Wednesday, July 13, 2016
एक निर्जीव वस्तु के लिये सजीव,निर्दोष कली को सज़ा क्यों ?
सज़ा क्यों
फिर सुना
एक नवविवाहिता को
उसके सुहाग के
लाल जोड़े ने
शोला बनाकर
जला डाला ।
हाथ की
लाल मेंहदी का
रंग अभी
उतरा भी न था
कि उसके
माँग के लाल
सिंदूर ने
जन्म-जन्म
साथ निभाने का
वायदा तोड़ डाला।
अग्नि के सात
फेरों के साथ
आकार लेते अरमान
फूल बनने से पूर्व ही
रौंद डाले गये ।
एकांत कोने में पड़ी
माथे की गोल-गोल
बिंदिया चीतकार कर उठी
एक निर्जीव
वस्तु के लिये
सजीव, निर्दोष
कली को
सज़ा क्यों
सज़ा क्यों ?
Tuesday, July 12, 2016
देश प्रेम और देश द्रोह के बीच जंग जारी है
देश प्रेम और देश द्रोह के बीच जंग जारी है ,
देशद्रोही नारे सुनकर, खून न खोले वह खून नहीं पानी है ।
देशप्रेम माँ के खून की तरह रग-रग में समाया है,
सिर्फ़ कहने से ही कोई देशप्रेमी बन नहीं जाता ।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अनाचार बंद करो,
उच्च श्रंखलता पर अंकुश ज़रूरी,माँ ने नहीं सिखाया तो अब सीखो ।
नैतिकता का नहीं ज़रा भी नहीं भान, कैसे हो तुम देशवासी,
जिनकी जड़ो में लगा हो धुन, वह क्या देंगे माँ भारती को सम्मान ।
अब तो चेतों, अभी न संभले तो कब सँभलोगे,
जब देश ही नहीं रहेगा तो तुम कहाँ रहोगे ?
मानव हो मानवीय गुण अपनाओ...
छोड़ कर बंदूक़ें प्रेम की गंगा बहाओ ।
तुम सुधरोगे देश सुधरेगा...
विश्व के पटल नाम भारत का होगा ।
Monday, July 11, 2016
निशीथ के गहन अंधकार में
अंधेरों के वलय
निशीथ के गहन अंधकार में
अतीत की गहराइयों में डूबकर
न जाने क्यों
हो रही हूँ व्यथित ?
अतीत...
नैराशय और व्यथा से पूर्ण
चाहती हूँ भुलाना
परन्तु असंभव
छलावा मात्र...
रह-रहकर मंडराना
मन-मस्तिष्क में
अनकही विवशता,बेचैनी...
न कब, किस घड़ी
अतीत को छोड़
अभिशपत, अग्नि दग्ध
ह्रदय को
सावन की सुखद सलोनी
बूँदों से कर शीतल,
भविष्य के सुनहरे
स्वप्नों की ओर
हो पाऊँगी अग्रसर ।
Sunday, July 10, 2016
संघर्ष का नाम ही तो ज़िंदगी है ...
ज़िन्दगी
संघर्ष का नाम ही तो
ज़िंदगी है ,
जीवन के कुछ पलों में
जब होती है निराशा
लेना चाहिये तब
काम धैर्य से
क्योंकि ...
निराशा के पश्चात ही
होता है आशा का प्रादुर्भाव
और ...
दुख की तपिश से
जलते तन-मन को
सुख की चन्द्रिका
आत्मिक सुकून का
कराती है अहसास ।
Friday, July 8, 2016
ज़िन्दगी एक स्वप्न है...
ज़िन्दगी
ज़िन्दगी एक स्वप्न है
वास्तविकता से दूर,
नैराशय के टूटे खंडहरों में
दुख और व्यथा से पूर्ण,
बहता रहता है जहाँ
सुख-दुख का अथाह सागर ।
सृष्टि के इस महान रहस्य को
कोई नहीं जान पाता
प्रयत्न करता है यदि कोई
स्वयं उलझ जाता है
विश्व रूपी पिंजड़े में ।
Friday, March 25, 2016
आख़िर कोई इंसान इतना निर्दयी कैसे हो जाता है
दिल्ली में डा०पंकज नारंग की नृशंस हत्या मन में अनेकों प्रश्न पैदा कर रही है । आख़िर कोई भी इंसान इतना निर्दयी कैसे हो जाता है कि न उसे मासूम बच्चे का रूदन सुनाई देता है और न ही पत्नी की चीख़ पुकार । क्या उसे अपना अपअसमय मान व्यक्ति की जान से अधिक प्यारा होता है ? न जाने यह व्यक्ति की कैसी सोच है ? अगर हम नहीं बदले,बच्चों को अच्छे संस्कार देने में नाकामयाब रहे तो मानवता को कुमहलाने से कोई नहीं रोक पायेगा ।
Thursday, March 24, 2016
ये भटके हुये लोग
कांग्रेस ने वीर सावरकर को ग़द्दार कहा ...कांग्रेस के इन नेताओं को अंडमान जाकर अपनी स्मृति को पैना कर लेना चाहिये । तब शायद ये भटके लोग स्वतंत्रता सैनानियों
को ग़द्दार कहने का साहस न कर पायें । हम भारत के सामान्य नागरिक हैं पर हमें देशद्रोही और देशप्रेमी में अंतर करने की समझ है अब इनके इस तरह की हरकतें या बयान
विचलित नहीं करते क्योंकि मुझे विश्वास है कि देश का हर अमन पसंद आदमी एेसे लोगों से किनारा कर लेगा जो देश के विकास में बाधक हैं ।
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