार नहीं होंगे । माँ-पापा से इस संबंध में बात करने से कोई फायदा नहीं था । अगर कुछ कर सकती थी तो केवल सपना ही...उसने सपना को अपने मन की बात बताई । उसने माँ-पापा के सामने उनकी पैरवी भी की । एक समय ऐसा भी आया कि पापा ने बेमन से ही सही उनके इस संबंध के लिये अपनी स्वीकृति दे दी पर माँ नहीं मानी । वे लौट आये थे ।
समय के साथ सपना का विवाह तय हो गया । वह विवाह में सम्मिलित होने गया । माँ ने उसे विवाह योग्य लड़कियों की फोटो दिखाई पर उसने उन्हें देखने से भी मना कर दिया । उसने सिर्फ इतना कहा...‘माँ आप जानती हैं, मेरे दिल में कोई बसा है, मैं उससे प्यार करता हूँ । किसी से प्यार करूँ किसी से विवाह... यह मुझसे नहीं हो पायेगा । ऐसा करके मैं किसी को धोखा नहीं देना चाहता । मैं और क्रिस्टीना आपकी सहमति का अभी तक इंतजार कर रहे हैं ।’
‘ इंतजार कर, मेरा फैसला बदलने वाला नहीं है ।’ दो टूक शब्दों में यह कहते हुये माँ ने अपनी मानसिकता बता दी थी कि अभी भी वह अपनी जिद छोड़ने को तैयार नहीं हैं ।
माँ के नकारने के बावजूद क्रिस्टीना ने हार नहीं मानी । वह हिंदी सीखने का प्रयास करने के साथ ही साथ भारतीय खानपान को भी अपनाने का भरपूर प्रयास करने लगी । एक दिन वह उससे अपने किसी आवश्यक काम के संदर्भ में जाने की बात कर छुट्टी लेकर चली गई ।
‘ सुजय जितनी जल्दी हो सके तू घर आ जा ।’ एक दिन माँ ने फोन कर उससे कहा ।
‘ माँ घर में सब ठीक है न ।’ उसने घबराकर पूछा था ।
‘ सब ठीक है, बस तू जल्दी घर आ जा ।’ माँ ने अपनी बात दोहराई थी ।
माँ के मना करने के बावजूद सुजय ने बार-बार उनके आग्रह का कारण जानना चाहा क्योंकि चार वर्षो के विदेश प्रवास के दौरान माँ ने इस तरह से उससे कभी आग्रह नहीं किया था । वह बार-बार यही कहती रही कि तू घर आ जा फिर बता दूँगी ।
सुजय ने क्रिस्टीना को घर जाने की बात बताने के लिये फोन किया पर उसका फोन स्विच आफ बता रहा था । वैसे भी जाते समय उसने उससे कहा था तुम मुझे फोन मत करना जब मुझे अवसर मिलेगा मैं ही फोन कर लिया करूँगी । पिछले महीने भर से उससे कान्टेक्ट न कर पाने के कारण वह चिंतित भी था । कैथरीना को फोन कर उससे पूछा तो उसने भी कह दिया कि उसे पता नहीं, अब अचानक जाना...वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे ? आखिर क्रिस्टीना के लिये मैसेज छोड़कर वह घर के लिये चल दिया ।
यात्रा के दौरान पूरा समय उसका इसी उहापोह में बीता कि माँ ने उसे क्यों बुलाया है...!! कहीं पापा की तबियत तो खराब नहीं है । अगर ऐसा है तो माँ ने उसे बताया क्यों नहीं ?
‘ तू परेशान होगा, इसलिये नहीं बताया होगा ।’ अंतर्मन ने कहा ।
‘ क्या मैं बच्चा हूँ ?’
