Saturday, June 15, 2019
कामयाब
कामयाब
हमेशा जिंदादिल और खुशमिजाज रमा को अंदर आ कर चुपचाप बैठे देख चित्रा से रहा नहीं गया, पूछ बैठी, ‘‘क्या बात है, रमा…?’’
‘‘अभिनव की वजह से परेशान हूं.’’
‘‘क्या हुआ है अभिनव को?’’
‘‘वह डिपे्रशन का शिकार होता जा रहा है.’’
‘‘पर क्यों और कैसे?’’
‘‘उसे किसी ने बता दिया है कि अगले 2 वर्ष उस के लिए अच्छे नहीं रहेंगे.’’
‘‘भला कोई भी पंडित या ज्योतिषी यह सब इतने विश्वास से कैसे कह सकता है. सब बेकार की बातें हैं, मन का भ्रम है.’’
‘‘यही तो मैं उस से कहती हूं पर वह मानता ही नहीं. कहता है, अगर यह सब सच नहीं होता तो आर्थिक मंदी अभी ही क्यों आती… कहां तो वह सोच रहा था कि कुछ महीने बाद दूसरी कंपनी ज्वाइन कर लेगा, अनुभव के आधार पर अच्छी पोस्ट और पैकेज मिल जाएगा पर अब दूसरी कंपनी ज्वाइन करना तो दूर, इसी कंपनी में सिर पर तलवार लटकी रहती है कि कहीं छटनी न हो जाए.’’
‘‘यह तो जीवन की अस्थायी अवस्था है जिस से कभी न कभी सब को गुजरना पड़ता है, फिर इस में इतनी हताशा और निराशा क्यों? हताश और निराश व्यक्ति कभी सफल नहीं हो सकता. जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लाने के लिए सोच भी सकारात्मक होनी चाहिए.’’
‘‘मैं और अभिजीत तो उसे समझासमझा कर हार गए,’’ रमा बोली, ‘‘तेरे पास एक आस ले कर आई हूं, तुझे मानता भी बहुत है…हो सकता है तेरी बात मान कर शायद मन में पाली गं्रथि को निकाल बाहर फेंके.’’
‘‘तू चिंता मत कर,’’ चित्रा बोली, ‘‘सब ठीक हो जाएगा… मैं सोचती हूं कि कैसे क्या कर सकती हूं.’’
घर आने पर रमा द्वारा कही बातें चित्रा ने विकास को बताईं तो वह बोले, ‘‘आजकल के बच्चे जराजरा सी बात को दिल से लगा बैठते हैं. इस में दोष बच्चों का भी नहीं है, दरअसल आजकल मीडिया या पत्रपत्रिकाएं भी इन अंधविश्वासों को बढ़ाने में पीछे नहीं हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो विभिन्न चैनलों पर गुरुमंत्र, आप के तारे, तेज तारे, ग्रहनक्षत्र जैसे कार्यक्रम प्रसारित न होते तथा पत्रपत्रिकाओं के कालम ज्योतिषीय घटनाओं तथा उन का विभिन्न राशियों पर प्रभाव से भरे नहीं रहते.’’
विकास तो अपनी बात कह कर अपने काम में लग गए पर चित्रा का किसी काम में मन नहीं लग रहा था. बारबार रमा की बातें उस के दिलोदिमाग में घूम रही थीं. वह सोच नहीं पा रही थी कि अपनी अभिन्न सखी की समस्या का समाधान कैसे करे. बच्चों के दिमाग में एक बात घुस जाती है तो उसे निकालना इतना आसान नहीं होता.
उन की मित्रता आज की नहीं 25 वर्ष पुरानी थी. चित्रा को वह दिन याद आया जब वह इस कालोनी में लिए अपने नए घर में आई थी. एक अच्छे पड़ोसी की तरह रमा ने चायनाश्ते से ले कर खाने तक का इंतजाम कर के उस का काम आसान कर दिया था. उस के मना करने पर बोली, ‘दीदी, अब तो हमें सदा साथसाथ रहना है. यह बात अक्षरश: सही है कि एक अच्छा पड़ोसी सब रिश्तों से बढ़ कर है. मैं तो बस इस नए रिश्ते को एक आकार देने की कोशिश कर रही हूं.’
और सच, रमा के व्यवहार के कारण कुछ ही समय में उस से चित्रा की गहरी आत्मीयता कायम हो गई. उस के बच्चे शिवम और सुहासिनी तो रमा के आगेपीछे घूमते रहते थे और वह भी उन की हर इच्छा पूरी करती. यहां तक कि उस के स्कूल से लौट कर आने तक वह उन्हें अपने पास ही रखती.
रमा के कारण वह बच्चों की तरफ से निश्ंिचत हो गई थी वरना इस घर में शिफ्ट करने से पहले उसे यही लगता था कि कहीं इस नई जगह में उस की नौकरी की वजह से बच्चों को परेशानी न हो.
विवाह के 11 वर्ष बाद जब रमा गर्भवती हुई तो उस की खुशी की सीमा न रही. सब से पहले यह खुशखबरी चित्रा को देते हुए उस की आंखों में आंसू आ गए. बोली, ‘दीदी, न जाने कितने प्रयत्नों के बाद मेरे जीवन में यह खुशनुमा पल आया है. हर तरह का इलाज करा लिया, डाक्टर भी कुछ समझ नहीं पा रहे थे क्योंकि हर जांच सामान्य ही निकलती… हम निराश हो गए थे. मेरी सास तो इन पर दूसरे विवाह के लिए जोर डालने लगी थीं पर इन्होंने किसी की बात नहीं मानी. इन का कहना था कि अगर बच्चे का सुख जीवन में लिखा है तो हो जाएगा, नहीं तो हम दोनों ऐसे ही ठीक हैं. वह जो नाराज हो कर गईं, तो दोबारा लौट कर नहीं आईं.’
आंख के आंसू पोंछ कर वह दोबारा बोली, ‘दीदी, आप विश्वास नहीं करेंगी, कहने को तो यह पढ़ेलिखे लोगों की कालोनी है पर मैं इन सब के लिए अशुभ हो चली थी. किसी के घर बच्चा होता या कोई शुभ काम होता तो मुझे बुलाते ही नहीं थे. एक आप ही हैं जिन्होंने अपने बच्चों के साथ मुझे समय गुजारने दिया. मैं कृतज्ञ हूं आप की. शायद शिवम और सुहासिनी के कारण ही मुझे यह तोहफा मिलने जा रहा है. अगर वे दोनों मेरी जिंदगी में नहीं आते तो शायद मैं इस खुशी से वंचित ही रहती.’
