Tuesday, November 8, 2011
मुखोटा
इंसान अपने चेहरे पर न जाने कितने मुखोटे लगाए रहता है । अंदर से कुछ बाहर से कुछ...सच तो यह है कि कभी-कभी वह स्वयं ही मुखोटे के पीछे छिपे अपने चेहरे को नहीं पहचान पाता या अपने अहंकार के वशीभूत इसे स्वीकार करने में हिचकता है पर शायद वह नहीं जानता कि वह दूसरों को धोखा दे सकता है पर स्वयं को नहीं...
मुखोटा
जो स्वयं के साथ सच्चा नहीं
वह दूसरों के साथ सच्चा कैसे होगा,
साथ चलना है तो चलेंगे ही
पर विश्वास पर दाग लगा ही होगा...।
अपनों के साथ छल कपट कर
गर तुम आगे बढ़े भी
मत भूलो, स्वयं तुम्हारा भी
भला नहीं होगा....।
मुखोटों में कैद
ज़िंदगी भी क्या जिदगी,
छिपकर नज़रों से अपनी
जीना भी भला जीना होगा....।
जीना है तो जियो शान से
आत्मसम्मान, आत्मगौरव के संग,
विश्वास करो न करो तुम
सारा जमीन,सारा आकाश तुम्हारा होगा....।
सुधा आदेश
Sunday, November 6, 2011
मन
मन को आज तक कोई नहीं समझ पाया है मन अगर चाहे कठिन से कठिन समस्याओ का हल चुटकियों मे कर दे,नहीं तो सरल से सरल समस्याओ के समाधान में महीनो लगा दे....किसी ने सच ही कहा है....मन की गति मन ही जाने....मेंने मन की गति को कुछ इस तरह उकेरने का प्रयत्न किया है....
उलझनों में घिरा मन
अगर मगर में हैरान परेशान मन
फिर भी चलता चला
जा रहा है मन...।
कितना कैद रहे मन,
उड़ना है तो उड़ेगा मन
फिद्रत से मजबूर मन....
हँसोगे तो हँसेगा मन
रोओगे तो रोएगा मन
नाचता नचाता रहा सदा मन....।
आवश्यकता में तीव्रता से भागा मन
रुका तो रुका ही रह गया मन,
मन को ही नहीं समझ पाया मन...।
मित्र बना जब मन का मन,
अंधेरों में जुगनू सा जगमगाया मन,
इन्द्रधनुष सा लहराया, सुकून पाया मन....।
Wednesday, October 12, 2011
शुभकामनाये
मेरा आँचल रहा मरहूम,
तुम आई दिल मे बसी
मेरे ख्वाबो की
अनमोल कड़ी सी....
दिल को सुकून मिला
ख्वाबो को विश्राम मिला
आवाज ने तुम्हारी भर दिया
दिल का सूना कोना....
दूर हो पर फिर भी
पास इतनी ज्यो चाँद से चाँदनी....
खुशी के इस दिन
दुआ बस इतनी....
महकता जीवन सदा रहे
खुशियाँ के रंगो से
भरपूर प्यार मिले
जीवन के हर रिश्ते से....
प्यार की हर सौगात
सर आंखो पर लेना
ईर्ष्या द्वेष से रहना सदा दूर
पा लोगी कल्पनातीत जहां...।
तुम आई दिल मे बसी
मेरे ख्वाबो की
अनमोल कड़ी सी....
दिल को सुकून मिला
ख्वाबो को विश्राम मिला
आवाज ने तुम्हारी भर दिया
दिल का सूना कोना....
दूर हो पर फिर भी
पास इतनी ज्यो चाँद से चाँदनी....
खुशी के इस दिन
दुआ बस इतनी....
महकता जीवन सदा रहे
खुशियाँ के रंगो से
भरपूर प्यार मिले
जीवन के हर रिश्ते से....
प्यार की हर सौगात
सर आंखो पर लेना
ईर्ष्या द्वेष से रहना सदा दूर
पा लोगी कल्पनातीत जहां...।
Sunday, October 2, 2011
गांधी जयंती
आज फिर गांधी जयंती समारोह मे
जाने के लिए साल भर से उपेछित
बंद बक्सो से खादी के
कुर्ते पाजामे निकाल आए हे....