‘ माँ के लिये उसका पुत्र या पुत्री सदैव बच्चे ही रहते हैं ।’
चौबीस घंटे की यात्रा के दौरान मन बेहद परेशान रहा । घर पहुँचकर बेचैनी से घंटी बजाई...दरवाजा माँ ने ही खोला । उनके पीछे क्रिस्टीना को खड़ा देखकर वह चौंक गया ।
‘ बहुत दिन आजाद घूम लिया । अब बेड़ियाँ पहनने के लिये तैयार हो जा । अगले हफ्ते तेरा विवाह है ।’ वह कुछ पूछ पाता, उससे पहले ही माँ ने कहा ।
‘ विवाह पर किससे ?’ अनजान बनते हुये उसने पूछा ।
‘ कह तो ऐसे रहा है जैसे तुझे पता ही नहीं...अरे, क्रिस्टीना को देखकर भी तुझे आभास नहीं हुआ...। तेरा विवाह क्रिस्टीना से है...बहुत प्यारी बच्ची है । मैंने इससे कह दिया है तुझे जैसे रहना हो इस घर में रहना । हमारी ओर से कोई बंदिश नहीं है । बस तू मेरे इस नादान बच्चे का ख्याल रखना ।’ माँ ने उसके चेहरे पर चपत लगाते हुये प्यार से कहा तथा क्रिस्टीना की ओर देखकर मुस्करा दीं ।
घर के अंदर आकर अवसर पाकर उसने क्रिस्टीना से माँ के अंदर आये परिवर्तन के बारे में पूछा तो उसने मुस्करा कर कहा,‘ प्यार देकर ही प्यार पाया जा सकता है । इस बात को हम स्त्रियाँ ही समझ और समझा सकती हैं । माँ ने मेरे दिल की सच्ची बात सुनी और हमारे रिश्ते को मंजूरी मिल गई । मुझे तुम्हारे साथ माँ-पापा और एक प्यारी बहन भी मिल गई । आज मैं बहुत खुश हूँ । ’
आखिर चार वर्षो की जद्दोजेहद के पश्चात् उनके प्यार को माँ-पापा का आशीर्वाद मिल ही गया । सच अगर दो दिल मिल जायें तो सात समुंदर की दूरियाँ भी मायने नहीं रखतीं...अंततः सरहदें टूट ही जाती हैं ।
सपना और उसके पति धीरज ने विवाह का इंतजाम संभाल लिया था । आखिर विवाह का दिन भी आ गया । क्रिस्टीना की बहन कैथरीना भी विवाह में सम्मिलित होने आ गई थी । वह भी बहन का घर संसार को देखकर बहुत ही खुश थी । खूब धूमधाम से उनका विवाह हुआ । विवाह वाले दिन क्रीम कलर के सुनहरे जरी के काम वाले लंहगे में सुजय के बगल में खड़ी क्रिस्टीना परी से कम नहीं लग रही थी । नाते रिश्तेदारों और पड़ोसियों से क्रिस्टीना की प्रसंशा सुनकर माँ बाग-बाग हो रही थीं ।
कुछ दिन माँ-पापा के पास रहकर आखिर उन्हें अपनी कर्मभूमि लौटना पड़ा । अब उन्होंने भारत में अपने योग्य काम खोजने की शुरूवात के साथ अपनी कंपनी में भी वापस अपने देश लौटने की इच्छा जताते हुए आवेदन कर दिया ।
इस बीच क्रिस्टीना ने आग्रहकर माँ-पापा को अमेरिका बुलाया तथा उसने और सुजय ने उन्हें अमेरिका के मुख्य पर्यटन स्थल...नियाग्रा फाल, स्टेचू आफ लिबर्टी, वाशिंगटन डी.सी. तथा फ्लोरिडा का डिस्नेवर्ड भी घुमा दिया । वह सपना और धीरज को भी बुलाना चाहती थी किंतु धीरज अपने कार्य के सिलसिले में इतना व्यस्त था कि वह समय ही नहीं निकाल पाया ।
आखिर दो वर्ष पश्चात् सुजय और क्रिस्टीना का प्रयास रंग लाया, उनकी इच्छापूर्ण हुई । उन दोनों को उनकी कंपनी ने भारत में रहकर कार्य करने की इजाजत दे दी । कहते हैं जहाँ चाह है वहाँ राह भी निकल ही आती है ।
सुधा आदेश
Friday, November 8, 2019
पेशानी पर टंगा प्रश्न
पेशानी पर टंगा प्रश्न
सुरेखा को अनियंत्रित हालत में घर में प्रवेश करते देखकर अरुणा ने चौंक कर पूछा,’ क्या हुआ सुरेखा ?’