उस के बाद तो रमा का सारा समय अपने बच्चे के बारे में सोचने में ही बीतता. अगर कुछ ऐसावैसा महसूस होता तो वह चित्रा से शेयर करती और डाक्टर की हर सलाह मानती.
धीरेधीरे वह समय भी आ गया जब रमा को लेबर पेन शुरू हुआ तो अभिजीत ने उस का ही दरवाजा खटखटाया था. यहां तक कि पूरे समय साथ रहने के कारण नर्स ने भी सब से पहले अभिनव को चित्रा की ही गोदी में डाला था. वह भी जबतब अभिनव को यह कहते हुए उस की गोद में डाल जाती, ‘दीदी, मुझ से यह संभाला ही नहीं जाता, जब देखो तब रोता रहता है, कहीं इस के पेट में तो दर्द नहीं हो रहा है या बहुत शैतान हो गया है. अब आप ही संभालिए. या तो यह दूध ही नहीं पीता है, थोड़ाबहुत पीता है तो वह भी उलट देता है, अब क्या करूं?’
हर समस्या का समाधान पा कर रमा संतुष्ट हो जाती. शिवम और सुहासिनी को तो मानो कोई खिलौना मिल गया, स्कूल से आ कर जब तक वे उस से मिल नहीं लेते तब तक खाना ही नहीं खाते थे. वह भी उन्हें देखते ही ऐसे उछलता मानो उन का ही इंतजार कर रहा हो. कभी वे अपने हाथों से उसे दूध पिलाते तो कभी उसे प्रैम में बिठा कर पार्क में घुमाने ले जाते. रमा भी शिवम और सुहासिनी के हाथों उसे सौंप कर निश्ंिचत हो जाती.
धीरेधीरे रमा का बेटा चित्रा से इतना हिलमिल गया कि अगर रमा उसे किसी बात पर डांटती तो मौसीमौसी कहते हुए उस के पास आ कर मां की ढेरों शिकायत कर डालता और वह भी उस की मासूमियत पर निहाल हो जाती. उस का यह प्यार और विश्वास अभी तक कायम था. शायद यही कारण था कि अपनी हर छोटीबड़ी खुशी वह उस के साथ शेयर करना नहीं भूलता था.
पर पिछले कुछ महीनों से वह उस में आए परिवर्तन को नोटिस तो कर रही थी पर यह सोच कर ध्यान नहीं दिया कि शायद काम की वजह से वह उस से मिलने नहीं आ पाता होगा. वैसे भी एक निश्चित उम्र के बाद बच्चे अपनी ही दुनिया में रम जाते हैं तथा अपनी समस्याओं के हल स्वयं ही खोजने लगते हैं, इस में कुछ गलत भी नहीं है पर रमा की बातें सुन कर आश्चर्यचकित रह गई. इतने जहीन और मेरीटोरियस स्टूडेंट के दिलोदिमाग में यह फितूर कहां से समा गया?
बेटी सुहासिनी की डिलीवरी के कारण 1 महीने घर से बाहर रहने के चलते ऐसा पहली बार हुआ था कि वह रमा और अभिनव से इतने लंबे समय तक मिल नहीं पाई थी. एक दिन अभिनव से बात करने के इरादे से उस के घर गई पर जो अभिनव उसे देखते ही बातों का पिटारा खोल कर बैठ जाता था, उसे देख कर नमस्ते कर अंदर चला गया, उस के मन की बात मन में ही रह गई.
वह अभिनव में आए इस परिवर्तन को देख कर दंग रह गई. चेहरे पर बेतरतीब बढ़े बालों ने उसे अलग ही लुक दे दिया था. पुराना अभिनव जहां आशाओं से ओतप्रोत जिंदादिल युवक था वहीं यह एक हताश, निराश युवक लग रहा था जिस के लिए जिंदगी बोझ बन चली थी.
समझ में नहीं आ रहा था कि हमेशा हंसता, खिलखिलाता रहने वाला तथा दूसरों को अपनी बातों से हंसाते रहने वाला लड़का अचानक इतना चुप कैसे हो गया. औरों से बात न करे तो ठीक पर उस से, जिसे वह मौसी कह कर न सिर्फ बुलाता था बल्कि मान भी देता था, से भी मुंह चुराना उस के मन में चलती उथलपुथल का अंदेशा तो दे ही गया था. पर वह भी क्या करती. उस की चुप्पी ने उसे विवश कर दिया था. रमा को दिलासा दे कर दुखी मन से वह लौट आई.
उस के बाद के कुछ दिन बेहद व्यस्तता में बीते. स्कूल में समयसमय पर किसी नामी हस्ती को बुला कर विविध विषयों पर व्याख्यान आयोजित होते रहते थे जिस से बच्चों का सर्वांगीण विकास हो सके. इस बार का विषय था ‘व्यक्तित्व को आकर्षक और खूबसूरत कैसे बनाएं.’ विचार व्यक्त करने के लिए एक जानीमानी हस्ती आ रही थी.
आयोजन को सफल बनाने की जिम्मेदारी मुख्याध्यापिका ने चित्रा को सौंप दी. हाल को सुनियोजित करना, नाश्तापानी की व्यवस्था के साथ हर क्लास को इस आयोजन की जानकारी देना, सब उसे ही संभालना था. यह सब वह सदा करती आई थी पर इस बार न जाने क्यों वह असहज महसूस कर रही थी. ज्यादा सोचने की आदत उस की कभी नहीं रही. जिस काम को करना होता था, उसे पूरा करने के लिए पूरे मनोयोग से जुट जाती थी और पूरा कर के ही दम लेती थी पर इस बार स्वयं में वैसी एकाग्रता नहीं ला पा रही थी. शायद अभिनव और रमा उस के दिलोदिमाग में ऐसे छा गए थे कि वह चाह कर भी न उन की समस्या का समाधान कर पा रही थी और न ही इस बात को दिलोदिमाग से निकाल पा रही थी.
