Wednesday, August 1, 2018

आस है तो जीवन है रीत गया जीवन जैसे कोई पुराना घड़ा घड़ा तो फिर भर जाएगा रीता जीवन कैसे भर पायेगा ? घड़ा तो घड़ा है निर्जीव है घुटन ,संताप से दूर है लोग आयेंगे, प्यास बुझायेंगे रीते जीवन को कौन भर पायेगा ? रीत तो नदिया भी जाती है पावस की सुहानी बूंदे बरस-बरस कर धरती से गगन का कराती है मिलन रीती नदिया सैकड़ों बांध तोड़कर धरा की प्यास बुझा जाती है । हे पागल मन मत हो निराश स्नेह की नन्हीं-नन्हीं बूँदें फिर आयेंगी, सहलाकर तन-मन को रीते मन को, रीते जीवन को प्यार की खुशबू से भर जायेंगी... मत भूलना आस है तो जीवन है । @सुधा आदेश

Tuesday, July 31, 2018

रुकना मेरा काम नहीं

रुकना मेरा काम नहीं 

 मैं जल की बहती धारा, रूकना मेरा काम नहीं 
चल सको तो चलो साथ मेरे, मत कहना कहा नहीं ।

 जीवन है थोड़ा क्या पाया क्या खोया ,रखा हिसाब नहीं, कर्तव्य पथ पर चलती रही, पाया कभी विश्राम नहीं ।

 कट जायेगा बचा जीवन भी ,रही कोई आस नहीं 
साथ मेरे कर्म , दुनिया रूठे आंच नहीं । 

 न रहूँ आश्रित किसी के, विश्वास कभी टूटे नहीं 
चलना ही जीवन मकसद रहे,डगमगाये कभी कदम नहीं ।

 @ सुधा आदेश

Thursday, March 29, 2018

गुलशन नया

गुलशन नया 

 प्यार और नफरत के मध्य है धुंधला आवरण,
 प्यार ने मरने न दिया नफरत ने जीने न दिया । 

 प्यार करो दिल की गहराइयों से, 
नफ़रत इतनी ही करो दिल में थोड़ी गुंजाइश रहे । 

 रहना हमको भी यहीं तुमको भी यहीं, 
फिर क्यों नफ़रत में दिन जाया करें । 

 दिल से निकालकर नफरतों के नागफ़नी,
 आओ मिलें गले सजायें गुलशन नया । 

 @ सुधा आदेश

Thursday, March 1, 2018

रंग बरसे, आई होली, हर चेहरे पर हँसी ठिठोली...

आई होली रंग बरसे, आई होली हर चेहरे पर हंसी ठिठोली । गुझिया बानी, अनरसे बने दही भल्ले की हॉट लगी । चुग-चुग खाये हर घर में जाति पाति की दीवार ढही । रंगे सभी एक ही रंग में अमीर-गरीब की खाई मिटी । रंग लो मन को प्यार के रंग में रहे न ईर्ष्या द्वेष भाव कहीं । हम सब एक ही भारत मां के अंश समझ लो एक बात सही । सब मिलकर रचो विश्व नया हर दिन होली ,रुंधे न हंसी ठिठोली । शुभ होली @सुधा आदेश

Wednesday, December 13, 2017

ख़ूबसूरत ज़िंदगी मिली, जी नहीं पाये पता नहीं क्यों ?

ख़ूबसूरत ज़िंदगी मिली जी नहीं पाये पता नहीं क्यों ? आँखों में अनेकों हसरतें पलती रहीं अधूरी रहीं, पता नहीं क्यों ? लबों पर शब्द अटके रहे कह नहीं पाये पता नहीं क्यों ? पाँव थिरकने को आतुर हुये थिरक नहीं पाये पता नहीं क्यों ? झिझक थी या मजबूरी रही अनबूझ पहेली पता नहीं क्यों ? उलझा रहा जीवन कर्तव्यों के जंगल में उबर नहीं पाये पता नहीं क्यों ? कल इतिहास बन जायेगी ज़िंदगी जी लूँ, मन में द्वन्द पता नहीं क्यों ?

Thursday, August 24, 2017

कल एक न्यूज़ चैनल में एक मौलवी कह रहे थे कि तलाक़ के बाद औरत हरामज़ादी हो जाती है । एक आम आदमी की बात तो छोड़िये एक मौलवी की औरत के प्रति इतनी घृणित सोच...ओफ !...बेहद शर्मनाक । केवल क़ानून बनाने से कुछ नहीं होगा । औरतें चाहे किसी भी धर्म या सम्प्रदाय की हों उन्हें स्वयं को को इतना सबल एवं जागरूक बनाना होगा जिससे कि वे निज पर होते अत्याचार के प्रति आवाज़ उठा सकें ।

Monday, May 29, 2017

रिश्तों में पारदर्शिता

रिश्तों में कटुता आज आम बात हो गई है...अगर रिश्तों में पारदर्शिता के साथ आपसी समझ आ जाये तो कोई कारण नहीं कि रिश्ते सावन की नरम फुहार बन जीवन को महका जायें ।