‘अब क्या और कैसे बताऊँ ?’ कहकर सुरेखा सिर पर हाथ रखकर बैठ गई ।
‘संभालो स्वयं को फिर बताओ हुआ क्या है?’ अरुणा ने उसे पानी का ग्लास पकड़ाते हुए कहा ।
‘जब अपना ही सिक्का खोटा हो तो दोष किसको दूँ ?’
‘पहेलियां ही बुझाती रहोगी या कुछ बताओगी भी ।'
‘नमन लिव इन में रह रहा है !’
‘क्या ? कब से ?’ इस बार चौंकने की बारी अरुणा की थी ।
‘चार पाँच महीने हो गए पर मुझे अभी हफ्ते भर पहले पता चला । न जाने क्या-क्या ख्बाब देखे थे सब मिट्टी में मिला दिये । आज मन बहुत परेशान था अतः तेरे पास चली आई ।'
‘अच्छा किया …जो भी निर्णय करना सोच समझ कर करना । आज की पीढ़ी अपने मन की करती है । वे बालिग हैं, आत्मनिर्भर हैं…झुकना तो हमें ही पड़ेगा ।’
‘तुम ठीक कह रही हो मैं और अजय तो इस संबंध को स्वीकारने को तैयार हूँ पर वे अभी विवाह नहीं करना चाहते । उनका मत है अभी वे पूरी तरह सैटल नहीं हैं ।’
‘तुमने उन्हें ऊँच-नीच नहीं समझाई !!’
‘सब कहकर देख लिया. नमन कहता है कि हम बच्चे नहीं हैं । अपना भला बुरा समझते हैं.’
‘और वह लड़की…क्या नाम है उसका ।’
‘प्रिया का भी यही मानना है । वह भी अभी पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहती ।'
‘तुमने उसके माता-पिता से बात की ।’
‘बात की थी । वे भी अपनी बेटी की जिद के सामने विवश हैं ।’
‘सच आज के बच्चों को पालना उन्हें संस्कार देना टेढ़ी खीर है । तेरा तो बेटा है…तेरी बात सुनकर मुझे अपनी बेटी सुवर्णा की चिंता होने लगी है ।’
‘माना मेरा बेटा है पर मैं स्त्री होने के नाते उस बेटी के माता-पिता के दर्द से कैसे अनभिज्ञ रह सकती हूँ जो अपनी बेटी के बिना किसी संबंध के किसी गैर मर्द के साथ रहने का दर्द झेल रहे हैं । इस स्तिथि के लिये कहीं न कहीं मैं भी दोषी हूँ जो अपने पुत्र को स्त्री का सम्मान करना नहीं सिखा पाई । बस अब तो एक ही कामना है कि नमन प्रिया को धोखा न दे । अच्छा अब चलती हूँ ।'
अपनी प्रिय सखी सुरेखा की आँखों में झलक रहे आँसुओं को देखकर अरुणा सोच रही थी कि हमारी पीढ़ी बच्चों के कदम से कदम मिलाकर चलना चाहती है पर पता नहीं कब, कहाँ चूक हो जाती है जो न वे हमें समझ पाते हैं न ही हम उन्हें...यहाँ तक कि शारीरिक सुख की खातिर आज वे सामाजिक और नैतिक मूल्यों की धज्जियाँ उड़ाने से भी नहीं चूक रहे हैं । आखिर कहाँ जा रहे हैं हम ? एक प्रश्न टंग गया था उसकी पेशानी पर ...जिसका कोई उत्तर उसके पास नहीं था ।
सुधा आदेश
Wednesday, November 6, 2019
संतुष्टि
संतुष्टि