आखिर वह दिन आ ही गया. नीरा कौशल ने अपना व्याख्यान शुरू किया. व्यक्तित्व की खूबसूरती न केवल सुंदरता बल्कि चालढाल, वेशभूषा, वाक्शैली के साथ मानसिक विकास तथा उस की अवस्था पर भी निर्भर होती है. चालढाल, वेशभूषा और वाक्शैली के द्वारा व्यक्ति अपने बाहरी आवरण को खूबसूरत और आकर्षक बना सकता है पर सच कहें तो व्यक्ति के व्यक्तित्व का सौंदर्य उस का मस्तिष्क है. अगर मस्तिष्क स्वस्थ नहीं है, सोच सकारात्मक नहीं है तो ऊपरी विकास सतही ही होगा. ऐसा व्यक्ति सदा कुंठित रहेगा तथा उस की कुंठा बातबात पर निकलेगी. या तो वह जीवन से निराश हो कर बैठ जाएगा या स्वयं को श्रेष्ठ दिखाने के लिए कभी वह किसी का अनादर करेगा तो कभी अपशब्द बोलेगा. ऐसा व्यक्ति चाहे कितने ही आकर्षक शरीर का मालिक क्यों न हो पर कभी खूबसूरत नहीं हो सकता, क्योंकि उस के चेहरे पर संतुष्टि नहीं, सदा असंतुष्टि ही झलकेगी और यह असंतुष्टि उस के अच्छेभले चेहरे को कुरूप बना देगी.
मान लीजिए, किसी व्यक्ति के मन में यह विचार आ गया कि उस का समय ठीक नहीं है तो वह चाहे कितने ही प्रयत्न कर ले सफल नहीं हो पाएगा. वह अपनी सफलता की कामना के लिए कभी मंदिर, मसजिद दौड़ेगा तो कभी किसी पंडित या पुजारी से अपनी जन्मकुंडली जंचवाएगा.
मेरे कहने का अर्थ है कि वह प्रयत्न तो कर रहा है पर उस की ऊर्जा अपने काम के प्रति नहीं, अपने मन के उस भ्रम के लिए है…जिस के तहत उस ने मान रखा है कि वह सफल नहीं हो सकता.
अब इस तसवीर का दूसरा पहलू देखिए. ऐसे समय अगर उसे कोई ग्रहनक्षत्रों का हवाला देते हुए हीरा, पन्ना, पुखराज आदि रत्नों की अंगूठी या लाकेट पहनने के लिए दे दे तथा उसे सफलता मिलने लगे तो स्वाभाविक रूप से उसे लगेगा कि यह सफलता उसे अंगूठी या लाकेट पहनने के कारण मिली पर ऐसा कुछ भी नहीं होता.
वस्तुत: यह सफलता उसे उस अंगूठी या लाकेट पहनने के कारण नहीं मिली बल्कि उस की सोच का नजरिया बदलने के कारण मिली है. वास्तव में उस की जो मानसिक ऊर्जा अन्य कामों में लगती थी अब उस के काम में लगने लगी. उस का एक्शन, उस की परफारमेंस में गुणात्मक परिवर्तन ला देता है. उस की अच्छी परफारमेंस से उसे सफलता मिलने लगती है. सफलता उस के आत्मविश्वास को बढ़ा देती है तथा बढ़ा आत्मविश्वास उस के पूरे व्यक्तित्व को ही बदल डालता है जिस के कारण हमेशा बुझाबुझा रहने वाला उस का चेहरा अब अनोखे आत्मविश्वास से भर जाता है और वह जीवन के हर क्षेत्र में सफल होता जाता है. अगर वह अंगूठी या लाकेट पहनने के बावजूद अपनी सोच में परिवर्तन नहीं ला पाता तो वह कभी सफल नहीं हो पाएगा.
इस के आगे व्याख्याता नीरा कौशल ने क्या कहा, कुछ नहीं पता…एकाएक चित्रा के मन में एक योजना आकार लेने लगी. न जाने उसे ऐसा क्यों लगने लगा कि उसे एक ऐसा सूत्र मिल गया है जिस के सहारे वह अपने मन में चलते द्वंद्व से मुक्ति पा सकती है, एक नई दिशा दे सकती है जो शायद किसी के काम आ जाए.
दूसरे दिन वह रमा के पास गई तथा बिना किसी लागलपेट के उस ने अपने मन की बात कह दी. उस की बात सुन कर वह बोली, ‘‘लेकिन अभिजीत इन बातों को बिलकुल नहीं मानने वाले. वह तो वैसे ही कहते रहते हैं. न जाने क्या फितूर समा गया है इस लड़के के दिमाग में… काम की हर जगह पूछ है, काम अच्छा करेगा तो सफलता तो स्वयं मिलती जाएगी.’’
‘‘मैं भी कहां मानती हूं इन सब बातों को. पर अभिनव के मन का फितूर तो निकालना ही होगा. बस, इसी के लिए एक छोटा सा प्रयास करना चाहती हूं.’’
‘‘तो क्या करना होगा?’’
‘‘मेरी जानपहचान के एक पंडित हैं, मैं उन को बुला लेती हूं. तुम बस अभिनव और उस की कुंडली ले कर आ जाना. बाकी मैं संभाल लूंगी.’’
नियत समय पर रमा अभिनव के साथ आ गई. पंडित ने उस की कुंडली देख कर कहा, ‘‘कुंडली तो बहुत अच्छी है, इस कुंडली का जाचक बहुत यशस्वी तथा उच्चप्रतिष्ठित होगा. हां, मंगल ग्रह अवश्य कुछ रुकावट डाल रहा है पर परेशान होने की बात नहीं है. इस का भी समाधान है. खर्च के रूप में 501 रुपए लगेंगे. सब ठीक हो जाएगा. आप ऐसा करें, इस बच्चे के हाथ से मुझे 501 का दान करा दें.’’
प्रयोग चल निकला. एक दिन रमा बोली, ‘‘चित्रा, तुम्हारी योजना कामयाब रही. अभिनव में आश्चर्यजनक परिवर्तन आ गया. जहां कुछ समय पूर्व हमेशा निराशा में डूबा बुझीबुझी बातें करता रहता था, अब वही संतुष्ट लगने लगा है. अभी कल ही कह रहा था कि ममा, विपिन सर कह रहे थे कि तुम्हें डिवीजन का हैड बना रहा हूं, अगर काम अच्छा किया तो शीघ्र प्रमोशन मिल जाएगा.’’