गांधीजी की प्रतिमा से
धूल मिट्टी की इंचों पड़ी धूल को
साफ कर पानी से धुलवाया गया हे।
चश्मे की ऐक कमानी टूट गई हे तो क्या
हारी थकी नेराश्य से भरी आंखो मे चश्मा तो हे,,,,
लंगोटी तार-तार हो चुकी हे तो क्या
महान भारत की लाखो करोणों जनता भी
तो ऐसे ही वस्त्रो से सुस्स्जित हे।
जनता जनार्दन को तीन घंटो का
इंतजार करा कर
खादी के वस्त्रो मे सुशोभित नेताजी
सभास्थल पर पहुंचे,
गांधीजी के आदर्शो को
अनमयस्क मन से दोहरा कर,
उनका जयगान कर हारे थके घर लोटे,
पत्नी से बोले,
खादी के इन मोटे कपड़ो का बोछ
अब सहा नहीं जाता
पेरिस से मंगाया मेरा
सिल्क का कुर्ता पाजामा ले आओ
तथा इन्हे बक्सो मे बंद कर दो....।'
उनकी बात सुनकर
अर्धांगिनी ने चुहुल करते हुए कहा,
' इन वस्त्रो मे आप सच्चे नेता लग रहे हो
श्वेत धवल कपड़ो मे सचमुच चमक रहे हो....।'
सुनकर नेताजी के चेहरे पर चमक आई
फिर स्वयं को सोफे मे
छिपाते हुए मायूस स्वर मे बोले,
' क्यो मज़ाक बनती हो,
एक समय था जब खादी
स्वच्छ विचारो तथा पवित्रता का प्रतीक थी
पर आज यही खादी,
ढोंग और ढकोसलो का पर्याय बन गई हे....
गांधीजी और गांधीवाद से
आज किसी का वास्ता नहीं रहा
आज तो यह सिर्फ सत्ता सुंदरी तक
पहुँचने का जरिया बन गई हे
जालसाजी, भ्रष्टाचार,रिश्वत और घोटालो के युग मे
उनके आदर्श तार-तार हो गए हे
निज स्वार्थ हेतु लोग देश की अस्मिता को
विदेशियों के हाथ बेच कर
अपनी तिजोरियाँ भर रहे हे
पर मे ऐसा नहीं कर सकता
वर्ष मे एक बार खादी धारण कर
उस महान आत्मा को
याद करना अलग बात हे
पर इसे धारण कर
नित्य उनकी आत्मा पर
होते प्रहारों को सह नहीं सकता
अब न स्वयं को बदल सकता हूँ न समाज को....
शायद यही अब हमारी नियति बन चुकी हे..।'
साफ कर पानी से धुलवाया गया हे।
चश्मे की ऐक कमानी टूट गई हे तो क्या
हारी थकी नेराश्य से भरी आंखो मे चश्मा तो हे,,,,
लंगोटी तार-तार हो चुकी हे तो क्या
महान भारत की लाखो करोणों जनता भी
तो ऐसे ही वस्त्रो से सुस्स्जित हे।
जनता जनार्दन को तीन घंटो का
इंतजार करा कर
खादी के वस्त्रो मे सुशोभित नेताजी
सभास्थल पर पहुंचे,
गांधीजी के आदर्शो को
अनमयस्क मन से दोहरा कर,
उनका जयगान कर हारे थके घर लोटे,
पत्नी से बोले,
खादी के इन मोटे कपड़ो का बोछ
अब सहा नहीं जाता
पेरिस से मंगाया मेरा
सिल्क का कुर्ता पाजामा ले आओ
तथा इन्हे बक्सो मे बंद कर दो....।'
उनकी बात सुनकर
अर्धांगिनी ने चुहुल करते हुए कहा,
' इन वस्त्रो मे आप सच्चे नेता लग रहे हो
श्वेत धवल कपड़ो मे सचमुच चमक रहे हो....।'
सुनकर नेताजी के चेहरे पर चमक आई
फिर स्वयं को सोफे मे
छिपाते हुए मायूस स्वर मे बोले,
' क्यो मज़ाक बनती हो,
एक समय था जब खादी
स्वच्छ विचारो तथा पवित्रता का प्रतीक थी
पर आज यही खादी,
ढोंग और ढकोसलो का पर्याय बन गई हे....