अक्सर नीलिमा अपने घर के सामने की सड़क पर एक युवक को गाय चराने के लिए जाते हुए देखा करती थी । मैले कुचैले कपड़े, नंगे पैरों के बावजूद उसके ओंठ कुछ न कुछ गुनगुनाते रहते थे । चेहरे पर सदा एक निर्दोष मुस्कान खिली रहती थी । उसको देखकर कभी-कभी लगता कि वह इतनी तंगहाली में भी इतना खुश कैसे रह लेता है जबकि वह स्वयं सारी सुख-सुविधा होने के बावजूद खुश नहीं रह पाती थी ।
बच्चे बाहर पढ़ रहे थे । पति अमित चार दिन के टूर पर गये थे । घर में करने के लिये कुछ नहीं था अतः नीलिमा अपने बागवानी के शौक को पूरा करने के लिये बगीचे में पानी देने लगी । अचानक उसका पैर पाइप में उलझ गया और वह गिर पड़ी । संयोग था कि उसी समय वह युवक अपनी गाय को चराने जा रहा था । उसकी आवाज सुनकर वह दौड़ा-दौड़ा आया तथा उसे उठाते हुये कहा ‘ आंटी चोट तो नहीं लगी ।’
‘ नहीं बेटा...।’
‘ क्या नाम है बेटा तुम्हारा ?’
‘ सोना....। ‘
‘ बहुत अच्छा नाम है । ‘
‘ ओ.के. आंटी अब मैं चलूँ ।’
‘ रूको बेटा, मैं अभी आई । ’ कहकर नीलिमा घर के अंदर गई ।
बाहर आकर नीलिमा ने सोना को चाकलेट के साथ कुछ रूपये दिये...
‘ आंटी हम गरीब जरूर हैं पर भिखमंगे नहीं...मेरे पास दो-दो माँ है फिर मुझे इन सबकी क्या आवश्यकता है ? मेरी सारी आवश्यकतायें वे पूरा कर देतीं हैं ।’ कहते हुये उसने उसकी गिफ्ट लेने से इंकार कर दिया ।
‘ दो-दो माँ...।’
‘ हाँ...एक मेरी माँ तथा दूसरी मेरी शालू माँ...।’ उसने गाय की ओर इशारा करते हुये कहा तथा चला गया ।
नीलिमा को सोना की संतुष्टि का रहस्य पता चल गया था ।
सुधा आदेश
Tuesday, November 5, 2019
दम तोड़ती योग्यता
दम तोड़ती योग्यता
‘ प्रिंसीपल साहब हम अपने पुत्र दीपक को पूरी फीस देकर इस स्कूल में पढ़ा रहे हैं फिर भेदभाव क्यों ?’ अमित शंकर ने प्रिंसीपल की इजाजत पाकर सीट पर बैठते हुये कहा ।
‘ मैं कुछ समझा नहीं...भेदभाव...कैसा भेदभाव...?’ प्रिंसीपल ने आश्चर्य से पूछा ।
‘ आपकी नाक के नीचे ये सब हो रहा है और आपको पता ही नहीं है ।’ व्यंग्य से अमित शंकर ने कहा ।
‘ आप क्या कहना चाह रहे हैं, ठीक से कहिये...पहेलियाँ न बुझाइये
‘ मेरा बेटा दीपक क्रिकेट अच्छा खेलता है पर उसका स्कूल की क्रिकेट टीम में नाम नहीं है !! क्या केवल इसलिये कि वह दलित का बेटा है ?’ अमित शंकर की आवाज में क्रोध झलक रहा था ।
‘ ऐसा कैसे हो सकता है ? मैं अभी खेल शिक्षक को बुलाकर पूछता हूँ ।’ कहते हुये उन्होंने घंटी बजा दी ।
चपरासी विजय के आते ही उन्होंने उससे खेल शिक्षक अविनाश को बुलाने का आदेश दिया । अविनाश के आते ही प्रिंसीपल साहब ने कहा...