रमा के चेहरे पर छाई संतुष्टि जहां चित्रा को सुकून पहुंचा रही थी वहीं इस बात का एहसास भी करा रही थी, कि व्यक्ति की खुशी और दुख उस की मानसिक अवस्था पर निर्भर होते हैं. ग्रहनक्षत्रों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. अब वह उस से कुछ छिपाना नहीं चाहती थी. आखिर मन का बोझ वह कब तक मन में छिपाए रहती.
‘‘रमा, मैं ने तुझ से एक बात छिपाई पर क्या करती, इस के अलावा मेरे पास कोई अन्य उपाय नहीं था,’’ मन कड़ा कर के चित्रा ने कहा.
‘‘क्या कह रही है तू…कौन सी बात छिपाई, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है.’’
‘‘दरअसल उस दिन तथाकथित पंडित ने जो तेरे और अभिनव के सामने कहा, वह मेरे निर्देश पर कहा था. वह कुंडली बांचने वाला पंडित नहीं बल्कि मेरे स्कूल का ही एक अध्यापक था, जिसे सारी बातें बता कर, मैं ने मदद मांगी थी तथा वह भी सारी घटना का पता लगने पर मेरा साथ देने को तैयार हो गया था,’’ चित्रा ने रमा को सब सचसच बता कर झूठ के लिए क्षमा मांग ली और अंदर से ला कर उस के दिए 501 रुपए उसे लौटा दिए.
‘‘मैं नहीं जानती झूठसच क्या है. बस, इतना जानती हूं कि तू ने जो किया अभिनव की भलाई के लिए किया. वही किसी की बातों में आ कर भटक गया था. तू ने तो उसे राह दिखाई है फिर यह ग्लानि और दुख कैसा?’’
‘‘जो कार्य एक भूलेभटके इनसान को सही राह दिखा दे वह रास्ता कभी गलत हो ही नहीं सकता. दूसरे चाहे जो भी कहें या मानें पर मैं ऐसा ही मानती हूं और तुझे विश्वास दिलाती हूं कि यह बात एक न एक दिन अभिनव को भी बता दूंगी, जिस से कि वह कभी भविष्य में ऐसे किसी चक्कर में न पड़े,’’ रमा ने उस की बातें सुन कर उसे गले से लगाते हुए कहा.
रमा की बात सुन कर चित्रा के दिल से एक भारी बोझ उठ गया. दुखसुख, सफलताअसफलता तो हर इनसान के हिस्से में आते हैं पर जो जीवन में आए कठिन समय को हिम्मत से झेल लेता है वही सफल हो पाता है. भले ही सही रास्ता दिखाने के लिए उसे झूठ का सहारा लेना पड़ा पर उसे इस बात की संतुष्टि थी कि वह अपने मकसद में कामयाब रही ।
सुधा आदेश
Friday, June 14, 2019
हाशिया
हाशिया
घंटी की आवाज सुनकर मनीषा ने दरवाजा खोला...
‘ अरे, तुम लोग...कब आये, कहाँ रूके हो....? बहुत दिनों से कोई समाचार भी नहीं मिला ।’ सामने महेश और नीता को देखकर आश्चर्यचकित रह गई तथा मुँह से निकल पड़ा,
‘दीदी, काफी दिनों से आपसे मिली नहीं थी । इन्हें दिल्ली एक सेमिनार में जाना है । आपसे मिलने की चाह लिये मैं भी इनके साथ चली आई...। ब्रेक जरनी की है, शाम को छह बजे की ट्रेन पकड़नी है । यद्यपि समय कम है पर मेरी आपसे मिलने की इच्छा तो पूरी हो ही गई...।’ उसने उनके चरणस्पर्श करते हुए कहा ।
‘ अच्छा किया...सच में काफी दिनों से मिले नहीं थे पर कुछ और समय लेकर आते तो और भी अच्छा लगता ।’ मनीषा ने नीता को उठाकर गले लगाते हुए कहा पर मन ही मन उसका अपने प्रति प्रेम देखकर गदगद हो उठी ।
आवाज सुनकर सुरेन्द्र भी बाहर निकल आये...महेश को पहचानते ही गर्मजोशी से स्वागत करते हुए वे दोनों भूत और वर्तमान की बातों में मशगूल हो गये ।
नीता तो जब तक रही उसके ही आगे पीछे घूमती रही, मानो वह उसकी छोटी बहन हो । बार-बार अपने सुखी जीवन के लिये उसे धन्यवाद देती हुई । अनेकों बार की तरह ही उसने अब भी उससे यही कहा था....इंसान अपना भविष्य स्वयं ही बनाता बिगाड़ता है अन्य तो निमित्त मात्र ही होते हैं । यह तुम्हारा बड़प्पन है कि तुम अभी तक उस समय को नहीं भूली हो...।’
‘ दीदी, बड़प्पन मेरा नहीं आपका है...आप उन लोगों में से हैं जो किसी के लिये बहुत कुछ करने के पश्चात् भूल जाने में विश्वास रखते हैं । वास्तव में आप ही थीं जिसने मेरी टूटी नैया को पार लगाने में मदद की थी, आपने ही मुझे जीने की नई राह दिखाई, मेरी जिंदगी को नया आयाम दिया वरना पता नहीं आज मैं कहाँ होती...?’
जाते-जाते समय नीता ओर महेश ने कहा कि उन्हें कभी भी कोई आवश्यकता पड़े तो उन्हें अवश्य याद कीजिएगा वे तुरंत आ जायेंगे । उन्हें इस बात का बहुत ही अफसोस था कि सुरेंद्र की बीमारी की सूचना उन्हें नहीं दी गई । वे सुनील और प्रिया के विवाह में भी आये थे तथा घर के सदस्य की तरह नीता ने विवाह की पूरी जिम्मेदारी संभाल ली थी ।
महेश और नीता के जाने के पश्चात् सुरेन्द्र इंटरनेंट खोल कर बैठ गये...शाम को उनकी यही दिनचर्या बन गई थी....देश विदेश की खबरों को इंटरनेट के जरिये जानना या अपने अपने विदेशवासी पुत्र सुनील तथा पुत्री प्रिया से चेटिंग करना...अगर वह भी नहीं तो कंप्यूटर पर ही घंटों बैठे चैस खेलना । उन्हें सास बहू वाले सीरियलस में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं थी । मनीषा ने टी.वी. खोला पर उसमें भी उसका मन नहीं लगा । बंद करके पास पड़ी मैगजीन उठाई, वह भी उसकी पढ़ी हुई थी । आँख बंद करके सोफे पर ही रिलैक्स होना चाहा पर वह भी नहीं संभव हो पाया...उसके मन में पिछले बाइस वर्ष पूर्व की घटनायें चलचित्र की भांति मंडराने लगी...