गांधीजी और गांधीवाद से
आज किसी का वास्ता नहीं रहा
आज तो यह सिर्फ सत्ता सुंदरी तक
पहुँचने का जरिया बन गई हे
जालसाजी, भ्रष्टाचार,रिश्वत और घोटालो के युग मे
उनके आदर्श तार-तार हो गए हे
निज स्वार्थ हेतु लोग देश की अस्मिता को
विदेशियों के हाथ बेच कर
अपनी तिजोरियाँ भर रहे हे
पर मे ऐसा नहीं कर सकता
वर्ष मे एक बार खादी धारण कर
उस महान आत्मा को
याद करना अलग बात हे
पर इसे धारण कर
नित्य उनकी आत्मा पर
होते प्रहारों को सह नहीं सकता
अब न स्वयं को बदल सकता हूँ न समाज को....
शायद यही अब हमारी नियति बन चुकी हे..।'
सुधा आदेश
Friday, September 30, 2011
अतीत
अतीत से चिपके रहना बुद्धिमानी नहीं हे कहा भी गया हे कि जो व्यक्ति अतीत से चिपका रहता हे वह जीवन मे कभी उन्नति नहीं कर सकता पर यह भी सच हे अतीत और वर्तमान के अनुभव ही हमे भविष्य की दशा और दिशा निर्धारित करने मे समर्थ बनाते हे....यदि अतीत कि कठिनाइयो से इंसान सबक नहीं लेता तो शायद आविष्कार ही न होते। आविष्कार आवश्यकता कि जननी हे अगर ऐसा नही होता तो आज भी हम आज भी चूल्हे पर खाना बना रहे होते, बेलगाड़ी मे यात्रा कर रहे होते और तो और हमारे घरो मे डिबरियों से ही रोशनी हो रही होती....शिक्षित इंसान का कर्तव्य हे कि वह अपने ज्ञान के प्रकाश से अपने घर का ही अंधेरा दूर न करे वरन दूसरे के घर के अंधरे को दूर करने का प्रयास करे तभी वह सच्चे अर्थो मे समाज की सेवा कर अपना मानव धर्म निभा पाएगा कार्य के प्रति समर्पित इन्सानो के कारण ही यह दुनिया रहने योग्य बनी हे वरना कुछ लोग तो अपनी करनी से विषबेल बोने की कोशिश मे लगे हे....हमे उनके इरादो को नेस्तनाबूद कर आगे बढ़ना होगा तभी हम विकास कर पाएगे
Thursday, September 29, 2011
बचपन
जीवन की निष्पाप अवस्था हे बचपन
कवि की निर्दोष कल्पना हे बचपन,
माँ की ममता की लोरी की तान हे बचपन
पिता के सुदृद बाहो का झूला हे बचपन,
भाई बहन की मीठी तकरार हे बचपन
संगी साथियो की मीठी नौक झौक हे बचपन,
चपलता, चंचलता, नटखटता का नाम हे बचपन
अनोखा,अनमोल सबसे प्यारा न्यारा हे बचपन,
कभी गुदगुदाता तो कभी रुलता हे बचपन
कर्तव्यो के बीहड़ जंगल मे जीना सिखाता हे बचपन,
जवानी का संबल हे बचपन
बुढ़ापे का उपहार हे बचपन,
रूप बदला, रंग बदला,न कभी बदला हे बचपन
यादों के झरोखो मे सदा टिमटिमाता रहा बचपन।
Monday, August 29, 2011
आज मेरी माँ को गए दो वर्ष हो गए पर ऐसा लगता हे वह आज भी मेरे आस पास ही हे जब में परेशांन होती हूँ तो वह चुपचाप आकर मेरे सर पर हाथ रख कर मुझे दिलासा देती हे...में रोटी हूँ तो उनके हाथ मेरे आंसू पोंछ देते हे....उनकी बड़ी-बड़ी आँखे आज भी मेरे आने का इंतजार करती हे तथा मेरे जाने की खबर सुनकर उदास हो जाती हे....आज भी वह मेरी मार्गदर्शक हे....मेरी छोटी से छोटी ख़ुशी उनके चहरे पर ख़ुशी तथा मेरा छोटे से छोटा दुःख उनके चहरे पर उदासी ले आता हे....वह जहाँ कही भी हो सुखी हो....उनका आशिशो भरा हाथ हमारे सर पर हो....यही कामना हे....
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