‘ दीपक के पिताजी अमितजी कह रहे हैं कि आप बच्चों के साथ भेदभाव करते है । दीपक क्रिकेट खेलने में अच्छा है पर आपने उसे स्कूल की क्रिकेट टीम में नहीं रखा ।’
।।‘ दलित होने के कारण...’ अमित शंकर जोड़ा ।
‘ सर, आरोप सरासर गलत है । दीपक से अच्छे अन्य बच्चे खेल रहे हैं । दीपक को भी मैं ट्रेनिंग दे रहा हूँ । अगर वह अच्छा खेलेगा तो उसे भी टीम में सम्मिलित कर लिया जायेगा । हम केवल योग्यता देखते हैं जाति नहीं...हमारे लिये सब बच्चे बराबर हैं । हमें अपनी टीम को अव्वल बनाना है जिससे दूसरे स्कूलों के साथ खेलकर जीत हासिल कर सके । ’
‘ यह सच नहीं है...आपने मेरे बेटे को अच्छा खेलने के बावजूद केवल दलित होने के कारण स्कूल की टीम में नहीं लिया ।’ अमित ने अविनाश की बातों को नकारते हुये कहा ।
‘ जो मैंने कहा है, वही सच है सर...। अगर आपका यही मत है तो अगर प्रिंसीपल साहब आदेश दें तो कल पता लगाता हूँ कि इस स्कूल में कितने दलित छात्र हैं । उनकी एक अलग टीम बनाई जा सकती है जिससे किसी दलित बच्चे के माता-पिता को कोई शिकायत न हो । कम से कम क्रिकेट में तो आरक्षण नहीं होना चाहिये...योग्यता अभी तक सर्वोपरि रही है और होनी ही चाहिये । ’ न चाहते हुये भी अविनाश का स्वर तिक्त हो गया तथा उसने निराशा में हाथ जोड़ दिये ।
‘ मैं देख लूँगा...आपको और आपके स्कूल को भी...।’ कहते हुये अमित शंकर चले गये ।
दूसरे दिन सभी प्रमुख अखबारों की हैडलाइन थी...शहर के प्रतिष्ठत स्कूल में छात्रों के साथ भेदभाव...। पूरा वाकया पूरे जोर-शोर से छपा था । पन्द्रह दिन के अंदर ही न केवल दीपक को स्कूल की क्रिकेट टीम में शामिल कर लिया गया वरन् पिछले पाँच वर्षो से स्कूल का खेलों में अद्वितीय प्रदर्शन करने के बावजूद अविनाश को नौकरी से हाथ धोना पड़ा । मैनेजमेंट कुछ नहीं कर पाया क्योंकि अमित शंकर के दलित कार्ड के आगे सभी विवश थे ।
सुधा आदेश
निःशब्द
निःशब्द
समीर के हाथ से खाने की प्लेट गिर गई । सीमा कमली को फर्श साफ करने का निर्देश देते हुये पुनः समीर के लिये प्लेट लगाने लगी । कमली ने फर्श पर गिरा खाना एक पोलीथीन में डाला तथा तथा गांठ मारकर एक कोने में रख दिया ।
‘ कमली खाने को फेंक दो, किनारे क्यों रख दिया ।’ सीमा ने पूछा ।
‘ भौजी, ठीक ही बा, जमीन अभी ही तो पोंछे बा । घर ले जाब, अपने बबुआ को खिलाब देब, उसके नसीबबा में ऐसा खाना कहाँ ?’