उस समय वह बलिया में थी....पड़ोस में एक एस.डी.एम. रहते थे । अक्सर उनके घर आते रहते थे ।जब भी वह उनसे विवाह के लिये कहती तो मुस्कराकर रह जाते ।
एक दिन उसने देखा कि एक बुजर्ग व्यक्ति एक बच्चे को लेकर घूम रहे हैं...नौकर से पता चला कि वह साहब के पिताजी है जो उनकी पत्नी और बच्चे को लेकर आये हैं ।
नौकर की बात सुनकर अजीब लगा...महेश अक्सर उनके घर आते थे लेकिन उन्होंने कभी उनसे अपनी पत्नी और बच्चे का जिक्र ही नहीं किया । यहाँ तक कि उन्हें कुंआरा समझकर जब-जब भी उसने उनसे विवाह की बात की तो वह कुछ कहने की बजाय सिर्फ मुस्कराकर रह जाते थे । यह तो उसे पता था कि वह गाँव के हैं...। हो सकता है बचपन में विवाह हो गया हो लेकिन अगर वह विवाहित थे तो वह बताना क्यों नहीं चाह रहे थे ? उन्होंने नहीं बताया तो हो सकता है उनकी कोई मजबूरी रही हो, सोचकर मनमस्तिष्क में चल रही उथल-पुथल पर रोक लगाई ।
जब तक महेश के पिताजी रहे तब तक तो सब ठीक चलता रहा किंतु उनके जाते ही दिलों में बंद चिंगारी भभकने लगी घरों के बीच की दीवार एक होने के कारण कभी-कभी उनके असंतोष की आग का भभका हमारे घर भी आ जाता था । मन करता कि वह जाकर उनसे बात कर असंतोष का कारण जानने का प्रयत्न करे...हमारे भी बच्चे हैं उनके झगड़े का असर हमारे ऊपर भी पड़ रहा है पर दूसरों के आंतरिक मामले में दखलंदाजी न करने के स्वभाव के कारण चुप रही ।
एक दिन बच्चों के स्कूल तथा सुरेंद्र के आफिस जाने के पश्चात् वह बरामदे में बैठी अखबार पढ़ रही थी कि घंटी बजी । दरवाजा खोला तो सामने एक युवती को देखकर चौंक गई...उसने उसे देखकर अपना परिचय देती हुई बोली, ‘दीदी, आप हमें पहचानत नहीं हो, हमार नाम नीता है, हम आपके पड़ोसी है । आपके अलावा हम किसी और को नहीं जानत हैं इसीलिये आपके पास आये हैं । हम बहुत दुखी है । समझ में नहीं आ रहा क्या करब....?’
‘ क्यों क्या बात है...? हमसे जितनी मदद होगी हम करेंगे...।’ उसे दिलासा देते हुए मनीषा ने उसे अंदर बुलाकर बिठाते हुये पूछा ।
‘यह कहत हैं कि हम तोय से तलाक ले लेव, लड़का को तू ले जाना चाह तो ले जाव । तेरे साथ हमारा निबाह संभव नहीं...हम दूसर विवाह करना चाहत हैं ।’ कहते हुए उसकी आँखों से बड़े-बड़े आँसू निकलने लगे थे ।
‘ ऐसे कैसे दूसरा विवाह कर लेंगें...? सरकारी नौकरी में एक पत्नी के होते हुए दूसरा विवाह करना संभव ही नहीं है...फिर तलाक की प्रक्रिया इतनी आसान थोड़े ही है कि मुँह से निकला नहीं और तलाक मिल गया...।’ पानी का गिलास पकड़ाते हुए उसे समझाते हुए मनीषा ने कहा ।
अनजान शहर में किसी के मीठे बोल सुनकर उसका रोना रूक गया । मनीषा के आग्रह करने पर उसने पानी पीया । उसके सहज होने पर मनीषा ने उससे पुनः पूछा,....‘लेकिन वह तलाक क्यों लेना चाहते हैं ?’
‘ कहत हैं...तू पढ़ी लिखी नहीं है । हमारी सोसाइटी के लायक नहीं है । दीदी, आज हम उन्हें अच्छे नहीं लग रहे हैं लेकिन जब हम इनके माय बाप के साथ खेतन में काम करत रहें, गाँव की गृहस्थी को संभालत रहें तब इन्हें यह सब नहीं सूझ रहा था । आज जब डिप्टी बन गये हैं तब कह रहे हैं कि हम इनके लायक नहीं रहे । दस बरस के थे जब हमारा इनसे ब्याह हुआ था । गाँव के एक स्कूल से ही चार जमात तक पढ़े हैं । ये तो हमें गाँव से लाना ही नहीं चाह रहे थे । वह तो इनकी आनाकानी देखकर एक दिन ससुरजी स्वयं ही हमें यहाँ छोड़ गये थे लेकिन यह तो हमसे ढंग से बात भी नहीं करते...।’ कहते हुए उसकी आँखों से आँसू निकलने लगे थे ।
माथे पर बड़ी सी गोल बिंदी...गले में चाँदी की मोटी हँसुली, बालों में रच-रचकर लगाया तेल, मोटी गूँथी चोटी में चटक लाल रंग की रिबन तथा वैसी ही चटक रंग की साड़ी...गाँव वाला ढीला ढाला ब्लाउज में वह ठेठ गंवार तो लग रही थी लेकिन उसके सांवले रंग में भी एक कशिश थी । उसकी बड़ी-बड़ी आँखें अनायास ही किसी को भी अपनी ओर आकर्षित करने में समर्थ थी...लंबी सुतवां नाक, गठीला बदन, ढीले-ढाले ब्लाउज से झाँकता यौवन किसी को मदहोश करने के लिये काफी था...अगर वह अपने पहनने ओढ़ने के ढंग तथा बातचीत करने के तरीके में थोड़ा सुधार ले आये तो निश्चय ही कायाकल्प हो सकता है...।
‘ यदि तुम उनके हृदय में अपनी जगह बनाना चाहती हो तो तुम्हें अपनी पढ़ाई फिर से प्रारंभ करनी होगी तथा अपने पहनने, ओढ़ने तथा बातचीत के लहजे में भी परिवर्तन लाना होगा...।’ मनीषा ने उसे सांत्वना देते हुए कहा ।
‘ दीदी, आप जैसा भी कहब हम वैसा करने को तैयार हैं । बस हमारी जिंदगी संवर जाये ।’ उसने उसके पैर छूते हुए कहा ।
‘ अरे, यह क्या कर रही हो...? बड़ी हूँ इसलिये बस इतना चाहूंगी कि तुम्हारा जीवन सुखी रहे । मैं तुम्हें सहयोग अवश्य दे सकती हूँ पर प्रयास तुम्हें स्वयं ही करना होगा । पहला तो यह कि वह चाहे कितना भी गुस्सा हों तुम चुप रहो । वह एक बच्चे का पिता है । वह स्वयं अपने बच्चे को स्वयं से दूर नहीं करना चाहेगें । यदि तुम स्वयं में परिवर्तन ला पाओ तो कोई कारण नहीं कि वह तुम्हें स्वीकार न करें ।’
‘ आप ठीक कहत हैं दीदी, वह अनूप को बेहद चाहत हैं । उन्होंने उसका एक अच्छे स्कूल में नाम भी लिखा दिया है । कल से वह स्कूल भी जाने लगा है । तभी आज हम समय निकाल कर आपके पास आये हैं ।’
‘ तुम्हें अक्षरज्ञान तो है ही, अतः कुछ किताबें मैं तुम्हें दे रही हूँ , इन्हें तुम पढ़ो, यदि कुछ समझ में न आये तो इस पेंसिल से वहाँ निशान बना देना । मैं समझा दूँगी , सुबह ग्यारह से एक बजे तक फ्री रहती हूँ । कल आ जाना ।’ कुछ पारिवारिक पत्रिकायें पकड़ाते हुए मनीषा ने नीता से कहा ।
‘ दीदी, अब हम चलें, अनूप स्कूल से आने वाला होव ।’ कहते हुए उसके चेहरे पर संतोष की छाया थी ।
‘ ऐसे कैसे ? रूको मैं चाय लाती हूँ ।’
‘ अब चलत हैं चाय फिर कभी...।’ कहते हुये एक बार फिर उसने उसके पैर छू लिये थे । मनीषा के प्यार भरे वचन सुनकर वह काफी व्यवस्थित हो गई थी किंतु फिर भी मन में भविष्य के प्रति अनिश्चितता थी ।
नीता के चेहरे पर छिपी व्यथा ने मनीषा का मन कसैला कर दिया था । पहली मुलाकात में महेश उन्हें अत्यंत भले, हाजिर जबाब तथा मिलनसार लगे थे किंतु पत्नी के साथ ऐसा दुर्व्यवहार...यहाँ तक कि दूसरे विवाह में कोई बाधा उत्पन्न न हो इसलिये अपने पुत्र से भी निजात पाना चाहते हैं । कैसे इंसान है वह ? सच है दुल्हन वही जो पिया मन भाये...किंतु विवाह कोई खेल तो नहीं, फिर इसमें इस मासूम का क्या दोष ? अपने छोटे मासूम बच्चे के साथ अकेले वह अपनी जिंदगी कैसे गुजारेगी...आखिर एक पुरूष यह क्यों नहीं सोच पाता ?
कहीं महेश का किसी और के साथ चक्कर तो नहीं है, एक आशंका मन में उमड़ी...नहीं-नहीं महेश ऐसे नहीं हो सकते । अगर ऐसा होता तो अनूप का दाखिला यहाँ नहीं करवाते...शायद अपनी अनपढ़, गंवार बीबी को देखकर वह हीनभावना के शिकार हो गये हैं और हीनभावना से उपजी कुंठा उनसे वह सब कहलवा देती है जो शायद सामान्य रूप से वह न कहते लेकिन अगर ऐसा है तो वह स्वयं कुछ प्रयास कर उसमें परिवर्तन ला सकते हैं...स्वयं उसे पढ़ा सकते हैं । कई अनुत्तरित प्रश्न लिये वह किचन में चली गई क्योंकि बच्चों का स्कूल से आने का समय हो रहा था । उनके लिये उसे खाना बनाना था ।
दूसरे दिन नीता आई तो अत्यंत उत्साहित थी । उसने एक कहानी पढ़ी थी...यद्यपि वह उसे पूरी तरह समझ नहीं पाई थी पर उसके लिये इतना ही काफी था कि उसने पढ़ने का प्रयत्न किया...। कुछ शब्द या भाव जो वह समझ नहीं पाई थी वहाँ उसने मनीषा के कथनानुसार पेंसिल से निशान बना दिये थे । उन्हें मनीषा ने उसे समझाया ।
नीता के सीखने की उत्कंठा देख मनीषा स्वयं आश्चर्यचकित थी । कुछ ही दिनों में बातचीत में परिवर्तन स्पष्ट नजर आने लगा था...थोड़ा आत्मविश्वास भी उसमें झलकने लगा था ।