कमली की बात सुनकर वह निःशब्द रह गई । विकास के स्थानांतरण के कारण उन्हें इस छोटे से कस्बे में आये तीन महीने हुये थे । उसने सुना तो था इस इलाके में गरीबी बहुत है पर इतनी होगी उसने कल्पना भी नहीं की थी । वह बचा खाना गाय या कुत्ते को खिला देती थी पर इन्हें यह सोचकर नहीं देती थी कि कहीं इनकी आदत न बिगड़ जाये । एकाएक उसने निर्णय किया अब घर में जो भी बनेगा वह कमली के बबुआ को अवश्य देगी ।
Friday, November 1, 2019
रिश्तों की बुनाई
रिश्तों की बुनाई
‘दादी आप कितना अच्छा स्वेटर बुना करती थीं...मुझे आज भी याद है जब हम पढ़ते थे तब आप हमारे पास रजाई में बैठकर हमारे लिये नई-नई डिजाइन के स्वेटर बुना करती थीं ।’ पल्लवी ने दादी की रजाई में घुसकर उनसे चिपकते हुये कहा ।
‘ बेटा वह दिन और ही थे । अपने हाथ से स्वेटर बुनकर पहनाना सुकून देता था । फिर तुम पहन भी तो लेती थीं मेरे हाथ का बुना स्वेटर ।’
‘ सच कहतीं हैं आप दादी, आपके बनाये स्वेटरों की डिजाइन तो सुन्दर रहती ही थी इसके साथ उनमें आपके प्यार की जो गर्माहट थी वह बाजार के स्वेटरों में कहाँ मिलती ?’
‘ बेटा जैसे हम स्वेटर बुनते थे वैसे ही रिश्तों को भी बुनते थे ।’
‘ रिश्ते बुनना...आप क्या कह रही हैं दादी ?’
‘ सच कह रही हूँ बेटा, रिश्तों के अनुसार ही हम रिश्तों में प्रेम के फंदे डालते थे, अगर गलत पड़ गया तो पुनः उसे उधेड़कर उसे ठीक कर अपने मनमाफिक बना ही लेते थे । इसलिये हमारे समय में रिश्ते आज की तरह टूटते नहीं थे । आज लोगों ने बुनना छोड़ दिया है शायद इसीलिये प्रेम के धागों को सहेज नहीं पा रहे हैं...।’ गहरी सांस लेते हुये दादी ने कहा ।
‘ जा सो जा मेरी लाढ़ो...कल तेरा विवाह है ।’ उसे चुप देखकर दादी ने पुनः कहा तथा करवट बदल कर सो गई ।
कल तेरा विवाह है, जा सो जा...बार-बार दादी के गूँजते शब्दों के साथ बीते पलों की स्मृतियाँ उसे होटल के आरामदेह कमरे में भी निद्रा देवी की गोद में विश्राम करने से रोक रही थीं...अचानक उसे बीते पल याद आने लगे...
‘ जब देखो मुझे ही छुट्टी लेनी पड़ती है...क्या आपकी अपने बच्चे के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है ?’ माँ ने पापा को उलाहना दिया था ।
‘ मैं छुट्टी ले लेता पर आज मेरा प्रजेंन्टेशन है । प्लीज आज तुम रूक जाओ कल मैं छुट्टी ले लूँगा ।’ पापा ने माँ से आग्रह किया ।
‘ रोज-रोज यही बहाना...तुम्हें क्या पता रोज-रोज छुट्टी लेने से आफिस में मेरी इमेज कितनी खराब हो रही है । राजीव तो जब तब कह ही देता है औरतों को इसीलिये कंपनी को रखना ही नहीं चाहिये क्योंकि वे बहाने मारकर काम से भागना चाहती हैं ।’
उनके जब-तब होते लड़ाई झगड़े उसके छोटे से मस्तिष्क को परेशान कर देते थे पर इसका उसके माता-पिता को जरा सा भी भान नहीं था । अंततः उसकी माँ ने नौकरी की बजाय उसे ही छोड़ना श्रेयस्कर समझा । माँ चली गई थी तबसे दादी माँ ने ही उसे संभाला है । उसे माँ की धुंधली तस्वीर ही याद है...। पहले विवाह की कड़ुवाहट के कारण दादी के बार-बार आग्रह के बावजूद पापा ने दूसरा विवाह नहीं किया ।
विदा के समय दादी के गले मिलते हुये उसने एक निर्णय लिया था कि वह भी दादी के समान रिश्तों को प्रेम के रंग से बुनेगी...।
सुधा आदेश
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