एक दिन मनीषा उसको साथ लेकर ब्यूटी पारर्लल गई तथा कुछ साडियाँ खरीदवा कर ब्लाउज सिलने दे आई । कुछ आर्टीफीशियल ज्वैलरी भी खरीदवाई । मेकअप का भी सामान खरीदवाने के साथ उन्हें उपयोग करने के साथ साड़ी बाँधने का तरीका बताया । बाल लंबे थे अतः जूड़ा बाँधने का तरीका बताते हुए तेल कम लगाने का सुझाव दिया । खुशी तो इस बात की थी कि वह उसके सारे सुझावों को ध्यान से सुनती तथा तद्नुसार आचरण करती । वैसे भी अगर शिष्य को सीखने की इच्छा है तो गुरू को भी उसे सिखाने में आनंद आता है ।
एक दिन वह आई तो बेहद खुश थी । कारण पूछा तो बोली,‘ दीदी, कल हम आपकी खरीदवाई साड़ी पहनकर इनका इंतजार कर रहे थे । ये घर के अंदर घुसे तो पहली बार हमें देखते ही रह गये तथा हमसे पूछा कि इतना परिवर्तन तुम्हारे अंदर कैसे आया...? जब हमने आपका नाम बताया तो गदगद हो उठे । कल इन्होंने हमें प्यार भी किया...।’ कहते-कहते वह शर्मा उठी थी ।
नैननक्श तो कंटीले थे ही....हल्के मेकअप तथा सलीके से पहने कपड़ों में उसके व्यक्तित्व में लगातार निखार आता जा रहा था । महेश भी उसमें आते परिवर्तन से खुश था । वह भी शाम को ढंग से सजसंवर कर उसका इंतजार करती...। यही कारण था कि जहाँ पहले वह उसकी ओर ध्यान ही नहीं देता था अब उसने भी उसके लिये अनेकों साड़ियाँ खरीदवा दी थी । एक बार महेश स्वयं मनीषा के पास आकर कृतज्ञता जाहिर करते हुए उसे धन्यवाद देते हुए बोला था,‘ दीदी, मैं आपका अहसान जिंदगी भर नहीं भूलूँगा । मैं तो सोच भी नहीं सकता था कि किसी इंसान में इतना परिवर्तन आ सकता है ।’
‘ महेश भाई, वस्तुतः मुझसे ज्यादा धन्यवाद की पात्र नीता है । उसने यह सब तुम्हें पाने के लिये किया है....वह तुम्हें बहुत चाहती है ।’
इसके बाद दोनों के बीच की दूरी घटती गई । कभी-कभी वे दोनों घूमने भी जाने लगे थे । मनीषा यह सब देखकर बहुत खुश थी ।
एक दिन अपने पुत्र अनूप की अंगे्रजी की पुस्तक लाकर बोली,‘ दीदी, इनसे पूछने में शर्म आती है....यदि आप थोड़ी देर पढा दिया करें तो...।’
उसके हाँ कहने पर वह प्रसन्नता से पागल हो उठी, बोली,‘ दीदी, आपने मेरे जीवन में खुशियाँ ही खुशियाँ बिखेर दी हैं । न जाने आपकी गुरूदक्षिणा कैसे चुका पाऊँगी ?’
‘ अरे पगली, यदि सचमुच मुझे अपना गुरू मानती है तो अपनी पढ़ाई पर ध्यान लगा...एक गुरू के लिये यही काफी है कि उसका शिष्य जीवन में सफल रहे ।
सचमुच ही छह महीने के अंदर ही उसने सामान्य बोलचाल के शब्द लिखना पढ़ना सीख लिया था । कहीं-कहीं अंग्रेजी शब्दों तथा वाक्यों का प्रयोग भी करने लगी थी...वैसे भी भाषा निरंतर उपयोग से ही सजती, संवरती और निखरती है...।
तभी सुरेंद्र का ट्रान्सफर हो गया...पत्रों के माध्यम से संपर्क सदा बना रहा । वह बराबर लिखती रहती थी । अपने बेटे अनूप के विवाह में हफ्ते भर पहले आने का आग्रह उसका सदा रहा है , बेटी रिया का कन्यादान भी वह उसके हाथों से कराना चाहती है...। उसके पत्रों में छिपी भावनायें उसे भी पत्र का उत्तर देने के लिये प्रेरित करती रही थीं....यही कारण था कि पिछले दस वर्षो से मिल न पाने पर भी उसके परिवार की एक-एक बात उसे पता थी...। आज के युग में लोग अपनों से भी इतनी आत्मीयता, विश्वास की कल्पना नहीं कर सकते, फिर वह तो पराये थे ।
‘ सुनो, कहाँ हो...सुनील का मैसेज आया है...।’ सुरेंद्र ने उसे पुकारते हुए कहा ।
‘ सुनील का मैसेज...क्या लिखा है ? सब ठीक तो है न...।’ विचारों के चक्रव्यूह से बाहर निकलते हुए मनीषा ने अंदर जाते हुए पूछा । वस्तुतः पिछले पंद्रह दिनों से उसका कोई समाचार न आने के कारण वे चिंतित थे....एक दो बार फोन किया पर किसी ने भी नहीं उठाया । आनसरिंग मशीन पर मैसेज छोड़ने के पश्चात् भी हफ्ते भर से किसी ने कान्टेक्ट करने का प्रयत्न नहीं किया था ।
लिखा है....हम कल ही स्विटजरलैंड से लौटे हैं...। प्रोग्राम अचानक बना इसलिये सूचित नहीं कर पाये । इस बार भी शायद हमारा इंडिया आना न हो पाये । बार-बार छुट्टी नहीं मिल पायेगी । अगर आप लोग आना चाहें तो टिकट भेज दें ।
इसके बाद उससे कुछ भी सुना नहीं गया...सब बहाना है । बाहर घूमने के लिये छुट्टी तो मिल सकती है पर माता-पिता से मिलने के लिये नहीं । दरअसल वे यहाँ आना ही नहीं चाहते हैं । माँ बाप के प्यार की उनके लिये कोई कीमत ही नहीं रही है । पिछले चार वर्षो से कोई न कोई बहाना बनाकर आना टाल रहे है...उस पर भी एहसान दिखा रहे हैं...अगर आना चाहे तो टिकट भेज दें...। एक बार तो जाकर देख ही आये हैं...सोचकर बड़बड़ा उठी थी मनीषा...।
पर तुरंत ही उसने अपने नकारात्मक विचारों को झटका...उसको यह क्या होता जा रहा है...? वह पहले तो कभी ऐसी नहीं थी । बच्चों के अवगुणों में गुण ढूँढना ही तो बड़प्पन है....हो सकता है कि सच में उसे छुट्टी न मिल रही हो । वह स्वयं नहीं आ पा रहा है तो उन्हें बुला तो रहा है । बात तो एक ही है...मिलजुलकर रहना...वहाँ का जीवन ही इतना व्यस्त है कि लोगों के पास अपने लिये ही समय नहीं है तो उसमें उनका क्या दोष ?
इस सबके बावजूद न जाने क्यों कुछ दिनों से उसे ऐसा लगने लगा था कि सच में कभी-कभी कुछ लोग अपने न होते हुए भी बेहद अपने बन जाते हैं और अपने, कर्तव्यों की आड़ में अपनों को ही हाशिये पर खिसकाते जा रहे हैं । उसने कभी किसी की हाशिये पर खिसकती जिंदगी को नया आयाम दिया था....चाहे कुछ भी हो जाये वह अपनी जिंदगी को हाशिये पर खिसकने नहीं देगी । वक्त जरूर बदल गया है, वक्त के साथ लोग भी....और शायद जिंदगी के अर्थ भी....पर बदलते वक्त के साथ स्वयं को बदलते हुए उसी अंदाज में अपनी बाकी जिंदगी गुजारेगी जिस अंदाज में आज तक रहती आई है...। इस विचार ने उसे तनावमुक्त कर दिया....माथे पर लटक आई लट को झटका, पास पड़ा रिमोट उठाया और टी.वी. आन कर दिया...।
सुधा आदेश
Tuesday, March 19, 2019
लोन माफ़ी का शोर मचा है
लोन माफ़ी का शोर मचा है
मुफ़्त खाने का रोग लगा है
मेहनत मज़दूरी क्यों करें
सरकार ने हमारा ठेका लिया है ।
कोई मेहनत करे, कोई ऐश करे
ज़माने का शग़ल समझ में आता नहीं,
तरक़्क़ी कैसे करेगा यह देश
जब अपाहिजों की क़तार लगी ।
अभी न संभले तो कभी न संभलेंगे
दूसरों पर क्यों,स्वयं पर करो यक़ीं
मेहनत करेंगे हाथ,किस्मत अवश्य बदलेगी
मानो न मानो लाख टके की है बात ।
प्रियंका बढेरा गांधी कहती हैं कि अमीर लोग चौकीदार रखते हैं ...
प्रियंका वाड्रा गांधी कहती हैं कि अमीर लोग चौकीदार रखते हैं... सही बात । अमीरों को अपनी संपत्ति तथा जानमाल की रक्षार्थ चौकीदार रखना पड़ता है जबकि गरीब स्वयं ही मालिक है तथा चौकीदार भी । उसे अपने घर, अपने बच्चों की चौकीदारी स्वयं ही करनी पड़ती है ।
व्यक्ति की बात छोड़िये, हमारी संवैधानिक संस्थाओं की स्थापना की मूल भावना भी तो व्यक्ति के,समाज के अधिकारों की रक्षार्थ की गई हैं । व्यापक अर्थ में देखें तो वे समाज के चौकीदार हुए न ।
अगर हम सब वास्तव में चौकीदार बन जाएं तो काफी हद तक देश में फैली बुराइयां...भ्रष्टाचार, अनाचार का समूल नाश हो जाएगा । बस अपना-अपना किरदार ढंग से निभाना होगा । घर में भी घर के सभी सदस्य थोड़ी-थोड़ी जिम्मेदारी उठायें तो काम सुव्यवस्थित ढंग से हो पाता है । इतने बड़े देश को कोई एक स्वच्छ एवं सुव्यवस्थित नहीं रख सकता । हम सभी प्रयास करें देश को बदलते देर नहीं लगेगी ।
Saturday, February 23, 2019
बेहद दुखी हैं हम...
अवंतिपुरा में सी.आर. पी.एफ.जवानों पर आतंकी हमला...26 जवान शहीद । देश का बड़ा नुकसान । पक्ष विपक्ष के बयान यह सोचने को विवश करते हैं कि क्या हो गया है नेताओं को ? क्या दुख की घड़ी में भी वे एकमत नहीं हो सकते ?
सेना को सशक्त क्यों नहीं करते ? उनके लिये खरीदे जाने वाले विमान, तोपे, जीपें सदा संदेह और बहस का मुद्दा क्यों बन जाते हैं ?
भारत चीन युद्ध के समय देशवासियों ने सेना की धन से
कपडों से मदद की थी ,अब भी कमोवेश यही स्तिथि है । लोग अन्य जगह भ्रष्टाचार की दुहाई नहीं देंगे लेकिन जब सेना को मजबूत बनाने के लिये कोई डील होती है वह संदेह के घेरे में आ जाती है ।
जिन्हें देश से प्यार है वे ऐसा कर ही नहीं सकते ...
देश के लिये, हमारे लिये शहीद होने वाले जवानों को शत-शत नमन ।
मत भूलिए देश है तो हम हैं जो देश को प्यार नहीं करता
उसे इस देश में रहने का अधिकार नहीं है ।
Monday, September 10, 2018
SUDHA ADESH: कमज़ोर नहीं हैं बेटियाँ
SUDHA ADESH: कमज़ोर नहीं हैं बेटियाँ: हमारी बेटियाँ कमज़ोर नहीं हैं बेटियाँ कमज़ोर बनाते हैं हम उन्हें यह न करो, वह न करो के बंधनों में बाँधकर । लड़कों को तो नहीं टोकते,रोकते ...
कमज़ोर नहीं हैं बेटियाँ
हमारी बेटियाँ
कमज़ोर नहीं हैं बेटियाँ
कमज़ोर बनाते हैं हम उन्हें
यह न करो, वह न करो के
बंधनों में बाँधकर ।
लड़कों को तो नहीं टोकते,रोकते
लड़के हैं ग़लती हो गई,
कर देते हैं सारे गुनाह माफ़...
काश !लडकियों से भी यही कह पाते ।
शरीर को शरीर ही रहने देते
पवित्रता ,अपवित्रता से न जोड़ते,
चिड़िया सा चहचहाने,कोयल सा गुनगुनाने देते,
तब हमारी बेटियाँ कमज़ोर न होतीं ।
सृष्टि की जन्मदातरी,सहनशीलता समाई
जिसकी रग-रग में ,कमज़ोर हो नहीं सकती ,
हमें बदलना होगा,बेटियों के प्रति नज़रिये को
जब नर अपवित्र नहीं तो नारी क्यों ?
सोच बदल पाये गर समाज की हम
दुष्कर्म नारी के लिये कलंक नहीं,
यातना नहीं ,बोझ नहीं, अभिशाप नहीं,
सिरफ हादसा होगा, सिर्फ़ एक हादसा ।
@सुधा आदेश
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